आ गए मेथेनॉल से चलने वाले जहाज़, ‘क्लीन फ्यूल’ के इस्तेमाल से घटेगा समुद्र का प्रदूषण
दुनिया का 90% से ज़्यादा कारोबार आज भी पानी के जहाज़ों (शिप) के ज़रिये होता है। पर क्या आपको पता है, ये भारी भरकम जहाज़ चलते किस ईंधन से हैं। अगर आप सोच रहे हैं पेट्रोल-डीज़ल या गैस से, तो आप ग़लत हैं। हज़ारों-लाखों हॉर्सपावर के दानवी इंजन वाले ये जहाज़ दरअसल जिस ईंधन से चलते हैं, उसे हैवी फ्यूल ऑयल कहा जाता है। जो क्रूड ऑयल से भी ज़्यादा क्रूड, तारकोल की तरह गाढ़ा-चिपचिपा पदार्थ होता है। बिल्कुल ही अनरिफाइंड होने के कारण यह प्रदूषण भी भरपूर करता है।
इसके चलते जहाज़ों से निकलने वाला प्रदूषण भरा भारी धुआं हवा को प्रदूषित करने के बाद अपने कार्बनिक कणों के वजन की वजह से समुद्र में घुल जाता है। इस तरह दुनिया भर में चल रहे पानी के जहाज़ हमारे सागरों और महासागरों को सदियों से प्रदूषित करते आ रहे हैं। इस बीच एक सुखद और महत्वपूर्ण ख़बर यह आई है कि अब समुद्रों के इस प्रदूषण पर लगाम लग सकती है। क्योंकि, अब प्रदूषक हैवी फ्यूल ऑयल के बजाय मेथेनॉल जैसे स्वच्छ ईंधन से चलने वाले जहाज़ तैयार हो गए हैं। नई तकनीक वाले इन जहाज़ों से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन 92% तक और सल्फर ऑक्साइड उत्सर्जन 99% तक कम होता है।
पड़ोसी देश चीन ने हाल ही में अपने डालियान पोर्ट से दुनिया के पहले मेथेनॉल और गैस से चलने वाले डुअल-फ्यूल जहाज़ ‘काई तुओ’ (न्यू एक्सप्लोरर) को रवाना किया। यह करीब 21000 किलोमीटर के अपने पहले सफ़र को सफ़लतापूर्वक पूरा भी कर चुका है।
कच्चे तेल को ढोने वाला यह यह टैंकर शिप स्मार्ट अल्ट्रा-लार्ज क्रूड कैरियर (ULCC) की श्रेणी में आता है। इस जहाज़ की एक और ख़ासियत ये है कि यह मेथेनॉल और पारंपरिक ईंधन दोनों पर चल सकता है। इसमें चीन द्वारा विकसित स्वदेशी मेथेनॉल डुअल-फ्यूल इंजन और इंटेलिजेंट कार्गो मैनेजमेंट जैसे स्मार्ट सिस्टम लगे हैं। यह चीन ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के शिपबिल्डिंग उद्योग में एक मील का पत्थर है, क्योंकि समुद्री परिवहन के प्रदूषण को घटा कर इसके कम कार्बन फुटप्रिंट में कमी लाने में कारगर हो सकता है।
क्या होता है HFO और उसका असर?
पानी के जहाज़ों में हैवी फ्यूल ऑयल (HFO) एक सघन, भारी और अशुद्ध ईंधन होता है जो पेट्रोलियम क्रूड के अत्यधिक अवशेष भागों से प्राप्त होता है। यह इतना अशुद्धियों से भरा होता है कि डीज़ल और क्रूड ऑयल की तरह द्रव अवस्था में होने के बजाय ताराकोल की तरह अर्ध ठोस अवस्था में होता है, जिसे इस्तेमाल करने के लिए बर्नरों से गर्म करके पिघलाना पड़ता है। यह पारंपरिक डीज़ल या गैस ईंधन की तुलना में काफ़ी सस्ता तो है, लेकिन जलने पर भारी प्रदूषण करता है।
जब HFO को जहाज़ के इंजन में जलाया जाता है, तो यह सल्फर ऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ), काला कार्बन (Black Carbon) और सूक्ष्म कण (PM₂.₅) जैसे हानिकारक प्रदूषकों का भारी मात्रा में उत्सर्जन करता है। रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक इससे निकलने वाला गहरा काला कार्बन और गर्म व ज़हरीली गैसें समुद्री और तटीय क्षेत्रों में गर्मी सोखने की क्षमता बढ़ाकर स्थानीय तापमान में बढ़ोतरी और ग्लेशियरों के पिघलने की वजह बनती हैं।
पानी और हवा दोनों को नुकसान
HFO की सबसे बड़ी ख़ामी यह है कि इसका धुआं हवा के साथ ही समुद्री जल को भी गंभीर रूप से प्रदूषित करता है। इसका सीधा और गंभीर कुप्रभाव सागरों के पानी की गुणवत्ता और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र (मरीन इको-सिस्टम) पर पड़ता है। जहाज़ों में उत्सर्जित ये जहरीले कण और भारी ऑर्गेनिक यौगिक वायुमंडल में फैलने के बाद समुद्री पानी और समुद्र तट क्षेत्रों में भी मिश्रित हो सकते हैं, खासकर जब जहाज़ों द्वारा उपयोग की गई स्क्रबर प्रणालियों के माध्यम से सल्फर को हटाने के लिए समुद्री जल का उपयोग किया जाता है। क्योंकि, यह जहाज़ के धुएं से निकले प्रदूषकों को समुद्र में वापस छोड़ देता है, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
इसके अलावा समुद्री इलाक़ों की नम हवाएं इस धुएं की नमी बढ़ाकर इसे भारी कर देती हैं, जिससे यह समुद्र की सतह पर बैठ जाता है और फिर तेज़ समुद्री लहरों के कारण पानी में घुल जाता है। इसके अलावा, जहाज़ोंके दुर्घटना ग्रस्त होने या HFO के रिसाव जैसी घटनाएं होने पर यह भारी, चिपचिपा पदार्थ समुद्र के काफ़ी बड़े इलाके में फैल जाता है। जो समुद्री जीवन को काफ़ी लंबे समय तक गंभीर नुकसान पहुंचाता है, क्योंकि यह समुद्र की सतह पर लंबे समय तक तैरता रहता है। इसके कारण पानी में मौज़ूद कार्बन डाईआक्साइड मुक्त होकर हवा में नहीं मिल पाती है समुद्री जल में ही कै़द हो कर रह जाती है। इससे समुद्री जीवों और पक्षियों के व्यवहार और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डालता है। इस तरह भारी ईंधन तेल का सस्ता विकल्प पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर जोखिम पैदा करता है।
बाल्टिक सागर के इलाक़े में हुए अध्ययन में इससे मछलियों व अन्य जलीय जीवों की जैव विविधता और मैंग्रोव जैसी जलीय वनस्पतियों पर गंभीर असर देखा गया है। इसके अलावा सैटेलाइट इंडेंटिफाइड डेटा से भी पता चलता है कि जहाज़ों द्वारा तेल की अनधिकृत डंपिंग और बाइलेज (engine waste) डिस्चार्ज समुद्र में लगातार लंबी तेल पट्टियां बनती जा रही हैं, जो समुद्री खाद्य जाल (plankton) जैसे आधारभूत जीवों को नुकसान पहुंचा रही हैं और पूरे समुद्री खाद्य शृंखला (मरीन फूड चेन) पर प्रभाव डाल रही हैं।
आर्कटिक में प्रतिबंध के बावज़ूद हो रहा इस्तेमाल
HFO के घातक दुष्परिणामों के चलते अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके इस्तेमाल को नियंत्रित करने और इसके पर्यावरण अनुकूल ईंधन विकल्पों को बढ़ाना देने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है। इसके चलते जहाज़ संयुक्त राष्ट्र की एक जहाज़ रानी एजेंसी अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (International Maritime Organization – IMO) के नियमों के तहत आर्कटिक क्षेत्र में HFO के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। हालांकि इसके बावज़ूद इसका इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। इसकी वज़ह है इसका सस्ता होना। इसके अलावा आर्कटिक तटरेखा का आधा हिस्सा रूस के अधिकार क्षेत्र में आने के चलते भी इन नियमों का सख्ती से पालन नहीं हो पा रहा है, क्योंकि वह खुद क्रूड और HFO का बड़ा निर्यातक होने के कारण नए नियम को लागू नहीं नहीं करना चाहता। पर्यावरण की दृष्टि से यह काफ़ी चिंताजनक बात है, क्योंकि जहाज़ों का प्रदूषण सिर्फ हवा तक सीमित नहीं रहता।
जब जहाज़ों के स्क्रबर सिस्टम (जो धुएँ से सल्फर हटाकर समुद्री जल में छोड़ते हैं) के कारण जहाज़ों के उत्सर्जन समुद्र में मिश्रित होते हैं, तो भारी धातुएँ और विषाक्त कार्बनिक यौगिक समुद्री पानी और तलछट में बैठ सकते हैं — इससे तटीय पारिस्थितिक तंत्र को दीर्घकालिक नुकसान होता है और मूल्यवान मछली तथा मैंग्रोव जैसी जैव विविधता प्रभावित होती है, जैसा बाल्टिक सागर के अध्ययन में भी दिखा है।
इसके अलावा सैटेलाइट इंडेंटिफाइड डेटा से पता चलता है कि जहाज़ों द्वारा किए गए तेल के अनधिकृत डंपिंग और बाइलेज (engine waste) डिस्चार्ज समुद्र में लगातार व्यापक तेल पट्टियाँ बनाती हैं, जो समुद्री खाद्य जाल (plankton) जैसे आधारभूत जीवों को नुकसान पहुँचाती हैं और पूरे समुद्री खाद्य वेब पर प्रभाव डालती हैं।
इस प्रकार, हैवी फ्यूल ऑयल से चलने वाले जहाज़ हवा और समुद्री जल दोनों को प्रदूषित कर रहे हैं, जिससे मरीन इकोसिस्टम, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है; इसी कारण वैश्विक स्तर पर स्वच्छ ईंधन विकल्पों और कड़े नियंत्रणों की मांग बढ़ रही है। हैवी फ्यूल ऑयल (HFO) से चलने वाले समुद्री जहाज़ आज वैश्विक समुद्री प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोतों में गिने जाते हैं।
HFO से जुड़े कुछ चिंताजनक आंकड़े
दुनिया भर के समुद्री जहाज़ वैश्विक सल्फर ऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जन का लगभग 13–15% और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ) उत्सर्जन का करीब 15% उत्पन्न करते हैं। इसका मुख्य कारण भारी मात्रा में उपयोग होने वाला हैवी फ्यूल ऑयल है।
आईएमओ और यूरोपियन एनवायर्नमेंट एजेंसी के मुताबिक जहाज़ों के ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाले हैवी फ्यूल ऑयल में 3.5% तक सल्फर पाया जाता है, जो सड़क परिवहन में इस्तेमाल होने वाले डीज़ल की तुलना में करीब 3,500 गुना अधिक है। यही कारण है कि इसका धुआं अत्यंत विषैला होता है।
बाल्टिक मरीन एनवायर्नमेंट प्रोटेक्शन कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक एक बड़ा समुद्री जहाज़ हर दिन औसतन 20,000–45,000 टन तक प्रदूषित स्क्रबर वॉटर समुद्र में छोड़ता है, जिसमें भारी धातुएँ, पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) और अम्लीय तत्व मौज़ूद होते हैं।
नेचर क्लाइमेट चेंज के अध्ययन के अनुसार, जहाज़ों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन और तेलीय कण फाइटोप्लैंकटन की उत्पादकता को 5–10% तक घटा सकते हैं, जिससे पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला प्रभावित होती है।
आर्कटिक काउंसिल और यूएनईपी की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के सबसे ज़्यादा संवेदनशील समुद्री क्षेत्रों में गिने जाने वाले आर्कटिक क्षेत्र में होने वाले कुल ब्लैक कार्बन प्रदूषण का लगभग 20% हिस्सा केवल शिपिंग गतिविधियों से ही आता है, जो बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया को तेज करता है और समुद्री पारिस्थितिकी को अस्थिर बनाता है।
इंटरनेशलन काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन यानी ICCT के मुताबिक जहाज़ों में HFO के इस्तेमाल से डीज़ल की तुलना में 81% अधिकPM-2.5 कण और ब्लैक कार्बन उत्सर्जन अधिक होता है, जो वायु और समुद्री जीवन के लिए गंभीर जोखिम है।
आगे की राह और चुनौतियां
सस्ते समुद्री ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा हैवी फ्यूल ऑयल समुद्र, वायु और जैव विविधता के लिए दीर्घकालिक पर्यावरणीय खतरा है। इसके कारण उत्पन्न प्रदूषण समुद्री जीवन, मत्स्य संसाधनों और तटीय समुदायों के अस्तित्व को सीधे प्रभावित कर रहा है। इस कारण वैश्विक स्तर पर इसके विकल्पों की मांग लगातार तेज हो रही है।
अब मेथेनॉल से चलने वाले जहाजों की शुरुआत के बाद इस गंभीर समस्या पर प्रभावी नियंत्रण की उम्मीद जगी है। हालांकि इसकी महंगी लागत के कारण इसका इस्तेमाल अभी बहुत ही सीमित है। अभी एंटोनिया मर्स्क जैसी केवल कुछ ही शिपिंग कंपनियों प्रायोगिक स्तर पर इसे अपनाया है, जिसने हाल ही में अपना तीसरा एथेनॉल से चलने वाला जहाज समुद्र में उतार दिया है। आगे चलकर लागत में कमी आने पर इसका दायरा बढ़ने की उम्मीद है। इसके अलावा समुद्री परिवहन में सख्त पर्यावरणीय नियमों को भी मुश्तैदी से लागू करने की ज़रूरत है, ताकि HFO के इस्तेमाल को घटाकर मेथेनॉल जैसे कम प्रदूषण वाले विकल्पों को अपनाया जा सके। इसमें अभी काफ़ी वक्त लगेगा और इसे चरणबद्ध ढंग से लागू करना होगा।
इसके अलावा कई तकनीकी और व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। इसमें सबसे पहले जहाज में ईंधन भरने के और इसे चलाने वाले संचालनके लिए चालक दल (क्रू) को नए सिरे से गहन प्रशिक्षण देने की ज़रूरत होगी, क्योंकि मेथेनॉल HFO की तुलना में काफ़ी ज़्यादा ज्वलनशील ईंधन है। जहाजों पर कड़े सुरक्षा प्रबंधों को लागू करने की भी ज़रूरत है, ताकि मेथनॉल को भरते और जहाज चलाते वक्त सुनिश्चित को किया जा सके। साथ ही जहाजों में ज़्यादा संख्या में और बेहर कार्यक्षमता वाले अग्निशमन उपकरण लगाना, मेथनॉल कक्ष, बंकर स्टेशनों और इंजन कक्ष के निचले हिस्से में स्थायी अग्निशमन फोम, बंकरिंग होज़ पर ब्रेकअवे कपलिंग के साथ-साथ बंकर स्टेशन पर सीसीटीवी कैमरे लगाने जैसी तकनीकी चुनौतियां भी शामिल हैं।
ईंधन की ज़्यादा खपत भी एक बड़ी चुनौती मानी जा रही है। मेथेनॉल के कम कैलोरी मान के कारण समान शक्ति प्राप्त करने के लिए मेथनॉल से चलने वाले कंटेनर जहाज को पारंपरिक HFO ईंधन की तुलना में दो से ढाई गुना अधिक मेथनॉल का उपयोग करना पड़ता है। यह भी एक बड़ी समस्या है, क्योंकि ज़्यादा ईंधन भरने से जहाज का वज़न बढ़ जाता है और उसकी मालवहन क्षमता घट जाती है, जो आर्थिक और कारोबारी नज़रिये से एक बड़ी बाधा बनती है। इन समस्याओं का कारगर समाधान होने तक पहले से मौज़ूद जहाजों की बड़ी संख्या के चलते इस नई मरीन फ्यूल क्रांति का प्रभावी असर दिखाई देने में अभी कई वर्षों का वक्त लगेगा।

