डेयरी उद्योग में दूध की पैकिंग के लिए बड़े पैमाने पर प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है। इसके इको फ्रेंडली विकल्प अपना कर प्रदूषण को कम किया जा सकता है।
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विश्व पर्यावरण दिवस पर मदर डेयरी की इको फ्रेंडली पहल : अब बायो-डिग्रेडबल पैक में बिकेगा गाय का दूध
लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने और प्रदूषण पर लगाम कसने के प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। आमतौर पर यह दिन बौद्धिक आयोजनों और कुछ प्रतीकात्मक कार्यक्रमों तक ही सिमट कर रह जाता है और ज़मीनी स्तर पर किसी बड़ी पहल अभाव में पर्यावरण संरक्षण की बात भुला दी जाती है। इसे देखते हुए देश के कई राज्यों में पैकेट बंद दूध बेचने वाली कंपनी मदर डेयरी ने विश्व पर्यावरण दिवस पर एक पर्यावरण हितैषी पहल की घोषणा की है।
कंपनी 5 जून पॉली पाउच के बजाय नेचुरली डिग्रेडेबल पाउच में दूध की पैकिंग शुरू करने जा रही है। इसकी शुरुआत आगामी विश्व पर्यावरण दिवस पर गाय के दूध के नए बायो डिग्रेडबल पैक की लॉन्चिंग से की जाएगी। कंपनी ने आगे चलकर इस इको फ्रेंडली पैक का इस्तेमाल अन्य उत्पादों में भी किए जाने का इरादा जताया है। पर्यारवरणविदों का मानना है डेयरी की यह पहल प्लास्टिक पाउचों से होने वाले प्रदूषण को कम करने में मददगार साबित होगी। क्योंकि, शहरों के लैंड फिल्स (कूड़े के पहाड़) में एक बड़ा हिस्सा दूध के प्लास्टिक पाउचों का ही होता है, जो मिट्टी को खराब करने और प्रदूषण की एक बड़ी वजह बनते हैं।
गाय के दूध से होगी शुरुआत
कंपनी का कहना है कि वह दूध की पैकिंग के लिए एक ऐसा पाउच इस्तेमाल करने जा रही है, जो कि नेचुरली डिग्रेडेबल है। दूध इस्तेमाल करने के बाद इसे यदि इस पाउच को फेंक दिया जाए, तो बायो डिग्रेडबल मैटेरियल यानी प्राकृतिक रूप से गलने वाले पदार्थ से बना यह पाउच दो से तीन साल में खुद गल कर मिट्टी में मिल जाएगा। नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (NDDB) के अध्यक्ष मीनेश शाह ने इस नेचुरली डिग्रेडेबल मिल्क पाउच को नई दिल्ली में लॉन्च किया। इस मौके पर उन्होंने बताया कि 5 जून 2026 से दिल्ली एनसीआर में मदर डयेरी केपर्यवरण के प्रति सुरक्षित पॉली पाउच में दूध की पैकिंग की शुरुआत की जाएगी। शुरू में इस पाउच में गाय का दूध मिलेगा। धीरे-धीरे इसी पाउच में अन्य दूध भी पैक किए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि मदर डेयरी एनडीडीबी की ही अनुषंगी इकाई (Subsidiary Unit) है।
पॉली पैक से महंगा, पर ग्राहकों की जेब पर बोझ नहीं
मदर डेयरी के मैनेजिंग डायरेक्टर जयतीर्थ चारी के मुताबिक नेचुरली डिग्रेडेबल पाउच परंरागत पोली पैकिंग से महंगा पड़ता है। इसके बावजूद कंपनी इस पैक में बेचे जाने वाले दूध की कीमत में कोई बढ़ोतरी नहीं कर रही है। इस तरह इस इको फ्रेंडली पहल का आर्थिक बोझ ग्राहकों की जेब पर नहीं पड़ेगा।
पेटेंट मुक्त रहेगा 'इन हाउस'' तैयार किया पाउच
मदर डेयरी को इस नेचुरली डिग्रेडेबल मिल्क पाउच को डेवलप करने में चार साल से भी ज्यादा का समय लगा है। इसमें देश के कई वैज्ञानिक व पर्यावरणीय रिसर्च संस्थानों से सहयोग लिया गया। मदर डेयरी के मैनेजिंग डायरेक्टर जयतीर्थ चारी का कहना है कि हालांकि, इस बायो डिग्रेडबल मिल्क पाउच को तैयार करने में काफी श्रम और धन का निवेश हुआ है, इसके बावजूद कंपनी ने इसका पेटेंट नहीं कराया है।
इसका फायदा यह होगा कि पर्यावरण के लिए बेहतर इस तकनीक का उपयोग कोई भी कर सकेगा। इस पर कोई रोक-टोक नहीं रहेगी। कंपनी इसे देश का पहला नेचुरली डिग्रेडेबल मिल्क पाउच बता रही है। कंपनी के अनुसार, इस पाउच में ऐसी विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह समय के साथ एक बायोअवेलेबल वैक्स (Bioavailable Wax) में बदल जाता है। इसके बाद मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव इसे प्राकृतिक तत्वों में तोड़ देते हैं।
ऐसे में जहां सामान्य प्लास्टिक को खत्म होने में सैकड़ों साल लग सकते हैं, वहीं यह नया पाउच अपने खास इको फ्रेंडली मैटेरियल के कारण कुछ ही सालों में मिट्टी में प्राकृतिक रूप से विघटित हो जाएगा। इस पैक की एक खासियत यह भी है कि बात यह है कि यह पाउच पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) योग्य भी है, जिससे इसके उपयोग के बाद संसाधनों का पुनः उपयोग संभव हो सकेगा।
डेयरी कंपनियां पहले दूध को कांच की बोतलों में देती थीं। पर, लागत घटाने और सहूलियत के लिए उसकी जगह प्लास्टिक के पैकेटों का इस्तेमाल किया जाने लगा, जो प्रदूषण को बढ़ा रहा है।
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मिट्टी और भूजल को प्रदूषित करते हैं प्लास्टिक पाउच
दूध की पैकिंग में आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले सामान्य प्लास्टिक के पाउच सैकड़ों साल तक मिट्टी में पड़े रहते हैं और इनके गलने से निकलने वाले हानिकारक रसायन मिट्टी को खराब करते हैं। प्लास्टिक से निकलने वाला यह ज़हरीला तरल लीचेट (Leachate) कहलाता है और यह मिट्टी की परतों से रिसते हुए भूजल स्रोतों तक पहुंच कर भूजल को भी प्रदूषित करता है। दरअसल, डंपिंग साइट्स पर रोजाना घरेलू कचरा, सड़ा हुआ भोजन, प्लास्टिक, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक कचरा, मेडिकल वेस्ट, रसायन और औद्योगिक अपशिष्ट एक साथ फेंके जाते हैं।
इस मिश्रित कचरे के भीतर जैविक पदार्थ समय के साथ बैक्टीरिया की क्रिया से सड़ने लगते हैं। सड़न की इस प्रक्रिया में गर्मी, गै्सें और विभिन्न रासायनिक यौगिक बनते हैं। जब बारिश का पानी या कचरे में मौजूद नमी इन सड़ते हुए पदार्थों के बीच से गुजरती है, तो वह रास्ते में मौजूद घुलनशील रसायनों, भारी धातुओं, अमोनिया, प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों और रोगजनक सूक्ष्मजीवों को अपने साथ घोल लेती है। यही दूषित तरल “लीचेट” कहलाता है। इस ज़हरीले लीचेट को जमीन के अंदर जाने से रोकने का इंतज़ाम करना काफ़ी खर्चीला होता है।
इसे लेकर एक राहत भरी ख़बर सामने आई है। कानपुर के हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (HBTU) के वैज्ञानिकों ने ऐसी सस्ती तकनीक तैयार की है, जो कूड़े से निकलने वाले जहरीले तरल को जमीन के अंदर जाने से रोक सकती है। काली मिट्टी से तैयार किया गया यह देसी और सस्ता समाधान प्रदूषण नियंत्रण के साथ ही भूजल सुरक्षा के लिए बड़ी उम्मीद माना जा रहा है, क्योंकि यह डंपिंग साइट्स से भूजल स्रोतों में होने वाले ज़हरीले रसायनों के रिसाव को रोक कर भूजल को प्रदूषित होने से बचा सकता है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए आप हमारी हाल ही में प्रकाशित स्टोरी कानपुर के वैज्ञानिकों ने ढूंढा डंपिंग साइट्स के ज़हरीले तरल से हो रहे भूजल प्रदूषण को रोकने का सस्ता तरीका को पढ़ सकते हैं।
दूध के प्लास्टिक पाउच : एक बड़ा पर्यावरणीय संकट
दि इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित Chintan Environmental Research and Action Group की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जितने दूध के पाउच सिर्फ एक दिन में फेंके जाते हैं (12 करोड़), उन्हें एक के पीछे एक रखा जाए तो उनकी लंबाई पृथ्वी की परिधि से कई गुना अधिक हो सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर दिन करीब 12 करोड़ (120 मिलियन) दूध के प्लास्टिक पाउच इस्तेमाल होकर फेंक दिए जाते हैं। यानी हर साल इनकी संख्या 4,300 करोड़ से भी अधिक हो जाती है।
दिल्ली में किए गए एक वेस्ट ऑडिट में पाया गया कि ब्रांडेड सिंगल-लेयर प्लास्टिक कचरे का 57% हिस्सा दूध के पाउच और टेट्रा पैक से जुड़ा था।
वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक सामान्य प्लास्टिक दूध पाउच को पूरी तरह टूटने में 200 से 500 साल तक लग सकते हैं, जबकि इस दौरान वे माइक्रोप्लास्टिक में बदलकर मिट्टी, नदियों और खाद्य श्रृंखला को प्रदूषित करते रहते हैं।
मिल्क विला की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इस्तेमाल होने वाले दूध पाउचों का बहुत बड़ा हिस्सा रीसाइकल नहीं हो पाता, क्योंकि ये अक्सर गीले कचरे के साथ मिल जाते हैं और लैंडफिल में पहुंच जाते हैं।
प्लास्टिक पाउच बनाने में पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल का उपयोग होता है, जिससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और पूरी पैकेजिंग श्रृंखला का पर्यावरणीय प्रभाव काफी बड़ा हो जाता है।
भारत में डेयरी उद्योग का आकार बहुत बड़ा है। अगर इसमें प्लास्टिक के इस्तेमाल में कमी लाई जाती है, तो यह प्रदूषण नियंत्रण में काफी मददगार साबित हो सकती है।
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हाल के वर्षों में कंपनियों की प्रमुख पर्यावरणीय पहलें
नंदिनी (BAMUL): कॉर्न-स्टार्च आधारित बायोडिग्रेडेबल दूध पैकेट
कर्नाटक मिल्क फेडरेशन के अंतर्गत BAMUL ने नंदिनी ब्रांड के लिए कॉर्न-स्टार्च आधारित जैव-विघटनीय दूध पैकेट शुरू किए। पायलट परियोजना के तहत प्रतिदिन लगभग 2 लाख दूध और दही के पैकेट ऐसे कवरों में पैक किए जा रहे हैं, जो कुछ महीनों में विघटित हो जाते हैं।जोमैटो का 'Plastic-Free Future Packathon'
फूड डिलीवरी सेक्टर में प्लास्टिक कचरा कम करने के लिए जोमैटो ने 2025 में "Plastic-Free Future Packathon" आयोजित किया। इसमें स्टार्टअप्स को प्लास्टिक के विकल्प विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया गया और ताड़ (Areca) पत्तियों से बने पैकेजिंग समाधानों को बढ़ावा मिला।अमेज़न इंडिया: सिंगल-यूज प्लास्टिक की विदाई
अमेज़न इंडिया ने अपने सभी फुलफिलमेंट सेंटर्स से सिंगल-यूज प्लास्टिक हटाने का दावा किया। बबल रैप और एयर पिलो जैसी सामग्री की जगह पेपर कुशन और अन्य वैकल्पिक पैकेजिंग अपनाई गई।बांस आधारित पैकेजिंग को बढ़ावा
कोलकाता की कंपनी Amwoodo ने बांस से बने ऐसे उत्पाद विकसित किए हैं जो सिंगल-यूज प्लास्टिक का विकल्प बन रहे हैं। कंपनी ने कई बड़े ब्रांडों के साथ साझेदारी कर पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग और उपभोक्ता उत्पादों को बढ़ावा दिया है।
निष्कर्ष : ऐसे ही पर्यावरण हितैषी कदमों की ज़रूरत
मदर डेयरी का यह नया कदम भारतीय डेयरी उद्योग में पर्यावरण-अनुकूल नवाचार का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यदि यह पहल सफल रहती है, तो भविष्य में अन्य खाद्य और उपभोक्ता उत्पाद कंपनियां भी इसी प्रकार की टिकाऊ पैकेजिंग तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित हो सकती हैं। इससे प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने और हरित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी।
हालांकि, केवल कंपनियों की पहल भर से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सरकार, उद्योग जगत और उपभोक्ताओं को मिलकर काम करना होगा। एक ओर कंपनियों को पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों और पैकेजिंग में निवेश बढ़ाना होगा, वहीं उपभोक्ताओं को भी टिकाऊ विकल्पों को प्राथमिकता देनी होगी।
आज जब भारत प्रतिदिन करोड़ों प्लास्टिक पाउच और अन्य एकल-उपयोग प्लास्टिक उत्पादों का इस्तेमाल कर रहा है, तब ऐसे नवाचार केवल एक व्यावसायिक निर्णय नहीं, बल्कि पर्यावरणीय जिम्मेदारी का प्रतीक हैं। विश्व पर्यावरण दिवस का संदेश भी यही है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माना जाए। मदर डेयरी की यह पहल इस बात की सीख देती है इच्छा शक्ति और तकनीक का सही मेल करके छोटे दिखने वाले ऐसे बदलाव किए जा सकते हैं, जो भविष्य में बड़े पर्यावरणीय परिणाम दे सकते हैं।
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