क्रिकेट मैदानों को सिंचाई के जरिये हराभरा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी का इस्‍तेमाल होता है, जिसे लेकर पानी का स्रोत न बताने के कारण NGT ने IPL-19 के मैच करा रहे 6 स्‍टेडियमों को नोटिस दिया है। 

क्रिकेट मैदानों को सिंचाई के जरिये हराभरा रखने के लिए भारी मात्रा में पानी का इस्‍तेमाल होता है, जिसे लेकर पानी का स्रोत न बताने के कारण NGT ने IPL-19 के मैच करा रहे 6 स्‍टेडियमों को नोटिस दिया है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

देश के भूजल स्तर में कमी पर NGT ने बनाई हाई लेवल समिति, पानी के इस्‍तेमाल को लेकर IPL-19 के 6 स्‍टेडियमों को नोटिस

देश में बढ़ते जल संकट के बीच एक्‍शन में आया नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल, पानी से जुड़े मुद्दे पर स्‍वत: संज्ञान और IPL के खिलाफ PIL पर एक्‍शन से पर्यावरण प्रेमियों में जगी उम्‍मीद
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देश में इस साल अप्रैल में गर्मी के सारे रिकॉर्ड तेजी से टूटते दिखाई दे रहे हैं। प्रचंड गर्मी और हीटस्‍ट्रोक के कहर के बीच देश के विभिन्‍न इलाकों में जल संकट गहराने की खबरें भी सामने आने लगी हैं। ऐसे में पानी और पर्यावरण पर नज़र रखने वाला राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने इसके मद्देनज़र कई ज़रूरी और महत्‍वपूर्ण कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। 

देश में बढ़ते जल संकट और भूजल स्तर में तेजी से आती कमी का स्‍वत: संज्ञान लेते हुए NGT की प्रधान पीठ ने एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन करके महत्वपूर्ण कदम उठाया है। यह समिति भारत में बढ़ते भूजल स्तर में कमी की समीक्षा करने के साथ ही बढ़ते जल संकट से निपटने के उपाय सुझाएगी। समिति अगले चार महीनों में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।

न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव (अध्यक्ष), डॉ. ए. सेंथिल वेल (विशेषज्ञ सदस्य) और डॉ. अफरोज अहमद (विशेषज्ञ सदस्य) की पीठ ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) और विभिन्न राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों की समीक्षा की। उन्होंने पाया कि देश के कई हिस्‍सों में भूजल का अत्‍यधिक और अनियंत्रित दोहन किया जा रहा है और इस पर लगाम लगाने के लिए नियमों व दिशा-निर्देशों का सही ढंग से पालन नहीं किया जा रहा है।

एनजीटी ने एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए यह मामला शुरू किया। इसमें भारत-गंगा बेसिन और उत्तर-पश्चिमी भारत सहित कई क्षेत्रों में भूजल स्तर केचिंताजनक भविष्य पर विचार किया गया। न्यायाधिकरण ने संकलित आंकड़ों की समीक्षा की, जिससे पता चला कि नियामक दिशानिर्देशों के अपर्याप्त प्रवर्तन के कारण भूजल का व्यापक रूप से अत्यधिक दोहन हुआ है। भूजल के स्‍तर में गंभीर रूप से गिरावट आने की स्थिति को देखते हुए एनजीटी ने यह कदम उठाया है। 

पंजाब में सबसे ज्‍यादा भूजल दोहन, कई राज्‍यों ने NGT को नहीं दी रिपोर्ट

आंकड़ों से पता चलता है कि पंजाब में सबसे अधिक भूजल दोहन हो रहा है। राज्‍य में 75.16% इकाइयां ‘अति-शोषित' की श्रेणी में हैं। उसके बाद हरियाणा का नंबर है, जहां भूजल का दोहन 61.54% है। राजधानी एनसीटी दिल्ली में 41.18%, तमिलनाडु में 33.87% और कर्नाटक में 18.99% इकाइयां इस श्रेणी में हैं। कई राज्यों ने अपनी रिपोर्ट जमा नहीं की है, जिसकी वजह से वहां भूजल के दोहन की स्थिति की जानकारी उपलब्‍ध नहीं है।

कौन-कौन होंगे NGT कमेटी के सदस्य ?

इन गंभीर मुद्दों के समाधान हेतु न्यायाधिकरण ने राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान (एनजीआरआई), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफ एंड सीसी) और आईआईटी रुड़की के प्रतिनिधियों से युक्त एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है, जिसमें सीजीडब्ल्यूए नोडल एजेंसी के रूप में कार्य कर रहा है। समिति को तीन महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है।

IPL में पानी का स्रोत न बताने पर, पूछा क्‍यों न रोकें मैच ?

देश भर में इंडियन प्रीमियर लीग यानी IPL के चढ़ते बुखार के बीच एनजीटी की एक सख्‍त टिप्‍पणी से टूर्नामेंट के आगामी मैचों पर संकट की तलवार लटकती भी दिख रही है। दरअसल कोर्ट ने  IPL क्रिकेट मैचों का आयोजन करा रहे देश के छह क्रिकेट स्टेडियमों को नोटिस जारी कर पूछा है कि उनके परिसरों में होने वाली गतिविधियों को क्यों नहीं रोका जाए? 

एनजीटी ने नोटिस जारी कर संबंधित अधिकारियों से पूछा है कि पिच और मैदानों के रखरखाव के लिए इस्तेमाल किए गए पानी के स्रोत का खुलासा न करने पर उनकी गतिविधियों को क्यों नहीं रोका जाना चाहिए। पर्यावरण निकाय क्रिकेट मैदानों के रखरखाव के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से उपचारित पानी के बजाय भूजल या ताजे पानी के उपयोग और भूजल भंडारण, निर्वहन और पुनर्स्थापन के लिए वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित न करने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है।

छह स्टेडियम, जिनको मिला NGT का नोटिस 

यह छह स्टेडियम हैं दिल्ली का अरुण जेटली स्टेडियम (फिरोजशाह कोटला), शहीद वीर नारायण सिंह अंतर्राष्ट्रीय स्टेडियम (रायपुर), सवाई मानसिंह स्टेडियम (जयपुर), डॉ. डी. वाई. पाटिल स्टेडियम (मुंबई), भारत रत्न श्री अटल बिहारी वाजपेयी एकाना क्रिकेट स्टेडियम (लखनऊ) और बाराबती स्टेडियम (कटक)। इनमें से दिल्ली, रायपुर, जयपुर और लखनऊ के चार स्टेडियम आईपीएल 2026 के मैचों की मेजबानी कर रहे हैं।  

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक एनजीटी के नोटिस पर दिल्ली और जिला क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) का कहना है कि उसने अनुपालन रिपोर्ट पिछले साल मार्च में जमा कर दी थी और 16 अप्रैल को हुई घटनाओं के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं थी। डीडीसीए के प्रवक्ता आरआर सिंह ने बताया, "डीडीसीए को वर्ष 2024 में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) से अरुण जेटली स्टेडियम में भूजल के उपयोग के संबंध में एक नोटिस प्राप्त हुआ था। हमने सीजीडब्ल्यूए के मार्गदर्शन में सभी आवश्यक अनुपालन किए हैं। डीडीसीए इस संबंध में जारी सभी निर्देशों का पालन करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।" 

उन्होंने कहा, "हमें 16 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई होने की जानकारी नहीं थी और इसलिए हम माननीय ट्रिब्यूनल को इसकी सूचना नहीं दे सके। हम न्यायिक रिकॉर्ड में सही स्थिति लाने के लिए आवश्यक कदम उठा रहे हैं।" सिंह ने यह भी बताया कि परिसर में पहले से ही दो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और 17 वर्षा जल संचयन गड्ढे मौजूद हैं। सुनवाई के दौरान हैदराबाद के स्टेडियम की ओर से पेश वकील ने ट्रिब्यूनल के निर्देशों का पालन करने के लिए तीन हफ्ते का समय मांगा। 

एक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) ने 15 अप्रैल को महीने और साल में मैदानों की सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी, उपचारित पानी का हिस्सा और मिले ताजे पानी के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी दी थी। पांच मैदान और संघों सौराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन, हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन, ग्रीन पार्क स्टेडियम, मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन और महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन ने जवाब दिया था। उधर, सौराष्ट्र क्रिकेट संघ ने सीडीडब्ल्यूए को बताया कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाना मुमकिन नहीं है। वह राजकोट महानगर पालिका से मिलने वाले 1 लाख लीटर/दिन उपचारित (ट्रीटेड) पानी का इस्तेमाल कर रहा है। महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन ने पुणे के गहुंजे स्टेडियम में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट लागू किया है और एसटीपी बनाने की तैयारी में भी है।

इंडियन प्रीमियर लीग का 19वां सीजन 28 मार्च को शुरू हुआ था और 31 मई को खत्म होगा। मैच आयोजन से संबंधित अधिकारियों ने भी आशा व्यक्त की है कि हालिया घटनाक्रम से उनके परिसरों में चल रहे इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) मैचों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक याचिका से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि क्रिकेट मैदानों की देखभाल जैसे- पिच, आउटफील्ड और हरे मैदान की सिंचाई के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से मिलने वाले उपचारित जल की बजाय भूजल या ताजे पेयजल स्रोतों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि जल संकट के दौर में यह संसाधनों के अनुचित उपयोग की श्रेणी में आ सकता है। 

याचिका में यह भी सवाल उठाया गया कि कई बड़े स्टेडियमों में भूजल संरक्षण, रिचार्ज और वर्षाजल संचयन (Rainwater Harvesting) जैसी अनिवार्य व्यवस्थाएं पर्याप्त रूप से क्यों नहीं हैं। इसी आधार पर एनजीटी ने संबंधित स्टेडियमों से उनके जल स्रोत, दैनिक खपत, भूजल दोहन की अनुमति और वैकल्पिक जल प्रबंधन उपायों का ब्योरा मांगा। 

ट्रिब्यूनल ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नियमों का पालन नहीं हुआ तो खेल गतिविधियों पर रोक जैसे कड़े कदमों पर भी विचार किया जा सकता है। फिलहाल सेंट्रल ग्राउंड वाटर अथॉरिटी (CGWA) विभिन्न स्टेडियमों से मिली सूचनाओं को संकलित कर उनकी जांच कर रही है, ताकि यह तय किया जा सके कि कहीं सार्वजनिक जल संसाधनों का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा। 

क्रिकेट और गोल्फ मैदानों में होती है पानी की भारी खपत

क्रिकेट और गोल्फ जैसे खेलों के चमकदार हरे मैदान अक्सर भारी जल खपत पर टिके होते हैं। विशेषज्ञ आकलनों के अनुसार एक बड़े अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम की आउटफील्ड, पिच और प्रैक्टिस ज़ोन की सिंचाई में गर्मियों के दौरान प्रतिदिन लगभग 50,000 से 3,00,000 लीटर पानी तक खर्च हो सकता है। यह स्थानीय मौसम, घास की किस्म और मैदान के आकार पर निर्भर करता है। 

इंडियन प्रीमियर लीग जैसे लंबे टूर्नामेंट में यह खपत करोड़ों लीटर तक पहुंच सकती है यदि उपचारित जल का उपयोग न हो। एनजीटी ने इसी संदर्भ में IPL 2026 के मैच करा रहे छह स्टेडियमों से उनके जल स्रोत पर जवाब मांगा है कि कहीं पेयजल या भूजल का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा।

गोल्फ कोर्स इससे भी अधिक जल-गहन माने जाते हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार 18-होल वाले एक औसत गोल्फ कोर्स को प्रतिदिन लगभग 5 लाख से 10 लाख लीटर (करीब 1.3 से 3 लाख गैलन) पानी की आवश्यकता हो सकती है, जबकि शुष्क क्षेत्रों में यह और बढ़ सकती है। कुछ बड़े कोर्स सालाना 20 से 40 करोड़ लीटर तक पानी उपयोग कर सकते हैं। जल संकट वाले देशों में यह सवाल इसलिए गंभीर है क्योंकि इतनी मात्रा हजारों परिवारों की दैनिक जरूरतों के बराबर हो सकती है। इसलिए treated wastewater, rainwater harvesting और drought-resistant turf अब खेल प्रबंधन की पर्यावरणीय अनिवार्यता बनते जा रहे हैं।

पहले भी उठे हैं पानी से 'खिलवाड़' पर सवाल

खेलों के आयोजन में पानी के भारीमात्रा में इस्‍तेमाल या पानी की बर्बादी का यह कोई पहला मामला नहीं है। खेल मैदानों में पानी की भारी खपत और उसके खिलाफ सवाल पहले भी कई बार उठ चुके हैं। बीते वर्षों में सामने आए कुछ प्रमुख विवाद इस प्रकार हैं:

आईपीएल और क्रिकेट स्टेडियमों पर पुराना विवाद (2024–26) : एनजीटी के सामने दायर याचिका 2021 से इसी मुद्दे को उठा रही है कि कई बड़े क्रिकेट स्टेडियम भूजल या ताजे पानी से मैदान सींच रहे हैं, जबकि treated sewage water उपलब्ध हो सकता है। दिसंबर 2024 में एनजीटी ने CGWA से देशभर के स्टेडियमों के लिए जल उपयोग दिशानिर्देश मांगे, और 2026 में कई क्रिकेट संघों पर अनुपालन न करने पर जुर्माना भी लगा।

मोहाली का आईएस बिंद्रा स्टेडियम : पंजाब के मोहाली स्थित स्टेडियम का मामला विशेष रूप से चर्चा में रहा, जहां NGT रिकॉर्ड के अनुसार मैदान रखरखाव के लिए लगभग 6,000 किलोलीटर भूजल प्रति माह उपयोग पर सवाल उठा, जबकि treated water विकल्प पर बहस हुई।

ईडन गार्डन्स, कोलकाता : केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) रिपोर्ट के अनुसार ईडन गार्डन्स में भी भूजल उपयोग और rainwater harvesting क्षमता को लेकर सवाल उठे। यह दिखाता है कि मामला सिर्फ छोटे शहरों का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्टेडियमों तक फैला है।

महाराष्ट्र का 2016 आईपीएल जल विवाद : भयंकर सूखे के दौरान महाराष्‍ट्र में आईपीएल मैचों के लिए लाखों लीटर पानी उपयोग पर बड़ा जन-विवाद हुआ था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने सार्वजनिक हित याचिका (PIL) पर कुछ मैच महाराष्ट्र से बाहर शिफ्ट करने का आदेश दिया था, क्योंकि सूखा प्रभावित क्षेत्रों में खेल बनाम पेयजल प्राथमिकता पर तीखी बहस हुई।

गोल्फ कोर्स और अर्बन लक्ज़री स्पोर्ट्स : भारत के कई महानगरों में गोल्फ कोर्स लंबे समय से “ग्रीन लक्ज़री बनाम जल न्याय” बहस का हिस्सा रहे हैं, जहां विशाल हरे क्षेत्र बनाए रखने के लिए भारी सिंचाई की जरूरत पर पर्यावरणविद सवाल उठाते रहे हैं।

इन उदाहरणों से स्‍पष्‍ट होता है कि छह आईपीएल स्‍टेडियमों केा NGT का मौजूदा नोटिस कोई पहली या अनूठी कार्रवाई नहीं, बल्कि खेलों में जल प्रबंधन पर लंबे समय से राष्ट्रीय स्‍तर पर बहस हाती रही है।

मनोरंजन बनाम जरूरत : जब खेल और शहर की प्‍यास हो आमने-सामने

गर्मी के चरम महीनों में भारत के कई शहर जल संकट, घटते भूजल स्तर, टैंकर निर्भरता और पेयजल कटौती जैसी समस्याओं से जूझते हैं। ऐसे विकट समय में बड़े क्रिकेट लीग या खेल के बड़े आयोजनों पर भी सवाल उठ रहे हैं। क्‍योंकि, इन खेलों के लिए विशाल हरे भरे खेल के मैदानों को तैयार करने में लाखों लीटर पानी खर्च होता है। भारत जैसे जल संकट से जूझते देश में यह केवल संसाधन उपयोग का मामला नहीं रह जाता, बल्कि सामाजिक न्याय और मूलभूत सुविधाओं की प्राथमिकताओं से जुड़ी बहस का मुद्दा भी बन जाता है। सीधा और स्‍वाभाविक सवाल यह उठता है कि जब कई परिवार रोजमर्रा की जरूरतों के लिए सीमित पानी में गुजारा कर रहे हों, तब मनोरंजन उद्योग को कितनी जल प्राथमिकता मिलनी चाहिए? आलोचकों का तर्क है कि खेल आयोजनों के लिए यदि भूजल, नगर निगम जल या पेयजल गुणवत्ता वाला पानी उपयोग होता है, तो यह “पब्लिक रिसोर्स बनाम प्राइवेट एंटरटेनमेंट” का उदाहरण बन सकता है। यह बहस ग्रामीण भारत में और तीखी हो जाती है, जहां सूखा, फसल संकट और पीने के पानी की कमी पहले से गंभीर हैं। दूसरी ओर खेलों के आयोजन से जुड़े संस्थान अकसर रोजगार, अर्थव्यवस्था और पर्यटन का तर्क देते हैं, लेकिन जल संकट के दौर में पारदर्शिता, जल ऑडिट और treated wastewater का उपयोग सामाजिक जवाबदेही का मामला तो बनता ही है। इसलिए यहां असली सवाल खेल विरोध नहीं, बल्कि संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग का है।

पर्यावरण से खिलवाड़ करता ‘खेल’ का कार्बन फुटप्रिंट

किसी क्रिकेट स्टेडियम या बड़े खेल परिसर की पर्यावरणीय लागत केवल पानी तक सीमित नहीं होती; उसका ऊर्जा और कार्बन फुटप्रिंट भी काफी बड़ा हो सकता है। हरी घास को बनाए रखने के लिए नियमित सिंचाई, पंपिंग सिस्टम, घास काटने वाली मशीनें, उर्वरक, ग्राउंड कूलिंग तकनीक और रखरखाव उपकरण लगातार ऊर्जा मांगते हैं। इसके साथ दिन-रात चलने वाले मैचों में हाई-इंटेंसिटी फ्लडलाइट्स भारी बिजली खपत करते हैं, जो यदि जीवाश्म ईंधन आधारित ग्रिड से आती है तो कार्बन उत्सर्जन बढ़ाती है। 

एयर-कंडीशंड कॉरपोरेट बॉक्स, डिजिटल स्क्रीन, प्रसारण अवसंरचना और दर्शकों का परिवहन इस प्रभाव को और बढ़ाते हैं। यानी खेल आयोजन केवल “मैदान” नहीं, बल्कि एक ऊर्जा-गहन शहरी आयोजन होते हैं। जलवायु परिवर्तन और हीटवेव के दौर में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या खेल संस्थान सौर ऊर्जा, वर्षाजल संचयन, ऊर्जा दक्ष लाइटिंग और recycled water जैसे टिकाऊ मॉडल अपना रहे हैं या नहीं। भविष्य में खेल अवसंरचना की सफलता सिर्फ दर्शक संख्या से नहीं, बल्कि उसके ecological footprint से भी आंकी जा सकती है।

‘जलवायु संकट’ के दौर में ‘वॉटर-स्मार्ट स्पोर्ट्स’ की जरूरत

एनजीटी की सख्ती केवल छह स्टेडियमों से जवाब मांगने भर का मामला नहीं, बल्कि भारत की खेल अवसंरचना (Sports Infrastructure) नीति पर बड़ा सवाल है कि क्या बड़े स्टेडियमों और खेल परिसरों के लिए जल ऑडिट, पर्यावरणीय मंजूरी, भूजल उपयोग की सीमा और treated wastewater के इस्‍तेमाल जैसे मानक पर्याप्त रूप से लागू किए जा रहे हैं? हीटवेव, घटते जलाशयों और शहरी जल संकट के इस दौर में खेल प्रबंधन को पारंपरिक मॉडल से आगे बढ़कर वॉटर-स्मार्ट स्पोर्ट्स (Water-Smart Sports) का नज़रिया अपनाना होगा। 

भविष्य में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग, सीवेज ट्रीटेड वॉटर से सिंचाई, drought-resistant grass, hybrid turf, सौर ऊर्जा और मौसम आधारित मैच शेड्यूलिंग जैसे उपाय विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन सकते हैं। असली चुनौती खेल रोकना नहीं, बल्कि उसे संसाधन-संवेदनशील बनाना है ताकि मनोरंजन, पर्यावरण और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन कायम रह सके। आने वाले समय में वही खेल संस्थान टिकाऊ माने जाएंगे, जो सिर्फ स्कोरबोर्ड नहीं बल्कि अपने ecological footprint का हिसाब भी देंगे।

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