भूजल को कैसे प्रभावित करते हैं भूकंप? पानी की मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर पड़ता है असर

फाई फ़ोटो - स्रोत विकिकॉमंस 

भूजल को कैसे प्रभावित करते हैं भूकंप? पानी की मात्रा और गुणवत्ता दोनों पर पड़ता है असर

भूकंप के आने पर जमीन के ऊपर होने वाले नुकसान से हम सब वाकिफ़ है, लेकिन क्या आपने कभी जमीन के नीचे होने वाले नुकसान के बारे में सोचा है? जिन लोगों को लगता है कि जमीन के अंदर पानी का एक बड़ा भंडार है तो उनके लिए यह जानकारी बेहद महत्वपूर्ण है कि जमीन के नीचे पानी का कोई बड़ा भंडार नहीं, बल्कि छोटे-छोटे ढेर सारे भंडार है, जो भूकंप के आने पर प्रभावित होते है। भूकंप के आने पर जमीन के नीचे मौजूद पानी पर क्या असर पड़ता है, पढ़ें विस्तार से।
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फिलीपींस के मिंडानाओ द्वीप के पास  8 जून 2026 को आए 7.8 तीव्रता के शक्तिशाली भूकंप ने पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया को झकझोर दिया। भूकंप के तेज झटकों से इमारतें हिल गईं, बिजली और संचार सेवाएं बाधित हो गईं तथा हजारों लोग घरों से बाहर निकल आए। भूकंप के बाद फिलीपींस और इंडोनेशिया के कुछ तटीय क्षेत्रों के लिए सुनामी चेतावनी भी जारी की गई। 

भूकंप के आने पर अकसर इमारतों, पुलों, आदि के गिरने के वीडियो आते हैं, जहां हम धरती के ऊपर होने वाले नुकसान को देखते हैं। क्या आपने कभी उस नुकसान के बारे में सोचा है जो भूकंप के दौरान धरती के अंदर होता है? भूकंप के आने पर जमीन के नीचे की चट्टानों के खिसकने से भूजल पर क्या असर पड़ता है यह जानना हर उस व्यक्ति के लिए जरूरी है, जिसका जीवन भूजल पर निर्भर है। 

धरती के भीतर मौजूद जल प्रणालियों, विशेषकर भूजल स्रोतों पर भी गहरा प्रभाव डाल सकते है। 

फिलीपींस में आया यह भूकंप केवल उपरी विनाश है या इससे धरती के भीतर मौजूद जल प्रणालियों पर भी प्रभाव पड़ा है ? ऐसा ही एक मामला जनवरी 2001 में गुजरात के कच्छ क्षेत्र में आए विनाशकारी भूकंप के बाद कई गांवों में लोगों ने एक अजीब बदलाव देखा था। कुछ स्थानों पर पुराने कुओं का जलस्तर अचानक बढ़ गया था, जबकि कुछ कुओं में पानी कम हो गया। स्थानीय लोगों ने इसे चमत्कार माना, लेकिन वैज्ञानिकों के लिए यह भूजल और भूकंप के बीच गहरे संबंध का संकेत था।

भूकंप का प्रभाव केवल भवनों, सड़कों और पुलों तक सीमित नहीं रहता। यह धरती के भीतर मौजूद जलभृतों को भी प्रभावित करता है। इससे भूजल की मात्रा, प्रवाह और गुणवत्ता में परिवर्तन आ सकता है। भारत जैसे देश में, जहां सिंचाई और पेयजल का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है और यह जल सुरक्षा से  सीधे सीधे जुड़ा हुआ है।

भूकंप और भूजल का क्या संबंध है?

भूकंप पृथ्वी की सतह के नीचे मौजूद टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियों के कारण उत्पन्न होते है। जब इन प्लेटों के बीच तनाव अचानक मुक्त होता है, तो ऊर्जा भूकंपीय तरंगों के रूप में फैलती है। ये तरंगें केवल चट्टानों को ही नहीं हिलातीं, बल्कि भूजल भंडारों (Aquifers) को भी प्रभावित करती है।

अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण USGS के अनुसार भूकंप की तरंगें भूजल स्तर में अचानक उतार-चढ़ाव पैदा कर सकती है। कई बार जल स्तर कुछ समय के लिए ऊपर या नीचे चला जाता है और कुछ मामलों में स्थायी परिवर्तन भी दर्ज किए गए है।

भूकंप के दौरान भूजल में होने वाले दोलन 

वैज्ञानिकों ने दशकों पहले यह पाया था कि भूकंप के दौरान कुओं और भूजल स्रोतों के जलस्तर में तेज़ दोलन उत्पन्न होते हैं। सामान्य निगरानी में ये बदलाव अक्सर दिखाई नहीं देते, लेकिन जब जलस्तर को प्रति सेकंड के अंतराल पर रिकॉर्ड किया जाता है, तो यह भूकंपीय तरंगों के समान पैटर्न प्रदर्शित करता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार, भूकंप से उत्पन्न लंबी अवधि की सतही तरंगें जलभृत को फैलाती और संकुचित करती हैं, जिससे छिद्र जल-दाब में उतार-चढ़ाव होता है। इसके परिणामस्वरूप पानी कुएं और जलभृत के बीच अंदर-बाहर प्रवाहित होता है और जलस्तर में दोलन दिखाई देते हैं। 

प्रारंभिक सिद्धांतों में माना गया था कि कुएं में जलस्तर का यह परिवर्तन अनुनाद के कारण बढ़ जाता है, लेकिन हाल के अध्ययनों से संकेत मिलता है कि भूकंपीय तरंगों द्वारा उत्पन्न छिद्र जल-दाब में वास्तविक परिवर्तन पहले की तुलना में कहीं अधिक हो सकते हैं। इससे यह समझ बढ़ी है कि भूकंप केवल धरातल को ही नहीं, बल्कि भूमिगत जल प्रणालियों और भूजल दाब को भी महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते है।

भूकंप के बाद भूजल स्तर में स्थायी बदलाव 

भूकंप के बाद कुछ कुओं में भूजल स्तर अचानक और अपेक्षाकृत स्थायी रूप से बढ़ या घट जाता है, जिसे वैज्ञानिक ऑफसेट (Offset) कहते है। यह बदलाव सभी कुओं में नहीं देखा जाता, बल्कि कुछ विशेष भूगर्भीय परिस्थितियों वाले कुओं में ही होता है।

कई बार जलस्तर में यह परिवर्तन तुरंत दिखाई देता है, जबकि कुछ मामलों में इसे अधिकतम स्तर तक पहुंचने में कई दिन या सप्ताह लग सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे भूकंपीय तरंगों के कारण भूजल दबाव, चट्टानों की पारगम्यता, गैसों के निकलने, अवसादों के संघनन या गर्म जल प्रणालियों में दाब परिवर्तन जैसी प्रक्रियाएं जिम्मेदार हो सकती है। 

ऐसे परिवर्तन विशेष रूप से भू-तापीय क्षेत्रों में अधिक देखे जाते है। यह शोध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भूकंप से उत्पन्न भूजल दबाव में बदलाव दूरस्थ क्षेत्रों में भी नए भूकंपों या ज्वालामुखीय गतिविधियों को ट्रिगर करने में भूमिका निभा सकते है।

भूजल और भूकंप सम्बन्धी जरुरी बातें  

  • भारत में भूजल की अहमियत - भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता देश है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के अनुसार देश की लगभग 60 प्रतिशत सिंचित कृषि और बड़ी ग्रामीण आबादी की पेयजल जरूरतें भूजल से पूरी होती है। यही कारण है कि भूजल में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे कृषि, पेयजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।

  • जब भूकंप भूजल को हिलाता है -  भूकंप के दौरान पृथ्वी की टेक्टोनिक प्लेटों में जमा ऊर्जा अचानक मुक्त होती है। इससे उत्पन्न भूकंपीय तरंगें चट्टानों, दरारों और जलभृतों तक पहुंचती हैं। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) के अनुसार भूकंप के कारण भूजल स्तर में अचानक वृद्धि या गिरावट हो सकती है। कई मामलों में ये परिवर्तन अस्थायी होते हैं, लेकिन कुछ स्थानों पर वर्षों तक बने रहते है।

  • एक्वीफर के भीतर क्या होता है? - भूजल सामान्यतः चट्टानों और मिट्टी के छिद्रों तथा दरारों में संग्रहित रहता है। भूकंप आने पर इन दरारों की संरचना बदल सकती है। यदि नई दरारें खुलती है तो पानी के प्रवाह के लिए नए मार्ग बन जाते है। इससे जलस्तर बढ़ सकता है और नए झरने निकल सकते है। लेकिन यदि दरारें बंद हो जाएं या तलछट से भर जाएं तो पानी का प्रवाह रुक सकता है और कुएं सूख सकते है। USGS के अनुसार भूकंप के बाद कुओं में जलस्तर में कई मीटर तक परिवर्तन दर्ज किए गए है।

  • भुज भूकंप: भूजल में दर्ज हुआ बदलाव - 26 जनवरी 2001 को आए 7.7 तीव्रता के भुज भूकंप ने गुजरात में व्यापक तबाही मचाई। इसके बाद वैज्ञानिकों ने भूजल स्रोतों में महत्वपूर्ण बदलाव दर्ज किए। एक अध्ययन के अनुसार कच्छ क्षेत्र के कई हिस्सों में जलस्तर बदल गया था। कुछ स्थानों पर नए जलस्रोत उभरे, जबकि कुछ क्षेत्रों में पुराने स्रोत कमजोर हो गए। इसके अनुसार भूकंप ने भूमिगत जल मार्गों और चट्टानी संरचनाओं को प्रभावित किया था।

26 जनवरी 2001 को गुजरात के कच्छ क्षेत्र में आए 7.7 तीव्रता के भुज भूकंप के बाद भूजल स्रोतों में असामान्य परिवर्तन दर्ज किए गए। Current Science में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार नरवेरी क्षेत्र में भूकंप के बाद भूजल स्वतः सतह पर निकलने लगा और यह प्रवाह कई महीनों तक जारी रहा। शोधकर्ताओं ने गुजरात के विभिन्न हिस्सों में भूकंप के बाद भूजल स्रोतों में बदलाव और जल के उभार की घटनाएं दर्ज कीं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि भूकंप भूमिगत जलभृतों और जल प्रवाह मार्गों को प्रभावित कर सकता है। 

क्या हज़ारों किलोमीटर दूर भी दिख सकता है असर ?

भूकंप का प्रभाव केवल उसके केंद्र तक सीमित नहीं रहता। USGS के अनुसार बड़े भूकंपों के बाद हजारों किलोमीटर दूर स्थित कुओं में भी जलस्तर परिवर्तन दर्ज किए गए है। इसका कारण भूकंपीय तरंगों का लंबी दूरी तक पहुंचना है।

हिमालयी क्षेत्र भारत का सबसे संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्र माना जाता है। यहां हजारों गांव प्राकृतिक झरनों पर निर्भर है। भारत सरकार के नीति आयोग की रिपोर्ट Inventory and Revival of Springs in the Himalayas के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में झरनों का प्रवाह भूगर्भीय संरचनाओं से जुड़ा होता है। यदि भूकंप इन संरचनाओं को प्रभावित करता है तो झरनों का जल प्रवाह बदल सकता है। उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में भूकंपीय गतिविधियों और झरनों के व्यवहार के बीच संबंध मौजूद है।

केवल मात्रा नहीं, गुणवत्ता भी प्रभावित होती है

भूकंप के बाद पानी की गुणवत्ता में बदलाव एक गंभीर लेकिन कम चर्चित मुद्दा है। जब धरती हिलती है तो चट्टानों और मिट्टी में मौजूद महीन कण पानी में मिल जाते है। इससे पानी मटमैला हो जाता है। तलछट बढ़ जाती है। रंग और स्वाद बदल सकता है और जल स्रोत अस्थायी रूप से उपयोग के अयोग्य हो सकते है।

इसके अलावा भूकंप का प्रभाव केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता। इसकी वजह से भूजल की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।

  • पानी मटमैला हो सकता है।

  • तलछट और गाद बढ़ सकती है।

  • पानी का रंग बदल सकता है।

  • स्वाद और गंध में परिवर्तन हो सकता है।

USGS के अनुसार भूकंप के बाद कुओं का पानी कई बार अस्थायी रूप से धुंधला या गंदला हो जाता है क्योंकि चट्टानों की दरारों और छिद्रों में जमा तलछट बाहर निकल आती है।

रासायनिक संरचना में बदलाव

भूकंप के दौरान दो अलग-अलग जलभृत आपस में जुड़ सकते हैं। यदि एक जलभृत में खनिजों की मात्रा अधिक है और दूसरा अपेक्षाकृत साफ है, तो दोनों के मिश्रण से पानी की गुणवत्ता बदल सकती है।

भूकंप के बाद पानी में आयरन, मैंगनीज, फ्लोराइड, लवणता की मात्रा में बदलाव आ सकता है। हालांकि ऐसे बदलाव हर भूकंप में नहीं होते, लेकिन बड़े भूकंपों के बाद इनके उदाहरण दर्ज किए गए हैं।

प्रदूषण का जोखिम भी बढ़ता है

भूकंप के दौरान सीवर लाइनें, औद्योगिक पाइप लाइनें और रासायनिक भंडारण संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। यदि इनसे रिसाव होता है तो प्रदूषक भूजल तक पहुंच सकते हैं। शहरी क्षेत्रों में यह खतरा और अधिक होता है क्योंकि वहां भूमिगत अवसंरचना का जाल अधिक घना होता है।

क्या भूजल भूकंप की चेतावनी दे सकता है?

दुनिया के कई देशों में वैज्ञानिक भूकंप से पहले भूजल में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन कर रहे हैं। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि भूकंप से पहले जलस्तर बदलता है। गैसों की मात्रा में परिवर्तन होता है तथा पानी की रासायनिक संरचना बदल सकती है। हालांकि इस बात पर कई लोग सहमत नहीं है कि केवल भूजल संकेतों के आधार पर भूकंप की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है। फिर भी भूजल निगरानी को भूकंप अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण उपकरण माना जाता है।

जल प्रबंधन के लिए क्या सबक?

भारत में आपदा प्रबंधन योजनाएं आमतौर पर भवन सुरक्षा और राहत कार्यों पर केंद्रित रहती हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि भूकंप के बाद जल स्रोतों की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।भूकंप के बाद निम्न कदम जरूरी है, जिनमें कुओं और हैंडपंपों का निरीक्षण। पेयजल गुणवत्ता परीक्षण। झरनों और प्राकृतिक स्रोतों की निगरानी। भूजल स्तर का रिकॉर्ड तैयार करना तथा प्रदूषण की जांच आवश्यक है। केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्य भूजल विभागों द्वारा यदि भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में नियमित निगरानी की जाए तो जल संकट और स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सकता है।

बदलती जलवायु और बढ़ती चुनौती

जलवायु परिवर्तन के कारण पहले ही कई क्षेत्रों में भूजल पर दबाव बढ़ रहा है। अनियमित वर्षा, सूखा और अत्यधिक भूजल दोहन से जलभृत कमजोर हो रहे है। ऐसे समय में यदि कोई बड़ा भूकंप आता है तो उसके प्रभाव और गंभीर हो सकते हैं। इसलिए भविष्य की जल नीति में भूजल और भूकंप के संबंध को भी शामिल करना आवश्यक है।

भूकंप केवल धरती की सतह को नहीं बदलते, बल्कि धरती के भीतर मौजूद जल प्रणालियों को भी प्रभावित करते हैं। इनके कारण भूजल की मात्रा बढ़ या घट सकती है, नए जल स्रोत बन सकते हैं और पुराने सूख सकते है। साथ ही पानी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है।

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