गंगा दशहरा किसी पूजा विशेष का दिन नहीं है। यह उस स्मृति का दिन है जिसमें पानी केवल ज़रूरत नहीं, जीवन और संबंध की तरह याद किया जाता है।

गंगा दशहरा किसी पूजा विशेष का दिन नहीं है। यह उस स्मृति का दिन है जिसमें पानी केवल ज़रूरत नहीं, जीवन और संबंध की तरह याद किया जाता है।

चित्र: फ़ेसबुक

गंगा दशहरा: पानी और संस्कृति के रिश्ते को समझने का पर्व

गंगा दशहरा केवल आस्था का पर्व नहीं, बल्कि पानी के साथ भारतीय समाज के सांस्कृतिक रिश्ते को याद करने का अवसर भी है। लोकगीतों, घाटों और परंपराओं के जरिए यह पर्व बताता है कि पानी कभी सिर्फ संसाधन नहीं था, बल्कि जीवन और समुदायों की साझा धारा था।
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गंगा दशहरा: नदी, लोक-संस्कृति और पानी के प्रति भारतीय समाज की स्मृति

जेठ की दोपहरी में धरती तपकर पीली पड़ जाती है, नंगे पांव चलना मुश्किल हो जाता है, खेतों में खड़ी फसलें बारिश की आस में आसमान की तरफ़ ताकती रह जाती हैं और कुएं-तालाबों का पानी थोड़ा और नीचे उतर जाता है। ऐसे समय में उत्तर भारत के कई हिस्सों में एक पुराना पर्व फिर लौट आता है, जिसका नाम है गंगा दशहरा

यह केवल किसी पूजा विशेष का दिन नहीं है। यह उस स्मृति का दिन है जिसमें पानी केवल ज़रूरत नहीं, जीवन और संबंध की तरह याद किया जाता है।

घाटों पर उतरती भीड़, पानी से जुड़ती सांसें

गंगा दशहरा के दिन सुबह होते-होते गंगा के घाटों पर हलचल बढ़ने लगती है। वाराणसी के अस्सी घाट से लेकर गंगा के विभिन्न घाटों पर कोई नदी में उतरकर श्रद्धा भाव से अपनी अंजुली में पानी उठाता है, कोई डुबकी लगाता है, तो कोई किनारे बैठकर ही हाथ जोड़ लेता है। 

प्रयागराज में संगम के पास रेत पर चटाइयां बिछ जाती हैं, और लोग अपने परिवार के साथ घंटों तक नदी के किनारे रुकते हैं। घाट पर सिर्फ़ श्रद्धा नहीं दिखती, वहां जीवन चलता है। 

कहीं फूल-मालाएं बेचने वाले अपनी टोकरी संभाले होते हैं, नाविक यात्रियों को बुला रहे होते हैं, और बच्चे कागज़ की नावें बनाकर उन्हें पानी में छोड़ते हैं।

कई जगह शाम होते-होते दीये जलते हैं। नदी की सतह पर तैरती रोशनी एक अजीब-सी शांति बना देती है, जैसे पानी खुद भी कुछ सुन रहा हो।

<div class="paragraphs"><p>गंगा दशहरा के दिन कई जगह शाम होते ही नदी में जलते दिये प्रवाहित किए जाते हैं। </p></div>

गंगा दशहरा के दिन कई जगह शाम होते ही नदी में जलते दिये प्रवाहित किए जाते हैं।

चित्र: फ़ेसबुक

गंगा: केवल नदी नहीं, एक स्मृति

गंगा दशहरा का संबंध उस पौराणिक कथा से जोड़ा जाता है जिसमें राजा भगीरथ कठोर तप करके गंगा को पृथ्वी पर लाने का काम किया था। लोककथाएं इसे केवल पूर्वजों की मुक्ति की कथा के रूप में नहीं देखती हैं। यह सूखी धरती पर पानी आने, जीवन के लौटने और प्रकृति के पुनर्जीवन की कहानी भी है।

कई लोक परंपराओं में गंगा को “धरती की प्यास बुझाने वाली” नदी कहा गया है। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से लेकर बिहार और बंगाल तक गंगा केवल नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी मां के रूप में देखी जाती रही है।

भारतीय समाज में नदियों को स्त्री-स्वरूप देने की परंपरा भी इसी सोच से जुड़ी मानी जाती है। पानी को जन्म, पालन और संरक्षण से जोड़कर देखा गया। शायद यही कारण है कि लोकगीतों में गंगा एक साथ मां, बहन, सहेली और स्मृति बन जाती है।

“गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो…” यह पंक्ति केवल भक्ति नहीं है। इसमें एक विनती है, एक तरह का भरोसा है और एक ऐसा रिश्ता भी है जिसमें इंसान पानी से बातचीत करता है।

लोकगीतों में बहती नदी 

भोजपुरी, अवधी, मैथिली और बंगाली लोकगीतों में गंगा बार-बार दिखाई देती है। इन गीतों के बोल में गंगा केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि एक जीवित संवाद है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाक़ों में प्रसिद्ध लोकगायिका शारदा सिन्हा का यह गीत आज भी गंगा-दशहरा और छठ के दिनों में सुनने को मिल जाता है। 

जिसके बोल कुछ इस प्रकार हैं: “गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो…” यह पंक्ति केवल भक्ति नहीं है। इसमें एक विनती है, एक तरह का भरोसा है और एक ऐसा रिश्ता भी है जिसमें इंसान पानी से बातचीत करता है। विदाई के गीतों में नदी का जिक्र आज भी आता है। जैसे नदी सिर्फ़ रास्ता नहीं, घर और बाहर के बीच की याद हो।

शायद यही वजह थी कि पुराने समाजों में पानी केवल उपयोग की चीज़ नहीं रहा। लोग तालाबों, कुओं और नदियों के साथ रिश्ता बनाकर जीते थे। 

इसी रिश्ते के कारण अलग-अलग समुदाय जल-संरक्षण को अपनी सामुदायिक जिम्मेदारी की तरह देखते थे। भारत में पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणालियां और सांस्कृतिक व्यवहार लंबे समय तक पानी बचाने की सामुदायिक व्यवस्था का हिस्सा रहे।

<div class="paragraphs"><p>केवल तकनीकी परियोजनाएं जल संकट का समाधान नहीं कर सकतीं। पानी के साथ समाज के सांस्कृतिक रिश्ते को फिर से मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है। </p></div>

केवल तकनीकी परियोजनाएं जल संकट का समाधान नहीं कर सकतीं। पानी के साथ समाज के सांस्कृतिक रिश्ते को फिर से मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

चित्र: गूगल पिक्स

घाट: जहां नदी सिर्फ़ पूजा नहीं, जीवन थी 

भारतीय परंपरा में गंगा के घाटों को कभी भी केवल धार्मिक स्थल के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उनका सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन बहुत अधिक व्यापक रहा है।

घाटों पर स्नान के साथ-साथ मेलों, संगीत, लोककला, व्यापार और सामुदायिक संवाद की परंपरा भी विकसित हुई। नाविक, फूल बेचने वाली महिलाएं, मछुआरे, कारीगर और पुजारी, सभी नदी से जुड़ी अर्थव्यवस्था का हिस्सा बने।

वाराणसी और प्रयागराज जैसे शहरों में घाट सदियों से सार्वजनिक जीवन के खुले मंच रहे हैं। यहां पानी केवल धार्मिक अनुष्ठान का माध्यम नहीं, बल्कि शहर की सामाजिक धड़कन भी रहा है।

केवल तकनीकी परियोजनाएं जल संकट का समाधान नहीं कर सकतीं। पानी के साथ समाज के सांस्कृतिक रिश्ते को फिर से मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

कलश और पानी की प्रतीक-भाषा

किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत जल से भरे कलश से होती है। कलश में रखा जल सिर्फ़ पानी नहीं माना गया। उसे सृष्टि की शुरुआत, संतुलन और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक समझा गया। 

कई परंपराओं में यह भी माना जाता है कि कलश में सभी तत्व मौजूद हैं, धरती, जल, अग्नि, वायु और आकाश। और अक्सर इस कलश में गंगा जल का प्रयोग किया जाता है, जैसे पूरा नदी-विश्व एक छोटे से पात्र में समा गया हो। 

यह परंपरा बताती है कि भारतीय समाज में पानी को केवल भौतिक ज़रूरत नहीं, बल्कि सृष्टि के आधार के रूप में समझा गया। यही सोच गंगा दशहरा जैसे पर्वों में भी दिखाई देती है, जहां नदी की पूजा वास्तव में जीवन के स्रोत के प्रति कृतज्ञता का भाव है।

बदलती नदियों के साथ बदलती संस्कृति

कभी जीवन के केंद्र में रही गंगा कई जगहों पर बदल गई है और मनुष्य और पानी के बीच का यह सांस्कृतिक रिश्ता भी कई चुनौतियों से गुजर रहा है। ज़्यादातर घाटों पर पानी अब पहले जैसा साफ़ नहीं रहा। शहरों का कचरा, प्लास्टिक और औद्योगिक दबाव नदी के प्रवाह को प्रभावित कर रहा है।

कभी गांवों का जल-आधार रहे तालाबों और बावड़ियों जैसे जल-स्रोत या तो सूख चुके हैं या मिट्टी और कचरे से भर गए हैं। कई जगहों पर इन जल-स्रोतों के ऊपर निर्माण भी हो गए हैं। गांवों में पारंपरिक तालाबों के उपयोग में कमी आई है और शहरों में नदियां धीरे-धीरे कंक्रीट के किनारों में सीमित होती जा रही हैं।

इसके अलावा, रेत खनन और बांध परियोजनाओं ने कई जगह नदी के स्वाभाविक प्रवाह और जीवन को प्रभावित किया है। इसके साथ ही वह लोक-संस्कृति भी धीरे-धीरे कमजोर हुई है जो पानी के आसपास विकसित हुई थी।

जिन घाटों पर कभी सामुदायिक जीवन बसता था, वहां कई जगह अब व्यवसायिक गतिविधियों का दबाव बढ़ गया है। नतीजतन, कई पारंपरिक नाविक परिवार और नदी से जुड़े समुदाय रोज़गार बदलने को मजबूर हुए हैं।

जल विशेषज्ञ लगातार यह कह रहे हैं कि केवल तकनीकी परियोजनाएं जल संकट का समाधान नहीं कर सकतीं। पानी के साथ समाज के सांस्कृतिक रिश्ते को फिर से मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

<div class="paragraphs"><p>भारतीय समाज में पानी को केवल भौतिक ज़रूरत नहीं, बल्कि सृष्टि के आधार के रूप में समझा गया। </p></div>

भारतीय समाज में पानी को केवल भौतिक ज़रूरत नहीं, बल्कि सृष्टि के आधार के रूप में समझा गया।

चित्र: दैनिक भास्कर

क्या पर्व फिर से जल-चेतना बन सकते हैं?

गंगा दशहरा जैसे पर्वों की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वे लोगों को पानी से भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। यदि इन अवसरों पर नदी-सफाई, प्लास्टिक-मुक्त आयोजन, पारंपरिक जल-स्रोतों के संरक्षण और स्थानीय भागीदारी को बढ़ावा दिया जाए, तो यह सांस्कृतिक ऊर्जा पर्यावरणीय चेतना में बदल सकती है।

कुछ शहरों और गांवों में अब स्थानीय समूह नदी किनारों की सफाई और जल-जागरूकता अभियानों को धार्मिक आयोजनों से जोड़ने लगे हैं। यह छोटे प्रयास हैं, लेकिन वे बताते हैं कि परंपरा और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं।

पानी को संसाधन नहीं बल्कि जीवन की तरह देखने की जरूरत

गंगा दशहरा हमें याद दिलाता है कि पानी सिर्फ़ पाइप से आने वाली सुविधा नहीं है। वह स्मृति है जो लोकगीतों में बसती है, वह श्रम है जो खेतों में दिखाई देता है, और वह धारा है जो खेत, लोकगीत, प्रकृति, मनुष्य और समुदाय, सबको आपस में जोड़ती है।

शायद यही कारण है कि भारत की परंपरा में नदियों को “मां” कहा गया। यह केवल श्रद्धा भाव नहीं था, बल्कि उस समझ का हिस्सा था जिसमें प्रकृति को उपभोग की चीज़ नहीं, जीवन का स्रोत माना गया।

आज जब देश के कई हिस्से जल-संकट और प्रदूषण से जूझ रहे हैं, तब गंगा दशहरा जैसे पर्व हमें फिर से वही पुराना प्रश्न पूछने का मौक़ा देते हैं कि क्या हम पानी को सिर्फ उपयोग की चीज़ मानेंगे, या जीवन की साझी विरासत भी समझेंगे?

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