24 अक्टूबर, अंतरराष्ट्रीय नदी डॉल्फिन दिवस (International Freshwater Dolphin Day) : आवाज़ से अपनी दुनिया पहचानती डॉल्फिन

गंगा नदी डॉल्फिन : भागीरथी नदी, पश्चिम बंगाल

गंगा नदी डॉल्फिन : भागीरथी नदी, पश्चिम बंगाल

फोटो : मुंशील अबुल बरकत / CC BY 4.0 / विकिमीडिया कॉमन्स

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Summary
  • 24 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय मीठे पानी की डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य लोगों को नदी डॉल्फिनों और उन्हें बचाने की जरूरत के बारे में बताना है।

  • दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण अमेरिका की नदियों में कई तरह की डॉल्फिन मिलती हैं।

  • गंगा और सिंधु नदी डॉल्फिन पानी में आवाज़ की प्रतिध्वनि से अपना रास्ता और भोजन खोजती हैं।

  • बांध, घटता नदी प्रवाह, मछली पकड़ने के जाल, प्रदूषण और पानी के भीतर बढ़ता शोर नदी डॉल्फिनों के सामने प्रमुख खतरे हैं।

डॉल्फिन का नाम सुनते ही अक्सर समुद्र और नीले पानी में छलांग लगाती डॉल्फिन की तस्वीर सामने आती है। लेकिन दुनिया की कई बड़ी नदियों में भी डॉल्फिन रहती हैं। भारत की गंगा और ब्रह्मपुत्र, पाकिस्तान की सिंधु, दक्षिण अमेरिका की अमेजन और दक्षिण-पूर्व एशिया की मेकांग जैसी नदियां इनका घर हैं।

इनमें कुछ डॉल्फिनों की दृष्टि बहुत सीमित होती है और वे पानी के भीतर आवाज़ की मदद से अपना रास्ता और भोजन खोजती हैं। हर साल 24 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय मीठे पानी की डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है।

यह दिन हमें उन नदियों और डॉल्फिनों की याद दिलाता है, जो बाँधों, प्रदूषण, मछली पकड़ने के जाल और पानी के बदलते बहाव से खतरे में हैं।

24 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय मीठे पानी की डॉल्फिन दिवस?

अंतरराष्ट्रीय मीठे पानी की डॉल्फिन दिवस (International Freshwater Dolphin Day) हर साल 24 अक्टूबर को मनाया जाता है। अक्टूबर 2009 में इंडोनेशिया के पूर्वी कालीमंतान में हुई एक अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में इस दिन को मनाने का फैसला लिया गया था। इस कार्यशाला में मीठे पानी की डॉल्फिनों और दूसरे जलीय स्तनधारियों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाने पर चर्चा हुई थी।

इस दिन का मकसद लोगों को नदी डॉल्फिनों के सामने मौजूद खतरों के बारे में बताना है। साथ ही सरकारों, वैज्ञानिकों और नदी किनारे रहने वाले लोगों को इनके संरक्षण से जोड़ना भी है। दुनिया की कई नदी डॉल्फिन प्रजातियां संकटग्रस्त हैं। उनके लिए केवल पानी में जीवित रहना ही चुनौती नहीं है।

नदियों पर बने बांध, मछली पकड़ने के जाल, प्रदूषण और उनके प्राकृतिक आवास में बदलाव भी उनके अस्तित्व को प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए डॉल्फिनों को बचाने के लिए उन नदियों को भी बचाना जरूरी है, जिनमें वे रहती हैं।

नदी को आवाजों से पढ़ती है

डॉल्फिन मछली नहीं, बल्कि स्तनधारी जीव है। वह बच्चे को जन्म देती है और उसे दूध पिलाती है। वह पानी में रहती है, लेकिन साँस लेने के लिए उसे सतह पर आना पड़ता है। नदी में रहना भी उसके लिए आसान नहीं है। खासकर उन नदियों में जिनका पानी गाद से भरा और धुंधला होता है। ऐसे पानी में दूर तक देख पाना मुश्किल है। गंगा की डॉल्फिन की आंखें बहुत छोटी होती हैं और उसकी दृष्टि सीमित होती है। फिर वह अपना रास्ता कैसे खोजती है? आवाज के सहारे।

डॉल्फिन पानी में ध्वनि-तरंगें छोड़ती है। ये तरंगें सामने मौजूद किसी मछली, पत्थर या दूसरी वस्तु से टकराकर वापस लौटती हैं। इस लौटती आवाज से डॉल्फिन को अपने आसपास की चीजों का अंदाजा होता है। इसे इकोलोकेशन कहते हैं।

इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे अँधेरे कमरे में कोई आवाज लगाकर सामने की दीवार का अंदाजा लगाए। फर्क यह है कि डॉल्फिन यह काम पानी के भीतर करती है। इस तरह लौटती हुई आवाज़ से डॉल्फिन को पता चल जाता है कि उसके आसपास क्या है और वह कितनी दूर है। इसी क्षमता से वह शिकार भी खोजती है।

मछलियां, झींगे और दूसरे छोटे जलीय जीव उसके भोजन का हिस्सा हैं। नदी की तलहटी के पास छिपी मछलियों और दूसरे छोटे जीवों को खोजने में भी उसे आवाज़ से मदद मिलती है। लेकिन जिस चीज से डॉल्फिन अपना रास्ता खोजती है, वही चीज उसके लिए परेशानी का कारण भी बन सकती है।

पानी के भीतर शोर बढ़ने से डॉल्फिन को दूसरी आवाज़ें पहचानने में परेशानी हो सकती है। तेज मोटर वाली नावें, ड्रेजिंग और निर्माण जैसी गतिविधियां नदी के उस शांत संसार को बदल देती हैं, जिसमें डॉल्फिन आवाज के सहारे रहती है। और खतरे सिर्फ शोर के नहीं हैं।

मछली पकड़ने के जाल में फंसना, नदी के प्रवाह में बदलाव, बांध और बैराज, प्रदूषण और प्राकृतिक आवास का नष्ट या बदलना भी नदी डॉल्फिनों के सामने बड़ी चुनौतियां हैं। इसलिए डॉल्फिन के जीवन को समझने के लिए उस नदी की स्थिति को भी देखना जरूरी है, जिसमें वह रहती है।

दुनिया की नदी डॉल्फिनों के सामने खतरे

नदी डॉल्फिन केवल भारत में नहीं मिलतीं। दक्षिण एशिया में गंगा और सिंधु नदी डॉल्फिन, दक्षिण अमेरिका में अमेजन नदी डॉल्फिन और टुकुक्सी जैसी प्रजातियां पाई जाती हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया की मेकांग, इरावदी और महाकम नदियों में इरावडी डॉल्फिन की अलग-अलग आबादियां रहती हैं। ये डॉल्फिन अलग-अलग तरह की नदियों में रहती हैं, लेकिन इनके सामने कई खतरे एक जैसे हैं।

WWF के अनुसार, 1980 के दशक के बाद से दुनिया की नदी डॉल्फिनों की आबादी में लगभग 73 प्रतिशत गिरावट का अनुमान है। यह आंकड़ा अलग-अलग क्षेत्रों में डॉल्फिन की आबादी में आए बदलावों के अध्ययन पर आधारित है। यह सभी डॉल्फिनों की प्रत्यक्ष गिनती नहीं है।

बांध, प्रदूषण, मछली पकड़ने के जाल और नदी के प्राकृतिक बहाव में बदलाव इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। चीन की यांग्त्से नदी में पाई जाने वाली बाइजी डॉल्फिन इसका गंभीर उदाहरण है। वर्ष 2006 के व्यापक सर्वेक्षण में एक भी बाइजी नहीं मिली थी। इसके बाद माना गया कि बाइजी डॉल्फिन शायद अब अपने प्राकृतिक आवास में नहीं बची है।

इन चुनौतियों को देखते हुए 24 अक्टूबर 2023 को कोलंबिया की राजधानी बोगोटा में नदी डॉल्फिन संरक्षण के लिए एक वैश्विक घोषणा पर हस्ताक्षर किए गए। इस घोषणा में डॉल्फिनों की घटती संख्या रोकने, उनकी नदियों को सुरक्षित रखने और देशों के मिलकर काम करने पर जोर दिया गया।

दुनिया की प्रमुख मीठे पानी की डॉल्फिन और उनसे संबंधित जलीय स्तनधारी

डॉल्फिन नदी के लिए क्यों जरूरी है?

सिर्फ डॉल्फिन की मौजूदगी से यह नहीं कहा जा सकता कि नदी पूरी तरह स्वस्थ है। डॉल्फिन को जीवित रहने के लिए पर्याप्त पानी, मछलियां और दूसरे छोटे जलीय जीव चाहिए। नदी में सुरक्षित रहने और आने-जाने के लिए गहरे हिस्से भी जरूरी हैं।

पानी का बहाव बहुत बदल जाए या उसकी रहने की जगह खराब हो जाए, तो डॉल्फिन पर असर पड़ सकता है। सुरक्षित रहने और आवाजाही के लिए नदी के गहरे और अपेक्षाकृत शांत हिस्से भी जरूरी हैं। नदी का प्रवाह बहुत ज्यादा बदल जाए या उसका आवास बिगड़ जाए, तो डॉल्फिन पर भी असर पड़ता है।

इसलिए डॉल्फिन नदी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यानी नदी में रहने वाले जीवों के साथ पानी, भोजन और प्राकृतिक वातावरण से भी उसका गहरा संबंध है। भारत का पर्यावरण मंत्रालय गंगा नदी डॉल्फिन को जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का शीर्ष शिकारी और अम्ब्रेला स्पीशीज बताता है।

इसका मतलब है कि डॉल्फिन और उसके रहने की जगह को सुरक्षित रखने से नदी की कई दूसरी प्रजातियों को भी संरक्षण मिल सकता है। इसलिए केवल डॉल्फिनों की संख्या गिनना काफी नहीं है। नदी में कितना पानी है, उसका बहाव कैसा है और डॉल्फिन को पर्याप्त भोजन मिल रहा है या नहीं, यह देखना भी जरूरी है।

भारत में नदी डॉल्फिनों के संरक्षण की स्थिति

भारत में 5 अक्टूबर को राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस मनाया जाता है। गंगा नदी डॉल्फिन देश का राष्ट्रीय जलीय जीव है। भारत में डॉल्फिनों को बचाने के लिए गंगा और सिंधु नदी प्रणालियों को सुरक्षित रखना भी जरूरी है।

भारत में गंगा और सिंधु नदी डॉल्फिन पाई जाती हैं। गंगा नदी डॉल्फिन गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ी है, जबकि सिंधु नदी डॉल्फिन की एक छोटी आबादी पंजाब की ब्यास नदी में रहती है।

भारतीय वन्यजीव संस्थान ने 2021 से 2023 के बीच देश की 28 नदियों में डॉल्फिनों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण किया। इसके आधार पर भारत में कुल 6,327 नदी डॉल्फिन होने का अनुमान लगाया गया।

जनवरी 2026 में भारत में डॉल्फिनों का दूसरा व्यापक आकलन भी शुरू किया गया। इस सर्वेक्षण में डॉल्फिनों की संख्या के साथ यह भी देखा जा रहा है कि वे कहां रहती हैं और उन्हें किन खतरों का सामना करना पड़ रहा है। इससे पता चल सकेगा कि किन नदियों में डॉल्फिनों को बचाने के लिए ज्यादा काम करने की जरूरत है।

जब नदी के लोग बने डॉल्फिन मित्र

भारत की नदी डॉल्फिन की कहानी में बिहार का भागलपुर एक अहम जगह है। गंगा का करीब 60 किलोमीटर लंबा हिस्सा विक्रमशिला गंगेटिक डॉल्फिन अभयारण्य है। सुल्तानगंज से कहलगाँव तक फैले इस हिस्से को 1991 में डॉल्फिन के संरक्षण के लिए अधिसूचित किया गया था। लेकिन किसी नदी को सिर्फ नक्शे पर सुरक्षित घोषित कर देने से डॉल्फिन सुरक्षित नहीं हो जाती। नदी में मछलियां पकड़ने वाले लोग भी हैं। नावें चलती हैं। रोजी-रोटी चलती है। और डॉल्फिन भी इसी नदी में रहती है।

यहीं से डॉल्फिन मित्र जैसी पहल की अहमियत समझ में आती है। नदी में रोज उतरने वाले मछुआरे और नाविक डॉल्फिन को किसी किताब से नहीं जानते। वे उसे नदी में देखते हैं। उसके साथ उसी पानी को साझा करते हैं। इसलिए डॉल्फिनों को बचाने के काम में मछुआरों और नाविकों का अनुभव बहुत काम आ सकता है। उन्हें भी इस काम से जोड़ना जरूरी है।

बिहार के डॉल्फिन संरक्षण केंद्र का घोषित उद्देश्य नदी किनारे रहने वाले लोगों की मदद करना और उन्हें डॉल्फिन संरक्षण के काम से जोड़ना भी है। केंद्र का काम शोध और प्रशिक्षण से लेकर नदी की पारिस्थितिकी और डॉल्फिन के संरक्षण तक फैला है। डॉल्फिन संरक्षण में मछुआरों की भागीदारी जरूरी है, क्योंकि उनकी आजीविका भी इन्हीं नदियों पर निर्भर है।

बिहार का यह अनुभव अकेला नहीं है। WWF-India ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में भी नदी किनारे रहने वाले समुदायों के साथ काम करते हुए Dolphin Mitra समूह विकसित किए हैं। पंजाब की ब्यास नदी में स्थानीय नाविक इंडस नदी डॉल्फिन की निगरानी में मदद करते हैं।

यानी डॉल्फिनों की निगरानी केवल वैज्ञानिक ही नहीं करते। कई जगह नदी को रोज देखने वाले लोग भी इसका हिस्सा हैं। इस पहल की खास बात यह है कि नदी किनारे रहने वाले लोग भी डॉल्फिनों की सुरक्षा में मदद करते हैं।

दूसरे देशों में भी नदी किनारे रहने वाले समुदाय डॉल्फिन संरक्षण का हिस्सा बन रहे हैं। कंबोडिया में मेकांग नदी के आसपास मछुआरों और स्थानीय लोगों के साथ संरक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इनमें मछली पकड़ने के ऐसे तरीकों पर जोर दिया जाता है, जिनसे डॉल्फिन के जाल में फँसने का खतरा कम हो।

डॉल्फिन को समझने के नए तरीके

डॉल्फिन के बारे में अब सिर्फ यह जानना काफी नहीं है कि वह कहां मौजूद है। यह जानना भी जरूरी है कि डॉल्फिन नदी के किन हिस्सों में रहती है, कहाँ आती-जाती है और नदी में होने वाले बदलावों का उस पर क्या असर पड़ता है।

इस दिशा में असम में हुई सैटेलाइट टैगिंग एक महत्वपूर्ण कदम है। दिसंबर 2024 में भारत में पहली बार एक गंगा नदी डॉल्फिन को सैटेलाइट टैग लगाया गया। भारतीय वन्यजीव संस्थान ने असम वन विभाग और आरण्यक के साथ मिलकर यह काम किया। इस टैग से मिलने वाले आंकड़ों की मदद से वैज्ञानिक जान सकेंगे कि डॉल्फिन नदी के किन हिस्सों में आती-जाती है और कहां ज्यादा समय बिताती है। इससे उसके रहने की जगह और आवाजाही के रास्तों को समझने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, अलग-अलग जगहों पर डॉल्फिनों को अलग तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ओडिशा की चिलिका झील इसका एक अलग उदाहरण है। यहां इरावडी डॉल्फिन के साथ पर्यटन भी जुड़ा हुआ है। डॉल्फिन देखने के लिए नावें चलती हैं और इससे स्थानीय लोगों की आजीविका भी जुड़ी है। लेकिन नावों की लगातार आवाजाही और उनसे होने वाला शोर डॉल्फिन के लिए परेशानी पैदा कर सकता है।

चिलिका झील में डॉल्फिन देखने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की गई है। इसके पालन की निगरानी के लिए चिलिका वन्यजीव प्रभाग के कर्मचारी नियमित गश्त करते हैं। भारत सरकार के अनुसार, पुरी जिला प्रशासन ने चिलिका झील के बाहरी जलमार्ग में पर्यटक नावों की संख्या की सीमा तय करने के बारे में सुझाव देने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई थी। इसका मकसद नावों की आवाजाही से डॉल्फिनों और झील के दूसरे जीवों को होने वाले नुकसान को कम करना है।

इस तरह डॉल्फिनों को बचाने के लिए अलग-अलग तरीके अपनाए जा रहे हैं। असम में सैटेलाइट टैग से उनकी आवाजाही का अध्ययन हो रहा है, जबकि चिलिका में नावों की गतिविधियों को नियंत्रित करने की कोशिश की जा रही है।

आखिर डॉल्फिन हमें क्या बता रही है?

डॉल्फिन पानी के भीतर आवाज़ों की मदद से अपना रास्ता और भोजन खोजती है। उसके लिए नदी में पर्याप्त पानी, भोजन और सुरक्षित जगह होना जरूरी है। नदी का बहाव बदलने या पानी के भीतर शोर बढ़ने से उसका जीवन प्रभावित हो सकता है।

दुनिया की अलग-अलग नदियों में रहने वाली डॉल्फिनों के सामने कई खतरे एक जैसे हैं। उन्हें पर्याप्त पानी, सुरक्षित आवास और बिना रुकावट आवाजाही के लिए जगह चाहिए।

24 अक्टूबर को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय नदी डॉल्फिन दिवस बताता है कि डॉल्फिनों को बचाने के लिए नदियों को सुरक्षित रखना भी जरूरी है। इसके लिए प्रदूषण कम करने, मछली पकड़ने के सुरक्षित तरीकों और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर ध्यान देना जरूरी है।

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