राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से भारत सरकार का उद्देश्य है कि वर्ष 2030 तक देश ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उसके व्यापक उपयोग और निर्यात के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो।

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से भारत सरकार का उद्देश्य है कि वर्ष 2030 तक देश ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उसके व्यापक उपयोग और निर्यात के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो।

चित्र: इंडिया वाटर पोर्टल

ग्रीन हाइड्रोजन मिशन: क्या भारत का हरित ऊर्जा भविष्य पानी के संकट को बढ़ाएगा?

भारत 2030 तक ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनने की तैयारी में है, लेकिन इस हरित ऊर्जा बदलाव के बीच पानी की बढ़ती मांग एक गंभीर सवाल बनकर उभर रही है। राजस्थान और गुजरात जैसे जल-दबाव वाले क्षेत्रों में यह ऊर्जा संक्रमण जल-संकट को किस दिशा में ले जाएगा, यह अब नीति और समाज दोनों के सामने अहम प्रश्न है।
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सुबह की पहली धूप जब राजस्थान के विशाल सोलर पार्क पर पड़ती है, तो दूर तक फैली चमक भविष्य की किसी सुनहरी तस्वीर जैसी दिखाई देती है। क़तार से लगे हुए सोलर पैनल, हवा में घूमते टर्बाइन और उनके बीच आकार लेती ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएं, यह सब मिलकर भारत के ऊर्जा संक्रमण की नई भाषा लिख रहे हैं। यह वही भविष्य है जिसे “स्वच्छ”, “हरित” और “आत्मनिर्भर” भारत के रूप में पेश किया जा रहा है।

लेकिन इस चमक के भीतर एक ऐसा तत्व है जो अक्सर मुख्‍य धारा से बाहर रह जाता है, और वह है पानी।

क्या है ग्रीन हाइड्रोजन

ग्रीन हाइड्रोजन को हरित ऊर्जा की श्रेणी में इसलिए रखा गया है क्योंकि इसे नवीकरणीय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) की मदद से पानी के इलेक्ट्रोलिसिस द्वारा तैयार किया जाता है। यानी बिजली के सहारे पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में बांटा जाता है। सुनने में यह प्रक्रिया जितनी साफ लगती है, जल संसाधनों पर इसकी निर्भरता भी उतनी ही गहरी है।

तकनीकी स्तर पर एक किलोग्राम हाइड्रोजन तैयार करने के लिए लगभग 9 लीटर शुद्ध पानी की ज़रूरत होती है। लेकिन वास्तविक औद्योगिक उत्पादन में शोधन, शीतलन, प्रक्रिया हानि और उपकरणों की सफाई को जोड़ दें, तो यह मात्रा और बढ़ जाती है। बड़े पैमाने के संयंत्रों में इस मांग का आंकड़ा लाखों लीटर प्रतिदिन तक पहुंच सकता है।

यहीं से यह कहानी केवल ऊर्जा की नहीं, पानी की भी हो जाती है।

सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा का उपयोग करके बनाई जाने वाली हाइड्रोजन गैस को ग्रीन हाइड्रोजन के रूप में जाना जाता है, क्‍योंकि इसके उत्‍पादन में कार्बन उत्‍सर्जन का स्‍तर तकरीबन शून्‍य रहता है।
सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा का उपयोग करके बनाई जाने वाली हाइड्रोजन गैस को ग्रीन हाइड्रोजन के रूप में जाना जाता है, क्‍योंकि इसके उत्‍पादन में कार्बन उत्‍सर्जन का स्‍तर तकरीबन शून्‍य रहता है।स्रोत : दिल्‍ली स्‍कूल ऑफ बिजनेस

हरित भविष्य और प्यासे भूगोल का समीकरण

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से भारत सरकार का उद्देश्य है कि वर्ष 2030 तक देश ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उसके व्यापक उपयोग और निर्यात के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो।
इसके तहत 5 मिलियन टन प्रति वर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। दूसरे शब्दों में, भारत खुद को स्वच्छ ऊर्जा के इस उभरते क्षेत्र में एक वैश्विक नेतृत्वकारी देश के रूप में स्थापित करना चाहता है। मिशन के तहत 17,490 करोड़ रुपये तक का प्रोत्साहन ढांचा तैयार किया गया है।
इस मिशन का अगला केंद्र राजस्थान, गुजरात और तटीय औद्योगिक बेल्ट जैसे क्षेत्रों को माना जा रहा है। लेकिन समस्या यह है कि ये सभी क्षेत्र पहले से ही जल दबाव वाले क्षेत्रों की सूची में शामिल हैं।

राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से भारत सरकार का उद्देश्य है कि वर्ष 2030 तक देश ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन, उसके व्यापक उपयोग और निर्यात के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख केंद्रों में शामिल हो। मिशन के तहत 17,490 करोड़ रुपये तक का प्रोत्साहन ढांचा तैयार किया गया है।

नीति आयोग की 2018 की समग्र जल प्रबंधन सूचकांक रिपोर्ट (Composite Water Management Index) यह संकेत देते हैं कि भारत के कई मौजूदा औद्योगिक क्लस्टर, जहां भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएं विकसित हो सकती हैं, उन्हीं राज्यों में स्थित हैं जहां भूजल स्तर लगातार गिर रहा है।

ऐसे में सवाल केवल तकनीकी नहीं रह जाता, क्योंकि एक तरफ जहां उद्योगों को स्वच्छ ईंधन की ज़रूरत है, वहीं दूसरी तरफ, वही पानी ग्रामीण घरों, खेती और स्थानीय जल स्रोतों की जीवनरेखा भी है। किसी परियोजना के लिए पानी का आवंटन सिर्फ संसाधन प्रबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं का भी प्रश्न है।

राजस्थान: धूप बहुत, पानी कम

राजस्थान को अक्सर भारत की ग्रीन एनर्जी राजधानी की तरह देखा जाता है। लगभग 2,245 मेगावाट क्षमता वाले भड़ला सोलर पार्क जैसे विशाल सौर पार्क ने इस राज्य को ऊर्जा मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिया है। 

लेकिन यही राज्य लंबे समय से जल-संकट की खबरों का भी केंद्र रहा है। हाल ही में केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के साल 2024-25 के आकलन के अनुसार राजस्थान की 302 भूजल इकाइयों में से 214 (लगभग 70 फ़ीसद) अतिदोहन (ओवर-एक्सप्लॉइटेड) की श्रेणी में हैं। यानी जहां भूजल निकासी प्राकृतिक पुनर्भरण से कहीं अधिक है। राज्य में केवल 12.25 फ़ीसद इकाइयां ही सुरक्षित श्रेणी में बची हैं। 

यह विरोधाभास ग्रीन हाइड्रोजन की पूरी बहस के तीखेपन को बढ़ा देता है। जहां सूरज की रोशनी प्रचुर है, वहीं पानी की उपलब्धता सीमित है। यही कारण है कि यदि भविष्य में बड़े औद्योगिक ग्रीन हाइड्रोजन हब राजस्थान में विकसित होते हैं, तो पानी के स्रोत और उसकी उपलब्धता से जुड़ा यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाएगा कि पानी कहां से आएगा? भूजल? नहर? या दूर के स्रोतों से?

CGWB के साल 2024-25 के आकलन के अनुसार राजस्थान की 302 भूजल इकाइयों में से 214 यानी लगभग 70 फ़ीसद इकाइयां अतिदोहन की श्रेणी में हैं।

राजस्थान के पश्चिमी हिस्सों में यह सवाल किसी सैद्धांतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है। UNICEF की 2020 की रिपोर्ट बताती है कि बाड़मेर और जैसलमेर जैसे जिलों में 5 फ़ीसद से भी कम घरों में नल कनेक्शन उपलब्ध थे। इन क्षेत्रों में बिखरी हुई ढाणियों, अत्यंत कम वर्षा और तीव्र शुष्कता के कारण सुरक्षित पेयजल तक पहुंच आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

जैसलमेर के खाड़ेरो की ढाणी जैसे गांवों में यह संकट और स्पष्ट दिखाई देता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यहां महिलाएं दिन में कई बार ‘बेरी’ जैसे पारंपरिक जल स्रोतों तक लंबी दूरी तय करती हैं। ढीली रेत, तेज धूप और सीमित जल स्रोतों के बीच पानी लाना केवल श्रम नहीं, बल्कि जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।

यही वह सामाजिक यथार्थ है जिसे ग्रीन हाइड्रोजन जैसी जल-आधारित औद्योगिक परियोजनाओं की बहस में साथ देखे जाने की ज़रूरत है। क्योंकि जिस भूगोल में उद्योग के लिए पानी की नई मांग पैदा होगी, वही पानी पहले से किसी महिला के रोज़ के कई घंटों के श्रम, किसी परिवार की पीने की जरूरत और किसी खेत की सिंचाई से जुड़ा हुआ है।

हालांकि, भड़ला सोलर पार्क के मौजूदा ढांचे में भी पानी की उपलब्धता एक केंद्रीय मुद्दा रही है। आधिकारिक परियोजना प्रस्तुति के अनुसार, पार्क के लिए इंदिरा गांधी नहर से पानी आरक्षित किया गया है और पैनलों की सफाई व अन्य उपयोगों के लिए लगभग 500 घन मीटर प्रतिदिन पानी की योजना बनाई गई थी।

गुजरात का उदाहरण

गुजरात को भारत के उभरते ग्रीन हाइड्रोजन भूगोल में एक केंद्रीय राज्य के रूप में देखा जा रहा है। हाल के वर्षों में मुंद्रा और कच्छ का तटीय क्षेत्र ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया निर्माण के संभावित हब के रूप में तेजी से उभरा है। यह क्षेत्र समुद्र के निकट होने, बंदरगाहों की उपलब्धता और पहले से मौजूद औद्योगिक ढांचे के कारण हरित ईंधन निर्यात के लिए अनुकूल माना जा रहा है।

मार्च 2025 में मुंद्रा क्षेत्र के लिए विशेष रूप से “Transmission System for Green Hydrogen/Ammonia Manufacturing Potential in Mundra, Gujarat” परियोजना को मंजूरी दी गई। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 2,800 करोड़ रुपये है। इसके तहत 75 किलोमीटर लंबी 765 kV डबल-सर्किट ट्रांसमिशन लाइन और 3,000 MVA अतिरिक्त ट्रांसफॉर्मेशन क्षमता विकसित की जा रही है, ताकि भविष्य में यहां प्रस्तावित ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया परियोजनाओं को पर्याप्त नवीकरणीय ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सके।

यह केवल ऊर्जा निवेश की कहानी नहीं है, बल्कि यह संकेत भी है कि तटीय गुजरात को भारत के हरित ईंधन निर्यात मानचित्र पर तेजी से स्थापित किया जा रहा है। इसी क्रम में कांडला-गांधीधाम स्थित दीनदयाल पोर्ट को भी ग्रीन हाइड्रोजन हब के रूप में विकसित किया जा रहा है। नवंबर 2025 में यहां ग्रीन हाइड्रोजन, ग्रीन अमोनिया और ग्रीन मेथनॉल परियोजनाओं के साथ 100 MLD (मिलियन लीटर प्रतिदिन) क्षमता वाले डीसैलिनेशन प्लांट का प्रस्ताव सामने आया।

पहली नज़र में यह रास्ता व्यावहारिक लगता है, समुद्र पास है, औद्योगिक कॉरिडोर तैयार हैं, और यह ताज़े पानी पर दबाव कम करने का एक रास्ता भी हो सकता है। लेकिन यहां भी कई गंभीर सवाल उभरते हैं।

  • डीसैलिनेशन में कितनी मात्रा में ऊर्जा खर्च होगी?

  • इससे निकला ब्रायन (brine) यानी अत्यधिक खारा अपशिष्ट समुद्री पारिस्थितिकी को किस प्रकार प्रभावित करेगा?

  • क्या यह “स्वच्छ” समाधान वास्तव में नई पर्यावरणीय लागत पैदा करेगा?

UNICEF के अनुसार
दुनिया भर में महिलाएं और लड़कियां हर दिन पानी लाने में लगभग 20 करोड़ घंटे का समय लगाती हैं।

पानी केवल आंकड़ा नहीं, जीवन की लय है

भारत के अनेक हिस्सों में पानी आज भी किसी पाइपलाइन या ग्राफ का विषय भर नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की जिंदगी की लय है। सुबह की पहली हलचल अक्सर रसोई से पहले पानी के बर्तनों की आवाज़ से शुरू होती है। बाल्टियां, डिब्बे, घड़े और टंकियों के समय का इंतज़ार। 

कई घरों की दिनचर्या इस बात से तय होती है कि पानी के आने का समय क्या है। ख़ास कर ग्रामीण और जल-संकटग्रस्त इलाकों में यह जिम्मेदारी अब भी बड़ी हद तक महिलाओं और लड़कियों के कंधों पर टिकी हुई है।

UNICEF के अनुसार दुनिया भर में महिलाएं और लड़कियां हर दिन पानी लाने में लगभग 20 करोड़ घंटे खर्च करती हैं। भारत की स्थिति भी अलग नहीं है, यहां भी पानी की अनुपलब्धता का समय-भार सबसे अधिक महिलाओं पर पड़ता है।

जल जीवन मिशन के शुरुआती प्रभावों का आकलन करने वाले एक अध्ययन के अनुसार घरेलू नल कनेक्शन मिलने से महिलाओं और किशोरियों पर पानी लाने के बोझ में उल्लेखनीय रूप से कमी आई है। इसका सीधा असर शिक्षा, उत्पादक श्रम और जीवन-गुणवत्ता पर देखा गया।

लेकिन यह तस्वीर अभी पूरी तरह बदल नहीं पाई है।हाल ही में तमिल नाडु के नामक्कल जिले में लगभग 600 परिवारों की महिलाओं ने अनियमित पेयजल आपूर्ति के विरोध में खाली मटकों के साथ सड़क जाम कर दिया।
यह दृश्य किसी रिपोर्ट की संख्या नहीं, बल्कि उस बेचैनी का जीवंत प्रमाण है जो हर दिन पानी की अनिश्चितता पैदा करती है।

जल जीवन मिशन के शुरुआती प्रभावों का आकलन करने वाले एक अध्ययन के अनुसार घरेलू नल कनेक्शन मिलने से महिलाओं और किशोरियों पर पानी लाने के बोझ में उल्लेखनीय रूप से कमी आई है।

इसी तरह कर्नाटक के धारवाड़ और आसपास के गांवों में हाल के दिनों में पानी की सप्लाई कई-कई दिनों के अंतराल पर पहुंच रही है, जिससे लोग फिर से टैंकरों और निजी बोरवेल पर निर्भर हो रहे हैं।

यानी कागज़ पर पानी एक “industrial input” हो सकता है, लेकिन ज़मीन पर वह किसी परिवार की दिनचर्या, किसी किसान की फसल और किसी समुदाय की सामाजिक स्मृति का हिस्सा है।

जब ग्रीन हाइड्रोजन जैसे किसी नए औद्योगिक प्रोजेक्ट के लिए पानी की बात होती है, तो यह समझना जरूरी है कि वही पानी पहले से किसी और जीवन-चक्र में शामिल है। वह किसी खेत की सिंचाई हो सकता है, किसी स्कूल जाने वाली लड़की के समय से जुड़ा सवाल हो सकता है, या किसी गांव की साझा टंकी का आख़िरी भरा हुआ दिन।

यही वह मानवीय परत है जिसे ऊर्जा और उद्योग की बड़ी बहसों में अक्सर जगह नहीं मिलती।

और शायद यही वह जगह है जहां जल-नीति को केवल मात्रा के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की लय के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है।

हरित कौशल को बढ़ावा
हरित कौशल को बढ़ावा

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

क्या हरित भविष्य जल-संवेदनशील होगा?

इस बात को लेकर शायद किसी तरह का मतभेद नहीं है कि ग्रीन हाइड्रोजन भारत के लिए एक ज़रूरी दिशा है। इस्पात, उर्वरक, रिफाइनरी और भारी परिवहन जैसे क्षेत्रों में उत्सर्जन घटाने के लिए इसे एक महत्वपूर्ण विकल्प माना जा रहा है। 

लेकिन इसके साथ जुड़ा एक बुनियादी सवाल यह भी है कि क्या यह ऊर्जा संक्रमण जल-संवेदनशील तरीके से आगे बढ़ेगा? अगर सैद्धांतिक स्तर पर देखें, तो एक किलोग्राम हाइड्रोजन के लिए लगभग 9 लीटर शुद्ध पानी की ज़रूरत होती है। 

इस आधार पर 5 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन के लिए केवल इलेक्ट्रोलिसिस स्तर पर ही लगभग 45 अरब लीटर पानी की आवश्यकता होगी। वास्तविक औद्योगिक उपयोग, शीतलन, शोधन और अन्य प्रक्रियाओं को जोड़ने पर यह मांग और बढ़ सकती है। यानी यह मुद्दा अब केवल तकनीक का नहीं, बल्कि संसाधन नियोजन और प्राथमिकताओं का भी है।

ऐसे में कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आते हैं:

  • क्या परियोजनाओं के लिए जल-तनाव मानचित्रण अनिवार्य होगा?

  • क्या उन जिलों में, जहां भूजल पहले से दबाव में है, बड़े संयंत्रों को अनुमति दी जानी चाहिए? 

क्या स्थानीय समुदायों की पेयजल तथा कृषि जरूरतों को प्राथमिकता देने का कोई स्पष्ट ढांचा होगा? भारत में पानी पहले से ही घरेलू उपयोग, सिंचाई, उद्योग और शहरी विस्तार के बीच एक बहु-स्तरीय संघर्ष का विषय है। 

इसलिए यह जरूरी है कि स्वच्छ ऊर्जा की योजना पानी के साथ न्यायपूर्ण और दीर्घकालिक संतुलन में बनाई जाए। अगर स्वच्छ ईंधन का भविष्य उन इलाकों में विकसित होता है जहां समुदाय पहले से पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो यह हरित विकास की नैतिकता पर भी सवाल खड़ा करेगा।

पानी और ऊर्जा को अक्सर अलग-अलग नीतिगत खानों में रखा जाता है, लेकिन ज़मीन पर दोनों का रिश्ता कहीं अधिक घनिष्ठ है। जहां ऊर्जा संयंत्र लगते हैं, वहां पानी की मांग बढ़ती है, और जहां पानी सीमित है, वहां विकास की दिशा बदल जाती है।

यही वह निर्णायक मोड़ है जहां भारत के विकास मॉडल से एक बड़ा सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या हम एक संकट से बाहर निकलने की जल्दबाज़ी में दूसरे संकट की नींव रख रहे हैं? या फिर यह वह अवसर है जब भारत ऊर्जा और जल, दोनों के भविष्य को साथ रखकर एक अधिक संवेदनशील, न्यायपूर्ण और टिकाऊ रास्ता चुन सकता है? 

भारत का हरित भविष्य केवल सूरज और हवा से नहीं बनेगा; वह इस बात से भी तय होगा कि उस भविष्य के लिए पानी कहाँ से आएगा, और किसकी प्यास पर उसकी कीमत चुकाई जाएगी।

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