मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 में बंदरगाहों के विकास के साथ ही समुद्री पर्यावरण को बचाने का है लक्ष्‍य। 

मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 में बंदरगाहों के विकास के साथ ही समुद्री पर्यावरण को बचाने का है लक्ष्‍य। 

स्रोत : आईडब्‍लूपी

जानिए क्‍या है मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030, जिससे भारत बनेगा दुनिया की दिग्‍गज समुद्री शक्ति

पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए किया जाएगा बंदरगाहों के विकास। देशभर के पोर्ट्स के एमिशन में 2030 तक 45% की कमी लाने का है लक्ष्‍य, 2070 तक नेट-ज़ीरो का टार्गेट।
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करीब 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा वाला भारत एक मजबूत समुद्री शक्ति बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इसे लेकर सरकार 10-वर्षीय ब्लूप्रिंट मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 यानी MIV 2030 पर तेज़ी से काम कर रही है। इसका लक्ष्‍य  3.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश के साथ 2030 तक भारत के समुद्री क्षेत्र को आधुनिक, टिकाऊ और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है। 

मार्च 2021 में लॉन्च किए गये इस विज़न में पर्यावरण संरक्षण को और भी मजबूत बनाने के लिए 2023 में हरित सागर ग्रीन पोर्ट्स गाइडलाइंस को जोड़ा गया। इस तरह MIV2030 के तहत 2030 तक एमिशन इंटेंसिटी को 45% तक कम करने और 2070 तक नेट-ज़ीरो हासिल करने का लक्ष्‍य रखा गया, जो भारत की COP26 प्रतिबद्धता के अनुरूप है।

इस विज़न के तहत बंदरगाहों की क्षमता में 260 करोड़ टन से ज्‍़यादा की बढ़ोतरी, 30 करोड़ टन से अधिक क्षमता के तीन विशाल बंदरगाह (Mega Ports) बनाना, और बंदरगाहों को 'ग्रीन/स्मार्ट  पोर्ट' के रूप में विकसित करने जैसी 150 से अधिक पहलें शामिल हैं। इससे बंदरगाहों के ज़रिये अंतरराष्‍ट्रीय कारोबार में बढ़ोतरी  के साथ ही बड़ी संख्‍या में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने हाल ही में मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 की अबतक की प्रगति के बारे में राज्य सभा में एक लिखित उत्तर में जानकारी दी है। उन्‍होंने बताया कि  MIV 2030 के तहत पिछले तीन वर्षों में प्रमुख बंदरगाहों पर लगभग 75 बंदरगाह विकास परियोजनाएं प्रदान की गई हैं, जिनमें कार्गो प्रबंधन क्षमता और परिचालन दक्षता बढ़ाने की परियोजनाएं भी शामिल हैं। इस दौरान देश के पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय द्वारा पूंजीगत व्यय में 37 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 

इसे वित्त वर्ष 2022 में 5527 करोड़ रुपये से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2024 में 7571 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसमें सकल बजट सहायता (जीबीएस) में 54% की वृद्धि शामिल है, जो वित्त वर्ष 2022 में 1099 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 1687 करोड़ रुपये हो गई है। इस तरह सरकार एमआईवी 2030 के लिए तय किए गए लक्ष्यों को प्राप्‍त करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही है। 

भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय यानी PIB की ओर से जारी आधिकारिक सूचना में दी गई जानकारी के मुताबिक पिछले 3 वर्षों में MIV 2030 के तहत समुद्री क्षेत्र में भारत द्वारा की गई प्रगति को संक्षेप में इन बिंदुओं के ज़रिये समझा जा सकता है:

  • प्रमुख बंदरगाहों की क्षमता वित्तीय वर्ष 2022 में 1598 एमएमटीपीए से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024 में 1630 एमएमटीपीए हो गई।

  • कुल मिलाकर, पोत का टर्न अराउंड टाइम (टीएटी) वित्तीय वर्ष 2022 में 53 घंटे से घटकर वित्तीय वर्ष 2024 में 48 घंटे हो गया।

  • जहाज बर्थ डे आउटपुट वित्तीय वर्ष 2022 में 16,000 मीट्रिक टन से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024 में 18,900 मीट्रिक टन हो गया।

  • वैश्विक शीर्ष 30 बंदरगाहों में 2 भारतीय बंदरगाह शामिल।

  • विश्व बैंक के अंतर्राष्ट्रीय नौवहन रसद प्रदर्शन सूचकांक (एलपीआई) में भारत की रैंकिंग 2018 में 44 से सुधरकर 2023 में 22 हो गई।

  • राष्ट्रीय जलमार्गों (एनडब्ल्यू) द्वारा संभाले जाने वाले कार्गो की मात्रा वित्तीय वर्ष 2022 में 108 एमएमटी से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024 में 133 एमएमटी हो गई।

  • तटीय टन भार वित्तीय वर्ष 2022 में 260 एमएमटी से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024 में 324 एमएमटी हो गया है।

कार्बन उत्सर्जन में 30% तक की लानी होगी कमी  
मैरीटाइम इंडिया विजन के लक्ष्यों के अनुसार 2030 तक बंदरगाहों को प्रति टन माल पर कार्बन उत्सर्जन में 30% तक की कमी लानी होगी। साथ ही, बड़ी संख्या में मशीनों को जीवाश्‍म ईंधन के बजाय बिजली से संचालित करना होगा। इसमें भी कुल ऊर्जा खपत का 60% से अधिक हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से लेना अनिवार्य होगा। इन लक्ष्यों को 2047 तक और आगे बढ़ाते हुए 100% तक किया जाएगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 केवल 10 साल चलने वाली हरित परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह एक निरंतर चलने वाला प्रयास है।
<div class="paragraphs"><p>बंदरगाहों को देश की अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ़ माना जाता है, क्‍योंकि भारत का करीब 95% विदेशी व्‍यापार इन्‍हीं पोर्ट्स के ज़रिये ही होता है।&nbsp;</p></div>

बंदरगाहों को देश की अर्थव्‍यवस्‍था की रीढ़ माना जाता है, क्‍योंकि भारत का करीब 95% विदेशी व्‍यापार इन्‍हीं पोर्ट्स के ज़रिये ही होता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

ग्रीन और स्‍मार्ट पोर्ट का विकास

मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 की एक खास बात यह है कि इसके तहत किए जाने वाले बंदरगाहों के विकास में समुद्री पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना और जलवायु परिवर्तन को बढ़ाए बिना विस्तार गतिविधियों को आगे बढ़ाया जाएगा। इस चुनौती को लेकर सरकार का मानना है कि हरित विकास यानी ग्रीन डेवलपमेंट कोई बाधा नहीं, बल्कि भविष्य की दीर्घकालिक और टिकाऊ प्रगति के लिए यही एकमात्र रास्ता है। इस सोच को केंद्र में रखते हुए MIV 2030 में बंदरगाहों के विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसे ‘हरित सागर ग्रीन पोर्ट गाइडलाइंस’ का भी समर्थन प्राप्त है, जिनके लिए स्पष्ट लक्ष्य तय किए गए हैं।

हरित और स्मार्ट पोर्ट की अवधारणा के तहत केवल भौतिक ढांचे के विस्तार पर नहीं, बल्कि बंदरगाहों के संचालन को अधिक ऊर्जा-कुशल, कम-उत्सर्जन और पर्यावरण-अनुकूल बनाने पर जोर दिया गया है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग, जहाजों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने, अपशिष्ट प्रबंधन को मजबूत करने और समुद्री जैव विविधता की रक्षा जैसे पहलू शामिल हैं। सरकार का लक्ष्य है कि भारतीय बंदरगाह वैश्विक मानकों के अनुरूप ऐसे मॉडल के रूप में विकसित हों, जहाँ आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संतुलन एक-दूसरे के पूरक बनें, न कि विरोधी।

ग्रीन पोर्ट से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें

  • ‘हरित सागर ग्रीन पोर्ट गाइडलाइंस’ के तहत प्रमुख बंदरगाहों को चरणबद्ध तरीके से कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य दिए गए हैं।

  • बंदरगाह परिसरों में सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों के उपयोग को बढ़ावा देने पर जोर है।

  • जहाजों के लिए ऑनशोर-पावर सप्लाई (Onshore Power Supply) जैसी व्यवस्थाओं को अपनाने की बात कही गई है, जिससे बंदरगाह पर खड़े जहाजों से होने वाला प्रदूषण घटे।

  • ड्रेजिंग और भूमि पुनर्भरण जैसी गतिविधियों में समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर न्यूनतम प्रभाव सुनिश्चित करने के दिशा-निर्देश तय किए गए हैं।

  • बंदरगाहों पर जल संरक्षण, अपशिष्ट जल उपचार और ठोस कचरा प्रबंधन को अनिवार्य घटक के रूप में शामिल किया गया है।

  • स्मार्ट टेक्नोलॉजी के ज़रिये ईंधन दक्षता, लॉजिस्टिक्स और संचालन लागत को कम करने का लक्ष्य रखा गया है।

ग्रीन पोर्ट कॉन्सेप्ट को ज़मीन पर उतारने के लिए नए बंदरगाहों के विकास के साथ ही देश के मौजू़दा तीन सबसे बड़े बंदरगाहों  कांडला, कोचीन और पारादीप पोर्ट का भी आधुनिकीकरण  किया जा रहा है। इन तीनों प्रमुख भारतीय बंदरगाहों के उदाहरण से समझा जा सकता है कि इस कॉन्सेप्ट को ज़मीन पर कैसे उतारा जा रहा है और आगे किस दिशा में काम हो रहा है।

<div class="paragraphs"><p>10-वर्षीय ब्लूप्रिंट मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 के तहत अगले पांच साल में&nbsp;भारत के प्रमुख बंदरगाहों की एमिशन इंटेंसिटी को 45% तक कम करने और 2070 तक नेट-ज़ीरो लेवल हासिल करने का लक्ष्‍य रखा गया है।</p></div>

10-वर्षीय ब्लूप्रिंट मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 के तहत अगले पांच साल में भारत के प्रमुख बंदरगाहों की एमिशन इंटेंसिटी को 45% तक कम करने और 2070 तक नेट-ज़ीरो लेवल हासिल करने का लक्ष्‍य रखा गया है।

स्रोत : विकी कॉमंस

1. कांडला (दीनदयाल) पोर्ट, गुजरात

  • नवीकरणीय ऊर्जा पर ज़ोर : बंदरगाह परिसर में बड़े पैमाने पर सोलर पावर प्लांट लगाए गए हैं, जिससे पोर्ट की आंतरिक बिजली ज़रूरतों का एक हिस्सा हरित ऊर्जा से पूरा किया जा रहा है।

  • इलेक्ट्रिक उपकरणों का उपयोग : डीज़ल से चलने वाले क्रेनों और हैंडलिंग इक्विपमेंट को धीरे-धीरे इलेक्ट्रिक/हाइब्रिड सिस्टम में बदला जा रहा है।

  • धूल और प्रदूषण नियंत्रण : बल्क कार्गो हैंडलिंग के दौरान डस्ट सप्रेशन सिस्टम, वाटर स्प्रिंकलर और कवर कन्वेयर बेल्ट का इस्तेमाल।

  • कार्बन फुटप्रिंट आकलन: पोर्ट ऑपरेशंस से निकलने वाले उत्सर्जन का नियमित कार्बन ऑडिट और उसे घटाने की रणनीति।

2. कोचीन पोर्ट, केरल

  • ग्रीन पोर्ट की अग्रणी मिसाल : कोचीन पोर्ट को भारत के सबसे एनवायरनमेंट-फ्रेंडली पोर्ट्स में गिना जाता है।

  • एलएनजी और शोर पावर सुविधा : जहाज़ों के लिए एलएनजी आधारित फ्यूल और भविष्य में शोर-टू-शिप पावर (जहाज़ों को किनारे से बिजली) की तैयारी, ताकि बंदरगाह पर खड़े जहाज़ डीज़ल न जलाएं।

  • इलेक्ट्रिक मोबिलिटी : पोर्ट के अंदर प्रदूषण मुक्‍त माहौल बनाने के लिए जीवाश्‍म ईंधन से चलने वाले वाहनों और जेनरोटरों की जगह इलेक्ट्रिक बसें, ई-कार्ट और ई-वाहन और उच्‍च क्षमता वाले पावर बैकअप सिस्‍टम के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जा रहा है।

  • वेटलैंड और मैंग्रोव संरक्षण : पोर्ट क्षेत्र के आसपास मौजू़द आर्द्रभूमि (वेटलैंड) का संरक्षण करके और यहां मैंग्रोव पेड़ों को बढ़ावा देकर प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने और पुनर्जीवित करने पर खास ध्यान रखा जा रहा है।

  • ग्रीन बिल्डिंग्स : प्रशासनिक भवनों और टर्मिनलों में एनर्जी एफिशिएंट डिज़ाइन और रेनवॉटर हार्वेस्टिंग के ज़रिये जल संचय के इंतज़ाम किए जा रहे हैं।

3. पारादीप पोर्ट, ओडिशा

  • हरित हाइड्रोजन और अमोनिया की तैयारी : भविष्य की ईंधन ज़रूरतों को देखते हुए ग्रीन हाइड्रोजन/ग्रीन अमोनिया हैंडलिंग के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करने की योजना।

  • जल और अपशिष्ट प्रबंधन : ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ की दिशा में काम किया जा रहा है, जिसके तहत अपशिष्ट जल का (उपचार) कर उसका पुनः उपयोग (रीयूज़) किया जाएगा।

  • ग्रीन बेल्ट डेवलपमेंट: पोर्ट और आसपास के औद्योगिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित पट्टी यानी ग्रीन बेल्‍ट विकसित किया जा रहा है।

  • स्मार्ट और डिजिटल ऑपरेशंस : डिजिटल ट्रैकिंग, ऑटोमेशन और लॉजिस्टिक्स ऑप्टिमाइज़ेशन से ईंधन खपत और उत्सर्जन घटाने की कोशिश।

  • स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार : बंदरगाहों के संचालन यानी पोर्ट ऑपरेशंस में सोलर और विंड एनर्जी के रूप में ज्‍़यादा से ज्‍़यादा क्‍लीन एनर्जी का इस्‍तेमाल किया जाएगा।

<div class="paragraphs"><p>बंदरगाहों से होने वाला प्रदूषण समुद्र तटों पर बढ़ती गंदगी, समुद्री पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र को हो रहे नुकसान की  एक बड़ी वजह बनता जा रहा है। </p></div>

बंदरगाहों से होने वाला प्रदूषण समुद्र तटों पर बढ़ती गंदगी, समुद्री पर्यावरण और पारिस्थितिक तंत्र को हो रहे नुकसान की एक बड़ी वजह बनता जा रहा है।

स्रोत : आईडब्‍लूपी

कैसी उभर रही तस्वीर?

कांडला, कोचीन और पारादीप जैसे प्रमुख बंदरगाहों को देखकर यह साफ़ होता है कि भारत में ग्रीन पोर्ट कॉन्सेप्ट अब केवल प्रतीकात्मक पर्यावरणीय पहल नहीं रह गया है। ये बंदरगाह धीरे-धीरे ऐसे औद्योगिक और लॉजिस्टिक केंद्रों में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, जहाँ व्यापारिक गतिविधियाँ चलती रहें लेकिन उनका पर्यावरणीय बोझ न्यूनतम हो। सरकार और पोर्ट प्राधिकरणों की रणनीति यह संकेत देती है कि समुद्री व्यापार के बढ़ते दबाव के बीच अब “कम उत्सर्जन, कम प्रदूषण और दीर्घकालिक स्थिरता” को विकास की शर्त माना जा रहा है।

ऊर्जा संक्रमण : इन बंदरगाहों पर पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों से हटकर सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक सिस्टम की ओर बढ़ने की स्पष्ट कोशिश दिखती है। पोर्ट ऑपरेशंस में इस्तेमाल होने वाली बिजली का हिस्सा अब नवीकरणीय स्रोतों से पूरा करने पर ज़ोर है। इससे न सिर्फ़ कार्बन उत्सर्जन घटता है, बल्कि लंबे समय में संचालन लागत भी कम होती है। यह बदलाव बंदरगाहों को भारत के व्यापक ऊर्जा संक्रमण एजेंडे से जोड़ता है।

प्रदूषण नियंत्रण : धूल, धुआं और जहाज़ों से होने वाला वायु प्रदूषण लंबे समय से बंदरगाह क्षेत्रों की बड़ी समस्या रहा है। ग्रीन पोर्ट कॉन्सेप्ट के तहत डस्ट सप्रेशन सिस्टम, कवर कन्वेयर, स्वच्छ ईंधन और इलेक्ट्रिक उपकरणों को अपनाया जा रहा है। साथ ही अपशिष्ट जल और ठोस कचरे के बेहतर प्रबंधन से समुद्र और तटीय इलाकों पर पड़ने वाला दबाव कम करने की कोशिश हो रही है। इसका सीधा लाभ आसपास रहने वाले समुदायों को मिलता है।

भविष्य के हरित ईंधनों की तैयारी : कांडला, कोचीन और पारादीप जैसे बंदरगाह अब केवल मौजूदा जहाज़ों की ज़रूरतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भविष्य को ध्यान में रखकर ढांचा तैयार कर रहे हैं। एलएनजी, ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया जैसे ईंधनों की हैंडलिंग के लिए बुनियादी सुविधाओं पर काम शुरू हो चुका है। यह संकेत देता है कि भारत अपने बंदरगाहों को आने वाले दशकों की वैश्विक ग्रीन शिपिंग व्यवस्था के अनुरूप ढालना चाहता है।

स्थानीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा : ग्रीन पोर्ट कॉन्सेप्ट में केवल मशीनों और ईंधन की बात नहीं है, बल्कि आसपास के प्राकृतिक तंत्र को बचाने की सोच भी शामिल है। मैंग्रोव संरक्षण, ग्रीन बेल्ट विकास और जल निकायों की निगरानी जैसी पहलें इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। इसका उद्देश्य यह है कि बंदरगाह विकास समुद्री जैव विविधता और तटीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाए बिना आगे बढ़े। लंबे समय में यही संतुलन बंदरगाहों की सामाजिक स्वीकार्यता तय करेगा।

<div class="paragraphs"><p>मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 में भारतीय बंदरगाहों को शांत, साफ़-सुथरा और प्रदूषण मुक्‍त बनाने पर ज़ोर दिया गया है।</p></div>

मैरीटाइम इंडिया विज़न 2030 में भारतीय बंदरगाहों को शांत, साफ़-सुथरा और प्रदूषण मुक्‍त बनाने पर ज़ोर दिया गया है।

स्रोत : विकी कॉमंस

ग्रीन पोर्ट ही होंगे भविष्य के गेटवे 

भारत के बंदरगाह ऐसे समय में विस्तार के दौर से गुजर रहे हैं, जब वैश्विक समुद्री व्यापार तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन उसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी उतनी ही तीव्रता से सामने आ रहे हैं। ऐसे में ग्रीन पोर्ट कॉन्सेप्ट किसी ‘अतिरिक्त सुधार’ का नहीं, बल्कि अस्तित्व से जुड़े बदलाव का संकेत देता है। कांडला, कोचीन और पारादीप जैसे बंदरगाह यह दिखाते हैं कि अगर नीति, तकनीक और निवेश एक दिशा में हों, तो आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच टकराव को काफी हद तक टाला जा सकता है। हालांकि, असली चुनौती इन पहलों को पायलट प्रोजेक्ट से आगे ले जाकर रोज़मर्रा के संचालन का स्थायी हिस्सा बनाने की है। निगरानी, पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी तय करेगी कि ये ग्रीन पोर्ट मॉडल काग़ज़ों से निकलकर ज़मीन पर कितना असर डाल पाते हैं। 

कुल मिलाकर, ग्रीन पोर्ट कॉन्सेप्ट भारत के समुद्री विकास की दिशा में एक निर्णायक मोड़ का संकेत देता है। यह सोच अब साफ़ हो रही है कि भविष्य के बंदरगाह सिर्फ़ माल ढुलाई के केंद्र नहीं, बल्कि ऊर्जा संक्रमण, प्रदूषण नियंत्रण और तटीय पारिस्थितिकी के संरक्षक भी होंगे। अगर कांडला, कोचीन और पारादीप में शुरू हुई ये पहलें निरंतरता और जवाबदेही के साथ आगे बढ़ती हैं, तो भारत न केवल अपने पर्यावरणीय दायित्वों को निभा सकेगा, बल्कि वैश्विक हरित शिपिंग व्यवस्था में एक भरोसेमंद भागीदार के रूप में भी उभरेगा। असली सफलता इसी में होगी कि विकास की रफ्तार समुद्र की सेहत और तटों के जीवन से टकराए नहीं, बल्कि उनके साथ कदम मिलाकर आगे बढ़े।

1908 के पोर्ट्स एक्ट की जगह इंडियन पोर्ट्स एक्ट, 2025 लागू

बंदरगाह वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत भी रहे हैं। कई बंदरगाह मैंग्रोव जंगलों, दलदली इलाकों, कोरल रीफ और घनी आबादी वाले तटीय शहरों के नजदीक स्थित हैं, जिससे इन शहरों और समुद्र दोनों ही के लिए पर्यावरणीय जोखिम बढ़ जाता है। इस दिशा में एक बड़ा बदलाव लाने के लिए 1908 के पुराने पोर्ट्स एक्ट की जगह इंडियन पोर्ट्स एक्ट, 2025 को लागू कर दिया गया है। इस नए कानून को समुद्री प्रशासन की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। क्‍योंकि, इसमें पर्यावरण सुरक्षा को मज़बूती के साथ कानून का हिस्सा बनाया गया है। इस तरह बंदरगाहों के विकास में अब टिकाऊ विकास (सस्‍टेनेबल डेवलपमेंट) केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त बन चुका है।

बंदरगाहों से हो रहा भारत का 95% विदेशी व्यापार
इस समय भारत का लगभग 95% विदेशी व्यापार मात्रा के लिहाज से बंदरगाहों के माध्यम से हो रहा है। ऐसे में बंदरगाह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। पिछले 10 वर्षों में बड़े बंदरगाहों से माल की आवाजाही करीब 581 मिलियन टन से बढ़कर लगभग 855 मिलियन टन तक पहुंच गई है। यह वृद्धि देश के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आ रही मजबूती और ग्‍लोबल व्‍यापर व वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की बढ़ती हिस्‍सेदारी को दर्शाती है।
<div class="paragraphs"><p>देश के बंदरगाहों से लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी जुड़ी हुई है। इसलिए इनके विकास से स्‍थानीय समुदायों को भी लाभ मिलने की उम्‍मीद है।&nbsp;</p></div>

देश के बंदरगाहों से लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी जुड़ी हुई है। इसलिए इनके विकास से स्‍थानीय समुदायों को भी लाभ मिलने की उम्‍मीद है। 

स्रोत : शरत चंद्र प्रसाद

स्थानीय समुदायों को मिलेगा बदलावों का लाभ 

बंदरगाहों के रोज़मर्रा के कामों के संचालन में भी बड़े पैमाने पर सुधार किए जा रहे हैं। इसके तहत ‘शोर-टू-शिप पावर सिस्टम’ के जरिए जहाज बंदरगाह पर खड़े रहने के दौरान अपने डीजल इंजन को बंद रखेंगे। इससे तट पर इन जहाजों के उत्‍सर्जन में कमी आने से आसपास के शहरों में वायु प्रदूषण में कमी आएगी। इसके अलावा जहाजों की लोडिंग-अनलोडिंग जैसी प्रक्रियाओं में बिजली से चलने वाली क्रेन, वाहन और माल ढोने वाली मशीनें शोर कम करने वाली मशीनों का इस्‍तेमाल किया जाएगा। इससे प्रदूषण में कमी के साथ ईंधन की बचत होगी और श्रमिकों का काम भी आसान होगा। इस तरह बंदरगाहों पर हो रहे इन बदलावों का सीधा लाभ उन स्थानीय समुदायों को मिलेगा, जो वर्षों से बंदरगाहों से होने वाले प्रदूषण का असर झेलते आ रहे हैं।

बंदरगाहों के जल प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण पर भी ज़ोर

MIV 2030 के तहत अब कुशल जल प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण भी बंदरगाह विकास की प्राथमिकताओं में शामिल हो चुके हैं। नई तकनीकों के जरिए कम मात्रा में अपशिष्ट जल (सीवेज) का निकास और गंदे पानी का पुनः उपयोग किया जा रहा है। पोर्ट में हो रहे विकास कार्यों के लिए हो रही खुदाई से निकले मलबे का भी इस्तेमाल निर्माण और ज़मीन के भराव के कामों में किया जा रहा है। साथ ही मैंग्रोव वनों के पुनरुद्धार और हरियाली बढ़ाने से न केवल कार्बन अवशोषण में मदद मिलेगी, बल्कि तटीय क्षेत्रों को तूफानों और कटाव से भी सुरक्षा मिलेगी। इससे पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के संरक्षण में मदद मिलेगी।

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