प्रतिबंध के बावजूद क्यों प्लास्टिक से पटी है दिल्ली की नालियां और यमुना?
1 जुलाई 2022 को देश भर में सिंगल‑यूज़ प्लास्टिक पर औपचारिक प्रतिबंध लगाया गया, जिसे अब 3 साल से अधिक हो चुके हैं। लेकिन राजधानी दिल्ली की नालियों, यमुना के किनारों, झीलों और जलभराव वाले इलाक़ों को देखकर यह सवाल बार‑बार उठता है कि क्या यह प्रतिबंध कागज़ों से बाहर भी कहीं लागू है? प्लास्टिक की थैलियां, कप-प्लेट, स्ट्रॉ, रैपर और पैकेजिंग सामग्री आज भी दिल्ली में हर जगह दिखती हैं।
यह बिखराव केवल कूड़े की समस्या नहीं है। यह शहर के जल तंत्र पर एक अदृश्य लेकिन लगातार बढ़ता दबाव बना रहा है। यह समस्या सिर्फ कचरे तक सीमित नहीं है, इसका असर पानी, स्वास्थ्य और शहर के प्रशासन पर भी पड़ता है। और इन तीनों मोर्चों पर दिल्ली पहले से दबाव में है।
प्लास्टिक का असर: नालियों से यमुना तक
दिल्ली में 2018 से पतले प्लास्टिक बैग पर रोक और जुलाई 2022 से चिन्हित सिंगल‑यूज़ प्लास्टिक उत्पादों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस प्रतिबंध का उद्देश्य प्लास्टिक कचरे को स्रोत पर ही रोकना और जल‑मिट्टी को लंबी अवधि में होने वाले नुकसान से बचाना है।
जुलाई 2025 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंध के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष टास्क फोर्स गठित की गई हैं।
साथ ही निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ऑनलाइन डैशबोर्ड और शिकायत निवारण प्रणाली भी सक्रिय है। इसके बावजूद भी ज़मीनी स्तर पर अनुपालन की स्थिति असमान बनी हुई है। लेकिन ज़मीन पर यह नीति उतनी असरदार नहीं दिखी।
उपभोक्ता सुविधा चाहते रहे। छोटे व्यापारी वैकल्पिक उत्पादों की लागत और उपलब्धता से जूझते रहे। आपूर्ति शृंखला को न तो स्पष्ट दिशा मिली, न पर्याप्त समर्थन। नतीजतन, प्रतिबंध ज़मीन पर कमजोर पड़ता गया।
दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के आंकड़ों के अनुसार राजधानी में प्रतिदिन एक हज़ार टन से अधिक प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। हालांकि निगरानी, निरीक्षण, जब्ती और जुर्माना लगाने की कार्रवाई भी की जाती रही है लेकिन बावजूद इसके बाज़ारों में प्रतिबंधित चीजें भी खुलेआम बिकती हैं।
केंद्र सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, देशभर में जुलाई 2022 से लेकर नवंबर 2025 तक 8.61 लाख से अधिक निरीक्षण, 1985 टन प्रतिबंधित सिंगल-यूज़ प्लास्टिक की जब्ती और लगभग 19.8 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जा चुका है।
ये आंकड़े बताते हैं कि प्रवर्तन मौजूद है, लेकिन उसका असर कचरे के प्रवाह को रोकने में अभी पर्याप्त नहीं हो पाया है।
नीति विशेषज्ञों का कहना है कि दिक्कत सिर्फ़ निगरानी या सख़्ती की नहीं है। असली समस्या यह है कि लोगों के पास इस्तेमाल के लिए सस्ते और आसान विकल्प नहीं हैं, और प्लास्टिक छोड़ने की आदत बदलने में समय लग रहा है।
जल तंत्र पर सीधा असर
दिल्ली का प्लास्टिक कचरा सबसे पहले नालियों में फंसता है। वहां से वह झीलों तक पहुंचता है। और अंततः यमुना में जाकर पूरे जल-तंत्र को दूषित करता है।
बरसात के दिनों में इसके प्रवाह में और तेज़ी आ जाती है। नालियों में फंसे प्लास्टिक के कारण जल निकासी बाधित होती है, जिससे जलजमाव और शहर में बाढ़ जैसी स्थिति पैदा होने लगती है।
वहीं लंबे समय तक पानी में रहने से प्लास्टिक टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है, जिससे पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है।
लोगों के पास इस्तेमाल के लिए सस्ते और आसान विकल्प नहीं हैं, और प्लास्टिक छोड़ने की आदत बदलने में समय लग रहा है।
पानी और इससे जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली समाजसेवी संस्था इंडिया वाटर फ़ाउंडेशन के प्रेसिडेंट और संस्थापक डॉ. अरविंद कुमार कहते हैं, “दिल्ली में जल प्रदूषण पर बात करते समय हम अक्सर केवल सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट यानी इंडस्ट्रियल वेस्ट की ही बात करते हैं, लेकिन प्लास्टिक अब एक समानांतर खतरा बन चुका है।”
माइक्रोप्लास्टिक का असर धीरे‑धीरे दिखाई देता है, लेकिन यह दीर्घकालिक और गहरा होता है।” आगे वे कहते हैं, “जब हम प्लास्टिक या किसी भी तरह के कचरे का सही ढंग से प्रबंधन नहीं कर पाते, तो वह आखिरकार पर्यावरण में फैल जाता है। इसका असर हवा, पानी और मिट्टी के साथ-साथ पौधों, जानवरों और इंसानों तक पर पड़ता है।”
दिल्ली में जल प्रदूषण पर बात करते समय हम अक्सर केवल सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट यानी इंडस्ट्रियल वेस्ट की ही बात करते हैं, लेकिन प्लास्टिक अब एक समानांतर खतरा बन चुका है।
डॉ. अरविंद कुमार, प्रेसिडेंट एवं संस्थापक, इंडिया वाटर फ़ाउंडेशन
माइक्रोप्लास्टिक से पानी में मिलने वाले प्रमुख रासायनिक तत्व
जब प्लास्टिक टूटकर माइक्रोप्लास्टिक (5 मिमी से छोटे कण) में बदलती है, तो वह सिर्फ़ भौतिक कण नहीं छोड़ती, बल्कि कई तरह के रासायनिक तत्व और यौगिक भी पानी में घुल या फैल जाते हैं। इनमें से कई लंबे समय तक पानी में बने रहते हैं और तब तक नहीं निकलते, जब तक पानी वाष्प बनकर उड़ न जाए, और तब भी ये पदार्थ अक्सर पानी में ही पीछे रह जाते हैं।
रासायनिक तत्व जो हमारी सेहत के लिए हैं नुकसानदायक: प्लास्टिक के भीतर मौजूद एडिटिव (Additives) जो रसायन प्लास्टिक को मज़बूत, लचीला या टिकाऊ बनाने के लिए मिलाए जाते हैं:
फ्थैलेट्स (Phthalates) – हार्मोन को प्रभावित करने वाले (Endocrine disruptors)
बिस्फेनॉल-A (BPA) – प्रजनन और विकास पर असर
फ्लेम रिटार्डेंट्स (जैसे PBDEs) – तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव
UV स्टेबलाइज़र – सूर्य की रोशनी से बचाने के लिए
भारी धातुएं (Heavy Metals) जो धीरे-धीरे पानी में रिसते रहते हैं। प्लास्टिक निर्माण या रंगों में इस्तेमाल हुई धातुएँ:
सीसा (Lead)
कैडमियम (Cadmium)
पारा (Mercury)
क्रोमियम (Chromium)
माइक्रोप्लास्टिक इन धातुओं को अपने ऊपर चिपका कर पानी में बनाए रखता है।
पानी से चिपकने वाले ज़हरीले प्रदूषक (Persistent Pollutants)
माइक्रोप्लास्टिक एक तरह का चुंबक बन जाता है और आसपास मौजूद ज़हरीले रसायनों को सोख लेता है:
कीटनाशक (DDT जैसे)
औद्योगिक रसायन (PCBs)
पेट्रोलियम अवशेष (PAHs)
नैनोप्लास्टिक से निकलने वाले सक्रिय रसायन बहुत लंबे समय तक टूटते नहीं हैं। जब माइक्रोप्लास्टिक टूटकर नैनोप्लास्टिक बनती है तब यही रसायन और भी तेज़ी से पानी में घुल जाते हैं। इस पानी को पीने से ये कोशिकाओं और जैविक ऊतकों तक पहुंच सकते हैं।
यमुना और शहर की झीलें: संकट के साक्ष्य
यमुना पहले ही सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और जमा हो रहे गाद से प्रवाह में आई कमी के संकट से जूझ रही है। ऐसे में प्लास्टिक कचरा उसकी इस हालत को और भी जटिल बनाता है।
नदी के किनारे जमा प्लास्टिक न केवल इसकी सुंदरता को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि जलीय जीवन के लिए भी खतरा पैदा करता है। इसी तरह दिल्ली के विभिन्न इलाक़ों में स्थिति संजय झील, ओखला पक्षी विहार और अन्य जलाशयों में प्लास्टिक कचरे की मौजूदगी आम होती जा रही है।
बरसात के बाद पानी के साथ इतना प्लास्टिक आ जाता है कि मछुआरों के लिए जाल डालना मुश्किल हो जाता है। यमुना सहित इन झीलों में मछलियों की संख्या में भी तेज़ी से कमी आ रही है और जो मछलियां मिलती हैं उनकी गुणवत्ता को लेकर शंका होती है।
नदी के किनारे जमा प्लास्टिक न केवल इसकी सुंदरता को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि जलीय जीवन के लिए भी खतरा पैदा करता है।
अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यमुना में माइक्रोप्लास्टिक और प्लास्टिक कचरे की मौजूदगी लगातार बनी हुई है, और उसका विस्तार और फैलाव पानी में जंगली जीवन को प्रभावित कर रहा है।
ज़मीनी हकीकत: लोगों की प्रतिक्रियाएं
स्थानीय बाज़ारों में छोटे दुकानदार अक्सर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर लगे प्रतिबंध को लेकर असमंजस में रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, बड़े दुकानदारों के पास तो कागज़ या कपड़े के बैग का विकल्प होता है, लेकिन छोटे दुकानदारों के पास स्पष्ट वैकल्पिक सामग्री का पर्याप्त स्टॉक नहीं होता और ग्राहक सस्ते विकल्प ही चाहते हैं।
उदाहरण के लिए, चावड़ी बाजार के कई बड़े व्यापारी प्लास्टिक की जगह कागज़ के बैग देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन कुछ छोटे दुकानदार पुराने पॉलीथिन को ही चोरी-छिपे उपयोग में ला रहे हैं।
इसका कारण ग्राहकों की तरफ़ से सस्ते विकल्प की मांग और स्पष्ट नियमों की समझ का नहीं होना भी है। वहीं, लोग सुविधा को प्राथमिकता देते हैं और घर से वैकल्पिक बैग नहीं लाते, नतीजतन पर्यावरण अक्सर पीछे छूट जाता है।
सरकारी पक्ष और चुनौतियां
लोकसभा में 1 दिसंबर 2025 को दी गई जानकारी के अनुसार, दिल्ली में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियमों के अलावा सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को लेकर कोई अतिरिक्त कार्यकारी आदेश जारी नहीं किया गया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि दिल्ली जैसे घनी आबादी वाले शहर में केंद्रीय नियमों के साथ स्थानीय स्तर की स्पष्ट रणनीति के बिना व्यवहार परिवर्तन मुश्किल है।
केंद्र सरकार ने 2022 में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नियमों में संशोधन करते हुए एक्सटेंडेड प्रोडूसर रेस्पोंसिबिलिटी (ईपीआर) दिशानिर्देश लागू किए। इसके तहत प्लास्टिक पैकेजिंग बनाने वाली कंपनियों के लिए कचरे की रीसाइक्लिंग, रीयूज़ और रीसाइकिल्ड कंटेंट के उपयोग को अनिवार्य किया गया है।
इसका उद्देश्य प्लास्टिक के बोझ को केवल उपभोक्ता या नगर निकायों तक सीमित न रखकर उत्पादन करने वाली कंपनियों की भी जवाबदेही तय करना है।
सरकार का कहना है कि दिसंबर 2025 तक ईपीआर दिशानिर्देशों के बाद 165 लाख टन प्लास्टिक पैकेजिंग कचरे की रीसाइक्लिंग की जा चुकी है। लेकिन शहरी नीति विशेषज्ञ मानते हैं कि सिंगल-यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंध को ठोस कचरा प्रबंधन, जल संरक्षण और शहरी नियोजन के साथ एकीकृत करना ज़रूरी है। जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा तब तक यह प्रगति नालियों, नदियों और झीलों में दिखाई नहीं देगी।
जुलाई 2022 से दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध के पालन के लिए एक नियंत्रण कक्ष स्थापित किया है, जो निगरानी, निरीक्षण और उल्लंघन पर कार्रवाई की ज़िम्मेदारी निभाता है।
इसके तहत अब तक 50,500 से अधिक इकाइयों का निरीक्षण किया गया है और हज़ारों मामलों में प्रतिबंधित प्लास्टिक जब्त करने से लेकर जुर्माना लगाने तक की कार्रवाई की गई है।
राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से सिंगल-यूज़ प्लास्टिक प्रतिबंध के अनुपालन पर नियमित रिपोर्ट मांगता है, ताकि नीति के क्रियान्वयन और प्रवर्तन की स्थिति पर नज़र रखी जा सके।
इसी क्रम में दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) यमुना और शहर के प्रमुख नालों में सीवेज उपचार और सफ़ाई योजनाएं लागू कर रहा है, ताकि नालों के माध्यम से नदी में पहुंचने वाले प्रदूषण को कम किया जा सके। वहीं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) पर्यावरण संबंधी आदेशों की निगरानी करता है और यमुना की सफ़ाई के लिए उच्च-स्तरीय समितियों को निर्देश जारी करता रहा है।
हवा में माइक्रोप्लास्टिक: स्वास्थ्य खतरा
माइक्रोप्लास्टिक केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। अध्ययन बताते हैं कि छोटे‑छोटे प्लास्टिक के कण, जो पानी और नालियों के साथ शहर में फैलते हैं, हवा में भी मौजूद पाए गए हैं। इसका मतलब यह है कि हम इन्हें सांस के जरिए अपने शरीर में ले सकते हैं। दिल्ली-एनसीआर में किए इस अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष यह हैं:
दिल्ली की हवा में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति लगातार बनी हुई हैं।
ये कण लंबे रेशों से लेकर छोटे-छोटे टुकड़ों में पाए जाते हैं।
मौसम के अनुसार इनकी मात्रा बदलती रहती है, लेकिन ये हमेशा हमारे संपर्क में रहते हैं।
खासकर बच्चों और संवेदनशील लोगों के लिए यह स्वास्थ्य जोखिम बढ़ा सकता है।
क्या है समाधान
बहुस्तरीय दृष्टिकोण: सख़्त प्रवर्तन, सस्ते और आसानी से उपलब्ध विकल्प।
जन-जागरूकता: लोगों को प्लास्टिक कम करने और सही विकल्प अपनाने के लिए जागरूक करना।
शिक्षा और व्यवहार बदलाव: स्कूल और कॉलेज में छोटे-छोटे अभियान और वर्कशॉप।
स्थानीय व्यापारियों को मदद: वैकल्पिक उत्पाद उपलब्ध कराना, प्रशिक्षण देना और प्रोत्साहन देना।
सक्रिय नागरिक भागीदारी: घर से झोला लाना, प्लास्टिक कम करना और सामूहिकता बढ़ाना।
स्रोत कहते हैं कि दिल्ली-एनसीआर में पानी और वायु में माइक्रोप्लास्टिक का लगातार बढ़ता स्तर इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। ऐसे में सवाल यह है कि इस अदृश्य बोझ के बीच अगला कदम समय पर और प्रभावी तरीके से उठाया जा सकेगा या शहर को अपने जल-निकायों को यूं ही समाप्त और दूषित होते देखते रहना होगा।

