तमिलनाडु में लागू हुआ शराब पर 10 रुपये ‘पर्यावरण सेस’ खाली बोतल लौटाने पर वापस मिलेंगे पैसे

पुरानी बोतलों को दोबारा इस्‍तेमाल करके भी पर्यावरण का संरक्षण किया जा सकता है।

फोटो : विकी कॉमंस 

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  • बोतलों के रीयूज, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देकर की जाएगी राज्‍य में पर्यावरण संरक्षण और पानी की बचत 

  • उपकर से मिली रकम से बनेगा रीसाइक्लिंग के लिए नया तंत्र, नशा मुक्ति और जागरूकता जैसे सामाजिक कार्यों पर खर्च होगी राशि

  • TASMAC की खुदरा शराब दुकानों पर 1 नवंबर 2026 से लागू हुई नई व्यवस्था 

चीजों का दोबारा इस्‍तेमाल (Reuse) करके हम पर्यावरण को बचाने में एक बड़ा योगदान दे सकते हैं। इसी दिशा में एक महत्‍वपूर्ण पहल करते हुए तमिलनाडु में शराब की हर बोतल पर 10 रुपये का पर्यावरण एवं सामाजिक कल्याण उपकर लगाया है। राज्य सरकार ने यह कदम शराब की खाली बोतलों के दोबारा इस्‍तेमाल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाया है। इसीलिए पुरानी बोतल विक्रेता को वापस देने पर 10 रुपये की राशि वापस लौटाने का भी प्रावधान रखा गया है। असके अलावा इस उपकर से  पुनर्चक्रण (Recycling) और पर्यावरण संरक्षण (Environmental protection) के लिए संसाधन जुटाने और सामाजिक कार्यों के लिए धन एकत्र करने का भी लक्ष्‍य है। तमिलनाडु स्टेट मार्केटिंग कॉरपोरेशन (TASMAC) की खुदरा शराब दुकानों पर यह व्यवस्था 1 नवंबर 2026 से लागू हो गई है। इसके साथ ही शराब की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) में 10 रुपये का उपकर जोड़ दिया गया है। 

शराब की बोतलों से पर्यावरण को कितना नुकसान?

शराब की खाली बोतलें अक्सर इस्तेमाल के बाद कचरे में फेंक दी जाती हैं। कांच की बोतलें प्राकृतिक रूप से जल्दी विघटित नहीं होतीं। खुले में पड़ी बोतलें टूटकर नुकीले टुकड़ों में बदल सकती हैं, जिससे लोगों और पशुओं के घायल होने का खतरा रहता है। नालों, जलाशयों और नदी किनारों पर जमा कांच का कचरा सफाई की चुनौती बढ़ाता है। वहीं, प्लास्टिक या अन्य सामग्री से बने शराब के कंटेनरों का अनुचित निपटान भी पर्यावरण के लिए समस्या बन जाता है। क्‍योंकि, शराब की खाली बोतलें इस्तेमाल के बाद खुले में फेंक दी जाएं तो वे केवल कचरे का हिस्सा नहीं बनतीं, बल्कि छोटे जीवों के लिए भी खतरा पैदा कर सकती हैं। इस संबंध में प्रतिष्ठित साइंस जर्नल Science of the Total Environment में Bottled & canned – Anthropogenic debris as an understudied ecological trap for small animals शीर्षक से प्रकाशित एक अध्ययन में पोलैंड के व्रोकला शहर के 10 शहरी वन क्षेत्रों से 939 फेंके गए पेय पदार्थों के कंटेनर एकत्र किए गए। इनमें से 56 फीसदी कंटेनरों में मृत जीव मिले। शोधकर्ताओं ने कुल 10,162 मृत जीवों की पहचान की, जिनमें 10,139 अकशेरुकी और 23 कशेरुकी जीव थे। अध्ययन में पाया गया कि कांच और प्लास्टिक की बोतलों में एल्युमिनियम के डिब्बों की तुलना में मृत जीवों की संख्या अधिक थी। शोधकर्ताओं ने ऐसे कंटेनरों को छोटे जीवों के लिए एक तरह का पारिस्थितिक जाल बताया, जिसमें फंसकर उनकी मौत हो सकती है।

बातलें वापस करने पर कांच को रिसाइकिल कर नई बोतलें बनाई जा सकती हैं। इससे नए कच्चे माल की जरूरत घटती है और कांच के निर्माण में लगने वाली ऊर्जा की बचत की संभावना रहती है। हालांकि इसके लिए इस्तेमाल की गई बोतलों का व्यवस्थित संग्रह, छंटाई और सुरक्षित परिवहन जरूरी है। यदि बोतलें कचरे में बिखर जाएं या दूसरे कचरे के साथ मिल जाएं, तो उन्हें दोबारा इस्तेमाल करना कठिन हो जाता है। तमिलनाडु की नई व्यवस्था इसी समस्या से निपटने का प्रयास है। सरकार ने उपकर से मिलने वाली राशि को पर्यावरण संरक्षण के साथ शराब की बोतलों के सुरक्षित निपटान और पुनर्चक्रण से जोड़ने का प्रावधान किया है। साथ ही पर्यावरण संरक्षण के दायरे में पारिस्थितिकी, वन और वन्यजीवों की बहाली जैसे कार्य भी इसमें शामिल हैं।

नीलगिरि में पहले भी चल रही थी बोतल वापसी की योजना

तमिलनाडु में खाली शराब की बोतलों को वापस लेने की योजना नई नहीं है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरणीय नुकसान को कम करने के लिए TASMAC ने पहले नीलगिरि और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में बोतल वापसी योजना शुरू की थी। बाद में इसे राज्य के दूसरे जिलों तक बढ़ाया गया। इसके तहत उपभोक्ता खाली बोतल लौटाकर 10 रुपये वापस पा सकते थे। लेकिन, इस व्यवस्था में व्‍यावहारिक स्‍तर पर एक बड़ी समस्या सामने आ रही थी। तीन TASMAC दुकानों पर किए गए पायलट प्रोजेक्‍ट में केवल 55 से 65 फीसदी बोतलें वापस मिलीं। यह आंकड़ा राज्य सरकार के पहले के अध्ययन में किए गए दावे से अलग था, जिसमें 99 फीसदी बोतलों की वापसी की संभावना जताई गई थी। इसके अलावा बोतल वापसी की राशि के हिसाब-किताब को लेकर सवाल उठे थे। बोतल वापसी योजना के तहत हर महीने करीब 300 करोड़ रुपये जमा होते थे। पर, बड़ी संख्या में बोतलों के वापस न आने से राशि अटक जा रही थी और इसके एक बड़े हिस्‍से का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा था। अब एक नए उपकर के रूप में यह राशि लिए जाने से इस राशि को सरकारी रिकॉर्ड में लाकर इसके इस्‍तेमाल में आने वाली बाधा दूर होने की उम्‍मीद है। साथ ही इससे पारदर्शिता भी बढ़ेगी ।

नई व्यवस्था के तहत अब शराब की कीमत में ही 10 रुपये का पर्यावरण एवं सामाजिक कल्याण उपकर लिया जा रहा है। अब यह राशि अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) में शामिल है। जबकि, पहले उपभोक्ताओं को बोतल की कीमत के अलावा अलग से 10 रुपये देने पड़ते थे, जिसे एक अलग मद में जमा करके होल्‍ड पर रखा जाता था। इस व्‍यवस्‍था के चलते काफी समय तक इस रकम का इस्‍तेमाल नहीं हो पा रहा था कि रकम खर्च कर दिए जाने के बाद अगर ज्‍यादा संख्‍या में बोतलों की वापसी होती है, तो ग्राहकों को पैसे लौटाने की व्‍यवस्‍था से कहां से की जाएगी, इसकी कोई व्‍यवस्‍था नहीं थी। उपकर की नई व्‍यवस्‍था से यह व्‍यावहारिक दिक्‍कत खत्‍म हो गई है। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है कि यदि किसी शराब की बोतल की पुरानी कीमत 170 रुपये थी, तो अब उसकी कीमत 180 रुपये होगी। लेकिन खाली बोतल लौटाने पर उपभोक्ता को 10 रुपये वापस मिल जाएंगे। यानी बोतल लौटाने वाले उपभोक्ता के लिए अतिरिक्त खर्च नहीं होगा। जो लोग बोतल वापस नहीं करेंगे, उनके लिए यह राशि खर्च का हिस्सा बन जाएगी।

नई व्‍यवस्‍था के तहत TASMAC ने निर्देश दिया है कि उपभोक्ताओं से संशोधित कीमत (उपकर सहित) से अधिक कोई रकम न ली जाए। खाली बोतल कभी भी और किसी भी TASMAC दुकान पर लौटाई जा सकती है, चाहे वह वहीं से खरीदी गई हो या किसी दूसरी दुकान से। इस तरह नई व्‍यवस्‍था में बोतल वापसी की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रयास किया गया है।

बोतलों की रीसाइक्लिंग के लिए बनेगा नया तंत्र

इस व्यवस्था को केवल शराब पर नया कर लगाने के फैसले के रूप में देखना ठीक नहीं होगा। इसके पीछे खाली बोतलों को वापस लेने, उनके पुनर्चक्रण की व्यवस्था बनाने और अब तक अलग से वसूली जा रही राशि का हिसाब-किताब सरकारी रिकॉर्ड में लाने की कोशिश भी है। इसीलिए TASMAC ने दुकानों को खाली बोतलें जमा करने, गिनने और सुरक्षित रखने के लिए अतिरिक्त राशि देने का फैसला भी किया है। आगे चलकर दुकानों पर रिवर्स वेंडिंग मशीनें लगाने की योजना है। इन मशीनों के जरिए खाली बोतलों के संग्रह, गिनती और सत्यापन का काम स्‍वचालित हो जाएगा। इसके साथ ही बोतलों के पुनर्चक्रण और निपटान के लिए निर्माताओं की जिम्मेदारी तय करने की दिशा में भी काम हो रहा है। यह व्यवस्था सफल होती है तो शराब की खाली बोतलों को कचरे में फेंकने के बजाय उन्हें वापस लेकर रीयूज या रिसाइकिल करने की प्रक्रिया में आसान हो जाएगी। हालांकि, इस सबके बावजूद इस पूरी कवायद का वास्तविक पर्यावरणीय लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि कितनी बोतलें वापस आती हैं, उनमें से कितनी दोबारा इस्तेमाल करने की हालत में मिलेंगी और कितनी बोतलों को रिसाइकिल करना होगा।

<div class="paragraphs"><p>कांच की बोतलों के निर्माण की प्रक्रिया में अच्‍छी खासी मात्रा में पानी का इस्‍तेमाल होता है। बोतलों को दोबारा इस्‍तेमाल कर इस पानी की बचत की जा सकती है।&nbsp;</p></div>

कांच की बोतलों के निर्माण की प्रक्रिया में अच्‍छी खासी मात्रा में पानी का इस्‍तेमाल होता है। बोतलों को दोबारा इस्‍तेमाल कर इस पानी की बचत की जा सकती है। 

फोटो : विकी कॉमंस

सामाजिक कल्याण पर भी खर्च होगी रकम

तमिलनाडु सरकार ने इस उपकर को ‘पर्यावरण एवं सामाजिक कल्याण उपकर’ (Environmental and Social Welfare Cess) का नाम दिया है। इसके तहत जुटाई गई राशि का उपयोग केवल बोतलों के रीयूज और रीसाइकिलिंग तक सीमित नहीं रहेगा। इस रकम से शराब के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता अभियान चलाने, शराब की लत से प्रभावित लोगों के पुनर्वास और नशामुक्ति और शराब से प्रभावित परिवारों की आर्थिक मदद व आजीविका में सहायता करने जैसे सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों के लिए भी धन उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इस तरह राज्य सरकार ने शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व को उसके सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों से जोड़ने की कोशिश की है। इसके मूल्‍यांकन के लिए इस बात का आकलन भी करना होगा कि सरकार की इस पहल से खुले में फेंकी जाने वाली शराब की बोतलों की संख्या में कितनी कमी आई । 

समाज कल्‍याण की इन गतिविधियों को अच्‍छी तरह से चलाने के लिए यह भी जरूरी है कि उपकर से जुटाई गई राशि का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से हो और उसके परिणामों की नियमित जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि पूरी प्रक्रिया में एक जवाबदेही बनी रहे। कुल मिलाकर इस पहल की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि सरकार को कितनी राशि मिली। यह देखना भी जरूरी होगा कि कितनी बोतलें वापस आईं, कितनी बोतलों का दोबारा इस्‍तेमाल या रीसाइक्लिंग हुई। यदि यह व्यवस्था बोतलों के संग्रह से लेकर उनके सुरक्षित निपटान तक पूरी तरह काम करती है, तो यह शराब की बोतलों से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कम करने का एक प्रभावी तरीका बन सकती है और तमिलनाडु का यह प्रयोग दूसरे राज्यों के लिए भी उपयोगी उदाहरण बन सकता है।

बोतलों के दोबारा  इस्तेमाल से कैसे बचा सकता है पानी?

तमिलनाडु में शराब की खाली बोतलों को वापस लेने की व्यवस्था को जल संरक्षण के नजरिये से भी देखा जा सकता है। क्‍योंकि, कांच की बोतल की निर्माण प्रक्रिया में ऊर्जा के साथ ही बड़ी मात्रा में पानी का इस्‍तेमाल भी किया जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की कांच की बोतलों के जीवन चक्र आकलन (LCA) की रिपोर्ट के मुताबिक, एक टन कांच की बोतलों के निर्माण की पूरी प्रक्रिया में करीब 46,728 लीटर पानी की खपत दर्ज की गई। इस तरह यह आंकड़ा बताता है कि बोतल को इस्तेमाल के बाद फेंकने के बजाय दोबारा इस्तेमाल करके इस पानी को काफी हद तक बचाया जा सकता है। क्‍योंकि कांच की बोतलों के पुन: इस्तेमाल में नई बोतल बनाने की तुलना में पानी की खपत काफी कम होती है। रीयूज में बोतलों को दोबारा भरने से पहले केवल उनकी धुलाई करने की जरूरत ही होती है। एक लौटाई गई कांच की बोतल को धोने के लिए प्रति बोतल करीब 300 मिलीलीटर पानी ही खर्च होता है। जबकि, एक 300 ग्राम की कांच की बोतल के निर्माण में करीब 14 लीटर पानी खर्च होने का अनुमान है, इस तरह देखा जाए, तो प्रत्‍येक बोतल को दोबारा इस्तेमाल करने से हर बार करीब 13.7 लीटर पानी की बचत हो सकती है। बोतल को कई बार इस्तेमाल करके पानी की इस खपत में काफी ज्‍यादा कमी लाई जा सकती है। इस तरह शराब की बोतलों के रीयूज से नए कांच के निर्माण का पर्यावरणीय प्रभाव कम हो सकता है। इस तरह शराब की बोतलों पर पर्यावरण उपकर और जमा-वापसी की व्यवस्था जल संरक्षण में भी सहायक सिद्ध हो सकती है। हालांकि, पानी की वास्तविक बचत इस बात पर निर्भर करेगी कि कितनी बोतलें वापस आती हैं, कितनी बार इस्तेमाल होती हैं और उनकी सफाई में कितना पानी लगता है। यदि बोतलें खराब हालत में मिलने यानी दोबारा इस्‍तेमाल लायक न होने पर पर उन्‍हें रीसाइक्लिंग के लिए भेजना पड़ता है, तब भी नई बोतल के निर्माण में लगने वाले कच्चे माल, ऊर्जा और पानी की बचत होगी। क्‍योंकि, इसमें नए सिरे से कांच का उत्‍पादन नहीं करना होगा। बने बनाए कांच को पिघला कर नई बोतल बनाने में अपेक्षाकृत कम पर्यावरणीय नुकसान होगा।  हालांकि इस प्रक्रिया में पानी की बचत सीमित रहेगी।

तमिलनाडु में बढ़ते भूजल दोहन से गहराता जल संकट

तमिलनाडु में पेयजल की उपलब्धता का संकट केवल कम बारिश से नहीं, बल्कि भूजल के अत्यधिक दोहन से भी जुड़ा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) के REPORT ON DYNAMIC GROUNDWATER RESOURCES OF TAMIL NADU 2024 आकलन के मुताबिक राज्य में सालाना भूजल निकासी 14.45 अरब घन मीटर है। इसके मुकाबले सालाना 21.51 अरब घन मीटर भूजल का पुनर्भरण होता है, जबकि इस्तेमाल के लिए उपलब्ध संसाधन 19.46 अरब घन मीटर हैं। यानी राज्य में भूजल दोहन का स्तर उपलब्ध संसाधन का 74.26 फीसदी है।

इन आंकड़ों को देखकर ऊपरी तौर पर तो यही लगता है कि तमिलनाडु में सालाना जितना भूजल जमीन से निकाला जा रहा है, उससे अधिक पानी बारिश के जरिए जमीन में पहुंच रहा है। लेकिन, वास्‍तविकता में तस्‍वीर थोड़ी जटिल है, क्‍योंकि राज्‍य के हर इलाके में भूजल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। बारिश का पानी पूरे राज्य में एक समान नहीं बरसता और न ही हर जगह जमीन के भीतर एक समान मात्रा में पहुंचता है। जिन इलाकों में भूजल का दोहन लगातार अधिक हो रहा है, वहां भूजल स्तर गिर सकता है, भले ही राज्य का कुल भूजल भंडार बढ़ रहा हो। इसके अलावा, भूजल का एक हिस्सा जमीन की गहरी परतों में जमा होता है, जहां से उसे निकालना आसान नहीं होता। इसलिए राज्य के कुल आंकड़ों के बजाय स्थानीय स्तर पर भूजल की उपलब्धता और निकासी का संतुलन देखना जरूरी है। 

सबसे ज्‍यादा चिंताजनक स्थिति उन इलाकों की है, जहां भूजल का इस्तेमाल प्राकृतिक पुनर्भरण से अधिक हो रहा है। राज्य की 313 आकलन इकाइयों में से 106 यानी करीब 34 फीसदी को अति-दोहित यानी Over-exploited श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा 20 इकाइयां गंभीर यानी Critical और 55 अर्ध-गंभीर Semi-critical श्रेणी में हैं। इस तरह कुल 181 यानी करीब 58% इकाइयां भूजल दबाव का सामना कर रही हैं। यहां आकलन इकाइयों से मतलब भूजल आकलन के लिए निर्धारित प्रशासनिक क्षेत्र हैं, जिनमें मुख्य रूप से ब्लॉक, तालुक और कुछ मामलों में फिरका (राजस्व उपखंड) शामिल हैं। यह स्थिति बताती है कि राज्य में पेयजल आपूर्ति के लिए भूजल पर निर्भरता को कम करना और वर्षा जल का बेहतर संचय करना कितना जरूरी है।

बिगड़ती जा रही है भूजल की गुणवत्ता 

तमिलनाडु में जल संकट का दूसरा पहलू भूजल की गुणवत्ता का लगातार बिगड़ते जाना है। इसका कारण भूजल का बढ़ता खारापन और प्रदूषण है। राज्‍य के कई तटीय जिलों में समुद्र का खारा पानी जमीन के भीतर रिसकर भूजल से मिलकर उसे खारा कर रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के नवंबर 2024 के जलस्तर बुलेटिन के मुताबिक तमिलनाडु और पुडुचेरी के कुछ इलाकों में भूजल की गुणवत्ता भी गंभीर चिंता का विषय बन गई है। राज्य के भूजल संसाधन आकलन में पांच इकाइयों को खारे भूजल वाली श्रेणी में रखा गया है। खारे भूजल की समस्या तटीय क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता को और जटिल बना सकती है। समुद्र के नजदीक भूजल का अत्यधिक दोहन होने पर खारे पानी के मीठे जलभृतों में प्रवेश का खतरा बढ़ता है। इसके अलावा, भूजल में फ्लोराइड, नाइट्रेट और अन्य प्रदूषकों की मौजूदगी भी पेयजल की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में जल संकट से निपटने के लिए उसकी खपत में कमी लाना जरूरी है। शराब पर उपकर लगाने के कदम को इसी दिशा में की गई एक कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।

नदियों में प्रदूषण से भी घट रही जल की उपलब्धता

तमिलनाडु की नदियों में तेजी से बढ़ रहा जल प्रदूषण भी एक गंभीर समस्या है। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2023 की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2022 में राज्य की 10 नदी धाराओं को प्रदूषित घोषित किया था। इनमें कावेरी, भवानी, तामिरापरनी, पलार, अमरावती, अड्यार और कूवम जैसी नदियों के हिस्से शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार प्रदूषण का प्रमुख कारण शहरी स्थानीय निकायों से निकलने वाला अनुपचारित घरेलू सीवेज और भारी मात्रा में ठोस कचरा नदियों में फेंका जाना है। प्रदूषण की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सलेम से पाप्पारापट्टी तक थिरुमनिमुथारू नदी का 15 किलोमीटर हिस्सा और वसिष्ठा नदी का 10 किलोमीटर हिस्सा सबसे गंभीर प्रदूषण वाली प्राथमिकता-1 श्रेणी में रखा गया था। इसी तरह कूवम और अड्यार नदियों के भी प्रदूषित हिस्से दर्ज किए गए थे। नदियों में प्रदूषण बढ़ने से उपलब्ध जल का बड़ा हिस्सा सीधे पेयजल के रूप में इस्तेमाल करने योग्य नहीं रह जाता।

दूसरे राज्‍यों में भी उठाए जा चुके हैं इस तरह के कदम 

तमिलनाडु की शराब की बोतलों पर 10 रुपये के पर्यावरण एवं सामाजिक कल्याण उपकर की तरह ही भारत के दूसरे राज्यों में भी ऐसे प्रयोग भी किए जा चुके हैं। इनमें पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ताओं से शुल्क वसूलना या कचरा लौटाने पर पैसा वापस देने की व्यवस्था शामिल हैं। इनमें सबसे प्रासंगिक उदाहरण उत्तराखंड, गोवा और हिमाचल प्रदेश के हैं। दोनों राज्यों में बोतलों की वापसी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा-वापसी योजना लागू की गई है। 

उत्तराखंड में 2025-26 में बोतल वापसी दर बढ़कर 90 फीसदी तक पहुंच गई। गंगोत्री में इस साल लगभग 2.73 लाख और यमुनोत्री में 1.49 लाख से अधिक इस्तेमाल की जा चुकी बोतलें वापस जमा हुईं।

गोवा ने भी बोतलों और अन्य गैर-जैव अपघटनीय पैकेजिंग कचरे के निपटान के लिए जमा-वापसी योजना बनाई है। गोवा सरकार की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार इस योजना के तहत उपभोक्ता खाली बोतल निर्धारित संग्रह केंद्र पर लौटाकर जमा राशि वापस ले सकते हैं। योजना में कांच, धातु, कठोर और लचीले प्लास्टिक, लैमिनेटेड कार्टन और मल्टीलेयर प्लास्टिक जैसी पैकेजिंग शामिल है। इसके तहत उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को बोतलों पर पहचान संबंधी QR कोड लगाने और वापसी व्यवस्था में भाग लेने की जिम्मेदारी दी गई है।

इसके अलावा हिमाचल प्रदेश में भी जून 2025 में राज्यव्यापी जमा-वापसी योजना शुरू की गई। हिमाचल सरकार की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक इसका उद्देश्य गैर-जैव अपघटनीय पैकेजिंग कचरे को सार्वजनिक स्थानों, सड़कों और नालियों में फेंके जाने से रोकना है। योजना में शराब और अन्य पेय पदार्थों की कांच की बोतलें, प्लास्टिक और एल्युमिनियम के कंटेनर, टेट्रा पैक और मल्टीलेयर पैकेजिंग शामिल हैं। हिमाचल प्रदेश में गैर-पुनर्चक्रण योग्य प्लास्टिक कचरे यानी Non-recyclable plastic waste को भी आर्थिक प्रोत्साहन देकर इकट्ठा करने की व्यवस्था है। राज्य सरकार ने 2019 में बायबैक नीति लागू की, जिसके तहत शहरी स्थानीय निकाय पंजीकृत कचरा बीनने वालों और परिवारों से गैर-पुनर्चक्रण योग्य तथा एकल उपयोग वाले प्लास्टिक कचरे को 75 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीद सकते हैं। इस नीति में खाद्य पदार्थों, दूध, तेल, शैंपू और अन्य उत्पादों की प्लास्टिक पैकेजिंग शामिल है। हालांकि, PET बोतलों और अन्य पुनर्चक्रण योग्य वस्तुओं को इस योजना से बाहर रखा गया है।

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