कोयंबटूर शहर के रेस कोर्स रोड पर विकसित की गई नई वर्षाजल निकासी प्रणाली का उद्देश्य केवल बारिश का पानी सड़क से हटाना नहीं है।

कोयंबटूर शहर के रेस कोर्स रोड पर विकसित की गई नई वर्षाजल निकासी प्रणाली का उद्देश्य केवल बारिश का पानी सड़क से हटाना नहीं है।

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

क्या सड़कें भी भर सकती हैं भूजल? कोयंबटूर का यह प्रयोग बदल सकता है शहरों की सोच

हर साल शहरी बाढ़ और गिरते भूजल के दोहरे संकट से जूझते भारतीय शहरों के बीच कोयंबटूर का एक प्रयोग वर्षाजल निकासी को भूजल रिचार्ज से जोड़ने की नई दिशा दिखा रहा है।
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हर मानसून में भारतीय शहरों की एक जैसी तस्वीर सामने आती है। कुछ घंटों की बारिश के बाद सड़कें तालाब बन जाती हैं, आवागमन ठप पड़ जाता है और लोग जलभराव को शहरों की क़िस्मत मान लेते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि यही शहर कुछ महीनों बाद पानी की कमी और गिरते भूजल से जूझने लगते हैं। यानी एक ही शहर में बारिश का पानी और पानी की कमी दोनों ही संकट बन जाते हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने अपनी National Guidelines on Management of Urban Flooding में कहा है कि भारत में शहरी बाढ़ की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इसके पीछे केवल अधिक वर्षा नहीं, बल्कि अनियोजित शहरीकरण, प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों पर अतिक्रमण, आर्द्रभूमियों का सिकुड़ना और कंक्रीट और डामर जैसे अभेद्य सतहों (impervious) का तेजी से बढ़ना प्रमुख कारण हैं।

 ऐसे समय में तमिलनाडु के कोयंबटूर शहर में शुरू किया गया एक प्रयोग इस सोच को बदलने की कोशिश करता दिखाई पड़ता है। रेस कोर्स रोड पर विकसित की गई नई वर्षाजल निकासी प्रणाली का उद्देश्य केवल बारिश का पानी सड़क से हटाना नहीं है। बल्कि इस प्रयास से उसकी पानी को जमीन में वापस पहुंचाने की पहल भी है।

रिसाइलक्ड पॉलिमर से बने मॉड्यूलर ढांचे के माध्यम से वर्षाजल को कुछ समय के लिए जमा कर धीरे-धीरे मिट्टी में समाने दिया जाता है। इस परियोजना से एक सवाल उठता है कि क्या शहरों की सड़कें भी भूजल रिचार्ज का माध्यम बन सकती हैं?

शहरों में कंक्रीट और डामर का विस्तार लगातार बढ़ा है। खुले मैदान, तालाब, झीलें और मिट्टी वाले क्षेत्र सिकुड़ते गए हैं। इससे बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय तेजी से बह जाता है। नतीजतन, मानसून के दौरान जलभराव बढ़ता है और कुछ ही महीनों बाद वही शहर गिरते भूजल स्तर और पानी की कमी से जूझते हैं। यानी चुनौती केवल पानी निकालने की नहीं, बल्कि उसे स्थानीय स्तर पर रोकने और जमीन में लौटाने की भी है।

शहरों का पारंपरिक ड्रेनेज मॉडल क्यों पर्याप्त नहीं है?

भारत में शहरी बाढ़ अब किसी एक शहर की समस्या नहीं रह गई है। अक्सर मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, गुरुग्राम, दिल्ली, गुवाहाटी और पुणे जैसे शहरों के लगभग हर मानसून में जलभराव और शहरी बाढ़ जैसी संकट से जूझने की खबरें आती रहती हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने अपनी National Guidelines on Management of Urban Flooding में कहा है कि भारत में शहरी बाढ़ की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। इसके पीछे केवल अधिक वर्षा नहीं, बल्कि अनियोजित शहरीकरण, प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों पर अतिक्रमण, आर्द्रभूमियों का सिकुड़ना और कंक्रीट और डामर जैसे अभेद्य सतहों (impervious) का तेजी से बढ़ना प्रमुख कारण हैं।

NDMA ने इस पर भी जोर दिया है कि शहर में आने वाली बाढ़ की प्रकृति नदी की बाढ़ से अलग होती है। शहरों में पक्की सतहों के कारण वर्षाजल कुछ ही मिनटों या घंटों में तेजी से बहता है। अगर नालियां उस पानी को संभाल नहीं पातीं, तो सड़कें, कॉलोनियां और सार्वजनिक स्थान पानी में डूब जाते हैं।

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<div class="paragraphs"><p>कोयंबटूर शहर के रेस कोर्स रोड पर विकसित की गई नई वर्षाजल निकासी प्रणाली का उद्देश्य केवल बारिश का पानी सड़क से हटाना नहीं है।</p></div>

कोयंबटूर ने क्या अलग किया?

कोयंबटूर की परियोजना इसी सोच में बदलाव का संकेत देती है। यहां सड़क के किनारे रीसाइकल्ड पॉलिमर से बने मॉड्यूलर जल निकासी ढांचे लगाए गए हैं। वर्षाजल इन संरचनाओं में पहुंचकर कुछ समय के लिए रुकता है और फिर धीरे-धीरे आसपास की मिट्टी में रिसता है। ज़रूरत पड़ने पर इन मॉड्यूलों को निकाला, साफ किया या दूसरी जगह भी लगाया जा सकता है।

इसके लिए रेस कोर्स रोड के चुनाव के पीछे का कारण मानसून में सके कई हिस्सों में नियमित रूप से जलभराव की समस्या है। इसलिए इस तकनीक को पहले पायलट परियोजना के रूप में यहीं परखा गया।

पारंपरिक कंक्रीट नालियों की तुलना में यह प्रणाली हल्की है और इसके निर्माण में रीसाइकल्ड चीजों का उपयोग किया गया है। इससे निर्माण के दौरान कार्बन उत्सर्जन और संसाधनों की खपत कम होने का दावा किया जाता है। अगर रखरखाव नियमित रहे तो यह मॉडल वर्षाजल को स्थानीय स्तर पर रोकने और भूजल रिचार्ज में मदद कर सकता है।

हालांकि इसकी सफलता का आधार केवल तकनीक ही नहीं होगा। इसके लिए इन संरचनाओं की नियमित सफाई, उनमें कचरा न जमा होने देना और पानी के रिसाव के लिए पर्याप्त जगह को बनाए रखना भी उतना ही ज़रूरी होगा।

इस परियोजना की अनुमानित लागत
करीब 2.1 करोड़ रुपये है। इसमें लगभग 1.4 करोड़ करोड़ वर्षाजल निकासी संरचनाओं पर और लगभग 70 लाख रुपये EcoBloc मॉड्यूल लगाने पर खर्च किए जाने का अनुमान है।

परियोजना कैसे काम करती है?

<div class="paragraphs"><p>सड़क के किनारे रीसाइकल्ड पॉलिमर से बने मॉड्यूलर जल निकासी ढांचे।</p></div>

सड़क के किनारे रीसाइकल्ड पॉलिमर से बने मॉड्यूलर जल निकासी ढांचे।

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

कोयंबटूर नगर निगम ने इस परियोजना को रेस कोर्स रोड पर पायलट के रूप में शुरू किया। शुरुआत में लगभग 10 मीटर हिस्से में इस प्रणाली की जांच की गई। इसके बाद पूरे 2.6 किलोमीटर लंबे रेस कोर्स ट्रैक के उन हिस्सों को पहचाना गया जहां हर साल जलभराव की समस्या होती है। इन इलाक़ों में ज़रूरत के अनुसार स्मार्ट ड्रेनेज प्रणाली के विस्तार की योजना है।

इस परियोजना में पारंपरिक कंक्रीट नालियों की जगह EcoBloc नामक जर्मन तकनीक का उपयोग किया गया है। यह रीसाइक्लड पॉलीप्रोपाइलीन से बने मॉड्यूलर ब्लॉकों पर आधारित प्रणाली है। सड़क से जमा होने वाला वर्षाजल पहले इन मॉड्यूलों तक पहुंचता है। 

इसके बाद पानी को भूमिगत रिचार्ज टैंक में भेजा जाता है, जहां से वह धीरे-धीरे मिट्टी में समाता है या ज़रूरत पड़ने पर बागों की सिंचाई आदि के लिए भी उपयोग में लाया जा सकता है। चूंकि ये ढांचे लगभग अस्थायी हैं इसलिए ज़रूरत पड़ने पर इन्हें एक जगह से दूसरी जगह भी ले जाकर लगाया जा सकता है।

नगर निगम के अनुसार इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 2.1 करोड़ रुपये है। इसमें लगभग 1.4 करोड़ करोड़ वर्षाजल निकासी संरचनाओं पर और लगभग 70 लाख रुपये EcoBloc मॉड्यूल लगाने पर खर्च किए जाने का अनुमान है।

कोयंबटूर का सेम्मोझी पूंगा पार्क जो पानी पीता है

इसी तर्ज पर कोयंबटूर नगर निगम ने सेम्मोझी पूंगा पार्क को विकसित किया है। इस पार्क में बाग-बागीचों के बीच से जो जॉगिंग ट्रैक बनाया गया है उसमें भी वर्षा जल संचयन की प्रणाली को इंस्‍टॉल किया गया है। देखने में यह पार्क बाकी पार्कों जैसा ही सुंदर दिखता है, लेकिन इसकी जमीन ऐसी है जो पानी पीती है।

दुनिया के कई शहर पहले ही बदल चुके हैं अपनी सोच

बारिश के पानी को जल्द से जल्द शहर से बाहर निकालने की अवधारणा अब कई देशों में बदल रही है।

नीदरलैंड में सार्वजनिक स्थानों को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि वे भारी बारिश के दौरान अस्थायी जलाशय का काम करें। सिंगापुर ने अपने शहरी विकास में जल निकासी, हरित क्षेत्र और जल संरक्षण को एक साथ जोड़ने की दिशा में काम किया है। ऑस्ट्रेलिया में 'वॉटर सेंसिटिव अर्बन डिज़ाइन' (Water Sensitive Urban Design) के तहत सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों को वर्षाजल प्रबंधन का हिस्सा बनाया जा रहा है।

वहीं ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देशों में 'सस्टेनेबल अर्बन ड्रेनेज सिस्टम' (SUDS) के माध्यम से ऐसी संरचनाएं विकसित की जा रही हैं, जो वर्षाजल को स्थानीय स्तर पर रोकने, छानने और धीरे-धीरे जमीन में पहुंचाने में मदद करती हैं। इन सभी मॉडलों का साझा उद्देश्य एक ही है, बारिश के पानी को अपशिष्ट नहीं, बल्कि संसाधन मानना।

पिछले दो दशकों में इस सोच को व्यवस्थित रूप से विकसित किया गया है। ऑस्ट्रेलिया में इसे वॉटर सेंसिटिव अर्बन डिज़ाइन (WSUD) और ब्रिटेन में सस्टेनेबल ड्रेनेज सिस्टम (SuDS) कहा जाता है। इन दोनों का मूल विचार एक जैसा है। बारिश के पानी को जल्द से जल्द बाहर निकालने के बजाय, उसे वहीं रोकना, छानना और जहां संभव हो, जमीन में समाने देना या दोबारा इस्तेमाल करना।

इस सोच को लागू करने के लिए कई तरह के ढांचे विकसित किए गए हैं। इनमें बायोस्वेल, रेन गार्डन, परमेएबल पेवमेंट, रिटेंशन बेसिन और भूमिगत रिचार्ज संरचनाएं शामिल हैं। इनका उद्देश्य वर्षाजल को तुरंत नालियों में बहाने के बजाय कुछ समय तक रोकना और जहां संभव हो, उसे जमीन में समाने देना है।

भारतीय शहरों को वर्षाजल को केवल निकासी की समस्या नहीं, बल्कि जल सुरक्षा के संसाधन के रूप में देखना होगा।

ब्रिटेन के शोध एवं परामर्श संगठन CIRIA का कहना है कि आधुनिक शहरी जल प्रबंधन केवल जल निकासी तक सीमित नहीं रह गया है। अब इसका उद्देश्य जलभराव के ख़तरे को कम करना है। साथ ही इसके जरिए पानी की गुणवत्ता सुधारने और शहरों को बदलती जलवायु के अनुरूप अधिक सक्षम बनाने का लक्ष्य भी हासिल करने का प्रयास किया जाएगा।

भारत में भी सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) की Water-Sensitive Urban Design and Planning: Practitioner's Guide इसी दिशा में काम करने की बात करती है। गाइड के अनुसार बढ़ते कंक्रीटीकरण के बीच शहरों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे वर्षाजल जमीन में समा सके और भूजल का पुनर्भरण बढ़े।

इसी व्यापक सोच के संदर्भ में कोयंबटूर की यह परियोजना महज़ नई ड्रेनेज तकनीक का प्रयोग नहीं है। यह उस बदलते शहरी जल प्रबंधन दृष्टिकोण का भारतीय उदाहरण है, जिसमें सड़कों को भी जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज का हिस्सा माना जा रहा है।

भारत में भी बदल रही है सोच, लेकिन गति अभी धीमी है

भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में शहरी जल प्रबंधन को केवल नालियों और पाइपों तक सीमित रखने के बजाय उसे शहरी नियोजन का हिस्सा बनाने पर चर्चा बढ़ी है। हालांकि यह सोच अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन कुछ शहरों और संस्थानों ने इस दिशा में प्रयोग शुरू किए हैं।

चेन्नई में वर्ष 2015 की विनाशकारी बाढ़ के बाद शहर की जल निकासी, झीलों और आर्द्रभूमियों के संरक्षण तथा वर्षाजल संचयन को एक साथ देखने पर जोर दिया गया। वहीं बेंगलुरु में झीलों के आपसी संपर्क, वर्षाजल के प्राकृतिक प्रवाह और हरित अवसंरचना को शहरी नियोजन से जोड़ने की आवश्यकता लगातार रेखांकित की जाती रही है। इन अनुभवों ने यह स्पष्ट किया कि केवल नालियों की चौड़ाई बढ़ा देने से शहरी बाढ़ की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।

CSE का भी मानना है कि भारतीय शहरों को वर्षाजल को केवल निकासी की समस्या नहीं, बल्कि जल सुरक्षा के संसाधन के रूप में देखना होगा। संस्थान के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में होने वाली भारी वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में शहरों को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जो वर्षाजल को जहाँ संभव हो, स्थानीय स्तर पर रोक सके और भूजल रिचार्ज में मदद करे।

AMRUT 2.0 जैसे कार्यक्रमों में वर्षाजल संचयन और जल निकायों के संरक्षण पर पहले की तुलना में अधिक ज़ोर दिया गया है। इसके बावजूद सड़क आधारित भूजल रिचार्ज अभी भारतीय शहरों की सामान्य योजना का हिस्सा नहीं बन पाया है। ऐसे में कोयंबटूर का प्रयोग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा सकता है।

किसी भी वर्षाजल रिचार्ज प्रणाली की सफलता स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों, मिट्टी की पारगम्यता, वर्षा के पैटर्न और रखरखाव पर निर्भर करती है।

इस विषय पर विशेषज्ञ सुनीता नारायण का कहना है कि भारत के शहरों में बाढ़ का कारण केवल अधिक वर्षा नहीं है। असली समस्या यह है कि शहरी विकास के दौरान प्राकृतिक जल निकायों, नालों और वर्षाजल के पारंपरिक रास्तों की अनदेखी की गई है।

उनके अनुसार शहरों ने "पानी के लिए जगह" छोड़ने के बजाय निर्माण को प्राथमिकता दी, जिसका परिणाम बार-बार आने वाली शहरी बाढ़ के रूप में सामने आ रहा है। यही कारण है कि वे वर्षाजल को शीघ्र बाहर निकालने की सोच के बजाय स्थानीय स्तर पर रोकने, भूजल रिचार्ज बढ़ाने और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र को पुनर्जीवित करने पर जोर देती हैं।

क्या सड़कों का पानी सीधे जमीन में पहुंचाना सुरक्षित है?

यहीं से इस मॉडल की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। सड़कों पर बहने वाला वर्षाजल पूरी तरह स्वच्छ नहीं होता। इसमें धूल, प्लास्टिक के सूक्ष्म कण आदि होते हैं। साथ ही वाहन के टायरों से निकलने वाले रसायन, तेल, ग्रीस और कई बार भारी धातुओं के अंश भी मिल सकते हैं। अगर ऐसे पानी को बिना किसी उपचार या सफ़ाई प्रक्रिया से गुज़ारे सीधे जमीन में पहुंचाया जाए, तो लंबे समय में इसका सीधा असर भूजल की गुणवत्ता पर पड़ेगा।

इसी कारण दुनिया के कई शहरों में रिचार्ज संरचनाओं के साथ फिल्टर, तलछट कक्ष (सेडिमेंट ट्रैप) और जैविक उपचार की व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। इसलिए किसी भी भारतीय शहर में इस तरह की परियोजना को केवल इंजीनियरिंग समाधान नहीं, बल्कि जल गुणवत्ता प्रबंधन के साथ जोड़कर देखना होगा।

ध्यान देने वाली बातें

  • सड़क से आने वाले वर्षाजल का उपचार ज़रूरी है।

  • नियमित सफाई के बिना ऐसे ढांचे प्रभावी नहीं रह जाएंगे।

  • हर शहर की मिट्टी और भूगर्भीय स्थिति अलग होती है, इसलिए एक ही मॉडल हर जगह लागू नहीं किया जा सकता।

क्या यह मॉडल हर शहर में लागू किया जा सकता है?

इसका जवाब सीधे हां या ना में नहीं दिया जा सकता है। शहरी जल प्रबंधन पर काम करने वाले विशेषज्ञ भी मानते हैं कि किसी एक तकनीक को सभी शहरों में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। किसी भी वर्षाजल रिचार्ज प्रणाली की सफलता स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों, मिट्टी की पारगम्यता, वर्षा के पैटर्न और रखरखाव पर निर्भर करती है।

इसलिए कोयंबटूर जैसे प्रयोगों को किसी तैयार मॉडल के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होने वाले समाधान के रूप में देखना अधिक उचित होगा। इसी कारण किसी भी शहर में इस तरह की परियोजना शुरू करने से पहले स्थानीय भूगर्भीय अध्ययन, वर्षा के पैटर्न और जल गुणवत्ता का आकलन ज़रूरी होगा।

इसी तरह घनी आबादी वाले क्षेत्रों में यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि भूमिगत बिजली, गैस या अन्य उपयोगिताओं पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

भारत के शहरों में बाढ़ का कारण केवल अधिक वर्षा नहीं है। असली समस्या यह है कि शहरी विकास के दौरान प्राकृतिक जल निकायों, नालों और वर्षाजल के पारंपरिक रास्तों की अनदेखी की गई है। 

सुनीता नारायण, महानिदेशक, सेंटर फ़ॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE)

भारत के शहरों के लिए इससे क्या सीख मिलती है?

भारत के कई बड़े शहरों को हर साल दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ता है। एक ओर मानसून के दौरान जलभराव की समस्या होती है, दूसरी ओर गर्मियों में भूजल स्तर गिरता जाता है। अक्सर इन दोनों समस्याओं का समाधान अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से खोजा जाता है।

लेकिन इसका एक दूसरा रास्ता भी है। सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों को ऐसी संरचनाओं से जोड़ा जाए, जो वर्षाजल को रोकें, छानें और उसे जमीन में समाने दें। इससे एक ही निवेश से जलभराव कम करने और भूजल बढ़ाने जैसे कई उद्देश्यों पर एक साथ काम किया जा सकता है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर सड़क के नीचे ऐसी संरचना बना दी जाए। बल्कि इसका मतलब है कि सड़कों, फुटपाथों, पार्किंग स्थलों और खुले सार्वजनिक क्षेत्रों को जल प्रबंधन की दृष्टि से पुनः डिज़ाइन किया जाए।

तकनीक से अधिक ज़रूरी है रखरखाव

भारत में कई अच्छी जल संरचनाएं इसलिए विफल हुई हैं क्योंकि उनका नियमित रखरखाव नहीं हो पाया। वर्षाजल निकासी व्यवस्था भी इससे अलग नहीं है।

अगर मॉड्यूलर संरचनाएं प्लास्टिक, पत्तियों और तलछट से भर जाएं, तो उनकी क्षमता तेजी से घट सकती है। इसलिए ऐसी परियोजनाओं की सफलता निर्माण से अधिक उनके संचालन और रखरखाव पर निर्भर करेगी। नगर निकायों को नियमित निरीक्षण, सफाई और जल गुणवत्ता की निगरानी को परियोजना का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा।

शहरों की जल सुरक्षा केवल बाहर से पानी लाने से नहीं बढ़ेगी। शहरों को अपने यहां गिरने वाले वर्षाजल का बेहतर उपयोग करना होगा। उनके अनुसार सड़कों, पार्कों और खुले स्थानों से बहने वाले पानी को भी झीलों और भूजल रिचार्ज संरचनाओं तक पहुंचाया जा सकता है।

एस. विश्वनाथ, जल विशेषज्ञ, बैंगलुरु

आगे की राह

कोयंबटूर का यह प्रयोग भारतीय शहरों के लिए कोई अंतिम समाधान नहीं है। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण संकेत ज़रूर मिलता है कि शहरी जल प्रबंधन की सोच बदल रही है।

वास्तव में असली चुनौती नई तकनीक अपनाने से आगे की है। शहरों की योजना भी बदलनी होगी। सड़कें, पार्किंग स्थल, सार्वजनिक भवन और खुले स्थान केवल आवाजाही या सार्वजनिक उपयोग की जगह न रहें। उन्हें इस तरह विकसित किया जाए कि वे वर्षाजल को सम्भालने में भी मदद करें। इससे भूजल रिचार्ज बढ़ सकता है, जलभराव कम हो सकता है और शहरों की जल सुरक्षा भी मजबूत हो सकती है।दुनिया के कई शहर अब इसी दिशा में काम कर रहे हैं।

इसके उलट अगर वर्षाजल को शहरी जल चक्र का हिस्सा मानते हुए स्थानीय स्तर पर संजोया जाना चाहिए। ऐसा करने से उसी पानी से बाढ़ के जोखिम को कम करने और भूजल रिचार्ज बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।

जलवायु परिवर्तन के कारण कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में केवल बड़ी नालियां बनाना पर्याप्त नहीं होगा। शहरों को ऐसी संरचनाओं की भी ज़रूरत होगी जो वर्षाजल को रोकें, उसे साफ करें और जहां संभव हो, उसे वापस जमीन तक पहुंचाएं।

बेंगलुरु के वर्षाजल विशेषज्ञ एस. विश्वनाथ का मानना है कि शहरों की जल सुरक्षा केवल बाहर से पानी लाने पर निर्भर नहीं रह सकती। इसके लिए वर्षाजल संचयन और भूजल पुनर्भरण को भी शहरी नियोजन का हिस्सा बनाना होगा।

कोयंबटूर का यह प्रयोग इसी सोच को व्यवहार में उतारने की एक कोशिश है। अगर यह सफल रहता है, तो दूसरे शहर भी अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे मॉडल अपना सकते हैं।

अगर भविष्य की सड़कें केवल यातायात के लिए नहीं, बल्कि वर्षाजल को संभालने के लिए भी डिज़ाइन की जाएं, तो वे शहरी जल संकट के समाधान का हिस्सा बन सकती हैं। 

कोयंबटूर का प्रयोग इसी दिशा में एक शुरुआती कदम है। अब इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे स्थानीय परिस्थितियों, वैज्ञानिक निगरानी और नियमित रखरखाव के साथ कितना प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है।

नीति के स्तर पर क्या किया जा सकता है?

  • नई शहरी सड़कों और पुनर्विकास परियोजनाओं में वर्षाजल को जमीन में पहुंचाने की व्यवस्था को डिज़ाइन का जरूरी हिस्सा बनाया जाए।

  • सड़क आधारित रिचार्ज संरचनाओं के लिए पानी की गुणवत्ता और सफाई के स्पष्ट नियम तय किए जाएं।

  • नगर निकायों के लिए नियमित जांच और रखरखाव की अलग व्यवस्था बनाई जाए।

  • हर शहर की मिट्टी, पानी के स्तर और बारिश की स्थिति के अनुसार अलग-अलग डिज़ाइन अपनाए जाएं, एक ही तरीका सभी जगह लागू न किया जाए।

  • ऐसी परियोजनाओं के असर, जैसे जमीन के नीचे पानी का स्तर, जलभराव और पानी की गुणवत्ता की नियमित निगरानी की जाए, ताकि भविष्य में बेहतर योजनाएं बनाई जा सकें।

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