

फ़ोटो: रचित तिवारी
हिमाचल की पारंपरिक कूहल सिंचाई और घाट जलधाराओं के बदलते बहाव के कारण धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं।
जलविद्युत परियोजनाओं ने नदियों के प्राकृतिक बहाव को बदला है, जिसका असर खेती, पानी की उपलब्धता और स्थानीय आजीविका पर पड़ रहा है।
यह लेख दिखाता है कि ‘विकास’ की इन परियोजनाओं की असली कीमत स्थानीय समुदाय और नदी का पारिस्थितिकी तंत्र चुका रहे हैं।
हर इलाके का पानी के साथ अपना एक अलग रिश्ता होता है। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र के पहाड़ी समुदायों ने सदियों से पानी के साथ इस रिश्ते को एक खास जल व्यवस्था के जरिए बनाए रखा है। इसमें संकरी नालियों का एक जाल होता है। ये नालियां पहाड़ी धाराओं का पानी गांवों, बागों और सीढ़ीदार खेतों तक पहुंचाती हैं।
इस पारंपरिक व्यवस्था को कूहल सिंचाई प्रणाली कहा जाता है। कूहल बड़ी जलधाराओं और सहायक धाराओं से पानी मोड़कर खेतों और बस्तियों तक पहुंचाती हैं। इन बड़ी धाराओं और सहायक धाराओं को स्थानीय तौर पर खड्ड कहा जाता है। खेतों और बस्तियों में इस्तेमाल होने के बाद पानी फिर नीचे की ओर प्राकृतिक जलधारा में लौट जाता है।
फ़ोटो: रचित तिवारी
सदियों पहले बनाई गई कूहलें कच्ची मिट्टी की नालियां होती थीं। गांव की समितियां इनकी देखरेख करती थीं। इनके रखरखाव की जिम्मेदारी कोहली नाम के एक व्यक्ति की होती थी, जिसे इसके लिए नियुक्त किया जाता था।
समय के साथ सिंचाई विभाग की जलग्रहण क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं के तहत कई कच्ची कूहलों की जगह पक्की संरचनाएं बनाई गईं। इसका उद्देश्य पानी को बेहतर ढंग से पहुंचाना और रखरखाव की जरूरत कम करना था।
पहाड़ी धाराओं से मोड़ा गया पानी इन पक्की कूहलों से होकर गुजरता है। आगे चलकर यह पानी छोटी कच्ची नालियों में बंट जाता है। ये नालियां पहाड़ी ढलानों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर खेतों और घरों तक पानी पहुंचाती हैं।
फ़ोटो: रचित
इस पानी का एक प्रमुख पारंपरिक इस्तेमाल घाट (Gharat) चलाने में होता है। घाट पानी से चलने वाली एक पारंपरिक चक्की है। इसमें गेहूं और दूसरे अनाजों को पीसकर आटा बनाया जाता है।
कूहल का पानी पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से बनी एक संरचना तक पहुंचाया जाता है। वहां फर्श के नीचे लगी लकड़ी की एक बड़ी चकरी को पानी घुमाता है। यह चकरी बहते पानी की गति को यांत्रिक शक्ति में बदल देती है। इससे ऊपर रखा भारी पाट घूमता है और अनाज पिसता है।
चकरी धीरे-धीरे और लगातार घूमती है। इसलिए पिसाई के दौरान आटा गर्म नहीं होता। इससे उसका स्वाद और पोषण बना रहता है। इसके विपरीत, तेज गति से चलने वाली बिजली की चक्कियों में घर्षण के कारण तापमान बढ़ जाता है।
फ़ोटो: रचित
पालमपुर के पास कंडबाड़ी गांव में किए गए शोध से पता चलता है कि पारंपरिक जल चक्कियां, जिन्हें घाट कहा जाता है, धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, जलधाराओं के बहाव में बदलाव और आधुनिक तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल ने घाट चलाना मुश्किल कर दिया है। अब इसे चलाना आर्थिक रूप से भी फायदेमंद नहीं रह गया है।
फ़ोटो: रचित
इस इलाके की ज्यादातर घाट अब खंडहर में बदल चुकी हैं। केवल एक घाट अभी भी चल रही है। इसे कई दशक पहले इसके मालिक ने बनाया था। अब वे 90 साल से अधिक उम्र के हैं। फिलहाल उनके बड़े बेटे और बहू इस घाट को चलाते हैं।
वे खुद को उस संस्कृति का संरक्षक मानते हैं, जिसे वे ‘पहाड़ी संस्कृति’ कहते हैं। लेकिन घाट से उनकी बहुत कम आमदनी होती है। इसकी वजह यह है कि बहुत कम लोग पारंपरिक तरीके से पिसे आटे के लिए बिजली की चक्की के आटे से ज्यादा कीमत देने को तैयार होते हैं।
यह पारंपरिक चक्की मोड़ी गई जलधारा के पानी से गेहूं और मोटे अनाज पीसती है। इसकी संरचना स्थानीय पत्थर, लकड़ी और मिट्टी से बनी होती है। बहता पानी नीचे लगी लकड़ी की एक चकरी को घुमाता है। इससे ऊपर रखा भारी पाट घूमने लगता है।
फ़ोटो: रचित
चकरी धीरे-धीरे और लगातार घूमती है। इसलिए पिसाई के दौरान आटा गर्म नहीं होता। इससे उसके प्राकृतिक पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं। तेज गति से चलने वाली बिजली की चक्कियों में ऐसा नहीं होता। उनमें घर्षण के कारण तापमान बढ़ जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, इन बदलावों की एक बड़ी वजह नदी के बहाव में बदलाव है। यह बदलाव आवा पावर कंपनी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा संचालित आवा जलविद्युत परियोजना के कारण हुआ है।
फ़ोटो: रचित
यह परियोजना आवा खड्ड पर गांव से करीब पांच किलोमीटर ऊपर की ओर स्थित है। आवा खड्ड ही गांव की कूहल सिंचाई व्यवस्था के लिए पानी का मुख्य स्रोत है। यह परियोजना ब्यास नदी बेसिन में बनी छोटी रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं की श्रृंखला का हिस्सा है।
इस परियोजना को कम पर्यावरणीय प्रभाव वाली टिकाऊ ऊर्जा के विकल्प के रूप में पेश किया गया था। लेकिन स्थानीय लोगों से बातचीत की एक अलग तस्वीर सामने आती है। उनका कहना है कि परियोजना ने जलधारा के बहाव को प्रभावित किया है। इससे सिंचाई की पारंपरिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचा है। लोगों का पानी को देखने का नजरिया भी बदल गया है।
कंडबाड़ी और आसपास के गांवों के किसान बताते हैं कि बांध बनने के बाद जलधारा के बहाव में बड़ा बदलाव आया है। उनका कहना है कि पहले आवा खड्ड में पूरे साल लगातार पानी बहता था। अब गर्मी और दूसरे सूखे मौसम में नीचे की ओर पानी की उपलब्धता पूरी तरह ऊपर से छोड़े जाने वाले पानी पर निर्भर है।
फ़ोटो: रचित
स्थानीय लोगों का अनुभव एक जैसा है। वे कहते हैं, “बांध बनने से पहले आवा खड्ड में पूरे साल पानी बहता था और सबकी जरूरत के लिए पर्याप्त पानी रहता था। अब सूखे मौसम में हमें ऊपर से पानी छोड़ने वालों की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ता है।”
पहाड़ी इलाकों में खेती कूहलों के जरिए मिलने वाले पानी की नियमित आपूर्ति पर निर्भर करती है। पानी के बहाव में इस तरह के उतार-चढ़ाव से सूखे मौसम में सिंचाई का कोई भरोसा नहीं रहता। इसका असर फसल की पैदावार पर पड़ता है। सबसे ज्यादा नुकसान नीचे की ओर स्थित खेतों के किसानों को उठाना पड़ता है।
फ़ोटो: रचित
संभावना संस्थान के इंटरोगेटिंग डेवलपमेंट नामक अकादमिक कार्यक्रम के तहत आवा बांध का दौरा किया गया। इस दौरान घाटी के ऊपरी हिस्से में परियोजना किस तरह काम करती है, इसे करीब से देखने का मौका मिला।
ऊपरी हिस्से में एक छोटी नहर के जरिए पानी पालमपुर शहर की जलापूर्ति के लिए मोड़ा जाता है। मुख्य जलधारा को ऊंचे कंक्रीट के कक्षों और पहाड़ के भीतर बनाई गई एक बड़ी सुरंग में पहुंचाया जाता है। इन कक्षों को तब तक बंद रखा जाता है, जब तक बिजली की टर्बाइन चलाने के लिए पर्याप्त पानी जमा न हो जाए। इसके बाद पानी को नीचे की ओर छोड़ दिया जाता है।
फ़ोटो: रचित
कागज पर यह व्यवस्था पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए बनाई गई है। लेकिन इसकी वजह से नदी के वे हिस्से, जहां पहले लगातार पानी बहता था, लंबे समय तक सूखे रहते हैं। जलधारा का पानी मोड़ने से उसका तापमान, बहाव का स्वरूप और रासायनिक संरचना बदल जाती है। इसका असर जलीय जीवों के आवास और नदी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है।
फ़ोटो: रचित
रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं पर हुए अध्ययनों में भी नदी के उन हिस्सों पर ऐसे पर्यावरणीय प्रभावों की पुष्टि हुई है, जहां से पानी मोड़ दिया जाता है।
कूहलों पर निर्भर गांवों के लिए पानी की यह अनिश्चित आपूर्ति खेती और पीने के पानी की उपलब्धता, दोनों को प्रभावित करती है। इससे लोगों का नदी के साथ सदियों पुराना रिश्ता भी कमजोर पड़ रहा है। खत्म होती घाटें इस बदलाव का सबसे साफ संकेत हैं।
फ़ोटो: रचित
बांध बनाने का असर केवल नदी तक सीमित नहीं रहता। सड़कें बनाने, चट्टानों में विस्फोट करने, सुरंग खोदने और बड़े पैमाने पर कंक्रीट का इस्तेमाल करने से आसपास का पूरा भू-दृश्य प्रभावित होता है। इससे प्राकृतिक आवास टूटते हैं और पहाड़ों की नाजुक ढलानों पर निर्माण के निशान साफ दिखाई देते हैं।
फ़ोटो: रचित
हिमालय में पर्यावरणीय खतरे और आपदा का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। इसके बावजूद इतनी छोटी जलविद्युत परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अनिवार्य नहीं है। इन परियोजनाओं से पैदा होने वाली बिजली सीधे केंद्रीय ग्रिड में जाती है। स्थानीय लोगों को इसका सीधा लाभ बहुत कम मिलता है। इसके पर्यावरणीय नुकसान का बोझ, हालांकि, उन्हें ही उठाना पड़ता है।
फ़ोटो: रचित
आवा बांध और उससे जुड़े इन बदलावों ने खेती और जल चक्की जैसे पीढ़ियों से चले आ रहे आजीविका के साधनों पर लोगों का भरोसा कमजोर किया है। छोटी रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाओं के कारण कूहल और घाट जैसी पारंपरिक व्यवस्थाएं खत्म हो रही हैं। इसे अक्सर पुरानी तकनीक की जगह नई तकनीक आने और आधुनिक विकास के आगे बढ़ने के रूप में देखा जाता है। नई व्यवस्था आधुनिक, अधिक कुशल और कम खर्चीली नजर आती है। लेकिन इसकी असली कीमत स्थानीय समुदाय चुका रहे हैं। इस कीमत को विकास की पूरी तस्वीर में शामिल ही नहीं किया जाता।
फ़ोटो: रचित
पानी के प्रबंधन की ऐसी ‘तकनीकी’ व्यवस्था धीरे-धीरे पारंपरिक पहाड़ी समुदायों को हाशिए पर धकेल रही है। इससे प्रकृति के साथ रहने वाले लोगों और उसका दोहन करने वाले लोगों के बीच असमानता बढ़ रही है। खत्म होती घाटें और बाधित होती कूहलें इसके साफ उदाहरण हैं।
इन बदलावों के पीछे एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है। आधुनिक आर्थिक व्यवस्था की जरूरतों के मुताबिक भू-दृश्य को नए सिरे से ढाला जा रहा है। लेकिन इन जलधाराओं के आसपास कभी फलने-फूलने वाले पारिस्थितिक रिश्तों और आजीविकाओं की कीमत स्थानीय समुदाय चुका रहे हैं।
यह लेख 2024 में बेंगलुरु में अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की ओर से आयोजित माउंटेन्स ऑफ लाइफ फेस्टिवल में प्रस्तुत किया गया था।
इस लेख का हिन्दी अनुवाद डॉ. कुमारी रोहिणी ने किया है।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें