अपने विशाल जल भंडार के कारण भाखड़ा नांगल बांध उत्तर भारत के लिए बिजली उत्पादन, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
स्रोत : विकी कॉमंस
भाखड़ा नांगल और पौंग बांध पर मंडराते खतरे को देख सरकार हुई अलर्ट, डैम में आए झुकाव के बाद BBMB ने लिया यह बड़ा फैसला
जल क्षमता के हिसाब से देश के सबसे बड़े बांध भाखड़ा नांगल डैम और पड़ोस के कांगड़ा जिले में स्थित पौंग बांध समूचे उत्तर भारत की बिजली सप्लाई का एक मजबूत आधार माने जाते हैं। पर, महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाओं को चलाने वाले यह दोनों ही बांध कई वर्षों से गाद (Silt) के भारी जमाव की समस्या से जूझ रहे हैं, जिससे इनकी जलभंडारण क्षमता और बिजली उत्पादन दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं। अच्छी खबर यह है कि इन बांधों को अब इस समस्या से मुक्ति मिलने वाली है। इन बांधों की देखरेख करने वाले भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) ने बांधों के तल में दशकों से जमी गाद को हटाने के लिए दोनों बांधों के जलाशयों में डीप ड्रेजिंग का निर्णय लिया है। इस काम के लिए बोर्ड ने अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से प्रस्ताव मांगे हैं।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष पानी के दबाव के कारण भाखड़ा बांध में झुकाव सामान्य स्तर से 1.03 इंच से अधिक दर्ज किया था। इसका कारण तल पर जमी गाद के बांध पर बढ़ते दबाव को माना गया था। केंद्र और पंजाब सरकार ने बीबीएमबी से रिपोर्ट इसपर मांगी थी और कारगर कदम उठाने के निर्देश दिए थे।गाद के चलते बांध के स्ट्रक्चर पर पैदा हुए खतरे को भांपते हुए बीबीएमबी ने बीएसएल प्रोजेक्ट को पानी की आपूर्ति रोक कर लगभग एक माह के लिए बंद कर दिया था। बांध का जलस्तर 1673.24 फीट से घटाकर 1650 फीट तक लाया गया था। 25 फरवरी 2026 को बीबीएमबी ने दोनों बांधों की सुक्षित करने के लिए आइआइटी रुड़की के साथ तकनीकी सहायता के लिए करार किया था।
किस तकनीक से निकाली जाएगी भारी-भरकम गाद ?
सतलुज नदी पर बना भाखड़ा बांध (1963) और ब्यास नदी पर बना पौंग बांध (1975) उत्तर भारत की सिंचाई, जलविद्युत और बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं, लेकिन दशकों से इन जलाशयों में जमा हो रही गाद उनकी उपयोगी क्षमता को लगातार कम कर रही है। हिमालयी नदियां अपने साथ बड़ी मात्रा में सिल्ट, रेत, महीन मिट्टी और चट्टानी कण बहाकर लाती हैं, जो बांधों के तल में बैठते जाते हैं। यही तलछट धीरे-धीरे जलाशय की लाइव स्टोरेज क्षमता को कम करती है। हाल के वर्षों में भाखड़ा बांध क्षेत्र में संरचनात्मक झुकाव और तलछट दबाव को लेकर बढ़ी चिंताओं के बाद भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) ने आधुनिक ड्रेजिंग, हाइड्रो-सक्शन, मैकेनिकल स्लज रिमूवल और तलछट प्रबंधन जैसी उन्नत तकनीकों के उपयोग की दिशा में कदम बढ़ाया है। इसके लिए विशेषज्ञ कंपनियों से प्रस्ताव मांगे गए हैं, ताकि दशकों से जमी तलछट को वैज्ञानिक तरीके से हटाया जा सके। उद्देश्य केवल गाद निकालना नहीं, बल्कि बांधों की मूल डिजाइन क्षमता, जलधारण दक्षता और दीर्घकालिक सुरक्षा को बहाल करना है। बांध की सफाई और देखरेख के लिए अपनाई जाने वाली इन तकनीकों को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-
आधुनिक ड्रेजिंग (Modern Dredging) : इस तकनीक में विशेष ड्रेजर मशीनों की मदद से जलाशय के तल में जमी गाद, रेत और तलछट को यांत्रिक रूप से खोदकर बाहर निकाला जाता है। यह बड़े जलाशयों में भारी मात्रा में जमा सिल्ट हटाने के लिए उपयोगी मानी जाती है। निकाली गई तलछट को तय स्थानों पर डंप या पुन: उपयोग के लिए प्रोसेस किया जा सकता है।
हाइड्रो-सक्शन (Hydro-Suction Sediment Removal System) : इसमें जलाशय के भीतर मौजूद पानी के दबाव और ऊंचाई के अंतर का उपयोग कर पाइपलाइन के जरिए तलछट को बिना बड़े बाहरी ऊर्जा स्रोत के बाहर निकाला जाता है। यह अपेक्षाकृत कम ऊर्जा खर्च वाली तकनीक मानी जाती है। गहरे जलाशयों में तल की महीन गाद हटाने में यह विशेष रूप से प्रभावी हो सकती है।
मैकेनिकल स्लज रिमूवल (Mechanical Sludge Removal) : इस प्रक्रिया में पंप, कन्वेयर, एक्सकेवेटर या विशेष मशीनों से जमा स्लज और भारी तलछट को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाता है। जहां तलछट अधिक सघन या ठोस रूप में जमा हो, वहां यह तकनीक उपयोगी होती है। इसका प्रयोग अक्सर सीमित क्षेत्रों या संरचनात्मक रूप से संवेदनशील हिस्सों में किया जाता है।
तलछट प्रबंधन (Sediment Management) : यह केवल गाद हटाने तक सीमित नहीं, बल्कि कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट, फ्लशिंग, बाईपास चैनल और अपस्ट्रीम कटाव नियंत्रण जैसी समग्र रणनीतियों का हिस्सा है। इसका उद्देश्य जलाशय में नई गाद की आवक कम करना और मौजूदा स्टोरेज क्षमता को लंबे समय तक बनाए रखना है। दीर्घकालिक दृष्टि से इसे सबसे टिकाऊ समाधान माना जाता है।
भाखड़ा नांगल बांध के तल में भारी मात्रा में गाद के जमाव के कारण डैम एक हिस्से में झुकाव देखने को मिल रहा था, जिसे देखते हुए BBMB ने गाद की सफाई का फैसला किया है।
स्रोत : विकी कॉमंस
कितनी गाद आ रही हर साल ?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भाखड़ा जलाशय में हर वर्ष लगभग 35 से 40 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) गाद जमा हो रही है, जबकि पौंग बांध में यह मात्रा लगभग 25 MCM तक पहुंच रही है। यह स्थिति इसलिए गंभीर है क्योंकि दोनों बांध हिमालयी कैचमेंट क्षेत्रों से जुड़े हैं, जहां भूस्खलन, कटाव, अनियंत्रित निर्माण और मानसूनी बहाव के कारण तलछट भार लगातार बढ़ रहा है। इतनी बड़ी मात्रा में जमा होने वाली गाद जलाशयों की संग्रहण क्षमता को कम करती है, जिससे बिजली उत्पादन के लिए उपलब्ध जलस्तर प्रभावित होता है। साथ ही सिंचाई के लिए छोड़े जाने वाले पानी की दीर्घकालिक योजना पर दबाव बढ़ता है। बाढ़ नियंत्रण क्षमता में कमी भी एक बड़ा जोखिम है, क्योंकि कम स्टोरेज स्पेस होने पर असाधारण वर्षा या फ्लैश फ्लड की स्थिति में जल प्रबंधन चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सिल्टेशन की यह दर नियंत्रित नहीं हुई तो आने वाले दशकों में जलाशयों की कार्यक्षमता और आर्थिक उपयोगिता दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
कैसे होगी क्रिटिकल जोन में ड्रेजिंग ?
भाखड़ा और पौंग जलाशयों में गाद निकासी की सबसे जटिल चुनौती उनकी अत्यधिक गहराई और तल पर जमा कठोर तलछट है। भाखड़ा बांध में लगभग 1500 फीट और पौंग बांध में करीब 1300 फीट से नीचे के क्रिटिकल जोन ऐसे क्षेत्र माने जा रहे हैं, जहां दशकों से जमा गाद उच्च जलदाब, सीमित दृश्यता और कठिन भू-आकृतिक परिस्थितियों के कारण सामान्य ड्रेजिंग तकनीकों से निकालना बेहद कठिन है। इसी वजह से BBMB ऐसी अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ एजेंसियों और तकनीकी कंपनियों की तलाश में है, जिनके पास गहरे जलाशयों में काम करने वाले रोबोटिक या रिमोट-ऑपरेटेड ड्रेजिंग सिस्टम उपलब्ध हों। इसमें उच्च दबाव सहने वाले रिमोट कंट्रोल उपकरण, सोनार आधारित तल सर्वेक्षण प्रणाली, और कठोर या संपीड़ित गाद (Compressed silt) को काटकर बाहर निकालने वाले कटर सक्शन ड्रेजर जैसी उन्नत मशीनें शामिल हैं। विशेष ध्यान इस बात पर भी है कि पौंग जलाशय, जो पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील वेटलैंड और पक्षी आवास क्षेत्र माना जाता है, वहां गाद निकासी से जैव विविधता, जल गुणवत्ता या पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित न हो। इसलिए तकनीकी दक्षता के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा इस पूरी परियोजना की मुख्य शर्त होगी।
भाखड़ा नांगल बांध के बारे में कुछ खास बातें
हिमाचल प्रदेश और पंजाब में सतलज नदी पर स्थित भाखड़ा नांगल बांध भारत की बेहतरीन हाइड्रो व सिविल इंजीनियरिंग की एक बेहतरीन मिसाल है। 226 मीटर (741 फीट) ऊंचा यह बांध भारत के सबसे ऊंचे बांधों में से एक है। जल भंडारण क्षमता की दृष्टि से यह देश का सबसे बड़ा बांध है। यह बांध उत्तरी भारत में सिंचाई, जलविद्युत उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बांध सतलज नदी के पानी को रोक कर गोविंद सागर जलाशय का निर्माण करता है, जो कृषि सिंचाई के लिए, विशेष रूप से गर्मी के मौसम के दौरान, महत्वपूर्ण है। इस जल भंडार के ज़रिये ही भाखड़ा नांगल विद्युत स्टेशन 1,300 मेगावाट से अधिक बिजली उत्पन्न करता है, जो उत्तर भारत के कई राज्यों को बिजली की आपूर्ति करता है। इसके अलावा यह बांध मानसून के मौसम में बाढ़ के खतरे को नियंत्रित करने में मदद करता है, जिससे निचले इलाकों में जान और माल की रक्षा होती है। इसके चलते भाखड़ा नांगल बांध को न केवल पंजाब और हरियाणा, बल्कि पूरे उत्तर भारत के कृषि क्षेत्रों के लिए जीवन रेखा के रूप में देखा जाता है। इस प्रकार भाखड़ा नांगल बांध महज एक डैम नहीं, बल्कि यह देश के जल संसाधन का एक मजबूत ढांचा है। भाखड़ा बांध की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं -
ऊंचाई : 226 मीटर (741 फीट)
जल क्षमता : 9,340 मिलियन घन मीटर (गोबिंद सागर जलाशय)
स्थापित विद्युत क्षमता : 1,325 मेगावाट
सिंचाई के लाभ : पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में 1 करोड़ हेक्टेयर से अधिक भूमि की सिंचाई में सहायता करता है।
निर्माण अवधि : 1948 से 1963
पर्यटन : यह जलाशय नौका विहार और मछली पकड़ने जैसी गतिविधियों के लिए लोकप्रिय है, जो हर साल कई पर्यटकों को आकर्षित करता है।
पर्यावरण पर प्रभाव : बांध के कारण बड़े क्षेत्र जलमग्न हो गए हैं, जिससे समुदायों का विस्थापन हुआ है, जो अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शिवालिक पहाड़ियों के बीच ब्यास नदी पर बना पौंग बांध भी उत्तर भारत के प्रमुख बांधों में शुमार है।
स्रोत : विकी कॉमंस
सर्वश्रेष्ठ तकनीक इस्तेमाल की जाएगी : इस प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य बाजार में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ तकनीक का आकलन करना है। इसके बाद प्राप्त फीडबैक के आधार पर मुख्य टेंडर जारी किया जाएगा। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जैसे राज्यों को जलापूर्ति और बिजली की निरंतरता भी सुनिश्चित होगी।
मनोज त्रिपाठी, चेयरमैन, बीबीएमबी (दैनिक जागरण को बताया)
पौंग डैम के बारे में महत्वपूर्ण बातें
पौंग बांध हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शिवालिक पहाड़ियों की आर्द्र भूमि पर ब्यास नदी पर 1975 में बनाया गया था। पौंग बांध के जरिये एक विशाल जलाशय का निर्माण किया गया है, जिसे महाराणा प्रताप सागर नाम दिया गया है। जलाशय 24,529 हेक्टेयर (60,610 एकड़) के एक क्षेत्र तक फैला हुआ है, और झीलों का भाग 15,662 हेक्टेयर (38,700 एकड़) है। यह जलाशय या झील एक प्रसिद्ध वन्यजीव अभयारण्य है और रामसर सम्मेलन द्वारा भारत में घोषित अंतरराष्ट्रीय आर्द्रभूमि साइट (वेटलैंड) में से एक है। पौंग जलाशय हिमाचल प्रदेश में हिमालय की तलहटी में सबसे महत्वपूर्ण मछली वाला जलाशय है। इस जलाशय में महासीर मछली अत्याधिकता मे पाई जाती है |
हिमाचल की पहाड़ी वादियों में बना पौंग डैम एक खूबसूरत पर्यटन स्थल भी है। वन्यजीव अभयारण्य और रामसर स्थल होने के कारण यह इको-टूरिज़्म के लिए भी एक आकर्षक केंद्र है। यहां जाना ज़्यादा मुश्किल नहीं है। आप बाई रोड जाना चाहें तो बस, टैक्सी या निजी वाहन से जा सकते हैं। रेल मार्ग और हवाई मार्ग से भी जाया जा सकता है। सड़क मार्ग से यह नई दिल्ली से 466 किमी, चंडीगढ़ से 170 किलोमीटर, अमृतसर से 110 किलोमीटर, धर्मशाला से 55 किलोमीटर की दूरी पर है। ट्रेन से जाने के लिए पौंग डैम का सबसे नज़दीकी ब्रॉडगेज रेलवे स्टेशन पठानकोट कैंट (चक्की) पौंगडम से 70 किमी की दूरी पर है और नजदीकी नैरो गेज रेलवे स्टेशन नंदपुर भटौली रेलवे स्टेशन, बिरियाल रेलवे स्टेशन है। वायु मार्ग से पहुंचने के लिए गगल हवाई अड्डा, पौंग-बांध से केवल 76 किलोमीटर की दूरी पर है। यह हवाई अड्डा कुछ सीमित उड़ानों के जरिए दिल्ली से जुड़ा हुआ है।
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