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भूजल पुनर्भरण प्रक्रिया क्या है? कम लागत वाली ट्यूबवेल पुनर्भरण तकनीक
जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक घटना है, जलवायु परिवर्तन से देश में लाखों लोगों की खाद्य सुरक्षा और आजीविका पर संकट उत्पन्न हो गया है। कृषि में जल की बहुत ही अहम भूमिका है। भूजल की उपलब्धता जलवायु परिवर्तन के कारण विशेषतः निम्न वर्षा और उच्च भूजल वाले क्षेत्रों में प्रभावित हो रही है। देश में हाल ही के दशकों में सिंचाई के लिए भूजल उपयोग में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गई है।
भूजल पुनर्भरण क्या है?
भूजल पुनर्भरण को सामान्य अर्थों में जल के नीचे की ओर प्रवाह की मात्रा या प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया जाता है जो भौम जल स्तर तक पहुंचता है और भूजल भंडार में वृद्धि करता है।
भूजल पुनर्भरण का सीधा मतलब है भूजल संसाधनों की भरपाई। यह प्रक्रिया नियमित रूप से बारिश और बर्फ पिघलने के माध्यम से स्वाभाविक रूप से होती है। इसे कृत्रिम रूप से भी प्रेरित किया जा सकता है। महत्वपूर्ण गणना यह है कि जलभृत से पानी को पंप करने की तुलना में पुनर्भरण अधिक दर पर होना चाहिए।
ट्यूबवेल पुनर्भरण तकनीक क्या है What is borewell recharge technology?
इस परियोजना के क्रियान्वयन से पहले अधिकांश किसान मृदा और जल संरक्षण तकनीकों से अनभिज्ञ थे। कुछ किसान देसी तरीकों का उपयोग करके अपने ट्यूबवेल को रिचार्ज कर रहे थे जैसे बरसात के मौसम में बहते पानी को कच्चे ट्यूबवेल के वॉल्व को खोलकर जल संरक्षित करना आदि। लेकिन निथराई/निस्पंदन की समस्या के कारण गड्ढे में मिट्टी/गाद जमा हो जाती है।
इसे बार-बार साफ करने की आवश्यकता होती है। यह एक थकाऊ प्रक्रिया है और पानी की अत्यधिक बर्बादी होती है। उपरोक्त निष्कर्षों और ट्यूबवेल को रिचार्ज करने की उपयोगिता के आधार पर स्थानीय रूप से उपलब्ध सीमेंट पाइप (छिद्रित), ट्यूबवेल में ईंट की दीवार का उपयोग करके ट्यूबवेल की कम लागत वाली स्वदेशी पुनर्भरण संरचना को विकसित किया गया और ट्यूबवेल के बाहर पानी निथराई/निस्पंदन के लिए अलग से एक गड्ढा भी तैयार किया गया।
ट्यूबवेल पुनर्भरण तकनीक
भूजल पर बढ़ते दबाव को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) देश के पानी की कमी वाले जिलों में भूजल पुनर्भरण परियोजनाएं चला रहा है। जलवायु के बदलाव से खेती को सुरक्षित बनाने के लिए राष्ट्रीय नवाचार जलवायु समुत्थानशील कृषि (निक्रा) परियोजना के तहत भूजल रिचार्ज को प्राथमिकता दी गई है। शुरुआत में यह योजना 151 गांवों में लागू की गई थी, लेकिन अच्छे परिणाम मिलने के बाद इसे बढ़ाकर 400 गांवों तक पहुंचाया गया। अब ये गांव जलवायु अनुकूल खेती सीखने और प्रशिक्षण के केंद्र बन गए है।
पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में बारिश का तरीका बदल गया है। अब लंबे समय तक सूखा रहता है और बारिश भी असमान रूप से होती है। इसी समस्या को देखते हुए भरतपुर में भूजल की गुणवत्ता और उपलब्धता बढ़ाने के लिए कम लागत वाली ट्यूबवेल रिचार्ज तकनीक अपनाई गई। इस काम में कृषि संस्थानों और जिला कृषि विभाग की संयुक्त टीम ने किसानों के साथ मिलकर काम किया।
इस तकनीक में सीमेंट की 8-10 रिंग, 500 ईंटें, एक बोरी सीमेंट, 10 फीट का पाइप और 6 फीट लंबा छिद्रित पाइप लगाया जाता है। इसकी लागत लगभग 10 से 12 हजार रुपये आती है। इसमें कुल खर्च और मजदूरी का 25 प्रतिशत किसान देता है, जबकि 75 प्रतिशत खर्च निक्रा परियोजना के तहत भाकृअनुप द्वारा उठाया जाता है।
इस संरचना को बनाने में लगभग दो दिन लगते हैं। यह ट्यूबवेल रिचार्ज तकनीक भूजल को दोबारा भरने का आसान और कम खर्च वाला तरीका है। इससे खेतों में जरूरत के समय पानी उपलब्ध हो सकता है और खेती को सूखे से बचाने में मदद मिलती है।
भू-जल पुनर्भरण क्यों आवश्यक है -
भू-जल का उपयोग टिकाऊ संसाधन के रूप में करना होता है क्योंकि सतही जल हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में अपर्याप्त सिद्ध होता है।
उप मृदा में वर्षाजल का अवछन (निच्छालन) अत्यंत कम हो गया है तथा तेजी से बढते शहरीकरण के कारण भू-जल के पुनर्भरण में बहुत कमी आई है।
भू-जल स्रोतों के अत्यधिक दोहन के परिणामस्वरूप देश के अधिकांश भागों में जल का हल नीचे चला गया है।
भावी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अतिरिक्त सतही जल के संरक्षण और भंडारण के द्वारा भू-जल की उपलब्धता को बढ़ाने की आवश्यकता है।
तटवर्ती क्षेत्रों में समुद्री जल के भू-जल में मिलने या प्रवेश करने को रोका जाना चाहिए। ऐसा भू-जल के अत्यधिक पपिंग के कारण हो रहा है।
भू-जल की गुणवत्ता (खारापन / लवणता) को सुधारने की आवश्यकता है।
क्षेत्र की पारिस्थितिकी में सुधार के लिए वानस्पतिक आवरण को बढ़ाने कीआवश्यकता है और
कृषि क्षेत्र में बिजली की खपत को कम करने व अंततः कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कुओं में जल के तलों को ऊपर उठाने की आवश्यकता है।
सतही जलाशयों की तुलना में उप सतही जलाशयों के पुनर्भरण की लागत कम होती है।
नहरों, झीलों तथा ग्रामीण तालाब जैसे सतही जल स्त्रोतों वाले क्षेत्रों में जहां जल अपर्याप्त मात्रा में है जल समस्या का यह एक आदर्श समाधान है।
इससे भू-जल के तल ऊपर उठते हैं।
भू-जल प्रत्यक्ष रूप से वाष्पन अथवा प्रदूषण से प्रभावित नहीं होता।
इससे सूखे का प्रभाव कम होता है तथा सूखे के प्रति अवरोधता प्राप्त होती है।
रनऑफ कम होता है जिसके परिणामस्वरूप पानी नालों में तेजी से बहकर व्यर्थ नहीं जाता है और इसके साथ ही सड़कों या पार्कों आदि में भी वर्षों के दौरान पानी नहीं भरता है।
भू-जल की गुणवत्ता में सुधार होता है।
मृदा कटाव में कमी आती है तथा भू-जल को ऊपर उठाने (लिफ्ट करने) में ऊर्जा की बचत होती है जल के तल में एक मीटर की वृद्धि होने से लगभग 0:40 कि.वा. बिजली की बचत होती है ।
भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का चयन करते समय निम्नलिखित पर ध्यान देना चाहिए -
संरचनाओं का चयन भूगर्भीय स्थिति को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
सतही अपवाह का आंकलन अवश्य करें, ऐसा करने से सही क्षमता का अनुमान लग जाता है, जो आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
घरों और कल-कारखानों से निकलने वाले जल का पुनर्भरण के लिए प्रयोग करने से पहले गुणवत्ता सुनिश्चित करें। यदि जल की गुणवत्ता खराब है तो उचित प्रबंधन पद्धति को अपनाना चाहिए।
नलकूपों द्वारा पुनर्भरण में, छानक पर्तों का सही निर्धारण करें।
यदि आवश्यक हो तो एक साथ कई प्रकार की संरचनाएं बनाएं।
शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन -
शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचित करने के लिए निम्नलिखित तकनीकों का प्रयोग किया जा सकता है-
पुनर्भरण गड्ढा (Recharge pit)
पुनर्भरण खाई (Recharge Trench)
नलकूप (Tube well)
पुनर्भरण कूप (Recharge well)
ग्रामीण क्षेत्रों (Rural Areas) के लिए -
ग्रामीण क्षेत्रा में सामान्यतया सतही फैलाव की तकनीक अपनाई जाती है क्योंकि यहां जगह प्रचुरता से उपलब्ध होती है। ढलान, नदियों तथा नालों के माध्यम से व्यर्थ जा रहे वर्षा जल को यचाने के लिए निम्नलिखित संरचनाओं का प्रयोग किया जा सकता है-
परिश्रवण टैंक (Percolation Tank)
चेक बांध (Check Dam)/सीमेंट प्लग (Cement Plug)/ नाला बंध (Nala Bund)
पुनर्भरण शाफ्ट (Recharge Shaft)
कूप पुनर्भरण (Dugwell Recharge)
भूमिगत जल बांध (Groundwater Dams)/ उपसतही डाईक (Subsurface Dyke)
पुनर्भरण खाई द्वारा छत से प्राप्त वर्षा जल का संचयन -इस तकनीक में छत के वर्षा जल को खाई के माध्यम से फिल्टर कर जमीन में पहुंचाकर भूजल रिचार्ज किया जाता है।
मौजूदा नलकूप द्वारा छत से प्राप्त वर्षा जल का संचयन - छत के वर्षा जल को फिल्टर करके पुराने नलकूपों के जरिए गहरे जलभृतों तक पहुंचाया जाता है।
पुनर्भरण कुओं के साथ खाई द्वारा छत से प्राप्त वर्षा जल का संचयन - खाई और पुनर्भरण कुओं की मदद से अधिक मात्रा में वर्षा जल को भूमिगत जलभृतों तक पहुंचाया जाता है।
गली प्लग द्वारा वर्षा जल संचयन - छोटे नालों पर मिट्टी और पत्थरों की रुकावट बनाकर पानी और मिट्टी का संरक्षण किया जाता है।
परिरेखा बाँध द्वारा वर्षा जल संचयन - ढलान वाली जमीन पर कंटूर के अनुसार बांध बनाकर वर्षा जल और मिट्टी की नमी को रोका जाता है।
गैवियन संरचना द्वारा वर्षा जल संचयन - पत्थरों और लोहे की जाली से बने छोटे बांध जलधाराओं के बहाव को रोककर भूजल रिचार्ज में मदद करते हैं।
भूजल कृत्रिम पुनर्भरण
भूजल के कृत्रिम पुनर्भरण का मुख्य उद्देश्य वर्षा जल को विभिन्न प्रकार की संरचनाओं के माध्यम से होकर भूजल स्तर तक ले जाना होता है। ऐसा करने से सतही अपवाह जो बहकर अन्यत्र चला जाता है उसे कम किया जा सकता है जिससे भूजल स्तर में वृद्धि होती है। कृत्रिम पुनर्भरण द्वारा मृदा के कटाव एवं सूखे के प्रभाव को कम किया जा सकता है।
ट्यूबवेल पुनर्भरण का फसल आच्छादन पर प्रभाव
भरतपुर के तीन गांवों-सितारा, सहेंती एवं मुकुंदपुरा में ट्यूबवेल पुनर्भरण परियोजना पर कार्य किया गया। इसका अत्यधिक सकारात्मक प्रभाव पड़ा। परियोजना क्रियान्वयन से पहले (वर्ष-2012) तीन गांवों का फसल आच्छादन केवल 303 हेक्टेयर था, जो ट्यूबवेल पुनर्भरण के बाद वर्ष 2020 में बढ़कर 418 हेक्टेयर हो गया। इसमें लगभग 38 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गयी।
भरतपुर जिले के सितारा गांव में कुल 250 ट्यूबवेल पुनर्भरण संरचनाएं सफलतापूर्वक निर्मित हो चुकी हैं। सहेंती और मुकुंदपुरा गांवों के किसानों ने भी इस कम लागत वाली तकनीक (वर्ष 2017 से वर्ष 2020) को अपनाया है।
पुनर्भरण से उपलब्ध भूजल (8-10 फीट) के कारण रबी मौसम की फसलों की उपज में हानि को 90 प्रतिशत तक कम कर दिया है। इससे किसान सरसों के अलावा गेहूं, जौ और सब्जियों की खेती कर पा रहे हैं। एकत्रित हुए जल से किसानों को सितंबर में वर्षा नहीं होने पर रबी फसलों की बुआई के लिए खेतों की पूर्व सिंचाई करने में मदद मिली। इस तकनीक को अपनाने से जलस्तर में (2.5 से 4.0 मीटर) सार्थक वृद्धि हुई और लगभग 4000 क्यूबिक मीटर वर्षाजल एकत्र हुआ जो लगातार ट्यूबवेलों में पहुंचाया गया।
गेहूं पर प्रभाव
वर्ष 2017-18 से वर्ष 2020-21 के दौरान 326.24 हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की फसल पर 498 प्रदर्शनों का आयोजन किया गया। पुनर्भरण तकनीक अपनाने से किसानों के पास 6 सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध हो सका। इससे गेहूं की उपज में 42 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। गेहूं (राज-4238) के प्रदर्शनों से शुद्ध लाभ39600 से 56480 रुपये प्रति हैक्टर प्राप्त हुआ तथा औसत आय 45222 रुपये प्रति हैक्टर प्राप्त हुई।
जौ पर प्रभाव
वर्ष 2017-18 से वर्ष 2020-21 के दौरान 53.16 हैक्टर में जौ की फसल पर 102 प्रदर्शनों का आयोजन किया गया। पुनर्भरण तकनीक अपनाने से किसानों का 5 सिंचाई का अतिरिक्त जल उपलब्ध हो सका। इससे जौ की उपज में 35.20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। जौ (आरडी 2794) के प्रदर्शनों से शुद्ध लाभ 35820 से 44880 रुपये प्रति हैक्टर प्राप्त हुआ तथा औसत आय 38842.5 रुपये प्रति हैक्टर प्राप्त हुई।
सरसों का प्रभाव
वर्ष 2017-18 से वर्ष 2020-21 के दौरान 224.62 हैक्टर क्षेत्र में सरसों की फसल पर 560 प्रदर्शनों का आयोजन किया गया। पुनर्भरण तकनीक अपनाने से किसानों को 4 सिंचाई का अतिरिक्त जल उपलब्ध हो सका जिससे सरसों की उपज में 45-50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई। सरसों (डीआरएमआरआईजे-31) के प्रदर्शनों से शुद्ध लाभ 61500 से 117500 रुपये प्रति हैक्टर प्राप्त हुआ तथा औसत आय 81650 रुपये प्रति हैक्टर प्राप्त हुई।
कम लागत वाली ट्यूबवेल पुनर्भरण तकनीक से भूजल की गुणवत्ता में सुधार हुआ। यह प्रणाली सिंचाई लागत, मृदा की लवणता को कम करने में उपयोगी साबित हुई। इस सफल तकनीक से सिंचित क्षेत्र में वृद्धि हुई है और साथ ही गेहूं, जौ और सरसों की उपज में क्रमशः 42.00 और 45.50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस तकनीक ने कृषक समुदाय के बीच जागरूकता पैदा की और जल की कमी की समस्या को हल करने में काफी मददगार साबित हुई।
उपज एवं आय
ट्यूबवेलों के सफल पुनर्भरण (वर्ष 2012 में 38 से वर्ष 2022 में 250 तक) के कारण 63 हैक्टर क्षेत्र (गेहूं, जौ और सरसों) में रबी फसलों में दो से तीन सिंचाइयों के लिए अतिरिक्त पानी उपलब्ध हुआ और उपज में होने वाली हानि 90 प्रतिशत तक कम हुई।
निक्रा द्वारा अपनाए गए और आसपास के गांवों में रबी फसलों का क्षेत्रफल वर्ष 2012 में 76 हैक्टर से बढ़कर वर्ष 2022 में 1283 हैक्टर हो गया। इससे 780 किसानों को लाभ हुआ। भूजल की गुणवत्ता में (ई.सी. 9.5 से 5.96 और पी-एच 7.49 से 7.06) भी सुधार हुआ। गेहूं, जौ और सरसों की पैदावार में क्रमशः 42.00, 35.20 और 45.50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
तकनीक का प्रभाव
जलस्तर में 8-10 फीट तक की वृद्धि हुई। संग्रहित जल का उपयोग सूखे के दौरान सिंचाई के लिए और रबी फसलों में बुआई से पहले सिंचाई के लिए उपयोग में लिया जाता है। बागवानी फसल के साथ फसल विविधीकरण जैसे-बेर की किस्म थाई एप्पल आदि। जल पुनर्भरण संरचनाओं के निर्माण से किसानों को गेहूं, जौ, सरसों और सब्जियां उगाने का अवसर मिला। अपनाई गई तकनीक से सिंचाई की लागत में कमी हुई, ट्यूबवेलों का पुनर्भरण हुआ। सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता बढ़ी। इसके परिणामस्वरूप किसानों ने सरसों की फसल के साथ सब्जियों, गेहूं और जौ को भी फसलचक्र में सम्मिलित किया।
जलवायु परिवर्तनशीलता में कारगर
कम लागत वाली जल पुनर्भरण संरचनाओं (रिचार्ज ट्यूबवेल) के निर्माण ने गेहूं, जौ, सरसों और सब्जियां उगाने का अतिरिक्त अवसर प्रदान किया। इसके साथ ही इस तकनीक से किसानों ने सूखा प्रतिरोधी किस्में, कैंचा (हरी खाद के लिए), अंतःफसल प्रणाली, बुआई तकनीक, भूमि स्वरूप, उच्च उपज देने वाली चारे की खेती आदि को अपनाया। इससे किसानों की आय में वृद्धि हुई और उन्नत किस्मों के किसान-से-किसान बीज विनिमय में काफी बढ़ोत्तरी हुई।
तकनीक का प्रसार
कम लागत वाली ट्यूबवेल पुनर्भरण तकनीक को सिंचाई लागत को कम करने में बहुत उपयोगी पाया गया। राजस्थान के भरतपुर के गांवों में अधिकांश किसानों (780) ने इसे अपनाया। इससे भूजल की गुणवत्ता में सुधार के कारण मृदा की लवणता में भी कमी आई। इसके फलस्वरूप गेहूं, जौ और सरसों की फसलों के अलावा सब्जियों को उगाने में भी सफलता प्राप्त हुई।
कम लागत वाली ट्यूबवेल पुनर्भरण तकनीक भूजल स्तर बढ़ाने और पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने का एक सरल और प्रभावी तरीका है। इसमें ट्यूबवेल के आसपास एक पुनर्भरण गड्ढा या संरचना बनाई जाती है, जिसमें बारिश का पानी एकत्र किया जाता है।
यह पानी मिट्टी और फिल्टर सामग्री (जैसे बजरी, रेत) से छनकर भूजल स्तर को रिचार्ज करता है। इस तकनीक से पानी की गुणवत्ता बेहतर होती है और सिंचाई व पीने के पानी की समस्या कम होती है। यह किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए किफायती और टिकाऊ समाधान प्रदान करती है।
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