

फोटो : इंडिया वाटर पोर्टल
विश्वेश्वरैयाडॉ. विश्वेश्वरैया ने बिना बिजली और मोटर खुद से खुलने वाले बांध बनाकर चौंकाया था।
ग्वालियर के टिगरा बांध, कर्नाटक के कृष्णराज सागर और ओडिशा के हीराकुंड बांध में बड़ी भूमिका।
मूसी नदी में बार-बार आने वाली विनाशकारी बाढ़ से शहर को बचाने का समाधान निकाला।
विशाखापत्तनम बंदरगाह को समुद्री कटाव से बचाने के काम में तकनीकी भूमिका निभाई।
बेंगलुरु, कोल्हापुर, नागपुर, इंदौर, राजकोट समेत तमाम शहरों में जलापूर्ति का श्रेय भी डॉ. विश्वेश्वरैया को।
भारत में हर साल 15 सितंबर को इंजीनियर्स डे (Engineers' Day) मनाया जाता है। यह दिन भारत के महान इंजीनियर, प्रशासक और राष्ट्रनिर्माता सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया (Sir Mokshagundam Visvesvaraya) की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। इंजीनियर्स डे पर देश याद कर रहा उस बेमिसाल इंजीनियर को, जिसने करीब 120 साल पहले देश के एक बांध के लिए ऐसा अनूठा स्वचालित फाटक तैयार कर दिया था जो बिना किसी मोटर और बिजली के इस्तेमाल अपने फाटकों को खुद से खोल और बंद कर सकता था।
अपनी इस अनूठी इंजीनियरिंग से दुनिया को हैरान करने वाले डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया देश में सिंचाई व्यवस्था से लेकर बाढ़ नियंत्रण, पेयजल, बंदरगाह सुरक्षा और औद्योगिकीकरण तक में एक दूरद्रष्टा की भूमिका निभाई। उनके बहुमूल्य योगदानों ने देश को औद्योगिक और आर्थिक मोर्चे पर अपने पैरों पर खड़ा होने में अहम भूमिका निभाई।
सरकारी स्रोतों के अनुसार उनका जन्म 15 सितंबर 1861 को तत्कालीन मैसूर राज्य के मुद्देनहल्ली में हुआ था। उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, जो कि उस समय गिने-चुने भारतीय ही कर पाते थे। शिक्षा पूरी करने के बाद बंबई प्रेसिडेंसी के लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर के रूप में काम शुरू किया और आगे चलकर सिंचाई, जलापूर्ति, जल निकासी और बांध निर्माण के विशेषज्ञ के रूप में अपनी पहचान बनाई। 1955 में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
डॉ. विश्वेश्वरैया को देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के सपनों को हकीक़त की ज़मीन पर उतारने वाला शिल्पी और भारत के आर्थिक व औद्योगिक विकास के उनके विज़न को अमली जामा पहनाने वाले विश्वसनीय सहयोगी के तौर पर याद किया जाता है। पं. नेहरू के इस दूरदर्शी विज़न में डॉ. विश्वेश्वरैया की भी काफी अहम भूमिका मानी जाती है। उनकी खासियत यह थी कि वे इंजीनियरिंग को केवल पुल, सड़क या बांध बनाने की तकनीक नहीं मानते थे। उनके लिए इंजीनियरिंग का मतलब था सीमित संसाधनों में ज्यादा लोगों तक पानी पहुंचाना, बाढ़ से शहरों को बचाना, खेती की उत्पादकता बढ़ाना और उद्योगों के लिए आधार तैयार करना। यही वजह है कि उनका योगदान एक परियोजना तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने पानी और बुनियादी ढांचे से जुड़े कई ऐसे प्रयोग किए, जिनका प्रभाव बाद के दशकों में भी दिखाई देता रहा। सरकारी स्रोत उन्हें आधुनिक भारत के निर्माण में इंजीनियरिंग और औद्योगिकीकरण के प्रमुख पैरोकारों में गिनते हैं। 14 अप्रैल 1962 को 101 वर्ष की उम्र में उनका निधन हुआ।
पुणे के पास खड़गवासला जलाशय विश्वेश्वरैया की सबसे चर्चित इंजीनियरिंग उपलब्धियों में से एक है। उस समय समस्या यह थी कि जलाशय मानसून में जल्दी भर जाता था और अतिरिक्त पानी बाहर निकल जाता था, जबकि गर्मियों के लिए ज्यादा पानी सुरक्षित रखने की जरूरत थी। बांध की ऊंचाई बढ़ाए बिना जलाशय की उपयोगी भंडारण क्षमता बढ़ाना आसान काम नहीं था।
विश्वेश्वरैया ने इसी समस्या का समाधान Automatic Weir Floodgates यानी स्वचालित जल-निकासी फाटकों के जरिए किया। सरकारी स्रोतों के अनुसार इस प्रणाली को उन्होंने डिजाइन और पेटेंट कराया और 1903 में खड़गवासला में पहली बार लगाया गया।
इस तकनीक की खूबी यह थी कि फाटक को खोलने या बंद करने के लिए अलग बिजली की मोटर या मानव ऑपरेटर की जरूरत नहीं पड़ती थी।
जलाशय में पानी एक तय स्तर से ऊपर पहुंचने पर पानी फ्लोट से जुड़ी व्यवस्था को सक्रिय करता था और फाटक खुलकर अतिरिक्त पानी को नीचे की ओर जाने देता था। जब जलस्तर घटता था तो यही व्यवस्था उलटी दिशा में काम करती और फाटक बंद हो जाते थे। यानी पानी का अपना स्तर और दबाव ही उस स्वचालित व्यवस्था को संचालित करता था। इसका एक और बड़ा फायदा यह था कि बांध की ऊंचाई बढ़ाए बिना जलाशय में अधिक पानी रोकने की क्षमता हासिल की जा सकती थी, जबकि बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी स्वतः बाहर निकलता रहे। बाद में इसी मैकेनिज़्म को ग्वालियर के टिगरा बांध और कर्नाटक के कृष्णराज सागर बांध में भी अपनाया गया।
आज बांधों में बिजली से चलने वाले गेट, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण और SCADA जैसी आधुनिक प्रणालियां इस्तेमाल होती हैं। लेकिन, डॉ. विश्वेश्वरैया ने उस दौर में, जब आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रणालियों की कल्पना भी दूर थी, जलस्तर के बदलाव को यांत्रिक नियंत्रण में बदलने का रास्ता खोजा था। यही वजह है कि खड़गवासला के स्वचालित फाटकों को भारत के शुरुआती स्वचालित बांध-गेट इंजीनियरिंग प्रयोगों में महत्वपूर्ण माना जाता है।
भारत सरकार के अनुसार खड़गवासला का प्रयोग सफल होने के बाद स्वचालित फाटक की यह अवधारणा दूसरे बांधों में भी इस्तेमाल की गई। इनमें मध्य प्रदेश के ग्वालियर के पास टिगरा बांध और कर्नाटक का कृष्णराज सागर यानी KRS बांध प्रमुख हैं। इस बात का उल्लेख स्वयं देश के पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने अपने एक संबोधन में किया था।
इस तरह विश्वेश्वरैया का योगदान किसी एक संरचना को डिजाइन करने तक सीमित नहीं था। उन्होंने एक ऐसी अनूठी तकनीक विकसित की, जिसे अलग-अलग भौगोलिक और जल संसाधन परिस्थितियों में इस्तेमाल किया जा सकता है। खड़गवासला बांध में विकसित प्रणाली का दूसरे बांधों तक पहुंचना इसी इंजीनियरिंग सोच का उदाहरण है।
डॉ. विश्वेश्वरैया के नाम से सबसे ज्यादा जुड़ी परियोजनाओं में कृष्णराज सागर (KRS) बांध शामिल है। कावेरी नदी पर बना यह बांध तत्कालीन मैसूर राज्य के लिए केवल सिंचाई परियोजना नहीं था। इसका उद्देश्य पानी को संग्रहित करना, सिंचाई का विस्तार करना और आगे चलकर मैसूर तथा बेंगलुरु जैसे शहरों की जल जरूरतों को पूरा करने में मदद करना था। भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी पोर्टल के अनुसार KRS बांध और उससे जुड़ी जल व्यवस्था विश्वेश्वरैया की सबसे महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग उपलब्धियों में शामिल है।
KRS से निकलने वाली नहर प्रणाली ने बड़े क्षेत्र में सिंचाई को बढ़ावा दिया। एक सरकारी विज्ञान प्रकाशन के अनुसार बांध से जुड़ी नहरों ने कर्नाटक के कई क्षेत्रों में सिंचाई का विस्तार किया और बांध ने बिजली तथा पेयजल आपूर्ति में भी भूमिका निभाई। इस परियोजना ने यह दिखाया कि एक बड़े जलाशय को सिर्फ खेती के लिए नहीं, बल्कि सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा के बहुउद्देशीय संसाधन के रूप में विकसित किया जा सकता है।
विश्वेश्वरैया की प्रसिद्धि सिर्फ बांध बनाने के कारण नहीं हुई। 1908 में हैदराबाद में मूसी नदी की विनाशकारी बाढ़ के बाद उन्हें शहर की बाढ़ समस्या का समाधान तैयार करने के लिए बुलाया गया। उन्होंने उपलब्ध वर्षा और बाढ़ के आंकड़ों का अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि केवल शहर के भीतर जल निकासी सुधारना पर्याप्त नहीं होगा। ऊपर की ओर बड़े जलाशय बनाकर बाढ़ के पानी को नियंत्रित करना जरूरी होगा।
उनकी योजना में मूसी नदी और उसकी सहायक धारा पर ऐसे जलाशयों की परिकल्पना थी जो बाढ़ के पानी को रोक सकें और उसका एक हिस्सा नियंत्रित तरीके से छोड़ सकें। आगे चलकर उस्मान सागर और हिमायत सागर जैसे जलाशय हैदराबाद की जल व्यवस्था और बाढ़ नियंत्रण के महत्वपूर्ण हिस्से बने। केंद्रीय जल आयोग के ऐतिहासिक दस्तावेज में दर्ज है कि विश्वेश्वरैया ने हैदराबाद के लिए बाढ़ सुरक्षा के साथ-साथ शहर की ड्रेनेज व्यवस्था के लिए भी योजनाएं तैयार की थीं।
यहां उनकी सोच आज के Integrated Flood Management जैसी अवधारणा से जुड़ी दिखाई देती है। शहर में बाढ़ आने के बाद केवल राहत देने के बजाय नदी के पूरे कैचमेंट, जलाशयों, जल निकासी और शहर के विकास को एक साथ देखने की जरूरत उन्होंने एक सदी से भी पहले समझ ली थी।
पुणे के खड़कवासला डैम को डॉ. विश्वेश्वरैया की अद्भुत इंजीनियरिंग की अनूठी मिसाल माना जाता है, क्योंकि इसके फाटक पानी के स्तर के मुताबिक खुद ही खुलते और बंद होते हैं।
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विश्वेश्वरैया का काम सिर्फ नदियों और बांधों तक सीमित नहीं था। विशाखापत्तनम बंदरगाह को समुद्री कटाव से बचाने के काम में भी उन्होंने तकनीकी भूमिका निभाई। भारत सरकार के अनुसार उन्होंने बंदरगाह को erosion यानी समुद्री कटाव से बचाने की व्यवस्था विकसित करने में योगदान दिया।
यह योगदान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उनकी इंजीनियरिंग विशेषज्ञता का दायरा समझ में आता है। वे केवल जलाशय बनाने वाले इंजीनियर नहीं थे, बल्कि जल प्रवाह, तटीय प्रक्रियाओं, जल निकासी और बाढ़ नियंत्रण जैसी अलग-अलग समस्याओं को समझने वाले इंजीनियर थे।
1906-07 में भारत सरकार ने उन्हें एडन यानी वर्तमान यमन भेजा, जहां उन्हें जलापूर्ति और ड्रेनेज व्यवस्था का अध्ययन करना था। वहां तैयार की गई परियोजना को लागू किया गया। इससे पहले वे भारत में भी कई शहरों और क्षेत्रों की जलापूर्ति योजनाओं पर काम कर चुके थे। सरकारी विवरणों के अनुसार उनकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल कोल्हापुर, इंदौर, ग्वालियर, भोपाल, नागपुर, गोवा, राजकोट, भावनगर, बड़ौदा, सांगली तथा बिहार और ओडिशा के विभिन्न क्षेत्रों में जलापूर्ति से जुड़ी योजनाओं में हुआ।
उनके शुरुआती करियर में सुक्कुर, सिंध की जलापूर्ति व्यवस्था भी महत्वपूर्ण थी। उन्होंने नदी के तल से पानी को फिल्टर करने के लिए एक तकनीक विकसित की थी। बाद के स्रोत इसे उनके जलापूर्ति इंजीनियरिंग के शुरुआती महत्वपूर्ण प्रयोगों में गिनते हैं। इससे पता चलता है कि उनका ध्यान केवल बड़े बांधों पर नहीं बल्कि शहरों तक साफ पानी पहुंचाने की तकनीक पर भी था।
विश्वेश्वरैया का एक और महत्वपूर्ण योगदान Block System of Irrigation था। दक्कन के ऐसे क्षेत्रों में जहां पानी की उपलब्धता सीमित और वर्षा अनिश्चित थी, उन्होंने सिंचाई के पानी को बड़े ब्लॉकों में व्यवस्थित तरीके से वितरित करने की व्यवस्था विकसित की। इसका उद्देश्य उपलब्ध पानी का अधिक न्यायसंगत और उत्पादक इस्तेमाल करना था।
यह विचार आज के जल प्रबंधन के नजरिए से भी महत्वपूर्ण लगता है। जल संकट वाले इलाकों में केवल नए जलाशय बनाना ही समाधान नहीं है। उपलब्ध पानी को खेतों तक किस तरीके से पहुंचाया जाए, उसका वितरण कितना कुशल हो और पानी से कितनी कृषि उपज हासिल की जाए, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विश्वेश्वरैया ने सिंचाई को इसी व्यापक नजरिए से देखा।
हीराकुंड एक देश की एक ऐसी बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका इस्तेमाल बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन के लिए होता है। साथ ही यह महानदी डेल्टा के बड़े हिस्से को बाढ़ से सुरक्षा भी देती है। इस बांध के जरिये बाढ़ नियंत्रण की सोच में डॉ. विश्वेश्वरैया की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। हालांकि, हीराकुंड बांध को डॉ. एम. विश्वेश्वरैया द्वारा डिजाइन या निर्मित बांध नहीं कहा जा सकता, लेकिन इस परियोजना की मूल अवधारणा के शुरुआती चरण में उनका महत्वपूर्ण योगदान था।
1937 में महानदी के डेल्टा में आई भीषण बाढ़ के बाद तत्कालीन ओडिशा सरकार ने सर एम. विश्वेश्वरैया की सलाह ली। उन्होंने पुराने रिकॉर्ड और उपलब्ध आंकड़ों का अध्ययन करने के बाद महानदी बेसिन में बाढ़ नियंत्रण के लिए जलाशयों के निर्माण की व्यवहार्यता की विस्तृत जांच कराने की सिफारिश की। केंद्रीय जल आयोग के ऐतिहासिक दस्तावेज में दर्ज है कि उन्होंने खास तौर पर महानदी समेत प्रमुख नदियों पर ऐसे जलाशयों की संभावना तलाशने पर जोर दिया, जो बाढ़ के पानी को अस्थायी रूप से रोककर उसे धीरे-धीरे सुरक्षित दर से छोड़ सकें।
ओडिशा सरकार और Odisha Hydro Power Corporation के आधिकारिक इतिहास में 1937 में “Hirakud Scheme conceived by Er. M. Visveswaraya” दर्ज है। इसके बाद 1945 में महानदी घाटी के एकीकृत विकास को लेकर समझौता हुआ और स्वतंत्रता के बाद परियोजना को आकार मिला। विश्वेश्वरैया का हीराकुंड से संबंध बांध के इंजीनियर या डिजाइनर के रूप में नहीं, बल्कि उस बाढ़-नियंत्रण अवधारणा के शुरुआती वास्तुकार के रूप में देखा जाता है।
विश्वेश्वरैया की सबसे बड़ी विशेषताओं में एक यह थी कि उन्होंने इंजीनियरिंग को प्रशासन और आर्थिक विकास से जोड़ा। 1912 से 1918 तक वे मैसूर राज्य के दीवान रहे। इस दौरान उनका ध्यान केवल निर्माण परियोजनाओं पर नहीं बल्कि शिक्षा, उद्योग, बैंकिंग, कृषि और तकनीकी संस्थानों के विकास पर भी रहा। भारत सरकार के अनुसार इस दौर में भद्रावती आयरन एंड स्टील प्लांट, मैसूर साबुन फैक्टरी और स्टेट बैंक ऑफ मैसूर जैसी संस्थाओं की स्थापना/विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनकी सोच स्पष्ट थी कि केवल कृषि आधारित अर्थव्यवस्था से आधुनिक और समृद्ध राज्य नहीं बनाया जा सकता। उद्योग, तकनीकी शिक्षा, बैंकिंग और वैज्ञानिक संस्थानों का विकास साथ-साथ होना चाहिए। यही कारण है कि उन्हें केवल “डैम इंजीनियर” के रूप में याद करने के बजाय भारत की आर्थिक और औद्योगिक आत्मनिर्भरता के शिल्पकार के रूप में याद करना बेहतर होगा।
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