हरिद्वार में गंग नहर की सफाई, रखरखाव के लिए गंग नहर की वार्षिक बंदी कर दी गई है।
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हरिद्वार में गंग नहर की सफाई, रखरखाव और कुंभ 2027 से जुड़े निर्माण व मरम्मत,कार्यों के लिए वार्षिक बंदी शुरू हो गई है। बंदी के कारण हरकी पैड़ी और आसपास के कई घाटों पर जल स्तर काफी घट गया है। हर की पौड़ी समेत कई घाटों पर गंगाजल लगभग गायब हो गया है। स्नान के लिए हरिद्वार पहुंचे श्रद्धालुओं को पानी नहीं मिलने से निराशा हो रही है। इस बीच नहर की तलहटी में एक अलग ही गतिविधि देखने को मिल रही है। श्रद्धालुओं की ओर से गंगा में चढ़ाए गए सिक्के, धातु की वस्तुएं और कभी-कभी कीमती आभूषण तलाशने के लिए बड़ी संख्या में लोग घाटों पर पहुंच रहे हैं। कुछ लोगों के लिए यह सालाना बंदी कमाई का एक मौसमी अवसर भी है।
मीडिया रिपोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक दशहरे यानी 20 अक्तूबर की रात से गंग नहर को 18 दिन के लिए बंद किया गया है। गंग नहर में नियमित जलपूर्ति 7 नवंबर की मध्यरात्रि को होगी। यानी 8 नवंबर की सुबह हरकी पैड़ी क्षेत्र सहित अन्य घाटों पर गंगा का प्रवाह सुचारू हो जाएगा। इस समय बंदी के कारण हर की पौड़ी समेत कई घाटों पर गंगाजल कम हो गया है। अभी हरकी पैड़ी क्षेत्र में 11 हजार क्यूसेक पानी चल रहा है और पानी का स्तर लगभग पांच फुट है। गंग नहर बंद होने के बाद हरकी पैड़ी पर केवल सुबह और शाम की गंगा आरती के समय ही पानी छोड़ा जाएगा जिससे पानी का स्तर एक से डेढ़ फुट तक रहेगा।
हरिद्वार के हर की पैड़ी क्षेत्र में गंगा के जल स्तर में कमी आते ही घाटों का परिचित दृश्य बदल गया है। जिन स्थानों पर सामान्य दिनों में पानी की धारा बहती दिखाई देती है, वहां कई जगह तलहटी की रेत, पत्थर और जमा सामग्री नजर आने लगी है। इस बदलाव के साथ ही कुछ लोग सिक्के और दूसरी धातुओं की वस्तुएं तलाशने में जुट गए हैं। इन लोगों की नज़रें गंगा में श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाए जाने वाले सिक्कों और पूजा के दौरान अर्पित की जाने वाली वस्तुओं या गंगा स्नान के दौरान भूलवश गिर जाने वाले अंगूठी, बालियों जैसे छोटे-मोटे गहनों पर है, जिसकी तलाश में तलहटी की रेत और पत्थरों को खंगाल रहे हैं। हर की पैड़ी के आसपास सालभर मल्लाह और गोताखोर समुदाय के युवक व किशोर इन चीजों की तलाश में नदी में गोता लगाते दिखाई दे जाते हैं। पानी में डूबी रहने वाली जगहों तक सामान्य परिस्थितियों में पहुंचना मुश्किल होता है। नहर का जल प्रवाह रुकने के बाद तलहटी के सूखने और हर की पैड़ी में पानी घटने से सूखा तल सामने आने पर इन लोगों को वहां खोजबीन करने का मौका मिल गया है।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ लोग सुबह से शाम तक रेत और पत्थरों के बीच सिक्के, पीतल, तांबे और दूसरी धातुओं की वस्तुएं तलाशते हैं। कभी-कभी चांदी या सोने के आभूषण मिलने की बात भी सामने आती है। गंगा में सिक्के अर्पित करना अनेक श्रद्धालुओं की धार्मिक परंपराओं का हिस्सा है। लोग पूजा, प्रार्थना, मनोकामना या स्नान के दौरान नदी में सिक्के डालते हैं। कई बार पूजा सामग्री के साथ दूसरी छोटी धातु की वस्तुएं भी पानी में चली जाती हैं। तेज बहाव और लगातार बदलती जलधारा के कारण ऐसी वस्तुएं तलहटी में जमा हो सकती हैं या रेत और कंकड़ के बीच फंस सकती हैं। जब पानी का स्तर घटता है, तब उनमें से कुछ वस्तुएं दिखाई देने लगती हैं। ज्यादातर लोगों को श्रद्धालुओं द्वारा नदी और नहर में फेके जाने वाले सिक्कों को बटोर कर ही संतोष करना पड़ रहा है। इस काम में लगे लोगों को कितना पैसा मिलता है, यह उनकी खोज, दिनभर की मेहनत और मिलने वाली वस्तुओं पर निर्भर करता है। इसलिए इसे नियमित आय या हर परिवार की निश्चित कमाई के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह गतिविधि धार्मिक आस्था से जुड़ी परंपराओं के साथ स्थानीय आजीविका का एक कम चर्चित पहलू भी सामने लाती है।
हर की पैड़ी पर पानी का स्तर घटने के पीछे गंग नहर की वार्षिक बंदी है। इसे गंगा नदी के स्थायी रूप से सूखने या प्राकृतिक जल प्रवाह खत्म होने की घटना नहीं समझना चाहिए। हरिद्वार में गंगा की मुख्य धारा से जुड़ी ऊपरी गंग नहर का इस्तेमाल सिंचाई सहित कई महत्वपूर्ण जरूरतों के लिए किया जाता है। हर की पैड़ी क्षेत्र में दिखाई देने वाला प्रवाह भी इस नहर व्यवस्था से जुड़ा है। जब रखरखाव के लिए नहर में पानी रोक दिया जाता है, तो इससे जुड़े घाटों पर जल स्तर में बड़ा बदलाव दिखाई देता है।
इस साल 20 अक्टूबर की मध्यरात्रि से जल प्रवाह रोका गया है। विभाग की योजना के अनुसार, 7 नवंबर की मध्यरात्रि में पानी फिर छोड़ा जाएगा और 8 नवंबर की सुबह तक घाटों पर प्रवाह सामान्य होने की उम्मीद है। इस अवधि में हर की पैड़ी पर सामान्य दिनों जैसा पानी उपलब्ध नहीं रहेगा। मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि आरती के समय सीमित मात्रा में पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। ऐसे में श्रद्धालुओं को घाटों पर पहुंचने से पहले स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभाग से स्नान की स्थिति की जानकारी लेनी चाहिए।
जल स्तर में यह बदलाव अस्थायी है। नहर की बंदी पूरी होने और जल प्रवाह बहाल होने के बाद घाटों की स्थिति फिर बदल जाएगी। पानी लौटने पर तलहटी में खोजबीन करने की गुंजाइश भी समाप्त हो जाएगी। यही वजह है कि नहर बंद होने के इन कुछ दिनों को सिक्के और धातु की वस्तुएं तलाशने वाले लोग एक सीमित मौसमी अवसर की तरह देखते हैं।
गंग नहर का महत्व केवल सिंचाई और हरिद्वार के धार्मिक घाटों तक सीमित नहीं है। यह उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की जल व्यवस्था के साथ दिल्ली की पेयजल आपूर्ति से भी जुड़ी है। नहर से मिलने वाले पानी का इस्तेमाल कृषि के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में पेयजल उत्पादन के लिए भी किया जाता है। इसके लिए संबंधित जलापूर्ति प्रणालियों में पानी को निर्धारित प्रक्रियाओं से साफ करने के बाद लोगों तक पहुंचाया जाता है। यही वजह है कि गंग नहर की वार्षिक बंदी के दौरान जल संसाधनों का प्रबंधन और वैकल्पिक व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।
हालांकि, नहर बंद होने का असर सभी शहरों और जलापूर्ति प्रणालियों पर एक जैसा नहीं पड़ता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि संबंधित क्षेत्र पानी कहां से लेता है, उसके पास कितने दिनों का भंडार उपलब्ध है और दूसरे स्रोतों से कितनी आपूर्ति की जा सकती है। दिल्ली की जलापूर्ति में उत्तराखंड से आने वाले गंगा जल की महत्वपूर्ण भूमिका है, जबकि उत्तर प्रदेश में गंग नहर का बड़ा महत्व सिंचाई के साथ विभिन्न स्थानीय जल जरूरतों के लिए भी है। इसलिए बंदी के दौरान संबंधित विभागों को उपलब्ध जल भंडार, वैकल्पिक स्रोतों और आपूर्ति की समय-सारिणी पर नजर रखनी पड़ती है। नियमित रखरखाव के लिए जरूरी यह बंदी जल वितरण की व्यापक व्यवस्था की परीक्षा भी है।
ऊपरी गंग नहर का महत्व केवल हरिद्वार के धार्मिक घाटों तक सीमित नहीं है। यह उत्तर भारत की ऐतिहासिक सिंचाई प्रणालियों में शामिल है। भारत सरकार के जल शक्ति मंत्रालय की जानकारी के मुताबिक, ऊपरी गंगा नहर 1854 में शुरू हुई थी। इसका विकास औपनिवेशिक दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्रों को सिंचाई सुविधा देने के उद्देश्य से किया गया था। गंगा से पानी निकालकर नहरों और वितरक प्रणालियों के जरिए खेतों तक पहुंचाने की यह व्यवस्था उस समय कृषि उत्पादन और सूखे से निपटने की कोशिशों का अहम हिस्सा थी।
इंस्टीट्यूशन ऑफ सिविल इंजीनियर्स के विवरण के अनुसार, मुख्य गंग नहर की लंबाई करीब 437 किलोमीटर है और इससे जुड़ी वितरक नहरों का नेटवर्क लगभग 6,440 किलोमीटर तक फैला है। यह आंकड़ा बताता है कि गंग नहर महज एक जलधारा नहीं, बल्कि विस्तृत जल वितरण व्यवस्था है। इसके जरिए पानी को विभिन्न कृषि क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है। इसीलिए नहर की सफाई और मरम्मत का असर केवल हरिद्वार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नीचे के इलाकों में सिंचाई और जलापूर्ति की व्यवस्था से भी जुड़ता है।इतनी पुरानी और विस्तृत नहर प्रणाली में समय-समय पर रख-रखाव करना जरूरी है। लगातार जल प्रवाह के दौरान कुछ हिस्सों की तलहटी, दीवारों और संरचनाओं की पूरी जांच करना कठिन हो सकता है। पानी रोकने से मरम्मत दलों को उन हिस्सों तक पहुंच मिलती है, जहां सामान्य दिनों में काम करना संभव नहीं होता। यही वार्षिक बंदी का बुनियादी तकनीकी आधार है।
नहर में सालभर पानी बहने के दौरान गाद, रेत, पत्थर, पूजा सामग्री और दूसरी तरह का कचरा जमा होता रहता है। बारिश के मौसम और तेज प्रवाह के दौरान बहकर आने वाली सामग्री भी तलहटी में रुक सकती है। समय के साथ जमा होने वाली गाद जल प्रवाह की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा नहर की दीवारों, तटबंधों, पुलों और दूसरे ढांचों में टूट-फूट या मरम्मत की जरूरत सामने आ सकती है।
वार्षिक बंदी के दौरान विभाग को नहर की तलहटी की सफाई, गाद निकालने और जरूरी मरम्मत करने का अवसर मिलता है। अलग-अलग स्थानों पर संरचनाओं की जांच के बाद उन हिस्सों में काम किया जा सकता है, जहां क्षति या कमजोरी दिखाई देती है। इस साल भी नहर की सफाई और मरम्मत के साथ विभिन्न घाटों और दूसरी संरचनाओं पर काम किए जाने की जानकारी सामने आई है।
हालांकि, सफाई के दौरान कितना कचरा और कितनी गाद निकाली गई, इसका विस्तृत आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसलिए केवल नहर बंद होने या तलहटी दिखाई देने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि नहर पूरी तरह साफ हो गई है। इसके लिए निकाली गई गाद की मात्रा, कचरे के निस्तारण और मरम्मत किए गए हिस्सों का विवरण जरूरी है। सफाई का उद्देश्य सिर्फ दिखाई देने वाली गंदगी हटाना नहीं, बल्कि जल प्रवाह और नहर की संरचनात्मक सुरक्षा को बनाए रखना भी है।
गंग नहर की सालाना बंदी के बाद उसकी तलहटी में पड़े सिक्कों और अन्य कीमती सामान मिलने की आस में खोजबीन करने कई लोग पहुंच रहे हैं।
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इस साल की वार्षिक बंदी का एक पहलू हरिद्वार में प्रस्तावित अर्धकुंभ 2027 की तैयारियों से भी जुड़ा है। बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। ऐसे में स्नान स्थलों की क्षमता, पहुंच मार्ग, सुरक्षा व्यवस्था और घाटों की संरचनात्मक स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। जिन हिस्सों में पानी बहने के कारण निर्माण या मरम्मत करना कठिन है, वहां जल प्रवाह रोकने की अवधि में काम करना अपेक्षाकृत आसान होता है। इसलिए नहर बंदी का इस्तेमाल घाटों के निर्माण, मरम्मत और सुधार कार्यों को गति देने के लिए भी किया जा रहा है।
यह काम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धार्मिक आयोजन के दौरान घाटों पर भीड़ का दबाव बढ़ता है। पर्याप्त जगह, सुरक्षित सीढ़ियां, मजबूत किनारे और लोगों की आवाजाही के लिए व्यवस्थित रास्ते दुर्घटनाओं का जोखिम घटाने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन ,निर्माण कार्यों का मूल्यांकन केवल नए घाट बन जाने से नहीं होना चाहिए। यह देखना भी जरूरी है कि काम नदी और नहर के प्राकृतिक प्रवाह को किस तरह प्रभावित करता है, घाटों पर जमा कचरे का प्रबंधन कैसे होता है और स्नान के बाद निकलने वाली पूजा सामग्री का निस्तारण किस व्यवस्था से किया जाता है। अर्धकुंभ जैसे आयोजन में लाखों लोगों की धार्मिक गतिविधियों और जल संसाधन के प्रबंधन के बीच संतुलन बनाए रखना प्रशासन के सामने बड़ी जिम्मेदारी है।
हरिद्वार पहुंचने वाले अनेक श्रद्धालुओं के लिए हरकी पैड़ी पर स्नान धार्मिक यात्रा का प्रमुख उद्देश्य होता है। ऐसे में नहर बंदी के दौरान जल स्तर घटने से उनकी यात्रा का अनुभव प्रभावित हो सकता है। सामान्य दिनों में पानी से भरे घाटों पर जब तलहटी दिखाई देने लगती है, तो बाहर से आने वाले लोगों को यह दृश्य असामान्य लग सकता है। कुछ श्रद्धालुओं को स्नान के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता, जबकि दूसरे लोग केवल आरती और दर्शन के लिए घाट पर पहुंचते हैं।
इस स्थिति में यात्रियों तक सही जानकारी पहुंचाना जरूरी है। नहर बंदी पहले से निर्धारित कार्यक्रम के तहत की जाती है, इसलिए तीर्थयात्रियों को यात्रा की योजना बनाते समय जल प्रवाह की स्थिति के बारे में जानकारी ले लेनी चाहिए। स्थानीय प्रशासन और घाट प्रबंधन से मिलने वाली जानकारी के आधार पर ही स्नान की योजना बनाना बेहतर होगा। विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों और ऐसे लोगों को कम जल स्तर वाले हिस्सों में उतरने से बचना चाहिए, जहां पत्थर फिसलन भरे हों या तलहटी असमान हो।
जल स्तर कम होने पर भी घाटों की सुरक्षा संबंधी सावधानियां जरूरी रहती हैं। कहीं-कहीं गीली मिट्टी, फिसलन, नुकीले पत्थर या कचरा चोट का कारण बन सकते हैं। पानी दोबारा छोड़े जाने के समय भी प्रवाह में अचानक बदलाव का जोखिम हो सकता है। इसलिए लोगों को प्रशासन की ओर से प्रतिबंधित या असुरक्षित घोषित हिस्सों में प्रवेश नहीं करना चाहिए।
गंग नहर की बंदी के दौरान तलहटी का खुलना केवल सिक्के तलाशने वालों के लिए अवसर नहीं है। यह उस सामग्री को देखने का मौका भी देता है जो सामान्य दिनों में पानी के भीतर छिपी रहती है। रेत और गाद के साथ जमा पूजा सामग्री, प्लास्टिक या दूसरे ठोस कचरे की मौजूदगी जल प्रबंधन के लिए चुनौती बन सकती है। हालांकि, किसी खास घाट पर कचरे की मात्रा या उसके प्रकार के बारे में निष्कर्ष निकालने के लिए व्यवस्थित सर्वेक्षण जरूरी है।
गंगा में पूजा सामग्री अर्पित करने की परंपरा व्यापक है, लेकिन फूल, कपड़ा, प्लास्टिक में लिपटी सामग्री और अन्य ठोस वस्तुएं पानी में डालने से नदी और घाटों की सफाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। धार्मिक आस्था और नदी की स्वच्छता को एक-दूसरे के विरोध में देखने के बजाय ऐसे विकल्प बढ़ाने की जरूरत है, जिनसे श्रद्धालु अपनी परंपराओं का पालन करते हुए कचरा सीधे जलधारा में डालने से बच सकें। घाटों पर अलग-अलग कचरा पात्र, फूलों के संग्रह की व्यवस्था और नियमित सफाई अभियान इस दिशा में मदद कर सकते हैं।
सिक्के या धातु की वस्तुएं तलाशने वाले लोगों की गतिविधि को भी औपचारिक सफाई का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। वे कुछ वस्तुएं निकाल सकते हैं, लेकिन गाद हटाने, संरचनात्मक मरम्मत, प्रदूषण की निगरानी और कचरे के सुरक्षित निस्तारण के लिए विभागीय व्यवस्था जरूरी है। यदि तलहटी की सफाई के दौरान निकलने वाले कचरे और गाद का रिकॉर्ड रखा जाए, तो इससे भविष्य की बंदियों की योजना बनाने में मदद मिल सकती है।
गंग नहर में जल प्रवाह बहाल होने की निर्धारित तारीख नजदीक आने के साथ सफाई और मरम्मत कार्यों को समय पर पूरा करना जरूरी होगा। पानी छोड़े जाने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि काम वाले हिस्सों से निर्माण सामग्री, मलबा और उपकरण हटा लिए गए हों। जहां मरम्मत हुई है, वहां संरचनाओं की जांच और सुरक्षा संबंधी आवश्यक परीक्षण भी महत्वपूर्ण हैं। जल प्रवाह शुरू होने के बाद अधूरे काम या ढीली सामग्री नहर के बहाव और नीचे के हिस्सों की सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है।
हरकी पैड़ी जैसे प्रमुख तीर्थस्थल पर श्रद्धालुओं की आवाजाही को देखते हुए जल स्तर और प्रवाह में बदलाव की जानकारी स्पष्ट रूप से साझा की जानी चाहिए। यदि पानी चरणबद्ध तरीके से छोड़ा जाता है, तो घाटों पर तैनात कर्मचारियों और पुलिस को इसकी जानकारी होनी चाहिए, ताकि लोगों को समय रहते सावधान किया जा सके। इसी तरह, बंदी के दौरान तलहटी में जाने वाले लोगों को भी यह समझना चाहिए कि जल प्रवाह बहाल होने से पहले सुरक्षित स्थान पर लौटना जरूरी है।
गंग नहर की सालाना बंदी एक तकनीकी जरूरत है, लेकिन इसके सामाजिक और पर्यावरणीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। एक ओर यह व्यवस्था दशकों से कृषि और जल वितरण में अहम भूमिका निभा रही है, दूसरी ओर हरिद्वार में इसके बंद होने से धार्मिक गतिविधियों, स्थानीय आजीविका और घाटों की सफाई पर असर दिखाई देता है। सिक्के तलाशने वालों की भीड़ इस बदलाव का सबसे अनोखा दृश्य जरूर है, लेकिन इसके पीछे पानी के प्रबंधन, श्रद्धालुओं की जरूरतों और नदी की स्वच्छता से जुड़े बड़े सवाल भी हैं। 8 नवंबर को पानी लौटने के बाद घाट फिर सामान्य रूप में दिखाई देने लगेंगे, मगर सफाई और रखरखाव की सफलता का असली पैमाना यही होगा कि नहर कितनी सुरक्षित, साफ और बेहतर जल प्रवाह के साथ अगले साल तक चल पाती है।
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