गंगा की सफाई के लिए कई दशकों से विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, फिर भी यह नदी प्रदूषण मुक्त नहीं हो पाई है।
स्रोत : विकी कॉमंस
गंगा सफाई के नाम पर ‘स्वच्छ गंगा मिशन’ में हो रहा ‘खिलवाड़’ CAG रिपोर्ट में कई बड़ी खामियां उजागर
गंगा नदी को हमारे देश में देवी और मां का दर्जा दिया गया है। हरिद्वार से लेकर काशी तक में इसकी पूजा-अर्चना और आरती की जाती है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि आज इसका पानी नहाने या आचमन करना तो दूर हाथ में लेने लायक तक नहीं है। देश में पिछले करीब पांच दशकों से गंगा सफाई की परियोजनाओं पर अरबों रुपये खर्च करने के बावजूद भारत की इस प्रमुख नदी को साफ नहीं किया जा सका है। गंगा सफाई की सरकारी योजनाओं में किस तरह की भारी वित्तीय धांधलियां और भ्रष्टाचार किया जा रहा है, यह बात एक बार फिर से भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में उजागर हो गई है। इस रिपोर्ट में एक और अहम बात उभर कर सामने आई है है कि अबतक गंगा के प्रदूषण के लिए कानपुर जैसे मैदानी इलाके के शहरों को सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, पर अब गंगा के प्रदूषण का सिलसिला गंगा के उद्गम वाले राज्य उत्तराखंड के पहाड़ों पर ही शुरू हो जा रहा है।
1,000 करोड़ खर्च करके हुआ मामूली सा सुधार
CAG की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तराखंड में कई सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट गंगा के पानी को दूषित कर रहे हैं। रिपोर्ट में 2018-2023 की अवधि के बीच गंगा सफाई पर किए गए खर्च और उसके परिणामों की तुलना करते हुए बताया गया कि राज्य में गंगा सफाई पर लगभग 1,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस भारी-भरकम खर्च के बावजूद गंगा के सीवेज प्रबंधन में बहुत मामूली सा सुधार ही हुआ है। सफाई के प्रयासों के बावजूद, देवप्रयाग से हरिद्वार तक नदी में भारी प्रदूषण देखने को मिल रहा है।
उत्तराखंड में 32% STP गंगा में छोड़ रहे दूषित पानी
रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में लगभग एक तिहाई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) भारी खर्चे के बावजूद गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों में गंदा (मल-मूत्र) वाला पानी छोड़ रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 44 संयंत्रों में से 12 यानी लगभग 32% STP अपर्याप्त क्षमता, दोषपूर्ण कनेक्शन और खराब रखरखाव के कारण बिना साफ किए दूषित पानी गंगा में छोड़ रहे हैं। इससे न सिर्फ गंगा की सफाई पर व्यवधान आ रहा है, बल्कि इस पर नहाने और आचमन करने वाले लोगों को भी खतरा है। ऑडिट में पाया गया कि कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट टेक्निकल और परिचालन संबंधी समस्याओं के कारण या तो खराब प्रदर्शन कर रहे थे या पूरी तरह से बंद हो गए थे। ऋषिकेश, कीर्ति नगर और रुद्रप्रयाग में स्थित संयंत्र अपर्याप्त क्षमता या जल निकासी प्रणालियों में खराबी के कारण बिना साफ किए सीवेज को सीधे बहा रहे थे। कई स्थानों पर रिसाव और रुकावटों के कारण संरचनात्मक दोषों के कारण उचित ट्रीटमेंट संभव नहीं हो पाया। गोपेश्वर और कर्णप्रयाग में क्षतिग्रस्त इंफ्रास्ट्रक्चर की मरम्मत नहीं की गई, जबकि कुछ संयंत्र घरों से निकलने वाले दूषित जल को एकत्रित करने में विफल रहे।
निगरानी में लापरवाही, गिर रहा नाले-सीवर का पानी
रिपोर्ट के मुताबिक गंगा नदी में अभी भी कई गंदे नाले और सीवर का पानी सीधे गिर रहा है। रिपोर्ट में निगरानी में लापरवाही को इसका कारण बताया गया है। फरवरी 2023 के एक निरीक्षण का हवाला दिया गया है, जिसमें बिना किसी कानूनी कार्रवाई के अनुपचारित (Untreated) सीवेज को नदी में बहाया जा रहा था। इसके अलावा, सुरक्षा और निर्माण संबंधी चिंताओं के कारण 18 संयंत्रों को रखरखाव एजेंसियों द्वारा अपने नियंत्रण में नहीं लिया गया, जिससे संचालन में देरी हुई और निगरानी प्रणालियां कमजोर हो गईं।
एनजीटी के मानकों का नहीं हो रहा पालन
सीएजी के ऑडिट में पर्यावरण मानकों का अनुपालन खराब पाया गया। 2023 की शुरुआत में निरीक्षण किए गए 44 संयंत्रों में से केवल पांच ही राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) द्वारा निर्धारित मानदंडों को पूरा करते हुए पाए गए। इसके विपरीत अधिकांश STP निर्धारित मानकों को पूरा करने में विफल रहे। साल के अंत में स्थिति और भी खराब हो गई, केवल तीन संयंत्र ही मानकों को पूरा कर पाए। इसके अलावा, 33 संयंत्र केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरे।
कोलीफॉर्म बैक्टीरिया खतरनाक स्तर पर
रिपोर्ट में मल में पाए जाने वाले कोलीफॉर्म बैक्टीरिया के खतरनाक स्तर की ओर इशारा किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक है और गंभीर प्रदूषण का संकेत देता है। पानी में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी दस्त, पेचिश, हैजा (कालरा) जैसी गंभीर व जानलेवा बीमारियों की वजह बनती है। बीते दिनों मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में जलापूर्ति के पानी में इस बैक्टीरिया के कारण ही करीब डेढ़ दर्ज़न लोगों की मौत की खबरें सुनने को मिली थीं। हरिद्वार और ऋषिकेश में पानी की गुणवत्ता मुख्य रूप से 'बी' श्रेणी में बनी रही, जिसमें कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान ही कुछ समय के लिए सुधार हुआ था।
बुनियादी ढांचे और मूलभूत सुविधाओं की भी कमी
ऑडिट में नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत बुनियादी ढांचे और योजना में मौजूद प्रमुख कमियों को भी उजागर किया गया। हालांकि 2014 और 2023 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर 14,000 करोड़ रुपये से अधिक की राशि जारी की गई, उत्तराखंड में कई संयंत्र सीवर नेटवर्क से जुड़े नहीं रहे, जिससे वे अप्रभावी हो गए। कुछ कस्बों में वाटर ट्रीटमेंट की सुविधा के लिए प्लांट तो लगाए गए, लेकिन उनमें घरों तक पानी पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं थी। ऑडिट में ऐसे वाटर ट्रीटमेंट प्लांट्स को 'प्रतीकात्मक' कहा गया है। रिपोर्ट में व्यापक नदी बेसिन प्रबंधन योजना के अभाव और योजना निर्माण में सीमित सामुदायिक भागीदारी का भी उल्लेख किया गया है।
सीएजी की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक गंगा में नाले और सीवेज का प्रदूषित पानी गिरने का सिलसिला उत्तराखंड से ही शुरू हो आता है। कानपुर में भयंकर औद्योगिक प्रदूषण के बाद तो यह नाले जैसी दिखने लगती है।
स्रोत : विकी कॉमंस
कई योजनाओं पर अरबों खर्च के बावजूद गंगा मैली
गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए पिछले चार दशकों में केंद्र सरकार ने गंगा एक्शन प्लान से लेकर नमामि गंगे जैसी कई बड़ी योजनाएं चलाईं। इन अभियानों पर समय-समय पर अरबों रुपये खर्च किए गए, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाए गए, घाटों का विकास हुआ और प्रदूषण रोकने के लिए नीतियां बनाई गईं। इसके बावजूद देश की सबसे महत्वपूर्ण नदी आज भी कई हिस्सों में सीवेज, औद्योगिक कचरे और प्रशासनिक कमजोरियों से जूझ रही है। सवाल यही है कि इतने लंबे प्रयास और भारी निवेश के बाद भी गंगा सफाई का सपना अधूरा क्यों बना हुआ है। गंगा सफाई के लिए पिछले पांच दशकों में देश में चलाई गई प्रमुख सरकारी योजनाएं इस प्रकार हैं-
राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (NRCP, 1995–अब तक विस्तारित रूप में)
1995 में शुरू इस योजना का उद्देश्य सिर्फ गंगा नहीं, बल्कि देश की कई प्रदूषित नदियों की सफाई था; इसमें केंद्र और राज्यों की साझेदारी से हजारों करोड़ रुपये अलग-अलग चरणों में खर्च हुए। वार्षिक बजट परियोजना-आधारित रहा, लेकिन कई शहरों में सीवेज ढांचा क्षमता से पीछे रहा। नतीजा मिश्रित रहा है। कुछेक चुनिंदा शहरों में तो सुधार दिखा, पर व्यापक स्तर पर नदी प्रदूषण नियंत्रण अभी भी शहरीकरण और सीवेज दबाव से जूझ रहा है।
गंगा एक्शन प्लान (1985–2000s, चरण I और II)
राजीव गांधी सरकार ने 1985 में गंगा सफाई की पहली बड़ी राष्ट्रीय योजना शुरू की; शुरुआती चरण में सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए, बाद में इसे दूसरे चरण तक बढ़ाया गया। मुख्य फोकस सीवेज ट्रीटमेंट और घाट सुधार था, लेकिन खराब रखरखाव, अधूरी परियोजनाएं और संस्थागत कमजोरियों के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। विशेषज्ञ इसे भारत की नदी सफाई नीतियों की “सीखी गई लेकिन अधूरी” शुरुआत मानते हैं, जिसने बाद की योजनाओं, जैसे ‘नमामि गंगे' की नींव रखी।
नमामि गंगे (2014–अब तक)
केंद्र में 2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार बनने के बाद गंगा की निर्मलता और अविरता को बनाए रखने के लिए नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत की गई। हजारों करोड़ रुपये आवंटित कर नदी को दूषित होने से बचाने के लिए योजना को व्यापक तौर पर प्रचार-प्रसार के साथ लॉन्च किया गया और मई 2014 में केंद्र सरकार ने गंगा संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए जल संसाधन मंत्रालय का दायरा बढ़ाकर जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय बनाया, ताकि गंगा सफाई और पुनर्जीवन पर केंद्रित काम हो सके। बाद में 2019 में इसे पुनर्गठित कर जल शक्ति मंत्रालय बनाया गया, जिसके तहत नमामि गंगे सहित जल और नदी प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां समेकित की गईं। वर्तमान में इसी के तहत नमामि गंगे परियोजना पर काम लगातार चल रहा है। बावजूद इसके गंगा को किनारे बसे शहरों के नालों ने दूषित करना नहीं छोड़ा। जून 2014 में ₹20,000 करोड़ के शुरुआती बजट के साथ शुरू हुई यह योजना 2026 तक बढ़ाकर कुल ₹26,824.86 करोड़ आवंटन तक पहुंच चुकी है। वित्त वर्ष 2025-26 में इसका बजट ₹3,400 करोड़ रहा। अब तक हजारों करोड़ रुपये STP, घाट, सीवेज नेटवर्क और रिवरफ्रंट पर खर्च हुए, लेकिन कई हिस्सों में प्रदूषण, सीवेज प्रवाह और औद्योगिक अपशिष्ट अब भी चुनौती बने हुए हैं। स्थिति यह है कि कई शहरों में इंफ्रास्ट्रक्चर बना, कुछ जल गुणवत्ता संकेतकों में सुधार हुआ, पर “निर्मल गंगा” का लक्ष्य अभी अधूरा माना जाता है।
केंद्र सरकार ने दिया स्वच्छ गंगा मिशन का लेखजोखा
दूसरी ओर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान गंगा और उसकी सहायक नदियों की सफाई के लिए गए कामों का लेखाजोखा जारी किया है। पत्र सूचना कार्यालय (PIB) ने एक विज्ञप्ति जारी कर बताया है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे सीवेज ट्रीटमेंट की सुविधाओं को मजबूत करने और प्रदूषण कम करने के उपायों में बीते वित्त वर्ष उल्लेखनीय प्रगति हुई है। इस वर्ष की उपलब्धियाँ ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने, प्रमुख परियोजनाओं को पूरा करने और कई राज्यों में प्रदूषण के मुख्य हॉटस्पॉट को खत्म करने की दिशा में किए गए केंद्रित और लगातार प्रयासों को दर्शाती हैं।
पिछले साल पूरा हुआ 28 STP का काम
वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार में 18 परियोजनाओं के माध्यम से कुल 538.03 एमएलडीकी ट्रीटमेंट क्षमता जोड़ी गई। विशेष रूप से, इस वर्ष 28 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) पूरे किए गए, जो पिछले वर्ष पूरे किए गए 22 एसटीपी की तुलना में महत्वपूर्ण वृद्धि है। इन STP की लागत करीब 4700 करोड़ रुपये है। सरकार का कहना है कि यह बड़ा निवेश गंगा बेसिन में सीवेज ट्रीटमेंट अवसंरचना को मज़बूत करने और प्रदूषण को कम करने की उसकी प्रतिबद्धता को दिखाता है।
यूपी में हुआ सबसे ज्यादा काम
जानकारी के मुताबिक इन उपलब्धियों में उत्तर प्रदेश प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरा, जहां मुरादाबाद, शुक्लागंज, वाराणसी, वृंदावन, प्रयागराज और आगरा में कई STP परियोजनाएं लागू की गईं। इससे राज्य में सीवेज ट्रीटमेंट अवसंरचना काफी मज़बूत हुआ। इनमें वाराणसी में के अस्सी (बीएचयू) क्षेत्र पर केंद्रित परियोजना ने सबसे अधिक 55 एमएलडी की क्षमता जोड़ी गई। प्रयागराज में एक बड़ी पहल के तहत 13 नालों को रोककर उनका मार्ग बदला गया। साथ ही सलोरी एसटीपी की क्षमता बढ़ाई गई, जिससे ₹331.75 करोड़ की स्वीकृत लागत पर ट्रीटमेंट की क्षमता में अतिरिक्त 43 एमएलडी की बढ़ोतरी हुई। मुरादाबाद में भी रामगंगा नदी के प्रदूषण को कम करने के कार्यों में काफ़ी प्रगति हुई है, जिससे 25 एमएलडी की क्षमता बढ़ी है। वहीं, कानपुर के शुक्लागंज में इंटरसेप्शन, डायवर्जन और सीवेज ट्रीटमेंट के कार्यों से 5 एमएलडी की क्षमता और जुड़ी है। वृंदावन में, I&D और एसटीपी के कार्यों से क्षमता में 13 एमएलडी की और बढ़ोतरी हुई। आगरा में भी बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई, जिससे 166 एमएलडी की क्षमता बढ़ी और राज्य की कुल सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता में और वृद्धि हुई। कुल मिलाकर, ये सभी परियोजनाएं पूरे उत्तर प्रदेश में गंदे पानी के प्रबंधन और नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए किए जा रहे बड़े और कई शहरों में फैले प्रयास को दिखाती हैं। इनमें हाइब्रिड एन्युइटी मॉडल (एचएएम) के तहत लागू की गई परियोजनाएं भी शामिल हैं।
उत्तराखंड में कुल 36 एमएलडी क्षमता वृद्धि
उत्तराखंड में, ऊधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और मुनि की रेती में चल रही मुख्य परियोजनाओं ने गंदे पानी के प्रबंधन को बेहतर बनाने में योगदान दिया। ऊधम सिंह नगर परियोजना ने नदी के कई प्रदूषित हिस्सों की समस्या को हल किया और 10.3 एमएलडी की क्षमता जोड़ी, जबकि देहरादून की सपेरा बस्ती परियोजना ने 15 एमएलडी की क्षमता जोड़ी। हरिद्वार में जगजीतपुर, सराय, ऋषिकेश, श्रीनगर और देवप्रयाग जैसी जगहों पर छोटे लेकिन ज़रूरी स्थानीय स्तर के काम किए गए, जिनसे कुल मिलाकर 0.23 एमएलडी की क्षमता बढ़ी। मुनि की रेती में भी 11 एमएलडी की क्षमता और जोड़ी गई, जिससे इस क्षेत्र की अवसंरचना और मज़बूत हुई।
झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल में भी प्रगति
झारखंड में भी लगातार प्रगति देखने को मिली, जहाँ फुसरो में I&D और एसटीपी परियोजना पूरी हुई। इस परियोजना से ₹61.05 करोड़ की स्वीकृत लागत पर 14 एमएलडी की ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ी। यह राज्य में सीवेज ट्रीटमेंट अवसंरचना के विस्तार और गंभीर प्रदूषण स्थलों पर प्रदूषण की समस्या को हल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
बिहार में, दीघा, कंकड़बाग और भागलपुर की परियोजनाओं ने भी क्षमता निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिससे क्रमशः 30 एमएलडी, 35 एमएलडी और 22.5 एमएलडी की क्षमता बढ़ी। ये परियोजनाएं राज्य में शहरी अपशिष्ट जल से जुड़ी चुनौतियों से निपटने और नदी के पानी की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
पश्चिम बंगाल ने भी काफी प्रगति दिखाई, जहाँ जंगीपुर, महेशतला और चकदाह में परियोजना पूरी हुई। इससे निचले गंगा बेसिन में प्रदूषण कम करने के प्रयासों को काफी मजबूती मिली। महेशतला परियोजना ने इसमें सबसे बड़ा योगदान दिया, जिससे ₹286.97 करोड़ की स्वीकृत लागत पर 35 एमएलडी की क्षमता बढ़ी। जांगीपुर में, प्रदूषण कम करने के कार्यों से ₹68.47 करोड़ के निवेश के साथ 13 एमएलडी की क्षमता बढ़ी, जबकि चकदाह परियोजना ने इंटरसेप्शन, डायवर्जन और एसटीपी कार्यों के ज़रिए ₹121.66 करोड़ की लागत से 15 एमएलडी की अतिरिक्त क्षमता जोड़ी। नॉर्थ बैरकपुर ने 30 एमएलडी की और क्षमता जोड़ी, जिससे निचले गंगा बेसिन में किए जा रहे प्रयासों को और मज़बूती मिली। कुल मिलाकर, ये परियोजनाएं पश्चिम बंगाल में सीवेज ट्रीटमेंट क्षमता बढ़ाने और नदी के पानी की गुणवत्ता सुधारने के लिए किए जा रहे व्यापक प्रयासों को दर्शाती हैं।
मजबूत निगरानी के लिए शुरू किया ड्रेन डैशबोर्ड
ज़मीनी स्तर पर गंगा सफाई अभियान की निगरानी को मज़बूत करने और समय पर ज़रूरी कदम उठाने में मदद के लिए, नमामि गंगे कार्यक्रम ने डिजिटल टूल भी शुरू किया है, जिसे 'ड्रेन डैशबोर्ड' (Drain Dashboard) कहा जाता है। यह डैशबोर्ड नदी में गिरने वाले नालों पर नज़र रखने के लिए बनाया गया है। यह डैशबोर्ड नालों की टैपिंग की स्थिति, सीवेज को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) में भेजने की प्रक्रिया, और पानी के बहाव से जुड़ी स्थितियों पर नज़र रखने की सुविधा देता है। यह वास्तविक समय (real-time) में प्रदूषण के खतरों की पहचान करने में मदद करता है इसके साथ ही जवाबदेही, पारदर्शिता और तेज़ी से कार्रवाई करने की क्षमता को भी बेहतर बनाता है।
एसटीपी की निगरानी व्यवस्था को मज़बूत करने और पारदर्शिता व जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एनएमसीजी ने 'गंगा पल्स पब्लिक पोर्टल' (Ganga Pulse Public Portal) तैयार किया है। यह डिजिटल सिस्टम निगरानी मंच है, जो गंगा नदी के बेसिन वाले पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में मौजूद एसटीपी से जुड़ा वास्तविक समय का डेटा दिखाता है। यह पोर्टल हर साइट की बुनियादी जानकारी के साथ-साथ चार मुख्य पैमानों pH, BOD और TSS के बारे में भी जानकारी देता है। यह पोर्टल पानी के प्रवेश द्वार (Inlet) और निकास द्वार (Outlet) पर पानी की जाँच के नतीजे दिखाता है। इससे यह पता चलता है कि ट्रीटमेंट के बाद गंदे पानी की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ है। इससे ट्रीटमेंट की कुशलता और नियमों के पालन का आकलन करने में मदद मिलती है, जिससे नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत निगरानी का कार्य पारदर्शी और असरदार तरीके से हो पाता है। इस पोर्टल को आम लोगों के लिए (public domain) इसलिए शुरू किया गया है, ताकि जवाबदेही बढ़ाई जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि तैयार की गई अवसंरचना ठीक से काम कर रही है।
कुल मिलाकर, इस वर्ष जो प्रगति हुई है, वह सोची-समझी रणनीति और क्षेत्रीय संतुलन पर आधारित कार्यान्वयन के तरीके को दर्शाती है। वर्तमान परियोजनाओं की मज़बूत श्रृंखला और उन्हें समय पर पूरा करने पर लगातार ज़ोर देने के साथ, एनएमसीजी स्वच्छ और स्वस्थ गंगा के अपने लक्ष्य की ओर लगातार आगे बढ़ रहा है। इस दौरान जो बड़ी क्षमता तैयार की गई है, वह न केवल मौजूदा पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करती है, बल्कि नदी बेसिन के आस-पास शहरी विकास के कारण भविष्य में पैदा होने वाली ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी मज़बूती प्रदान करती है।
1. स्वच्छ गंगा मिशन में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट ने किन खामियों को उजागर किया है?
रिपोर्ट के अनुसार, गंगा नदी की सफाई पर भारी रकम के निवेश के बावजूद गंगा की स्थिति में मामूली सा सुधार हीहुआ है। इसके लिए जिम्मेदार मुख्य कारणों में बुनियादी ढांचे की कमी, उत्तराखंड में 32% एसटीपी (STP) द्वारा दूषित पानी छोड़ना और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का खतरनाक स्तर शामिल है।
निगरानी में लापरवाही किस प्रकार गंगा प्रदूषण के लिए जिम्मेदार साबित हो रही है?
निगरानी की कमी के कारण ही देशभर में हजारों गंदे नालों और सीवर का पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे गंगा में गिर रहा है। साथ ही, कई स्थानों पर एनजीटी (NGT) के मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है, जिससे सफाई अभियान के परिणाम प्रभावित हो रहे हैं।
सरकार ने इस मिशन की प्रगति को लेकर क्या जानकारी दी है?
सरकार ने बताया है कि पिछले साल देशभर में कुल 28 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) का काम पूरा किया गया है। इसमें उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा प्रगति हुई है। इसके अलावा उत्तराखंड, बिहार व बंगाल में क्षमता वृद्धि की गई है और बेहतर निगरानी के लिए 'ड्रेन डैशबोर्ड' की भी शुरुआत की गई है।
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