अब विशेषज्ञों की नई समिति तय करेगी अरावली पहाड़ की परिभाषा : जगी नई उम्मीद
केवल 100 मीटर या इससे ऊंचे पहाड़ों को ही अरावली पहाड़ मानने की परिभाषा पर जताई जा रही चिंताओं और बढ़ते विरोध के बाद इस मामले में एक राहत भरी ख़बर आई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश पर रोक लगाते हुए अरावली की परिभाषा तय करने के लिए एक नई समिति के गठन का आदेश दिया है। इससे अरावली को बचाने के लिए आवाज़ उठाने वाले लोगों और संगठनों, खासकर 'अरावली बचाओ' मुहिम चलाने वालों में उम्मीद की एक नई किरण जगी है।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 दिसंबर को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए को अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में बदलाव से जुड़े अपने पहले के निर्देशों पर रोक लगाई। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने कहा कि रिपोर्ट या कोर्ट के निर्देशों को लागू करने से पहले और स्पष्टीकरण की ज़रूरत है। कोर्ट के नए आदेश की ख़ास बात यह है कि नई समिति में एक तिहाई सदस्य सरकारी अधिकारी, एक तिहाई विशेषज्ञ और एक तिहाई लोग वे शामिल होंगे, जो अरावली बचाने में लंबे समय से जुटे हैं।
यह स्वतः संज्ञान मामला इस चिंता के बाद शुरू किया गया था कि अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में हाल में हुए बदलाव के चलते इसके 90% से ज़्यादा पहाड़ बिना रोक-टोक खनन और निर्माण की छूट के दायरे में आ सकते हैं, क्योंकि वर्तमान में अरावली के केवल 8.5% पहाड़ ही 100 मीटर या उससे ज़्यादा ऊंचे हैं। इस बारे में पढ़ें हमारी विस्तृत रिपोर्ट अरावली के पहाड़ अब क्यों नहीं रहे 'पहाड़’ मानकों की आड़ में दिल्ली हो न जाए उजाड़?और क्या है अरावली पहाड़ के होने का मतलब, जो न होता तो क्या होता ?
सुप्रीम कोर्ट ने अब क्या कहा?
कोर्ट ने यह चिंता जताई कि एक्सपर्ट कमेटी की रिपोर्ट और कोर्ट की टिप्पणियों को गलत समझा जा रहा है। कोर्ट ने कहा, "हमारा मानना है कि कमेटी की सिफारिश और इस कोर्ट के निर्देशों पर रोक लगाना ज़रूरी है। कमेटी के गठन तक रोक जारी रहेगी।" कोर्ट ने कहा कि 100 मीटर की परिभाषा ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा ने एक संरचनात्मक विरोधाभास पैदा किया। इसने अप्रत्यक्ष रूप से गैर-अरावली क्षेत्रों का दायरा बढ़ाने और बिना रोक-टोक खनन की भी आशंका पैदा की है, जिससे पर्यावरण को नुकसान हो सकता है। इसलिए इस मामले में निश्चित मार्गदर्शन देने के लिए एक निष्पक्ष, तटस्थ और स्वतंत्र विशेषज्ञ की राय पर विचार किया जाना चाहिए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कोर्ट ने रिपोर्ट का गहराई से मूल्यांकन करने और इन सवालों की जांच करने के लिए एक उच्च-शक्ति वाली विशेषज्ञ समिति गठित करने ज़रूरत है। प्रस्तावित प्रक्रिया में उन क्षेत्रों की विस्तृत पहचान भी शामिल होगी, जिन्हें अरावली क्षेत्र से बाहर रखा जाएगा और इस बात का आकलन किया जाएगा कि क्या इससे अरावली पर्वतमाला की पारिस्थितिक अखंडता को नुकसान और समझौता हो सकता है। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सीनियर एडवोकेट पीएस परमेश्वर से प्रस्तावित कमेटी की संरचना सहित मामले में कोर्ट की मदद करने का अनुरोध किया। मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 जनवरी 2026 की तारीख तय की गई है।
बेंच ने कुछ खास चिंताओं का भी जि़क्र किया है, जिसमें यह भी शामिल है कि क्या पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के गैप में नियंत्रित खनन की अनुमति दी जाएगी। अगर हां, तो यह सुनिश्चित करने के लिए किन मापदंडों का उपयोग किया जाएगा कि इससे पारिस्थितिक निरंतरता से समझौता न हो। कोर्ट ने कहा कि यह तय किया जाना चाहिए कि क्या यह चिंता कि 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा को पूरा करती हैं, तथ्यात्मक और वैज्ञानिक रूप से सही है, और क्या भूवैज्ञानिक जांच ज़रूरी है। अदालत ने कहा कि उसका मानना है कि अंतिम फैसला लेने से पहले सभी पहलुओं पर गहन विचार और विशेषज्ञों की राय को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि अरावली पर्वतमाला का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।
कैसा होगा नई समिति का स्वरूप
सुप्रीम कोर्ट ने जिस उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति के गठन का आदेश दिया है, उसमें पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC), भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI), भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI), संबंधित राज्यों के वन विभाग तथा केंद्र सरकार के अन्य तकनीकी संस्थानों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा। कोर्ट ने जिन लोगों/संस्थाओं को समिति में शामिल करने का आदेश दिया, उनके व्यक्तिगत नाम आदेश में नहीं लिखे गए हैं, बल्कि केवल पदनाम (designation) तय किए गए हैं। कोर्ट के आदेश के अनुसार नई समिति में ये सदस्य शामिल किए गए जाएंगे—
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) का प्रतिनिधि
भारतीय वन सर्वेक्षण (Forest Survey of India – FSI) का वरिष्ठ अधिकारी
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India – GSI) का प्रतिनिधि
राजस्थान, हरियाणा, गुजरात और दिल्ली — इन चारों राज्यों के वन विभागों के प्रधान सचिव / प्रमुख वन संरक्षक (PCCF)
केंद्र सरकार द्वारा नामित विशेषज्ञ सदस्य, जिनका कार्य तकनीकी और वैज्ञानिक सलाह देना है
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कौन-सा अधिकारी नामित होगा, यह संबंधित विभाग तय करेंगे। इसलिए आदेश में किसी व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि केवल पद और संस्थागत प्रतिनिधित्व दर्ज किया गया है। इस मामले में कोर्ट ने जानबूझकर किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं लिया है। यह बात बहुत स्पष्ट रूप से आदेश में दर्ज है।
अदालत ने व्यक्तियों के बजाय श्रेणियां (categories) तय की हैं, ताकि समिति राजनीतिक या संस्थागत दबाव से मुक्त रह सके।
कोर्ट के आदेश के अनुसार, इस समिति को अरावली पर्वतमाला की वैज्ञानिक, भौगोलिक और पारिस्थितिक परिभाषा तय करने, उसकी वास्तविक सीमा चिह्नित करने और यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी दी गई कि किन क्षेत्रों को कानूनी रूप से “अरावली क्षेत्र” माना जाना चाहिए। साथ ही समिति को यह भी देखना है कि अरावली से जुड़े संरक्षण कानूनों का पालन कैसे हो, ताकि अवैध खनन, निर्माण और पर्यावरणीय क्षरण पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।
समिति की संरचना
स्वतंत्र विशेषज्ञ (एक-तिहाई) : इनमें पर्यावरण विज्ञान, भूविज्ञान, पारिस्थितिकी, वन प्रबंधन से जुड़े मान्यता प्राप्त विशेषज्ञ शामिल होंगे। ख़ास बात यह है कि यह विशेषज्ञ किसी सरकारी पद पर कार्यरत नहीं होंगे।
वर्षों से अरावली संरक्षण में सक्रिय लोग (एक-तिहाई) : इसमें पर्यावरण कार्यकर्ता, शोधकर्ता, सामाजिक संगठन या संस्थाएं शामिल होंगी, जिन्होंने अरावली के संरक्षण, अवैध खनन के खिलाफ संघर्ष, या पर्यावरणीय अध्ययन में ठोस कार्य किया हो।
सरकारी अधिकारी (एक-तिहाई) : इसमें केंद्र और राज्यों के पर्यावरण, वन, भूविज्ञान विभागों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा।
महत्वपूर्ण बात: नई समिति में तीनों का संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने को कहा गया है।सुप्रीम कोर्ट ने जानबूझकर किसी व्यक्ति (जैसे किसी NGO प्रमुख या वैज्ञानिक) का नाम नहीं लिया, ताकि चयन को लेकर कोई सवाल न उठें। नामों का चयन न्यायालय की निगरानी में ही किया जाना है।
नए आदेश की कुछ ख़ास बातें
नई समिति को यह भी देखना होगा कि किन क्षेत्रों में अवैध खनन, निर्माण और भूमि उपयोग परिवर्तन हुआ है और उसके पर्यावरणीय प्रभाव क्या हैं।
अदालत ने निर्देश दिया कि राज्य सरकारें समिति को पूरा सहयोग दें और आवश्यक डेटा, नक्शे व रिकॉर्ड उपलब्ध कराएं।
रिपोर्ट तैयार होने तक अरावली क्षेत्र में किसी भी नए गैर-आवश्यक निर्माण या गतिविधि पर सतर्कता बरतने को कहा गया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल राजस्व रिकॉर्ड या पुराने नक्शों के आधार पर अरावली की सीमा तय नहीं की जा सकती, बल्कि भूवैज्ञानिक और पारिस्थितिक आधार अपनाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अरावली की सुरक्षा पर्यावरणीय जिम्मेदारी है, न कि केवल प्रशासनिक औपचारिकता।
समिति को यह भी जांचने का निर्देश दिया गया है कि किन क्षेत्रों में अरावली की प्राकृतिक संरचना को जानबूझकर बदला गया और इसके लिए कौन जिम्मेदार रहा।
अदालत ने माना कि बीते वर्षों में अलग–अलग राज्यों द्वारा अरावली की अलग-अलग व्याख्याएं की गईं, जिससे संरक्षण प्रयास कमजोर पड़े।
समिति को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वह भविष्य में अरावली क्षेत्र में भूमि उपयोग से जुड़े स्पष्ट मानक सुझाए, ताकि कानूनी अस्पष्टता खत्म हो सके।
कोर्ट ने संकेत दिया कि रिपोर्ट के आधार पर खनन, रियल एस्टेट और औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े नियमों की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।
आदेश में यह भी कहा गया कि पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई और पुनर्स्थापन (restoration) को नीति का हिस्सा बनाया जाए, न कि केवल रोक-टोक तक सीमित रहा जाए।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि अरावली का संरक्षण केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि जलवायु, सार्वजनिक स्वास्थ्य और भविष्य की पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा विषय है।
राजेंद्र सिंह ने लिखा था CJI को पत्र
अरावली के मामले में 'वाटरमैन ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर पर्यावरणविद् और सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को एक पत्र लिख कर 100 मीटर वाली परिभाषा पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था। सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान पर संतोष जताते हुए उन्होंने ईटीवी भारत से बातचीत में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने पूर्व के आदेश पर स्थगन आदेश जारी कर नई विशेषज्ञ समिति बनाने का आदेश दिया, जो अरावली के तकनीकी पहलू की जांच कर समीक्षा करेगी। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय स्वागत योग्य है। अरावली बचाने में जुटे लोगों की जीत है. इस निर्णय से अरावली को बचाने में जुटे लोगों की बात रखने का मौका मिल सकेगा।
राजेन्द्र सिंह ने कहा कि अरावली केवल पहाड़ और पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि उसका अपना ही एक इको सिस्टम है। अरावली भारत की प्रकृति और संस्कृति की एक बड़ी विरासत है। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि आने वाली पीढ़ी को इस विरासत को उसी रूप में सौंपें, जिसमें यह हमें मिली थी। इसके लिए हमारा कर्तव्य है कि हमारे समय में अरावली को ज्यादा नुकसान नहीं होने दें।
इसके लिए अरावली में किसी भी प्रकार का खनन नहीं होना चाहिए। इसमें जंगल, वन्य जीव, नदियां, तालाब और पानी बने रहना चाहिए। अरावली के आर्थिक महत्व का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जब तक अरावली में खनन नहीं था, तब भारत की जीडीपी बेहतर थी, क्योंकि एक बड़े इलाक़े के लोग सांस्कृतिक परंपराओं का पालन और प्रकृति की रक्षा करते हुए अपना पालन-पोषण कर रहे थे। पर, अरावली की 100 मीटर ऊंचाई वाली परिभाषा से इसके नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया था।
उन्होंने कहा कि अरावली हल्की ढलानों और चढ़ाइयों वाली पहाड़ियों का एक कोमल पारिस्थितिकी तंत्र है। हवाओं, मानसून, भूजल भंडार, जल संचयन प्रणालियां, वनस्पति, वन, वन्यजीव और जैव विविधता ने लाखों वर्षों में इसे आकार दिया है। यही जैव विविधताएं इसे विशिष्ट बनाती हैं और इसे बनाए रखती हैं। अरावली को समझने के आधार भू-आकृति विज्ञान, की ज़रूरत है। अरावली की परिभाषा भू-आकृति विज्ञान और भारतीय ज्ञान प्रणाली की मूल भावना को समझकर ही दी जा सकती है। यह काम 100 मीटर, 50 मीटर की ऊंचाई जैसे सरलीकृति भौतिक मापदंडों के आधार पर नहीं किया जा सकता।
अरावली के महत्व से जुड़ी कुछ खास बातें
1. कार्बन स्टोरेज क्षमता पर नया आकलन : फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) और IIT (दिल्ली, गांधीनगर व कानपुर) के हालिया अध्ययनों के अनुसार अरावली की वनस्पति और मिट्टी प्रति हेक्टेयर 60–80 टन तक कार्बन स्टोर करने की क्षमता रखती है। इस कारण अरावली को जलवायु परिवर्तन से लड़ने वाला प्राकृतिक कार्बन सिंक माना जाता है।
2. “डेज़र्टिफिकेशन हॉटस्पॉट” की पहचान : हालिया अध्ययन में पाया गया कि अरावली के कई हिस्से अब डेज़र्टिफिकेशन हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं, खासकर हरियाणा–राजस्थान सीमा पर। यही कारण है कि अरावली को अब केवल पहाड़ी नहीं, बल्कि मरुस्थलीकरण रोकने वाली एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक ढाल माना जा रहा है।
3. भूजल गिरावट की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक : हालिया जल अध्ययन दर्शाते हैं कि अरावली क्षेत्र के कई ब्लॉकों में भूजल स्तर हर साल 1–1.5 मीटर तक गिर रहा है, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इसका सीधा संबंध अरावली के क्षरण और प्राकृतिक रिचार्ज संरचनाओं के नष्ट होने से जोड़ा जा रहा है।
4. जैव विविधता का “संक्रमण क्षेत्र” (Ecotone) : वैज्ञानिक रूप से अरावली को दो जैव-भौगोलिक क्षेत्रों, शुष्क मरुस्थल और अर्द्ध-आर्द्र मैदान के बीच का संक्रमण क्षेत्र माना जाता है। क्योंकि यहां रेगिस्तानी, अर्ध-वन और मैदानी तीनों प्रकार की प्रजातियां एक साथ पाई जाती हैं, जो इसे जैविक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील बनाती हैं।
5. शहरीकरण के दबाव में सबसे ज़्यादा क्षतिग्रस्त पर्वतमाला : अध्ययन के अनुसार, अरावली देश की उन पर्वतमालाओं में शामिल है जहाँ सबसे तेज़ी से भूमि उपयोग परिवर्तन (Land Use Change) हुआ है, खासतौर पर गुरुग्राम, फरीदाबाद, अलवर और जयपुर क्षेत्र में। इसी कारण यह शहरीकरण के दबाव से देश में सबसे ज़्यादा क्षतिग्रस्त होने वाली पर्वतमाला बन गई। सुप्रीम कोर्ट को भी कई बार इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा है।

