फोटो - शाहवली के सौजन्य से
पश्चिम एशिया में तनाव का भारत पर असर, ग्लोबल रिपोर्ट में भारत के लिए 30 सुझाव
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहरा रहा है। साथ ही आर्थिक स्थिरता और रोजगार को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। ऐसे में भारत में 1 से 1.2 करोड़ लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। लेकिन अगर भारत इस चुनौती को अवसर के रूप में देखे तो 2047 तक 3.5 करोड़ हरित रोज़गार की संभावना है।
आईपीई ग्लोबल (IPE Global) के एक ताज़ा अध्ययन में भारत पर मंडरा रहे इस संकट को आंकड़ों में समझने के प्रयास किए गए हैं। "Paving a Green Transition: A New Social Contract Amid West Asia Crisis" शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत मौजूदा सरकारी योजनाओं और नीतिगत सुधारों का प्रभावी उपयोग करे, तो वर्ष 2047 तक लगभग 3.5 करोड़ हरित रोजगार (ग्रीन जॉब्स) सृजित किए जा सकते हैं। अध्ययन का अनुमान है कि इससे 2070 तक 15 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की हरित अर्थव्यवस्था विकसित करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। रिपोर्ट में 30 ऐसे नीतिगत सुझाव दिए गए हैं जिन्हें तुरंत लागू किया जा सकता है।
अध्ययन के अनुसार, पीएम-कुसुम, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI), संशोधित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS), पीएम प्रणाम और कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) जैसी मौजूदा योजनाओं के माध्यम से 42 से 53 अरब अमेरिकी डॉलर तक के वित्तीय संसाधन जुटाए जा सकते हैं, वह भी बिना बड़े अतिरिक्त सरकारी खर्च के।
किन राज्यों पर ज्यादा संकट कौन से राज्य सुरक्षित?
अध्ययन के अनुसार पश्चिम एशिया संकट की वजह से नौकरियां जाने का खतरा सबसे ज्यादा केरल, बिहार और उत्तर प्रदेश पर है। वहीं जो राज्य सुरक्षित हैं उनमें राजस्थान और गुजरात हरित रोजगार और नवीकरणीय संसाधनों की वजह से और तमिलनाडु व महाराष्ट्र औद्योगिक गलियारों वजह से सुरक्षित माने जा रहे हैं। ये वो राज्य हैं जो रोजगार सृजन का प्रमुख केंद्र बन कर उभर सकते हैं। इसके लिए कौशल विकास, श्रम प्रवासन और निवेश नीतियों में थोड़े परिवर्तन की जरूरत है।
30 सुझाव जो आईपीई ग्लोबल ने भारत को दिये
आईपीई ग्लोबल के इस अध्ययन में दिए गए सुझावों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है - कृषि, ऊर्जा और उद्योग। सुझाव इस प्रकार हैं -
कृषि क्षेत्र (10 सुझाव)
पीएम-कुसुम योजना को "किसान-ऊर्जा उत्पादक कार्यक्रम" के रूप में पुनर्गठित किया जाए।
किसानों को अतिरिक्त सौर ऊर्जा डिस्कॉम को बेचने की अनुमति दी जाए।
जलवायु-लचीला कृषि मिशन (CRAM) स्थापित किया जाए।
NFSM, NMSA और NAFCC जैसी योजनाओं का एकीकरण किया जाए।
एग्री-स्टैक और मौसम पूर्वानुमान आधारित कृषि सलाह को बढ़ावा दिया जाए।
जलवायु-अनुकूल बीजों का बड़े पैमाने पर प्रसार किया जाए।
प्राकृतिक खेती को 5 करोड़ हेक्टेयर तक विस्तारित किया जाए।
कार्बन बाजारों से किसानों को जोड़ा जाए।
कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) के तहत कृषि कार्बन पद्धतियां विकसित की जाएं।
जलवायु-स्मार्ट खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि ऋण प्रणाली में सुधार किया जाए।
ऊर्जा क्षेत्र (10 सुझाव)
500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य के लिए इमरजेंसी ग्रिड एक्सेलेरेशन प्रोग्राम शुरू किया जाए।
ट्रांसमिशन नेटवर्क का बड़े पैमाने पर आधुनिकीकरण किया जाए।
बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों में निवेश बढ़ाया जाए।
स्मार्ट ग्रिड तकनीकों का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार किया जाए।
नवीकरणीय ऊर्जा निकासी (Evacuation) अवसंरचना विकसित की जाए।
ग्रीन हाइड्रोजन खरीद दायित्व (GHPO) लागू किया जाए।
देशभर में हाइड्रोजन वैली विकसित की जाएं।
जर्मनी, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ ग्रीन हाइड्रोजन निर्यात साझेदारी बनाई जाए।
सौर विनिर्माण क्षमता को 65 GW से बढ़ाकर 200 GW किया जाए।
जलवायु वित्त के लिए एक भारतीय क्लाइमेट फाइनेंस आर्किटेक्चर विकसित किया जाए।
उद्योग क्षेत्र (10 सुझाव)
राष्ट्रीय हरित इस्पात मिशन (National Green Steel Mission) शुरू किया जाए।
ग्रीन हाइड्रोजन आधारित स्टील उत्पादन को बढ़ावा दिया जाए।
स्क्रैप स्टील रीसाइक्लिंग क्षमता का विस्तार किया जाए।
सरकारी खरीद में ग्रीन स्टील को प्राथमिकता दी जाए।
उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं को हरित विनिर्माण से जोड़ा जाए।
ऊर्जा दक्षता और उत्सर्जन कटौती को प्रोत्साहन का आधार बनाया जाए।
MSME ग्रीन ट्रांसफॉर्मेशन मिशन शुरू किया जाए।
MSME को रियायती हरित वित्त उपलब्ध कराया जाए।
MSME के लिए ग्रीन सर्टिफिकेशन और ऊर्जा ऑडिट को बढ़ावा दिया जाए।
MSME इकाइयों में रूफटॉप सोलर और स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों का विस्तार किया जाए।
रिपोर्ट जारी करते हुए आईपीई ग्लोबल के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक अश्वजीत सिंह ने वक्तव्य जारी किया कि ग्लोबल साउथ की आवाज़ को प्रतिध्वनित करने वाले एक भारतीय संगठन के रूप में, हम इस अध्ययन को इस बात का प्रमाण मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य अमूर्त आकांक्षाएं नहीं हैं, वे गहराई से परस्पर जुड़े, कार्योन्मुखी मार्ग हैं। पश्चिम एशिया संकट ने यह उजागर किया है कि ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, आजीविका और जलवायु लचीलापन कितनी गहराई से जुड़े हुए हैं और हमारा विश्लेषण दर्शाता है कि इन्हें अलग-अलग संबोधित करना अब कोई विकल्प नहीं है।
आंकड़े एक ऐसी कहानी कहते हैं जिसे भारत नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। हमारे कच्चे तेल आयात का 85 प्रतिशत, और कृषि, ऊर्जा व उद्योग में 1 करोड़ - 1.2 करोड़ आजीविकाएं पश्चिम एशिया के एकल भू-राजनीतिक झटके से उजागर हैं, यह भेद्यता वास्तविक है। लेकिन अवसर भी उतना ही वास्तविक है। अकेले PM-KUSUM को पुनर्परिभाषित कर किसानों को ऊर्जा उत्पादक बनाकर 50,000 मेगावाट एग्री-सोलर और 15 लाख हरित रोज़गार जोड़े जा सकते हैं, साथ ही प्रतिवर्ष 7 करोड़ टन CO2 समतुल्य में कमी लाई जा सकती है।
अबिनाश मोहंती, जलवायु परिवर्तन एवं सतत विकास प्रैक्टिस प्रमुख, आईपीई ग्लोबल और अध्ययन के प्रमुख लेखक।
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