डंपिंग साइट्स के रूप में देशभर के शहरों में कूड़े के पहाड़ देखने को मिल जाते हैं, जो मिट्टी, हवा में प्रदूषण फैलाने के साथ ही अपने ज़हरीले रसायनों से भूजल को भी प्रदूषित कर रहे हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
कानपुर के वैज्ञानिकों ने ढूंढा डंपिंग साइट्स के ज़हरीले तरल से हो रहे भूजल प्रदूषण को रोकने का सस्ता तरीका
देशभर के शहरों में जगह-जगह खड़े कूडे के पहाड़ यानी डंपिंग साइट्स पर्यावरण के लिए एक गंभीर समस्या बनती जा रही हैं। कूड़े-कचरे के इस अंबार से जहां आसपास के इलाकों में गंदगी और बदबू से लोगों का जीना मुहाल होता है, वहीं इनसे होने वाला प्रदूषण ज़मीन से लेकर हवा, मिट्टी और भूजल तक को प्रदूषित कर रहा है। इस प्रदूषण को रोक पाना नगर निकायों के लिए भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। क्योंकि यह काम काफी खर्चीला होता है। क्योंकि, कूड़े से निकलने वाले जहरीले तरल को जमीन के अंदर जाने से रोकने का इंतज़ाम करना काफ़ी खर्चीला होता है। इसे लेकर एक राहत भरी ख़बर सामने आई है। कानपुर के हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (HBTU) के वैज्ञानिकों ने ऐसी सस्ती तकनीक तैयार की है, जो कूड़े से निकलने वाले जहरीले तरल को जमीन के अंदर जाने से रोक सकती है। काली मिट्टी से तैयार किया गया यह देसी और सस्ता समाधान प्रदूषण नियंत्रण के साथ ही भूजल सुरक्षा के लिए बड़ी उम्मीद माना जा रहा है, क्योंकि यह डंपिंग साइट्स से भूजल स्रोतों में होने वाले ज़हरीले रसायनों के रिसाव को रोक कर भूजल को प्रदूषित होने से बचा सकता है।
सस्ता है देसी समाधान
हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (Harcourt Butler Technical University) के वैज्ञानिकों ने ऐसा देसी समाधान तैयार किया है, जो डंपिंग साइट्स के नीचे भूजल को सुरक्षित रखने में मदद करेगा। इससे शहरों के बाहर बने कूड़ा स्थलों से निकलने वाला काला जहरीला तरल अब बड़ी समस्या नहीं रहेगा। इस शोध का नेतृत्व कानपुर के प्रो. दीपेश सिंह और उनके शोधार्थी डॉ. अभिषेक ने किया है। कई सालों की मेहनत के बाद उन्हें शानदार परिणाम मिले हैं। इस तकनीक को 20 साल का पेटेंट भी मिला है। अगर इसे बड़े स्तर पर अपनाया गया तो देशभर के कूड़ा स्थलों के आसपास रहने वाले लाखों लोगों को राहत मिल सकती है। इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि खास बात यह है कि इसमें महंगे विदेशी मैटीरियल की जगह मुफ्त में मिल जाने वाली काली मिट्टी का इस्तेमाल किया गया है। वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोग में बुंदेलखंड क्षेत्र की काली मिट्टी का इस्तेमाल किया, जो कपास की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है। इस मिट्टी की खासियत यह है कि यह पानी और जहरीले तत्वों को नीचे जाने से रोकने में कारगर साबित हुई। इसे तकनीकी तरीके से तैयार कर एक नई सुरक्षात्मक परत बनाई गई, जिसे डंपिंग साइट्स के नीचे बिछाया जा सकता है।
कैसे बनता है ज़हरीला लीचेट ?
डंपिंग साइट्स पर रोजाना टनों में गीला और सूखा कूड़ा फेंका जाता है। जब यह कूड़ा सड़ता है तो उससे एक गाढ़ा काले रंग का जहरीला तरल निकलता है, जिसे लीचेट (Leachate) कहा जाता है। दरअसल, डंपिंग साइट्स पर रोजाना घरेलू कचरा, सड़ा हुआ भोजन, प्लास्टिक, कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक कचरा, मेडिकल वेस्ट, रसायन और औद्योगिक अपशिष्ट एक साथ फेंके जाते हैं। इस मिश्रित कचरे के भीतर जैविक पदार्थ समय के साथ बैक्टीरिया की क्रिया से सड़ने लगते हैं। सड़न की इस प्रक्रिया में गर्मी, गै्सें और विभिन्न रासायनिक यौगिक बनते हैं। जब बारिश का पानी या कचरे में मौजूद नमी इन सड़ते हुए पदार्थों के बीच से गुजरती है, तो वह रास्ते में मौजूद घुलनशील रसायनों, भारी धातुओं, अमोनिया, प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों और रोगजनक सूक्ष्मजीवों को अपने साथ घोल लेती है। यही दूषित तरल “लीचेट” कहलाता है।
वैज्ञानिक रूप से देखें तो यह प्रक्रिया कई चरणों में होती है। शुरुआती चरण में कचरे के भीतर ऑक्सीजन मौजूद रहती है, जिससे एरोबिक डिकम्पोज़िशन होता है। बाद में ऑक्सीजन खत्म होने पर एनारोबिक बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं, जो जैविक पदार्थों को तोड़कर अमोनिया, सल्फाइड, मीथेन और विभिन्न अम्लीय यौगिक बनाते हैं। ये रासायनिक तत्व पानी में आसानी से घुल जाते हैं। इसी कारण लीचेट का pH, जैविक ऑक्सीजन मांग (BOD) और रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD) बेहद अधिक हो सकती है।
पुरानी डंपिंग साइट्स में बनने वाला लीचेट और भी अधिक खतरनाक माना जाता है, क्योंकि वर्षों तक जमा कचरे से निकलने वाले रसायन आपस में प्रतिक्रिया करके विषैले यौगिक बना सकते हैं। यदि डंपिंग ग्राउंड के नीचे सुरक्षात्मक लाइनिंग या लीचेट कलेक्शन सिस्टम न हो, तो यह तरल धीरे-धीरे मिट्टी में रिसता हुआ भूजल तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि खुले डंपिंग ग्राउंड को भूजल प्रदूषण का बड़ा स्रोत माना जाता है।
जमीन के अंदर रिसते जाते हैं ज़हरीले रसायन
डंपिंग साइट्स से निकलने वाला लीचेट धीरे-धीरे मिट्टी की परतों के भीतर रिसता हुआ भूजल तक पहुंच जाता है। जिन डंपिंग ग्राउंड्स में नीचे सुरक्षात्मक लाइनिंग, ड्रेनेज या लीचेट ट्रीटमेंट सिस्टम नहीं होता, वहां यह प्रक्रिया और तेज हो जाती है। लीचेट में मौजूद भारी धातुएं, अमोनिया, नाइट्रेट, बैक्टीरिया और विषैले रसायन जमीन के भीतर फैलकर आसपास के जलस्रोतों को प्रभावित करने लगते हैं। कई शहरों और कस्बों में डंपिंग साइट्स के आसपास रहने वाले लोग इसी भूजल पर निर्भर होते हैं। ऐसे में यही दूषित पानी हैंडपंप, बोरिंग और कुओं तक पहुंच जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार लीचेट से प्रभावित पानी का रंग, गंध और स्वाद बदल सकता है, लेकिन कई बार प्रदूषण दिखाई नहीं देता और लोग लंबे समय तक अनजाने में इसे पीते रहते हैं। इससे त्वचा रोग, पेट संबंधी संक्रमण, लिवर और किडनी पर असर, सांस की दिक्कतें और गंभीर मामलों में कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर अधिक माना जाता है।
इसी समस्या को समझने के लिए HBTU के वैज्ञानिकों की एक टीम ने कानपुर के बाहरी क्षेत्र पनकी-भौंती स्थित डंपिंग साइट के आसपास अध्ययन किया। शोधकर्ताओं ने आसपास रहने वाले लोगों से बातचीत कर स्थानीय हालात का आकलन किया। अध्ययन में पाया गया कि बारिश के मौसम में डंपिंग साइट से बड़ी मात्रा में लीचेट निकलता था, जिससे बदबू, जलभराव और भूजल प्रदूषण की आशंका और बढ़ जाती थी। मानसून के दौरान वर्षा का पानी कूड़े के भीतर से गुजरकर अधिक मात्रा में जहरीले तत्वों को घोल लेता है, जिससे लीचेट का फैलाव तेजी से बढ़ता है।
कूड़े के पहाड़ों के कचड़े से बनने वाला रासायनिक पदार्थों का ज़हरीला 'लीचेट' ज़मीन में रिसकर भूजल स्रोतों तक पहुंच जाता है, जिससे ग्राउंड वाटर प्रदूषित हो रहा है।
स्रोत : विकी कॉमंस
डंपिंग साइट्स से ऐसे ज़हरीला हो जाता है भूजल
शहरों के कूड़े के पहाड़ों से निकलने वाला काला, बदबूदार और अत्यधिक विषैला तरल पदार्थ “लीचेट” कहलाता है। जब बारिश का पानी या कचरे में मौजूद नमी डंपिंग साइट्स के भीतर सड़ते हुए कूड़े से होकर गुजरती है, तो वह भारी धातुओं, रसायनों, प्लास्टिक कणों, रोगजनक बैक्टीरिया, अमोनिया और जहरीले जैविक पदार्थों को अपने साथ घोल लेती है। यही तरल धीरे-धीरे जमीन के भीतर रिसकर मिट्टी और भूजल तक पहुंच जाता है।
लीचेट में सीसा (Lead), पारा (Mercury), कैडमियम, क्रोमियम जैसी भारी धातुएं और उच्च मात्रा में नाइट्रेट व अमोनिया पाए जाते हैं। ये तत्व भूजल में घुलकर उसे पीने योग्य नहीं रहने देते। कई अध्ययनों में डंपिंग साइट्स के आसपास के हैंडपंप और बोरवेल के पानी में TDS, BOD, COD और भारी धातुओं का स्तर सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया है। इससे कैंसर, किडनी रोग, त्वचा संक्रमण, पेट संबंधी बीमारियां और बच्चों में विकास संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ता है। समस्या यह भी है कि एक बार भूजल प्रदूषित हो जाए तो उसकी सफाई बेहद कठिन और वर्षों लंबी प्रक्रिया होती है।
भारत में कितनी गंभीर है लीचेट प्रदूषण की समस्या?
भारत में ठोस कचरा प्रबंधन की खराब व्यवस्था के कारण लीचेट प्रदूषण तेजी से बढ़ती पर्यावरणीय समस्या बन चुका है। देश के अधिकांश शहरों में वैज्ञानिक लैंडफिल की बजाय खुले डंपिंग ग्राउंड मौजूद हैं, जहां बिना किसी सुरक्षा लाइनिंग के कचरा फेंका जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार भारत में हजारों एकड़ क्षेत्र में फैले पुराने कूड़े के पहाड़ मौजूद हैं, जिनसे लगातार लीचेट निकल रहा है। दिल्ली के गाज़ीपुर, भलस्वा और ओखला, मुंबई का देवनार, कोलकाता का धापा और लखनऊ, कानपुर, पटना जैसे शहरों की डंपिंग साइट्स के आसपास भूजल प्रदूषण को लेकर कई बार शिकायतें और अध्ययन सामने आ चुके हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार मानसून के दौरान यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि बारिश लीचेट की मात्रा कई गुना बढ़ा देती है। भारत के कई शहरों में डंपिंग साइट्स आबादी और जलस्रोतों के बेहद करीब हैं, जिससे लाखों लोगों के पेयजल स्रोत प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और CPCB कई बार राज्यों को लीचेट ट्रीटमेंट प्लांट लगाने और पुराने कचरे के बायो-रेमेडिएशन के निर्देश दे चुके हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है।
नगर निकायों की राह होगी आसान
अब तक कई जगह जियोसिंथेटिक क्ले लाइनर नाम का महंगा मैटीरियल इस्तेमाल होता था। इसमें कई परतें लगाई जाती थीं और इसकी लागत भी ज्यादा होती थी। लेकिन एचबीटीयू की टीम ने इसका आसान और कम खर्च वाला विकल्प तैयार कर दिया। काली मिट्टी देश के कई हिस्सों में आसानी से मिल जाती है। ऐसे में नगर निगम और स्थानीय निकाय इसे कम लागत में अपना सकते हैं। इससे कूड़ा प्रबंधन सस्ता और असरदार बन सकता है। अगर यह तकनीक देशभर के डंपिंग स्थलों पर लागू होती है तो जमीन के नीचे का पानी काफी हद तक सुरक्षित रह सकेगा। आसपास रहने वाले लोगों को बदबू, गंदगी और दूषित पानी से राहत मिलेगी। कानपुर से निकला यह शोध अब पूरे देश के लिए उम्मीद बन सकता है। कूड़े की समस्या के बीच यह काली मिट्टी सच में वरदान साबित हो सकती है।
डंपिंग साइट्स के कचरे को खाने के कारण पशु-पक्षी भी बीमारी और मौत का शिकार होते हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
कई तरह से नुकसानदायक है डंपिंग साइट्स का प्रदूषण
डंपिंग साइट्स से होने वाले प्रदूषण के और भी कई गंभीर और महत्वपूर्ण पहलू हैं, जिन्हें इस समस्या की जटिलता को समझने के लिए जानना ज़रूरी है। डंपिंग साइट्स किस प्रकार ज़मीन, पानी से लेकर हवा तक प्रदूषण का कारण बनती हैं, उसे कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है-
डंपिंग साइट्स से निकलने वाली जहरीली गैसें
कचरे के सड़ने से केवल लीचेट ही नहीं बनता, बल्कि बड़ी मात्रा में मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें भी निकलती हैं। मीथेन अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, जिसके कारण डंपिंग साइट्स में अक्सर आग लग जाती है। वहीं हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें आसपास रहने वाले लोगों में सांस संबंधी समस्याएं, आंखों में जलन और सिरदर्द पैदा कर सकती हैं।
माइक्रोप्लास्टिक और ई-वेस्ट का बढ़ता खतरा
आज के मिश्रित कचरे में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा शामिल होता है। जब ये लंबे समय तक खुले में पड़े रहते हैं, तो इनमें मौजूद सीसा, लिथियम, पारा और माइक्रोप्लास्टिक धीरे-धीरे मिट्टी और पानी में मिलते रहते हैं। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में डंपिंग साइट्स के आसपास की मिट्टी और जलस्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं।
कृषि भूमि पर हो रहा बुरा असर
यदि डंपिंग साइट्स खेतों या ग्रामीण इलाकों के पास हों, तो लीचेट सिंचाई के पानी और मिट्टी को भी प्रभावित कर सकता है। इससे मिट्टी की उर्वरता घट सकती है और फसलों में भारी धातुओं का जमाव बढ़ सकता है। यह समस्या खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ जाती है, क्योंकि दूषित तत्व भोजन श्रृंखला के जरिए इंसानों तक पहुंच सकते हैं।
मानसून में बढ़ जाता है खतरा
बारिश के मौसम में डंपिंग साइट्स सबसे ज्यादा खतरनाक हो जाती हैं। भारी वर्षा कूड़े के भीतर से गुजरकर अधिक मात्रा में जहरीले तत्वों को घोलती है, जिससे लीचेट का बहाव कई गुना बढ़ जाता है। कई जगहों पर यह तरल नालों, तालाबों और नदियों तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि मानसून के दौरान डंपिंग साइट्स के आसपास जल प्रदूषण और बदबू की शिकायतें तेजी से बढ़ती हैं।
कचरा बीनने वालों के लिए खतरनाक
डंपिंग साइट्स पर काम करने वाले रैगपिकर्स या कचरा बीनने वाले सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं। वे बिना सुरक्षा उपकरणों के जहरीले कचरे, मेडिकल वेस्ट और लीचेट के सीधे संपर्क में आते हैं। इससे संक्रमण, त्वचा रोग, फेफड़ों की बीमारी और चोटों का खतरा बना रहता है। बच्चों के कचरा बीनने की समस्या इसे और गंभीर बना देती है।
वैज्ञानिक लैंडफिल की कमी
भारत के अधिकांश शहरों में अभी भी वैज्ञानिक तरीके से विकसित सैनिटरी लैंडफिल नहीं हैं। विकसित देशों में डंपिंग साइट्स के नीचे हाई-डेंसिटी लाइनर, लीचेट कलेक्शन पाइप और ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाते हैं ताकि जहरीला तरल जमीन में न रिसे। भारत में कई पुराने डंपिंग ग्राउंड बिना ऐसी सुरक्षा व्यवस्था के दशकों से चल रहे हैं, जिससे भूजल प्रदूषण का खतरा लगातार बना हुआ है।
भविष्य के इस पर्यावरणीय संकट से निपटना ज़रूरी
डंपिंग साइट्स अब केवल शहरों के कचरे को जमा करने की जगह भर नहीं रह गई हैं, बल्कि वे धीरे-धीरे भूजल, मिट्टी, हवा और मानव स्वास्थ्य के लिए बड़े पर्यावरणीय संकट में बदलती जा रही हैं। लीचेट का जमीन के भीतर रिसना इस खतरे का सबसे गंभीर पहलू है, क्योंकि इसका असर लंबे समय तक दिखाई नहीं देता, लेकिन धीरे-धीरे पूरे इलाके के जलस्रोतों को प्रभावित कर सकता है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और बढ़ते कचरे के बीच यह समस्या आने वाले वर्षों में और गंभीर हो सकती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल कूड़ा हटाना समाधान नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक लैंडफिल, कचरे की स्रोत स्तर पर छंटाई, गीले कचरे का कम्पोस्टिंग, ई-वेस्ट के सुरक्षित निस्तारण और लीचेट ट्रीटमेंट सिस्टम जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हैं। साथ ही पुराने कूड़े के पहाड़ों की बायो-रेमेडिएशन और नियमित भूजल निगरानी भी बेहद महत्वपूर्ण है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो डंपिंग साइट्स से फैलता यह अदृश्य प्रदूषण आने वाली पीढ़ियों के पेयजल और पर्यावरण सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकता है।
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