झारखंड की जल सहियाओं के उदाहरण से समझा जा सकता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद सेवाएं अस्थिर हैं।
चित्र: पीआईबी
नल तो पहुंचे, पानी क्यों नहीं? जल सहियाओं की अनदेखी का सच
भारत में जल संकट से जुड़ा विमर्श अक्सर उसकी उपलब्धता, कवरेज और इंफ्रास्ट्रक्चर के इर्द-गिर्द घूमता है। उदाहरण के लिए, कितने घरों तक नल कनेक्शन पहुंचे, कितने स्रोत विकसित हुए, या किन परियोजनाओं को लागू किया गया। लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक अहम पहलू लगातार हाशिए पर रह जाता है: वे लोग, जो इन योजनाओं को ज़मीन पर लागू करते हैं।
इसी छूटे हुए पक्ष को समझने के लिए झारखंड की जल सहिया एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण सामने लाती हैं। ग्रामीण जल और स्वच्छता व्यवस्था में ये महिलाएं वह कड़ी हैं, जो योजनाओं को व्यवहार में बदलती हैं। चाहे वह जल गुणवत्ता की निगरानी हो, स्वच्छता को बढ़ावा देना हो या समुदाय के साथ निरंतर संवाद बनाना, जल-सहियाओं की भूमिका अहम है।
हाल के वर्षों में जल क्षेत्र में बड़े निवेश और नीतिगत पहलें हुई हैं, लेकिन इसके बावजूद कई क्षेत्रों में सेवाओं की नियमितता, गुणवत्ता और स्थायित्व से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
विश्व बैंक और WHO की रिपोर्टें लगातार यह दिखाती हैं कि जल प्रबंधन की सफलता केवल भौतिक ढांचे पर नहीं, बल्कि स्थानीय क्षमता, समुदाय की भागीदारी और व्यवहार परिवर्तन पर निर्भर करती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और UNICEF की संयुक्त रिपोर्ट (JMP, 2023) के अनुसार, सुरक्षित जल तक पहुंच और उसकी निरंतरता के बीच वैश्विक स्तर पर बड़ा अंतर बना हुआ है। कई देशों में बुनियादी ढांचा तो मौजूद है, लेकिन उसकी नियमित आपूर्ति और गुणवत्ता सुनिश्चित नहीं हो पाती।
इसी संदर्भ में, एक हालिया ग्राउंड रिपोर्ट यह भी दिखाती है कि जिन जल सहियाओं पर यह पूरी व्यवस्था टिकी है, उनकी कार्य स्थितियां, पारिश्रमिक और संस्थागत समर्थन अब भी उस जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं हैं, जो उन्हें सौंपी गई है।
जल प्रबंधन का विस्तार, लेकिन जमीनी चुनौतियां कायम
भारत में ग्रामीण जल आपूर्ति के विस्तार को लेकर पिछले कुछ वर्षों में तेज़ प्रगति दर्ज की गई है। जल जीवन मिशन के आधिकारिक डैशबोर्ड के अनुसार 2019 में जहां केवल लगभग 17 फ़ीसद ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन थे, वहीं 2024 तक यह आंकड़ा 70 फ़ीसद से अधिक हो चुका है।
इसका मतलब है कि पाइप जल कनेक्शन बढ़ाने और गांवों तक बुनियादी ढांचा पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश हुआ है। झारखंड जैसे राज्यों में भी लाखों ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुंचाने और जल योजनाओं को पंचायतों को सौंपने की दिशा में काम आगे बढ़ा है।
हालांकि, कवरेज बढ़ने के बावजूद जल आपूर्ति की नियमितता और गुणवत्ता से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। दूरदराज के इलाकों में आज भी लोगों को पानी के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जो यह दिखाता है कि पहुंच और सेवा की स्थिरता के बीच अब भी बड़ा अंतर मौजूद है।
जल जीवन मिशन के आधिकारिक डैशबोर्ड के अनुसार 2019 में जहां केवल लगभग 17 फ़ीसद ग्रामीण घरों तक नल कनेक्शन थे, वहीं 2024 तक यह आंकड़ा 70 फ़ीसद से अधिक हो चुका है।
नीति आयोग की समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (CWMI) रिपोर्ट भी बताती है कि कई राज्यों में जल गुणवत्ता और उपलब्धता दोनों ही गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं।
इसी संदर्भ में झारखंड का जल सहिया मॉडल महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस मॉडल से इंफ्रास्ट्रक्चर और उसके प्रभावी उपयोग के बीच के अंतर को भरने की कोशिश हो रही है। राज्य में हजारों जल सहियाएं जल गुणवत्ता परीक्षण, व्यवहार परिवर्तन और ग्राम स्तर की संस्थाओं के साथ तालमेल बिठाकर इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
शोध बताते हैं कि समय के साथ उनकी भूमिका केवल जागरूकता तक सीमित नहीं रह गई है। बल्कि स्वच्छता अभियानों को ज़मीन पर लागू और सामुदायिक प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं तक भी उनका विस्तार हुआ है।
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले का अनुभव बताता है कि जब स्थानीय स्तर पर इस तरह का नेतृत्व विकसित होता है, तो जल और स्वच्छता से जुड़े व्यवहारों में ठोस बदलाव देखने को मिलते हैं। इतना ही नहीं, सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ समुदाय में जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होती है।
इस तरह के अनुभव यह भी दिखाते हैं कि जब समुदाय आधारित जल प्रबंधन मजबूत होता है, तो उसके प्रभाव जल आपूर्ति से आगे बढ़कर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए पानी लाने और उसकी व्यवस्था करने में खर्च होने वाले महिलाओं के समय में बचत, आजीविका के अवसरों में वृद्धि और बच्चों की शिक्षा पर सकारात्मक प्रभाव।
हालांकि, सकारात्मक स्थिति का आभास देने वाले इन सभी उदाहरणों के बीच एक स्पष्ट विरोधाभास भी है। जहां एक ओर जल सहियाओं को जल योजनाओं की सफलता के लिए केंद्रीय माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके काम करने की स्थितियां और संस्थाओं से मिलने वाले समर्थन अब भी सीमित हैं। यानी, जिस मानवीय आधार पर जल प्रबंधन की पूरी संरचना टिकी है, वही अब भी सबसे कमजोर कड़ी बना हुआ है।
इसी विरोधाभास को हाल की एक ज़मीनी खबर और स्पष्ट करती है, जिसमें झारखंड की जल सहियाएं अपने पारिश्रमिक और मान्यता की मांग को लेकर लंबे समय से आंदोलन कर रही हैं।
जब समुदाय आधारित जल प्रबंधन मजबूत होता है, तो उसके प्रभाव जल आपूर्ति से आगे बढ़कर सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में भी दिखाई देते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, कई जिलों में हजारों जल सहियाओं ने प्रदर्शन करते हुए वर्षों से लंबित मानदेय जारी करने की मांग उठाई। टाइम्स ऑफ इंडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग के अनुसार एक जल सहिया का कहना है कि अपनी बातचीत में कहा, “50 महीने तक वेतन नहीं मिला तो परिवार चलाना कितना मुश्किल है,” जो इस पूरी व्यवस्था में मौजूद असंतुलन को साफ़ तौर पर उजागर करता है।
यह स्थिति इस बात की ओर इशारा करती है कि जिन पर जल योजनाओं के संचालन और समुदाय से जुड़ाव की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है, वही कार्यकर्ता अब भी अस्थिर और अपर्याप्त समर्थन के साथ काम करने को मजबूर हैं।
महिला श्रम, नीति की प्राथमिकताएं और संरचनात्मक असमानताएं
जल सहियाओं की भूमिका को समझने पर स्पष्ट होता है कि यहां सवाल सिर्फ पानी का नहीं, बल्कि उस श्रम का है जिसे अक्सर स्वाभाविक मान लिया जाता है। बल्कि श्रम, लैंगिक असमानता और नीति-निर्माण से जुड़ा एक व्यापक मुद्दा है। भारत में सामुदायिक स्तर पर काम करने वाली महिला कार्यकर्ताओं, जैसे आशा, आंगनवाड़ी और स्वच्छता कर्मियों की स्थिति भी लंबे समय से कमोबेश ऐसी ही बनी हुई है। इनकी ज़िम्मेदारियों में तो किसी तरह की कमी नहीं आई है लेकिन इनके अधिकार और मेहनताना के बढ़ने का अनुपात लगभग शून्य है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की Care Work and Care Jobs (2018) रिपोर्ट के अनुसार देखभाल और सामुदायिक सेवाओं से जुड़े कार्यों में महिलाओं का योगदान असमान रूप से अधिक है। लेकिन इन क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को कम वेतन, अस्थिर रोजगार और सीमित सामाजिक सुरक्षा का सामना करना पड़ता है।
भारत के संदर्भ में भी यह पैटर्न स्पष्ट दिखता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य व्यवस्था संसाधन केंद्र (NHSRC) के अध्ययन में सामने आया है कि आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता जैसी महत्त्वपूर्ण सेवाओं की रीढ़ हैं, लेकिन उन्हें नियमित कर्मचारी का दर्जा नहीं दिया जाता और उनका पारिश्रमिक मुख्यतः प्रोत्साहन आधारित रहता है।
Care Work and Care Jobs (2018) रिपोर्ट के अनुसार देखभाल और सामुदायिक सेवाओं से जुड़े कार्यों में महिलाओं का योगदान असमान रूप से अधिक है।
नीति स्तर पर यह व्यवस्था एक तरह से कम लागत वाले विस्तार (low-cost expansion) का मॉडल बनाती है, जिसमें सेवाओं का विस्तार तो होता है, लेकिन स्थायी संस्थागत निवेश और श्रम की औपचारिक मान्यता पीछे छूट जाती है।
BMC Public Health में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि झारखंड की जल सहियाओं की जिम्मेदारियां समय के साथ काफी बढ़ी हैं। इन ज़िम्मेदारियों में जल गुणवत्ता परीक्षण, स्वच्छता व्यवहार परिवर्तन, योजना निगरानी और ग्राम स्तरीय समन्वय शामिल हैं। लेकिन उनके पारिश्रमिक और कार्य स्थितियों में समानांतर सुधार नहीं हुआ है।
दरअसल यह असंतुलन केवल श्रम का मुद्दा नहीं है, बल्कि जल योजनाओं की प्रभावशीलता से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
विश्व बैंक (World Bank) सहित अन्य संस्थानों ने भी इस पर ज़ोर दिया है कि यदि स्थानीय स्तर पर काम करने वाले मानव संसाधन को पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता, तो इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित निवेश लंबी अवधि के लिए टिकाऊ नहीं रह पाता।
इसके साथ ही, लैंगिक दृष्टिकोण से भी यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है। UN Women के अनुसार, दुनिया भर में जल और स्वच्छता से जुड़े कामों का बोझ सबसे अधिक महिलाओं पर ही होता है, चाहे वह पानी लाना हो या समुदाय में स्वच्छता को बनाए रखना, इन सबकी ज़िम्मेदारी घर की महिलाओं के ऊपर ही होती है।
ऐसे में, जब जल सहियाओं जैसी व्यवस्थाएं महिलाओं के नेतृत्व को सामने लाने का काम करती हैं। ये बताती हैं कि ये सहियाएं केवल सेवा वितरण का माध्यम नहीं हैं, बल्कि स्थानीय शासन और सामाजिक संरचना में बदलाव का अवसर भी बनती हैं।
फिर भी, अगर इस नेतृत्व को संस्थागत समर्थन, उचित पारिश्रमिक और निर्णय-निर्माण में उचित जगह नहीं मिलती, तो इस मॉडल का प्रभाव सीमित ही रह जाएगा।
यानी, जल सहियाओं के सामने चुनौती केवल काम करने की नहीं, बल्कि उस सिस्टम में अपनी जगह सुनिश्चित करने की है, जो अब भी उनके श्रम को “पूरक” मानता है, “केंद्रीय” नहीं।
जल जीवन मिशन के दिशा-निर्देशों में Village Water & Sanitation Committees (VWSCs) जैसी ग्राम स्तरीय संस्थाओं को जल आपूर्ति के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपने की बात कही गई है।
नीति की मंशा और ज़मीनी क्रियान्वयन के बीच का अंतर
भारत में जल प्रबंधन को लेकर हाल के वर्षों में नीतिगत स्तर पर एक स्पष्ट बदलाव दिखाई देता है। इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण से आगे बढ़कर अब समुदाय आधारित और विकेंद्रीकृत प्रबंधन (decentralised governance) पर जोर दिया जा रहा है। जल जीवन मिशन के दिशा-निर्देशों में Village Water & Sanitation Committees (VWSCs) जैसी ग्राम स्तरीय संस्थाओं को जल आपूर्ति के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपने की बात कही गई है।
पूरी व्यवस्था व्यवहार में जल सहियाओं जैसे फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं पर टिकी है, लेकिन औपचारिक संस्थागत ढांचे में उनकी भूमिका, अधिकार और पारिश्रमिक स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं।
इस ढांचे में सामुदायिक स्वामित्व और स्थानीय क्षमता निर्माण को जल योजनाओं की स्थिरता के लिए केंद्रीय माना गया है। लेकिन जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था अक्सर अधूरी रह जाती है। अध्ययन में यह सामने आया है कि ग्राम स्तरीय संस्थाओं को जिम्मेदारी तो मिलती है, लेकिन उसके अनुरूप प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और वित्तीय संसाधन नहीं मिलते। संचालन और रखरखाव (O&M) के लिए आवश्यक वित्तीय स्पष्टता की कमी भी योजनाओं की निरंतरता को प्रभावित करती है।
इस अंतर का एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि पूरी व्यवस्था व्यवहार में जल सहियाओं जैसे फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं पर टिकी है, लेकिन औपचारिक संस्थागत ढांचे में उनकी भूमिका, अधिकार और पारिश्रमिक स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं हैं। समुदाय और सरकार के बीच एक अहम कड़ी होने के बावजूद, उन्हें आवश्यक समर्थन नहीं मिल पाता।
यह स्थिति एक व्यापक नीति-व्यवहार अंतर (policy-practice gap) की ओर इशारा करती है। जहां कागज़ों पर विकेंद्रीकरण और समुदाय भागीदारी को महत्व दिया गया है, लेकिन ज़मीन पर यह जिम्मेदारी सीमित संसाधनों और अस्थिर मानव ढांचे पर निर्भर रहती है। जिम्मेदारी नीचे तक पहुंची है, लेकिन संसाधन और अधिकार नहीं।
समाधान: जल प्रबंधन में मानव संसाधन को केंद्र में लाना
अगर भारत को जल संकट से निपटने के लिए एक स्थायी और टिकाऊ मॉडल विकसित करना है, तो जल प्रबंधन के वर्तमान ढांचे में मानव संसाधन को केंद्रीय स्थान देना अनिवार्य होगा।
जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रम इस दिशा में सामुदायिक स्वामित्व और विकेंद्रीकृत प्रबंधन की बात तो करते हैं, लेकिन इन प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को संस्थागत रूप से सशक्त करना ज़रूरी है।
श्रम की औपचारिक मान्यता: जल सहियाओं के लिए निश्चित और सम्मानजनक मानदेय सुनिश्चित करना इस दिशा में पहला कदम है। वर्तमान प्रोत्साहन आधारित भुगतान प्रणाली कार्य की निरंतरता और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करती है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दिखाते हैं कि जब सामुदायिक कार्यकर्ताओं को नियमित पारिश्रमिक और सामाजिक सुरक्षा मिलती है, तो सेवाओं की गुणवत्ता और स्थायित्व में सुधार होता है। इसके साथ ही, बीमा, पेंशन और कार्यस्थल सुरक्षा जैसे उपायों को शामिल करना आवश्यक है, ताकि इस श्रम को “स्वैच्छिक” नहीं बल्कि औपचारिक और संरक्षित कार्य के रूप में मान्यता मिल सके।
क्षमता एवं व्यवस्था समर्थन:विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन केवल जिम्मेदारी सौंपने से प्रभावी नहीं होता; इसके लिए निरंतर प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग आवश्यक है। जल गुणवत्ता परीक्षण, डिजिटल मॉनिटरिंग और स्थानीय समस्या समाधान जैसे कौशलों के बिना यह मॉडल टिकाऊ नहीं रह सकता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और UNICEF की संयुक्त JMP (2023) रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि केवल इंफ्रास्ट्रक्चर पर्याप्त नहीं है बल्कि सेवा की गुणवत्ता और निरंतरता के लिए स्थानीय क्षमता निर्माण जरूरी है।
इसी तरह, विश्व बैंक की रिपोर्ट भी इस बात पर जोर देती हैं कि स्थानीय स्तर पर तकनीकी और संस्थागत समर्थन के बिना जल सेवाएं लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह पातीं।
निर्णय-निर्माण में भागीदारी: जल सहियाओं और अन्य स्थानीय कार्यकर्ताओं को Village Water & Sanitation Committees (VWSCs) और पंचायत स्तर की संस्थाओं में औपचारिक भूमिका देना जरूरी है। इससे न केवल जवाबदेही बढ़ती है, बल्कि स्थानीय जरूरतों के अनुरूप निर्णय लेना भी संभव होता है।
UN Women के अनुसार, जब महिलाओं को संसाधनों और निर्णय-निर्माण में भागीदारी मिलती है, तो जल और स्वच्छता कार्यक्रम अधिक प्रभावी और समावेशी बनते हैं।
जल सहियाओं का अनुभव यह भी दिखाता है कि वे केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि समुदाय और व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु हैं। ऐसे में, उन्हें निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखना, पूरे मॉडल की प्रभावशीलता को सीमित कर देता है।
इन तीन स्तंभों के बग़ैर जल प्रबंधन का विकेंद्रीकृत मॉडल अधूरा रहेगा। इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार के साथ यदि मानवीय आधार को समान प्राथमिकता नहीं दी जाती, तो सेवाओं की गुणवत्ता और स्थायित्व दोनों प्रभावित होंगे।
ग्रामीण भारत में पानी का संकट अक्सर केवल कमी के रूप में दिखाई देता है। लेकिन ज़मीनी अनुभव यह बताते हैं कि यह उतना ही प्रबंधन और प्राथमिकताओं का संकट भी है। पाइपलाइन, टैंक और योजनाओं का अपना महत्व है, लेकिन वे तब तक अधूरे हैं, जब तक उन्हें संभालने और चलाने वाली मानवीय संरचना मजबूत न हो।
जल सहियाएं इस संरचना की सबसे अहम कड़ी हैं। वे घर और व्यवस्था के बीच, नीति और व्यवहार के बीच, और योजना और उसके असर के बीच एक सेतु की तरह काम करती हैं। फिर भी, उनका श्रम अक्सर उसी सहजता से स्वाभाविक मान लिया जाता है, जैसे पानी का बहना, जिसकी अहमियत तब समझ में आती है, जब वह रुक जाता है।
शायद अब समय है कि जल प्रबंधन को केवल एक सेवा या संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि एक संबंध के रूप में देखा जाए। एक ऐसा संबंध, जिसकी स्थिरता पाइपलाइन से नहीं, बल्कि उन लोगों से तय होती है जो इसे हर दिन संभव बनाते हैं। जल प्रबंधन की असली मजबूती ढांचों में नहीं, बल्कि उन हाथों में है जो इसे चलाते हैं।
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