नेपाल में बाढ़ से मची तबाही बांध और सुरंग परियोजनाओं की बांध, जलविद्युत और सुरंग सड़क परियोजनाओं की निगरानी और सुरक्षा बढ़ाएगी सरकार।
फोटो : फ्री पिक
नेपाल में GLOF की तबाही के बाद केंद्र सरकार सतर्क, हिमालय की बांध और सुरंग परियोजनाओं की होगी कड़ी निगरानी
ग्लेशियर झील के फटने से नेपाल में आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड से जलविद्युत परियोनाओं और टनल व बांधों को हुए नुकसान ने भारत के हिमालयी राज्यों में ऐसे ही बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्टों की सुरक्षा को लेकर केंद्र की चिंता बढ़ा दी है। इसे लेकर इन राज्यों की सरकारों के साथ ही केंद्र सरकार भी एक्शन में आ गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने हिमाचल प्रदेश समेत हिमालयी और उत्तर-पूर्वी राज्यों में निर्माणाधीन जल विद्युत परियोजनाओं तथा सड़क सुरंगों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा शुरू कर दी है। पीएमओ ने राज्यों से विशेष तौर पर यह जानकारी मांगी है कि पहाड़ों की खोदाई के दौरान दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए कौन-कौन से सुरक्षा प्रोटोकाल अपनाए जा रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इसे लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के सलाहकार तरुण कपूर की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय वर्चुअल बैठक भी आयोजित की गई।
राज्यों के साथ PMO की इस बैठक में संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में चल रहे टनल निर्माण की स्थिति पर गहन चर्चा हुई। हिमाचल प्रदेश की ओर से राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव आरडी नजीम और प्रधान सचिव देवेश कुमार ने शिमला से बैठक में हिस्सा लिया। नेपाल की घटना के संदर्भ में हिमाचल में सतलुज, ब्यास और रावी नदी बेसिन में करीब एक दर्जन छोटे-बड़े बांध और जल विद्युत प्रोजेक्ट में जोखिम कम करने और आपदा की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने को लेकर राज्य से फीडबैक लिया गया। इनमें से कई परियोजनाओं में पानी की आवाजाही सुरंगों के माध्यम से होती है, जबकि कुछ परियोजनाओं में टनल निर्माण अभी जारी है। चंडीगढ़-शिमला और कीरतपुर-मनाली फोरलेन पर कई सुरंगें बन चुकी हैं और कुछ हिस्सों में निर्माण चल रहा है। मटौर-शिमला और पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी एनएचएआई टनल परियोजनाओं पर काम कर रहा है।
टनल प्रोजेक्ट को सामान्य परियोजना की तरह न देखें
बैठक में पीएमओ ने कहा कि हिमालय की जटिल भूगर्भीय परिस्थितियों को देखते हुए वहां चल निर्माणाधीन टनल निर्माण को सामान्य निर्माण गतिविधि के तौर पर नहीं लिया जा सकता। प्रोजेक्ट के लिए किसी भी तरह की खुदाई शुरू करने से पहले और निर्माण के दौरान विस्तृत जियोलॉजिकल सर्वे, आधुनिक रॉक सपोर्ट सिस्टम, पानी के रिसाव की निगरानी और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसे उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। उद्देश्य यह है कि किसी भी भूगर्भीय हलचल, जल रिसाव या ढांचागत कमजोरी के संकेत समय रहते मिल सकें और बड़ी दुर्घटना से पहले आवश्यक कदम उठाए जा सकें। सुरंग निर्माण से पहले विस्तृत जियोलॉजिकल सर्वे, निर्माण के दौरान आधुनिक रॉक सपोर्ट सिस्टम, पानी के रिसाव की निगरानी और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसे उपायों को प्रभावी तरीके से लागू करना जरूरी है। इसका उद्देश्य किसी भूगर्भीय हलचल, पानी के दबाव में बदलाव या ढांचागत कमजोरी के संकेत को दुर्घटना से पहले पकड़ना है।
हिमाचल में दर्जन भर बड़े बांध और हाइड्रो प्रोजेक्ट
हिमाचल प्रदेश इस समीक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है। राज्य के सतलुज, ब्यास और रावी नदी बेसिन में करीब एक दर्जन छोटे-बड़े बांध और जलविद्युत प्रोजेक्ट हैं। कई परियोजनाओं में पानी को ले जाने और बिजली उत्पादन की व्यवस्था सुरंगों के जरिये होती है, जबकि कुछ परियोजनाओं में अभी सुरंग निर्माण चल रहा है।
मसलन, SJVN की सुन्नी डैम परियोजना सतलुज पर विकसित की जा रही है। परियोजना की क्षमता 382 मेगावाट है और इसमें भूमिगत पावर हाउस का प्रावधान है। SJVN के अनुसार परियोजना में 95 मीटर ऊंचे कंक्रीट बांध का निर्माण किया जा रहा है।
इसी तरह केंद्र की 2029-30 तक की जलविद्युत क्षमता वृद्धि योजना में हिमाचल की पारबती-II, धौलासिद्ध, कुठेड़ और अन्य परियोजनाएं शामिल हैं। केंद्र की सूची में हिमाचल के अलावा उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की कई बड़ी परियोजनाएं भी निर्माणाधीन दर्ज हैं।
उत्तराखंड में भी बड़ी भूमिगत परियोजनाएं
उत्तराखंड में विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। THDC के अनुसार यह 444 मेगावाट की रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना चमोली जिले में अलकनंदा नदी पर है। इसमें 65 मीटर ऊंचा कंक्रीट डायवर्जन बांध, 13.4 किलोमीटर लंबी हेड रेस टनल और 3.04 किलोमीटर लंबी टेल रेस टनल शामिल हैं। परियोजना का पावर हाउस भूमिगत है।
THDC की अगस्त 2026 की परियोजना स्थिति के अनुसार विष्णुगाड-पीपलकोटी अभी निर्माणाधीन है। कंपनी ने पहली यूनिट को दिसंबर 2027 और अंतिम यूनिट को जून 2028 तक चालू करने का लक्ष्य बताया है।
यही कारण है कि हिमालयी परियोजनाओं की सुरक्षा में केवल बांध की मजबूती देखना पर्याप्त नहीं होगा। बांध के साथ हेड रेस टनल, टेल रेस टनल, भूमिगत पावर हाउस, सर्ज शाफ्ट और पहाड़ी ढलानों की निगरानी भी जरूरी होगी।
अरुणाचल से जम्मू-कश्मीर तक फैला है जोखिम
केंद्र की जलविद्युत क्षमता वृद्धि योजना में हिमालयी राज्यों की परियोजनाओं का बड़ा हिस्सा है। अरुणाचल प्रदेश में 2000 मेगावाट की सुबनसिरी लोअर परियोजना और 1200 मेगावाट की कलाई-II परियोजना, सिक्किम में रंगित-IV और तीस्ता-VI, जम्मू-कश्मीर में पाकल दुल, किरू और क्वार तथा हिमाचल और उत्तराखंड की कई परियोजनाएं इस सूची में शामिल हैं।
अरुणाचल की सुबनसिरी लोअर परियोजना के संबंध में NHPC के 2026 के दस्तावेजों में भी परियोजना स्थल पर बाढ़ से संबंधित डी-वॉटरिंग पंप और अन्य उपकरणों का उल्लेख मिलता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि बड़े हिमालयी निर्माण स्थलों पर बाढ़ प्रबंधन स्वयं परियोजना सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है
हिमालयी राज्यों के प्रमुख बांध, हाइड्रो व टनल प्रोजेक्ट
नेपाल की घटना ने क्यों बढ़ाई चिंता?
नेपाल की घटना का सबसे बड़ा सबक यह है कि हिमालय में खतरा केवल तेज बारिश या नदी में अचानक बढ़े जलस्तर तक सीमित नहीं है। ग्लेशियर, बर्फ, चट्टान और मलबे के अचानक खिसकने से कुछ ही समय में नदी की पूरी धारा का व्यवहार बदल सकता है। 26 अगस्त की घटना में हिमालयी क्षेत्र से आई भारी मात्रा में बर्फ और मलबे ने नदी घाटी में विनाशकारी फ्लैश फ्लड पैदा की। यह नेपाल से सटे भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी एक बड़े खतरे की घंटी है। क्योंकि हिमालयी राज्यों में कई जलविद्युत परियोजनाएं ऐसी घाटियों में हैं जहां नदी, पहाड़, सुरंग और भूस्खलन का जोखिम एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
चीन ने नेपाल को नहीं दी पूर्व सूचना
नेपाल की घटना से भारत के चिंतित होने की एक वजह नेपाल को समय रहते चीन से ग्लेशियल झील के फटने (Glacial Lake Outburst Flood) यानी GLOF के कारण फ्लैश फ्लड (Flash Flood) आने की कोई पूर्व सूचना न मिलना भी है। अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक नेपाल और चीन की सीमा से लगे हिमालयी घाटी में पानी, कीचड़ और चट्टानों की एक विशाल दीवार के आने से सैकड़ों लोगों की मौत होने से तीन महीने पहले , दोनों देशों के विशेषज्ञ और अधिकारी काठमांडू में इस तरह की आपदाओं के जोखिम पर चर्चा करने के लिए मिले थे। नेपाल की राजधानी में 27 मई को हुई बैठक में, नेपाल के 10 अधिकारियों और चीन के लगभग एक दर्जन अधिकारियों ने, जिनमें तिब्बत क्षेत्र के अधिकारी भी शामिल थे, जहां आपदा आई थी, बाढ़, मौसम और ग्लेशियर से संबंधित खतरों की निगरानी और प्रतिक्रिया के लिए सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा की, जैसा कि नेपाली पक्ष द्वारा तैयार किए गए एजेंडा में बताया गया है, जिसे रॉयटर्स ने देखा है। दो नेपाली अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया कि बैठक के बाद उन्हें ग्लेशियरों के खतरे और जलस्तर के बारे में चीन से उतनी जानकारी नहीं मिली जितनी वे चाहते थे और उन्हें डर है कि अपर्याप्त डेटा साझाकरण बड़ी आपदाओं का अनुमान लगाने और उनसे निपटने की उनकी क्षमता में बाधा डाल सकता है।
अब सुरक्षा व्यवस्था में क्या बदल सकता है?
इस समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण संभावित असर यह हो सकता है कि परियोजनाओं में सुरक्षा को केवल निर्माण मानकों और संरचनात्मक मजबूती तक सीमित न रखकर पूरे आपदा-जोखिम चक्र (Disaster-risk cycle) के रूप में देखा जाए। यानी परियोजना शुरू करने से पहले भूगर्भीय अध्ययन, निर्माण के दौरान लगातार निगरानी और परियोजना चालू होने के बाद भी जलस्तर, ढलान, सुरंग और आसपास के भूभाग की निगरानी। रियल-टाइम सेंसर, जलस्तर मापक, भू-स्खलन और चट्टान की हलचल की निगरानी, सुरंगों में पानी के दबाव की निगरानी तथा आपातकालीन संचार प्रणाली इस व्यवस्था का हिस्सा बन सकते हैं। इसके साथ ही परियोजना स्थल पर काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों के लिए निकासी मार्ग, वैकल्पिक रास्ते, आपातकालीन आश्रय और रेस्क्यू ड्रिल भी महत्वपूर्ण होंगे।
निष्कर्ष: विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी
हिमालय भारत की जलविद्युत और रणनीतिक बुनियादी ढांचा जरूरतों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन यही क्षेत्र भूकंप, भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, क्लाउड बर्स्ट और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील भी है। नेपाल की घटना ने हिमालय के संवेदनशील इलाकों मेंं विकास परियोजनाओं और पर्यावरण के बीच संतुलन पर ध्यान देने की ज़रूरत को एक बार फिर गहराई से सोचने को मजबूर किया है।
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