

वृंदावन से पहले तक
प्रयाग में गंगा के साथ मिलकर तीर्थराज बनाने वाली यमुना खुद हिंडन से शहरी और जहरीली औद्योगिक गंदगी लेने के अलावा खुद भी दिल्ली, गाजियाबाद, वृंदावन, मथुरा और आगरा में तमाम विष ग्रहण करती है।
हिमालय की 6315 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री ग्लेशियर से निकली यमुना हरियाणा दिल्ली और उत्तर प्रदेश तीन राज्यों की सीमा से गुजरती है तथा आगरा के बाद के रास्ते में राजस्थान और मध्यप्रदेश की नदियों खारी, गंभीर, उटंगत और सर्खती तथा चंबल, बेतवा और केन का पानी समेटती हुई गंगा में मिलती है। इन नदियों का पानी मिल जाने से ही इटावा के बाद यमुना देखने में साफ लगती है।
इससे पहले यमुना में प्रदूषण की समस्या गहराने वाले कारणों में से एक उसका काफी पानी सिंचाई, पेयजल और उद्योगों के प्रयोग हेतु निकाल लिया जाता है। यह पानी इतना अधिक निकाल लिया जाता है कि गर्मी के दिनों में यमुना आगरा में ताजमहल के पीछे बहते एक बदबूदार गंदे नाले की शक्ल ले लेती है, जिसमें मुख्यतः फैक्ट्रियों और नगरों का दूषित उत्प्रवाह होता है। यमुना का यही सड़ा पानी आगरा की पेयजल व्यवस्था का मुख्य स्रोत है। आगरा ही क्यों वजीराबाद दिल्ली, से इटावा की 790 कि.मी. की दूरी में यमुना अपने किनारे रहने वाले लगभग दो करोड़ लोगों, पशुओं, पक्षियों का मुख्य जल स्रोत है। इन लोगों के दुर्भाग्य से यमुना का यही हिस्सा सर्वाधिक प्रदूषित है। इस हिस्से में मछलियां नाम मात्र को बची हैं।
सिंचाई के लिए यमुना से पानी निकालने के लिए सबसे पहले हरियाणा का तातेवाला बांध उल्लेखनीय है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सिंचाई के लिए यहां से दो नहरें पूर्वी और पश्चिमी निकलती हैं। यहां से दिल्ली के वजीराबाद बांध तक 280 किमी की दूरी में यमुना में औद्योगिक प्रदूषण के नाम पर बरसात के दिनों खेतों से बहकर कीड़ेमार दवाइयां मात्र आती हैं। वजीराबाद में एक बांध बनाकर दिल्ली की पेयजल आपूर्ति के लिए काफी अधिक पानी निकाल लिया जाता है और बदले में नजफगढ़ यमुना पार दिल्ली तथा कालका जी क्षेत्र से शहरी तथा औद्योगिक कचड़ा मिलता है। कई साल पहले अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के डा. शादाब खुर्शीद ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि नजफगढ़ के 215, यमुनापार के 116 और कालकाजी के 28 उद्योगों से गंदगी यमुना में गिरती है।
वजीराबाद से लगभग 20 किमी. नीचे पुनः ओखला बांध बनाया गया है, जहां से पानी पुनः रोककर आगरा नहर निकाली जाती है। इसी से बदरपुर पावर हाउस के लिये भी पानी लिया जाता है, जो बदले में गरम पानी और राख के रूप में चक बसंतपुर गांव के पास अपना उत्प्रवाह यमुना में छोड़ता है।
पावर हाउस के दूसरी ओर ओखला बैराज के पास शाहदरा ड्रेन आकर यमुना में मिलती है। बरसात में अथवा जब धारा इस किनारे होती है तो यह ड्रेन बैराज के पास ही यमुना में मिल जाती है। इस साल फरवरी, 1989 यह ड्रेन बैराज से चार किमी. आगे चलकर रायपुर गांव के पास यमुना में मिलती है।
शाहदरा ड्रेन में दिल्ली की कई यमुना पार कालोनियां और शाहदरा, साहिबाबाद-चार, पटपड़गंज, खिचड़ीपुर तथा गाजीपुर फार्म से आने वाला औद्योगिक, व्यावसायिक और घरेलू गंदा पानी इतनी अधिक मात्रा में होता है कि उसके मुकाबले यमुना का पानी कम पड़ता है। इस तरह यहां से यमुना नदी के बजाय नाले के रूप में आगे बढ़ती है।
दिल्ली निवासी जयहिंद ने बताया कि इस जगह पर अक्टूबर में काफी मछलियां मरती हैं। जयहिंद का कहना है कि मछलियां धीरे-धीरे कम होते जाने से मछुआरे भी कम होते गये हैं, इन लोगों ने अब पेट के लिए दूसरे छोटे-छोटे रोजगार शुरु कर दिये हैं।
उद्योग बहुल गाजियाबाद और नोएडा के कपड़ा, कागज, शराब, रासायनिक और स्टील के जिन कारखानों का पानी यमुना में मिलता है उसमें क्रोमियम, सायनायड, जिंक प्रमुख हैं। डा० अजमल द्वारा दिल्ली के पास यमुना के पानी की जांच में कोबाल्ट, क्रोमियम, निकिल और जिंक प्रदूषण की पुष्टि हुई है। यहां यमुना के कछार में किसानों ने फसल बो रखी है। फसल देखने में तो यहां हरी-भरी और लहलहाती दिखती है, पर वह भी इस गंदे और विषैले पानी से प्रदूषित है। चने का साग एक कौर खाकर मैंने देखा तो कसैला और दुर्गंधयुक्त लगा और यही हाल कछार में लगे पम्पिंग सेट के पानी की थी।
अब से चौबीस साल पहले 1965 में जार्ज और उनके साथियों ने डीडीटी. फैक्ट्री का उत्प्रवाह लाने वाले नजफगढ़ नाला का परीक्षण करके बताया था कि काफी तादाद में डीडीटी. विष और क्लोरल हाइड्रेट एवं पानी की अम्लीयता मछलियों के गलफड़ एवं श्वसन प्रक्रिया को अत्यधिक क्षति पहुंचाते हैं। उसके बाद स्थिति बद से बदतर ही हुई है।
आगरा के मछुआरों से प्राप्त जानकारी के अनुसार खुर्जा (बुलंदशहर) सैदाबाद (आगरा) और अलीगढ़ से गंदा पानी लेकर झरना नाला शाहदरा के पास यमुना में गिरता है। आगरा से अलीगढ़ जाते समय सैदाबाद में झरना नाला देखने को मिलता है।
छोटे-छोटे कारखानों और शहरी गंदे पानी से यह नाला यहां काफी प्रदूषित दिखता है।
उधर सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ जिलों और गाजियाबाद नोएडा की गंदगी हिंडन बुलंदशहर के फतेहपुर अट्टा से पहले यमुना में मिलती है। इसमें शहरी मलजल के अलावा भारी तादाद में धातुएं, रसायन तथा डिटर्जेंट आदि हानिकारक तत्व होते हैं।
हरियाणा के फरीदाबाद कस्बे का औद्योगिक और शहरी उत्प्रवाह यमुना के प्रदूषण में और इजाफा करता है।
ओखला से वृंदावन तक की दूरी में यमुना का पानी ऊपरी तौर पर काफी साफ हो जाता है। फिर भी रासायनिक और भारीधातु के तत्व नष्ट नहीं होते। मार्च 1988 से सितंबर 1988 के बीच प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा किये गये विश्लेषण में वृदावन में औसत पी० एच० 8.2 तथा घुलित ऑक्सीजन 6.4 मिग्रा. प्रति लीटर पाया गया।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें