आई से तैयार किए गए मॉडल के अनुसार कुछ ऐसा हो सकता है महाराष्‍ट्र के पालघर जिले में कोरे बीच के पास बनने वाले देश के पहले ऑफशोर एयरपोर्ट एयरपोर्ट का स्‍वरूप। 

आई से तैयार किए गए मॉडल के अनुसार कुछ ऐसा हो सकता है महाराष्‍ट्र के पालघर जिले में कोरे बीच के पास बनने वाले देश के पहले ऑफशोर एयरपोर्ट एयरपोर्ट का स्‍वरूप। 

फोटो : X.com

पालघर में बनेगा भारत का पहला 'ऑफशोर एयरपोर्ट' : विकास की उड़ान के साथ ही पर्यावरणीय चुनौतियां भी ?

जापान, हांगकांग और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तर्ज़ पर समुद्र के बीच कृत्रिम भूमि बनाकर तैयार किया जाएगा हवाई अड्डा
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महाराष्‍ट्र सरकार ने  प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट की समीक्षा के बाद विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने के निर्देश दिए

मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) की बढ़ती हवाई यातायात जरूरतों को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने पालघर जिले के कोरे बीच (Kore Beach) के पास देश का पहला ऑफशोर एयरपोर्ट समुद्र के बीच बनने वाला हवाई अड्डा विकसित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। यह एयरपोर्ट जमीन पर नहीं, बल्कि समुद्र में पुनर्निर्मित (Reclaimed) भूमि पर बनाया जाएगा। जापान, हांगकांग और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में इस तरह के एयरपोर्ट पहले से मौजूद हैं, लेकिन भारत में यह अपनी तरह का पहला प्रयोग होगा।

हाल ही में महाराष्‍ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस प्रोजेक्‍ट की प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट की समीक्षा के बाद विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार करने के निर्देश दिए हैं। यदि परियोजना आगे बढ़ती है तो यह केवल एक एयरपोर्ट नहीं होगा, बल्कि वधावन पोर्ट, बुलेट ट्रेन, एक्सप्रेसवे और समुद्री संपर्क को जोड़ने वाला विशाल मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब बन सकता है।

ऑफशोर एयरपोर्ट क्या होता है?

सामान्य एयरपोर्ट जमीन पर बनाए जाते हैं, जबकि ऑफशोर एयरपोर्ट समुद्र में कृत्रिम भूमि तैयार करके विकसित किए जाते हैं। इसके लिए समुद्र के एक हिस्से को चट्टानों, रेत और अन्य निर्माण सामग्री से भरकर विशाल ठोस और स्थिर प्लेटफॉर्म तैयार किया जाता है, जिस पर रनवे, टर्मिनल, टैक्सी वे और हवाई अड्डे के लिए ज़रूरी अन्य सभी ढांचे बनाए जाते हैं।

इस तकनीक का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण जापान का कंसाई इंटरनेशनल एयरपोर्ट और हांगकांग इंटरनेशनल एयरपोर्ट हैं। इन देशों ने सीमित भूमि उपलब्धता के कारण समुद्र का विकल्प चुना था। इसी से प्रेरणा लेकर मुंबई क्षेत्र में भी भूमि अधिग्रहण की कठिनाइयों और बढ़ते शहरीकरण को देखते हुए पालघर के पास इस मॉडल एयरपोर्ट बनाने का पर विचार किया जा रहा है।

परियोजना की रूपरेखा क्या है?

प्रस्तावित प्रोजेक्‍ट के तहत ऑफशोर एयरपोर्ट को पालघर जिले के कोरे बीच के निकट अरब सागर में विकसित किया जाएगा। परियोजना का संचालन महाराष्ट्र एयरपोर्ट डेवलपमेंट कंपनी (MADC) कर रही है और इसे वधावन बंदरगाह परियोजना के पूरक के रूप में देखा जा रहा है।

अब तक उपलब्ध प्रारंभिक जानकारी के अनुसार इसमें दो समानांतर रनवे प्रस्तावित हैं। इसकी सालाना क्षमता लगभग 9 करोड़ यात्रियों तथा करीब 30 लाख टन कार्गो संभालने की बताई जा रही है। यह क्षमता वर्तमान मुंबई एयरपोर्ट और निर्माणाधीन नवी मुंबई एयरपोर्ट के बाद क्षेत्र का तीसरा प्रमुख विमानन केंद्र बनाने के उद्देश्य से तय की गई है।

कब तक बन सकता है एयरपोर्ट?

फिलहाल परियोजना डीटेल प्रोजेक्‍ट रिपोर्ट (DPR) के चरण में है। DPR आने के बाद इसके विस्तृत इंजीनियरिंग, वित्तीय और पर्यावरणीय अध्ययन की प्रक्रिया होगी। इसके बाद पर्यावरण एवं तटीय नियामक (CRZ) सहित अनेक मंजूरियां लेनी होंगी। कुछ मीडिया रिपोर्टों में 2030 के दशक के शुरुआती वर्षों में इस ऑफशोर एयरपोर्ट का परिचालन शुरू होने की संभावना जताई गई है। हालांकि सरकार की ओर से अभी कोई आधिकारिक समय-सीमा घोषित नहीं की गई है। इसलिए फिलहाल इस समुद्री हवाई अड्डे के निर्माण अवधि को लेकर निश्चित दावा करना जल्दबाजी होगी।

यात्रियों को क्या-क्या सुविधाएं मिल सकती हैं?

प्रस्तावित एयरपोर्ट को कोई साधारण यात्री हवाई अड्डा नहीं होगा। इसे एक एकीकृत लॉजिस्टिक्स हब के रूप में विकसित करने की योजना है। यहां आधुनिक अंतरराष्ट्रीय टर्मिनल, विशाल कार्गो कॉम्प्लेक्स, दो रनवे, विमान रखरखाव सुविधाएं (MRO), डिजिटल एयर ट्रैफिक सिस्टम और मल्टी-मॉडल परिवहन कनेक्टिविटी विकसित किए जाने की संभावना है।

योजना के अनुसार यह एयरपोर्ट प्रस्तावित उत्तान-विरार सी लिंक, मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन स्टेशन, मुंबई-वडोदरा एक्सप्रेसवे, राष्ट्रीय राजमार्ग तथा वधावन पोर्ट से जुड़ सकता है। इससे समुद्री, सड़क, रेल और हवाई परिवहन का एकीकृत नेटवर्क तैयार होगा।

मुंबई क्षेत्र के लिए कितना महत्वपूर्ण होगा यह एयरपोर्ट?

मुंबई का वर्तमान अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट लगभग अपनी क्षमता के करीब पहुंच चुका है, जबकि नवी मुंबई एयरपोर्ट भी भविष्य की पूरी मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा। सरकार का अनुमान है कि 2050 तक मुंबई क्षेत्र में हवाई यात्रियों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि तीसरे बड़े एयरपोर्ट की आवश्यकता होगी।

प्रस्तावित ऑफशोर एयरपोर्ट भविष्य की इसी मांग को पूरा करने का प्रयास है। साथ ही यह वधावन पोर्ट के कारण बढ़ने वाले एयर कार्गो को भी संभाल सकेगा। इससे उद्योग, निर्यात, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद जताई जा रही है।

<div class="paragraphs"><p>समुद्र के किनारे बना दुनिया का एक मशहूर कोपेनहेगेन का ऑफशोर एयरपोर्ट।</p></div>

समुद्र के किनारे बना दुनिया का एक मशहूर कोपेनहेगेन का ऑफशोर एयरपोर्ट।

फोटो : विकी कॉमंस

पर्यावरणीय चिंताएं कहीं ज्यादा बड़ी हैं

देश के पहले ऑफशोर एयरपोर्ट की इस महत्‍वाकांक्षी परियोजना से जहां हवाई यात्रा में सहूलियत और अन्‍य कई प्रकार के फायदे होने की बात कही जा रही है, वहीं इसे लेकर कई गंभीर पर्यावरणीय चिंताएं भी जताई जा रही हैं। यहीं से इस परियोजना के साथ एक विवादित पहलू भी जुड़ जाता है। समुद्र में बनाए जाने वाले इस हवाई अड्डे को लेकर पर्यावरण को निम्‍नलिखित नुकसान होने की आशंकाएं जताई जा रही हैं - 

समुद्री पारिस्थितिकी पर बड़ा असर पड़ सकता है

ऑफशोर एयरपोर्ट बनाने के लिए समुद्र में बड़े पैमाने पर भूमि पुनर्निर्माण (Land Reclamation) करना होगा। इस प्रक्रिया में समुद्र तल की प्राकृतिक संरचना बदल जाती है। समुद्री जीवों के आवास नष्ट हो सकते हैं तथा तलछट (Sediment) का फैलाव बढ़ने से पानी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

समुद्री वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे निर्माण कार्यों से मछलियों के प्रजनन क्षेत्र, शेलफिश, प्लवक (Plankton) और समुद्री जैव विविधता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं। यही कारण है कि DPR में विस्तृत समुद्री पर्यावरण प्रभाव अध्ययन (Marine EIA) सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मछुआरों की आजीविका पर पड़ सकता है असर

पालघर का तटीय क्षेत्र पारंपरिक मत्स्य पालन के लिए जाना जाता है। यदि एयरपोर्ट निर्माण के कारण समुद्र के बड़े हिस्से में नौवहन प्रतिबंधित होता है या समुद्री पारिस्थितिकी बदलती है तो स्थानीय मछुआरा समुदाय की आजीविका प्रभावित हो सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना के सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) में इस पहलू को भी प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए।

तटीय पारिस्थितिकी और मैंग्रोव भी चिंता का विषय

पालघर तट के आसपास मैंग्रोव, ज्वारीय क्षेत्र (Tidal Flats), खारे दलदल तथा संवेदनशील तटीय पारिस्थितिकी मौजूद है। यदि परियोजना के लिए बड़े पैमाने पर समुद्री भराव किया जाता है तो इन प्राकृतिक तंत्रों पर दबाव बढ़ सकता है।

मैंग्रोव न केवल समुद्री जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं बल्कि चक्रवात और समुद्री कटाव से प्राकृतिक सुरक्षा भी प्रदान करते हैं। इसलिए पर्यावरणविदों का मानना है कि परियोजना के डिजाइन में इनके संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

जलवायु परिवर्तन भी बढ़ा सकता है जोखिम

दुनिया भर में समुद्र स्तर बढ़ने और चक्रवातों की तीव्रता में वृद्धि की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में समुद्र के भीतर बनने वाले किसी भी एयरपोर्ट को अत्यधिक ऊंचाई, मजबूत समुद्री सुरक्षा ढांचे और भविष्य की जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन करना होगा।

यदि इन पहलुओं की अनदेखी हुई तो भविष्य में रखरखाव लागत और आपदा जोखिम दोनों बढ़ सकते हैं।

दुनिया के अनुभव क्या कहते हैं?

दुनिया में अब तक केवल कुछ ही देशों ने समुद्र में कृत्रिम द्वीप बनाकर एयरपोर्ट विकसित किए हैं। इनमें जापान का कंसाई इंटरनेशनल एयरपोर्ट, चूबू सेंट्राएर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, हांगकांग का हांगकांग इंटरनेशनल एयरपोर्ट और दक्षिण कोरिया का इंचियोन इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्रमुख उदाहरण हैं। इन परियोजनाओं ने यह साबित किया है कि समुद्र में अत्याधुनिक एयरपोर्ट बनाना तकनीकी रूप से संभव है, लेकिन इसकी पर्यावरणीय और आर्थिक कीमत भी काफी बड़ी होती है।

सबसे चर्चित उदाहरण ओसाका खाड़ी में कृत्रिम द्वीप पर बनाया गया जापान का कंसाई एयरपोर्ट है, जो निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही तेजी से धंसने (Subsidence) लगा। स्थिति ऐसी बनी कि रनवे और टर्मिनल की ऊंचाई बनाए रखने के लिए लगातार इंजीनियरिंग सुधार करने पड़े, जिस पर अब तक अरबों डॉलर अतिरिक्त खर्च हो चुके हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र स्तर में वृद्धि और 2018 में आए शक्तिशाली तूफान (टाइफून जेबी) के दौरान एयरपोर्ट का एक हिस्सा समुद्री जल से भर गया था, जिससे यह भी स्पष्ट हुआ कि ऐसे ढांचों को भविष्य की चरम मौसमीय घटनाओं को ध्यान में रखकर डिजाइन करना कितना जरूरी है।

हांगकांग इंटरनेशनल एयरपोर्ट के निर्माण के दौरान भी समुद्र में बड़े पैमाने पर भूमि पुनर्भरण (Land Reclamation) किया गया। इससे समुद्री पारिस्थितिकी पर असर पड़ा और विशेष रूप से चीनी व्हाइट डॉल्फिन (Chinese White Dolphin) के आवास और संख्या को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आईं। बाद में वहां समुद्री जीवों की निगरानी, कृत्रिम रीफ, संरक्षित समुद्री क्षेत्र और अन्य शमन (Mitigation) उपाय लागू करने पड़े। इसके बावजूद पर्यावरणविद आज भी मानते हैं कि जैव विविधता को हुए नुकसान की पूरी भरपाई संभव नहीं हो सकी।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के लिए इन अनुभवों से सबसे बड़ा सबक यही है कि ऑफशोर एयरपोर्ट केवल इंजीनियरिंग परियोजना नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय परियोजना भी है। यदि शुरुआत में ही समुद्री जैव विविधता, तटीय धाराओं, तलछट के प्रवाह (Sediment Dynamics), समुद्र स्तर में वृद्धि, चक्रवातों की तीव्रता और स्थानीय मछुआरा समुदाय की आजीविका को ध्यान में रखकर योजना नहीं बनाई गई, तो भविष्य में पर्यावरणीय क्षति के साथ-साथ रखरखाव की लागत भी कई गुना बढ़ सकती है। इसलिए पालघर के प्रस्तावित ऑफशोर एयरपोर्ट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत वैश्विक अनुभवों से कितना सीखता है और विकास तथा पर्यावरण संरक्षण के बीच कितना संतुलन स्थापित कर पाता है।

निष्कर्ष : विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच हो संतुलन

पालघर का प्रस्तावित ऑफशोर एयरपोर्ट भारत के विमानन इतिहास की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में शामिल हो सकता है। यह मुंबई क्षेत्र की भविष्य की हवाई क्षमता, लॉजिस्टिक्स और आर्थिक विकास को नई दिशा दे सकता है। लेकिन इसकी सफलता केवल आधुनिक रनवे और विशाल टर्मिनलों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच कितना संतुलन बनाया जाता है।

चूंकि परियोजना अभी प्रारंभिक चरण में है, इसलिए आगामी DPR और पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) सबसे निर्णायक दस्तावेज होंगे। यदि इनमें समुद्री जैव विविधता, तटीय पारिस्थितिकी और स्थानीय समुदायों की आजीविका को पर्याप्त महत्व दिया जाता है, तभी यह परियोजना दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ मानी जाएगी।

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