मैंग्रोव वन: मैंग्रोव वनों की वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियां 

फ़ोटो - विकिकॉमंस 

मैंग्रोव वन: मैंग्रोव वनों की वर्तमान स्थिति और भविष्य की चुनौतियां 

मैंग्रोव वन तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो समुद्री तूफान, कटाव और जलवायु परिवर्तन से सुरक्षा प्रदान करते हैं। जानिए मैंग्रोव वनों की वर्तमान स्थिति, पर्यावरणीय महत्व और भविष्य की चुनौतियों के बारें में।
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मैंग्रोव वन एक अनोखा पारिस्थितिकी तंत्र है। ये वन भूमि और समुद्र के बीच स्थित तटीय क्षेत्रों में विकसित होते है। UN Environment Program के अनुसार ये खारे और नमकीन पानी में जीवित रहने के लिए विशेष रूप से अनुकूलित होते है। मैंग्रोव के पेड़ मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के तटों, डेल्टा और मुहानों के आसपास पाए जाते है। इन वनों का विस्तार विश्व के लगभग 123 देशों में है।

हालांकि वैश्विक उष्णकटिबंधीय वनों के कुल क्षेत्रफल में मैंग्रोव का हिस्सा 1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी इनका पर्यावरणीय और सामाजिक महत्व बहुत अधिक है। UN Environment Program रिपोर्ट के अनुसार अनुमान लगाया जाता है कि तट से 100 किलोमीटर के भीतर रहने वाले लगभग 24 लाख लोगों की आजीविका और सुरक्षा किसी न किसी रूप में मैंग्रोव पर निर्भर करती है।

मैंग्रोव वन समुद्री तूफानों, तटीय कटाव और बाढ़ से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते है। ये भोजन, ईंधन और लकड़ी के महत्वपूर्ण स्रोत भी है। इसके अलावा, मैंग्रोव जल की गुणवत्ता सुधारने और वातावरण से कार्बन अवशोषित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। इसी रिपोर्ट के अनुसार, ये वन 1533 से अधिक प्रजातियों के लिए प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराते है, जिनमें कई व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछलियों के प्रजनन स्थल भी शामिल हैं। साथ ही, मैंग्रोव प्रवाल भित्तियों और समुद्री घास के मैदानों जैसे तटीय पारिस्थितिक तंत्रों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी सहायक होते है। 

भारत सरकार के Forest Survey of India (FSI) के अनुसार, देश में मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र का लगातार वैज्ञानिक आकलन किया जा रहा है। इस सर्वेक्षण के अनुसार, मैंग्रोव वन उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय तटीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं तथा समुद्री जैव विविधता के लिए अत्यंत आवश्यक है।

मैंग्रोव का अर्थ क्या है?

मैंग्रोव ऐसे विशेष प्रकार के वनस्पति समुदाय हैं जो समुद्री तटों, ज्वारीय क्षेत्रों और खारे पानी वाले दलदली इलाकों में उगते है। इन पेड़ों में खारे पानी में भी जीवित रहने की अद्भुत क्षमता होती है।

मैंग्रोव शब्द पुर्तगाली शब्द Mangue और अंग्रेज़ी शब्द Grove से मिलकर बना माना जाता है। इन पेड़ों की जड़ें जमीन के ऊपर दिखाई देती है और ये दलदली मिट्टी में मजबूती से टिके रहते है। भारत सरकार के वन 

मैंग्रोव वनों की पारिस्थितिकी

वर्तमान स्थिति की बात करे तो मैंग्रोव कई मानवीय गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर खतरे का सामना कर रहे है। मछली पालन और कृषि का विस्तार, तटीय विकास, अत्यधिक दोहन, औद्योगिक एवं कृषि प्रदूषण और समुद्र स्तर में वृद्धि इनके प्रमुख कारण हैं।

ग्लोबल मैंग्रोव वॉच के अनुसार, वर्ष 2020 में विश्व में लगभग 147,359 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव क्षेत्र मौजूद था (जो यह विश्व की कुल 21,39,308.93 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा का लगभग 14.93 प्रतिशत हिस्सा दर्शाता है।), लेकिन 1996 से 2020 के बीच करीब 5,245 वर्ग किलोमीटर मैंग्रोव क्षेत्र नष्ट हो चुका है। 

हालांकि हाल के वर्षों में मैंग्रोव हानि की गति कुछ हद तक स्थिर हुई है, फिर भी इनके क्षरण और जैव विविधता में कमी की समस्या लगातार बनी हुई है।

मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी 1,533 प्रजातियों में से लगभग 15 प्रतिशत विलुप्त होने के खतरे में हैं। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, मैंग्रोव से जुड़े कई स्तनधारी, मछलियां, पौधे, पक्षी और सरीसृप प्रजातियां तेजी से संकटग्रस्त होती जा रही हैं। यह स्थिति पर्यावरण और तटीय समुदायों दोनों के लिए चिंता का विषय है।

मैंग्रोव वनों की प्रमुख विशेषताएँ क्या है?

  • खारे पानी में जीवित रहने की क्षमता - मैंग्रोव पेड़ों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समुद्र के खारे पानी में भी जीवित रह सकते हैं। उनकी जड़ें अतिरिक्त नमक को बाहर निकाल देती हैं या उसे अलग तरीके से संग्रहित करती हैं।

  • विशेष प्रकार की जड़ें - इन पेड़ों की जड़ें मिट्टी के ऊपर दिखाई देती हैं। इन्हें श्वसन जड़ें कहा जाता है। दलदली और ऑक्सीजन की कमी वाली मिट्टी में ये पौधे अपनी इन्हीं जड़ों की मदद से सांस लेते हैं।

  • तटीय सुरक्षा कवच - समुद्री तूफानों और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय मैंग्रोव वन प्राकृतिक दीवार का काम करते हैं। ये तेज लहरों की ऊर्जा को कम कर तटीय इलाकों को बचाते हैं।

  • जैव विविधता का केंद्र - मैंग्रोव क्षेत्र मछलियों, केकड़ों, झींगों, पक्षियों और कई समुद्री जीवों का प्रजनन स्थल होते हैं। इसलिए इन्हें “नर्सरी ऑफ द सी” भी कहा जाता है।

  • कार्बन संग्रहण की उच्च क्षमता - मैंग्रोव वन सामान्य जंगलों की तुलना में अधिक कार्बन अवशोषित करते है। यही कारण है कि इन्हें जलवायु परिवर्तन नियंत्रण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 

भारत में लगभग 4,900 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में मैंग्रोव वन फैले हुए है। पश्चिम बंगाल, गुजरात और अंडमान-निकोबार में सबसे अधिक मैंग्रोव पाए जाते है।

India State of Forest Report 2023 के अनुसार, भारत में मैंग्रोव क्षेत्रों की निगरानी उपग्रह तकनीक से की जाती है। उनके अनुसार तटीय विकास, जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर में वृद्धि मैंग्रोव वनों के लिए बड़ी चुनौती बन रहे है। 

मैंग्रोव वनों का महत्त्व क्या है?

इसके महत्व को निम्न प्रकार समझा जा सकता है -

  • तटीय क्षेत्रों को प्राकृतिक सुरक्षा - मैंग्रोव वन समुद्री तूफानों और चक्रवातों की गति को कम करते हैं। जब समुद्र में ऊँची लहरें उठती हैं, तो मैंग्रोव की घनी जड़ें और पेड़ उन्हें रोकने का काम करते हैं। 2004 की सुनामी के दौरान जिन क्षेत्रों में मैंग्रोव वन अधिक थे, वहाँ नुकसान अपेक्षाकृत कम देखा गया था। यही कारण है कि तटीय संरक्षण में इन्हें प्राकृतिक अवरोध माना जाता है।

  • जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में सहायक - मैंग्रोव वन वातावरण से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर मिट्टी और जैविक पदार्थों में संग्रहित करते हैं। इसे “ब्लू कार्बन” कहा जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, मैंग्रोव वन सामान्य स्थलीय वनों की तुलना में कई गुना अधिक कार्बन संग्रहित कर सकते हैं। 

  • मत्स्य पालन और आजीविका का आधार - मछलियों और समुद्री जीवों की कई प्रजातियाँ मैंग्रोव क्षेत्रों में प्रजनन करती है। इससे लाखों मछुआरों की आजीविका जुड़ी हुई है। यदि मैंग्रोव समाप्त होते है तो समुद्री जैव विविधता और मत्स्य उत्पादन दोनों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

  • तटीय कटाव को रोकना - समुद्री लहरें अक्सर तटों की मिट्टी को काटकर नुकसान पहुँचाती है। मैंग्रोव की जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़कर कटाव को कम करती हैं।

  • जैव विविधता का संरक्षण - सुंदरबन जैसे मैंग्रोव क्षेत्रों में रॉयल बंगाल टाइगर, मगरमच्छ, डॉल्फिन और कई दुर्लभ पक्षी पाए जाते हैं। इसलिए ये वन जैव विविधता संरक्षण के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं।

मैंग्रोव वनों के क्षरण के कारण क्या है?

इसके क्षरण के कारण को निम्न प्रकार समझा जा सकता है

  • तटीय शहरीकरण और औद्योगीकरण - बंदरगाह, सड़क, उद्योग और आवासीय परियोजनाओं के विस्तार के कारण बड़ी मात्रा में मैंग्रोव क्षेत्र नष्ट हो रहे हैं। देशों में कई तटीय राज्यों में विकास परियोजनाओं के लिए मैंग्रोव क्षेत्रों को हटाया गया है।

  • समुद्र स्तर में वृद्धि - जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर लगातार बढ़ रहा है। इससे मैंग्रोव क्षेत्रों में जलभराव और भूमि क्षरण बढ़ रहा है।

  • प्रदूषण - औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा और तेल रिसाव मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर नुकसान पहुँचाते हैं।

  • जलीय कृषि - कई क्षेत्रों में झींगा पालन और मत्स्य पालन के लिए मैंग्रोव वनों को काटा गया। इससे तटीय पारिस्थितिकी असंतुलित हुई। अंतरराष्ट्रीय शोधों में यह पाया गया कि झींगा पालन मैंग्रोव विनाश का बड़ा कारण रहा है। 

  • प्राकृतिक आपदाएँ - चक्रवात, अत्यधिक वर्षा और समुद्री तूफान भी मैंग्रोव वनों को नुकसान पहुँचाते हैं। हालांकि, स्वस्थ मैंग्रोव वन इन आपदाओं का सामना करने में अधिक सक्षम होते हैं।

जलवायु परिवर्तन से निपटने में मैंग्रोव वन अच्छा विकल्प क्यों?

  • उच्च कार्बन अवशोषण क्षमता - मैंग्रोव वन वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को तेजी से अवशोषित करते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, इनकी मिट्टी में हजारों वर्षों तक कार्बन सुरक्षित रह सकता है। यही कारण है कि इन्हें “कार्बन सिंक” कहा जाता है। 

  • चक्रवातों के प्रभाव को कम करना - भारत के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर आने वाले चक्रवातों से सुरक्षा के लिए मैंग्रोव प्राकृतिक ढाल का काम करते हैं। सुंदरबन और ओडिशा के कई क्षेत्रों में मैंग्रोव वनों ने चक्रवाती लहरों की तीव्रता कम करने में मदद की है।

  • समुद्री जैव विविधता का संरक्षण - जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री पारिस्थितिकी प्रभावित हो रही है। मैंग्रोव वन समुद्री जीवों के लिए सुरक्षित आवास प्रदान करते हैं और खाद्य श्रृंखला को बनाए रखते हैं।

  • तटीय समुदायों की सुरक्षा - मैंग्रोव वन स्थानीय समुदायों को भोजन, लकड़ी, मछली और रोजगार प्रदान करते हैं। इससे जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले आर्थिक संकट को कम करने में मदद मिलती है।

प्राकृतिक और कम लागत वाला समाधान

मैंग्रोव संरक्षण कृत्रिम तटीय दीवारों की तुलना में अधिक टिकाऊ और कम खर्चीला उपाय माना जाता है। भारत सरकार ने MISHTI Scheme (Mangrove Initiative for Shoreline Habitats and Tangible Incomes) शुरू की है, जिसका उद्देश्य मैंग्रोव वनों का संरक्षण और विस्तार करना है। 

संरक्षण के लिए आवश्यक कदम

मैंग्रोव संरक्षण के लिए निम्न बातें आवश्यक है - 

  1. तटीय क्षेत्रों में अवैध कटाई रोकना

  2. मैंग्रोव पुनर्स्थापन कार्यक्रम चलाना

  3. स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ना

  4. प्रदूषण नियंत्रण के सख्त उपाय लागू करना

  5. जलवायु अनुकूल तटीय विकास नीति अपनाना

  6. वैज्ञानिक निगरानी और उपग्रह आधारित मैपिंग बढ़ाना

विश्व में मैंग्रोव वनों की वर्तमान स्थिति और भविष्य 

एक रिपोर्ट के अनुसार मैंग्रोव वन विश्व के सबसे महत्वपूर्ण तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक हैं, जो भूमि और समुद्र के संगम पर पाए जाते हैं। ये वन तटीय क्षेत्रों को कटाव, तूफान और बाढ़ से सुरक्षा प्रदान करने के साथ-साथ जैव विविधता और कार्बन भंडारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

Present State and Future of the World’s Mangrove Forests नाम के शोध के अनुसार, विश्व में पिछले 50 वर्षों में लगभग एक-तिहाई मैंग्रोव वन नष्ट हो चुके हैं। इसके प्रमुख कारण तटीय शहरीकरण, जलीय कृषि, प्रदूषण, अत्यधिक दोहन और कृषि विस्तार हैं।

हालांकि हाल के वर्षों में कुछ क्षेत्रों में मैंग्रोव हानि की दर धीमी हुई है, फिर भी दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिम अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में इन पर खतरा लगातार बना हुआ है। जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर में वृद्धि भविष्य में मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

मैंग्रोव वन हजारों समुद्री जीवों, मछलियों, पक्षियों और अन्य प्रजातियों के लिए प्राकृतिक आवास प्रदान करते हैं। यदि संरक्षण, पुनर्स्थापन और टिकाऊ प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए, तो भविष्य में मैंग्रोव वन जलवायु परिवर्तन से निपटने और तटीय समुदायों की सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते है।

मैंग्रोव वन केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि पृथ्वी की जलवायु सुरक्षा प्रणाली का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये वन समुद्री तटों को बचाने, जैव विविधता को संरक्षित करने और कार्बन उत्सर्जन कम करने में बड़ी भूमिका निभाते है। 

आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, समुद्र स्तर वृद्धि और प्राकृतिक आपदाओं की चुनौती का सामना कर रही है, तब मैंग्रोव वन सबसे प्रभावी प्राकृतिक समाधान के रूप में उभर रहे है। 

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