भूजल में मिला यूरेनियम कुएं या बोरिंग से निकले पानी के साथ हमारे शरीर में पहुंच कर सेहत को नुकसान पहुंचाता है। 

भूजल में मिला यूरेनियम कुएं या बोरिंग से निकले पानी के साथ हमारे शरीर में पहुंच कर सेहत को नुकसान पहुंचाता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

पटना आईआईटी के वैज्ञानिकों ने खोजा यूरेनियम से दूषित पानी को साफ करने का तरीका

‘यूराजॉल’ पॉलिमर भूजल के साथ ही समुद्र के खारे पानी को भी यूरेनियम के रेडियो एक्टिव प्रदूषण से मुक्‍त करने में सक्षम
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पानी में घुले यूरेनियम के रेडियो एक्टिव प्रदूषण को हटाना वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रहा है। समुद्र के नमकीन पानी में तो इसे दूर कर पाना और भी मुश्किल हो जाता है। अच्‍छी खबर यह है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने इस जटिल समस्‍या का समाधान ढूंढ़ निकाला है। आईआईटी पटना के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा नया पॉलिमर विकसित किया है, जो दूषित पानी और समुद्री जल से भी यूरेनियम को तेजी से अलग कर सकता है। यह न केवल दूषित जल स्रोतों की सफाई के लिए जरूरी है, बल्कि लोगों को यूरेनियम युक्‍त पानी पीने से होने वाली गंभीर बीमारियों से बचाने में भी मददगार हो सकता है।

क्यों मुश्किल है पानी से यूरेनियम को अलग करना?

पानी से यूरेनियम को अलग करना इसलिए मुश्किल है क्योंकि यह आमतौर पर बहुत कम सांद्रता में घुला होता है। समुद्री पानी में इसकी मात्रा लगभग 3 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के आसपास होती है, यानी बेहद सूक्ष्म स्तर पर। इतनी कम मात्रा को निकालने के लिए बड़ी मात्रा में पानी को प्रोसेस करना पड़ता है, जिससे लागत और ऊर्जा खपत दोनों बढ़ जाती हैं। दूसरी चुनौती यह है कि पानी में यूरेनियम अकेला नहीं होता, बल्कि कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम जैसे कई अन्य घुले हुए आयन भी मौजूद रहते हैं। रासायनिक रूप से यूरेनियम अक्सर कार्बोनेट कॉम्प्लेक्स के रूप में घुला रहता है, जिसे अलग करने के लिए विशेष ऐडसॉर्बेंट या आयन-एक्सचेंज तकनीक चाहिए। ये तकनीकें महंगी हैं और बड़े पैमाने पर अभी व्यावसायिक रूप से पूरी तरह व्यवहार्य नहीं मानी जातीं। इसलिए वैज्ञानिक लगातार अधिक प्रभावी और किफायती तरीकों पर शोध कर रहे हैं।

दुनिया के महासागरों में अनुमानतः लगभग 4 अरब टन यूरेनियम घुला हुआ है। यह मात्रा धरती पर ज्ञात पारंपरिक खनिज भंडारों से सैकड़ों गुना अधिक मानी जाती है। यानी तकनीकी रूप से देखा जाए तो समुद्री पानी में मौजूद यूरेनियम मानव सभ्यता की परमाणु ईंधन जरूरतों को हजारों वर्षों तक पूरा कर सकता है।
<div class="paragraphs"><p>यूरेनियम पानी में घुलकर एक जटिल&nbsp;परमाणु संरचना बना लेता है, जिसके चलते उसे पानी से अलग करना मुश्किल हो जाता है।&nbsp;</p></div>

यूरेनियम पानी में घुलकर एक जटिल परमाणु संरचना बना लेता है, जिसके चलते उसे पानी से अलग करना मुश्किल हो जाता है। 

स्रोत : साइंस डायरेक्‍ट

कैसे काम करता है ‘यूराजॉल’ पॉलिमर

रेडियोएक्टिव यूरेनियम आम तौर पर अयस्क के रूप में धरती में पाया जाता है, लेकिन समय के साथ यह घुलकर भूजल, सतही जल और कई बार समुद्री पानी में भी पहुंच जाता है। पानी में यह प्रायः ‘यूरानिल आयन’ (UO₂²⁺) के रूप में मौजूद रहता है। यही इसका सबसे स्थिर और सामान्य घुलनशील रूप है। समस्या यह है कि यह आयन बहुत सूक्ष्म मात्रा में होता है और अन्य घुले हुए आयनों के बीच छिपा रहता है, इसलिए इसे अलग करना कठिन और खर्चीला होता है। ‘यूराजॉल’ पॉलिमर इसी चुनौती का समाधान प्रस्तुत करता है। इसकी संरचना में ऐसे विशेष रासायनिक समूह जोड़े गए हैं, जो यूरानिल आयन को पहचानकर उससे चयनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं। इसे सरल भाषा में समझें तो यह एक “मॉलिक्यूलर हुक” या चुंबकीय जाल की तरह काम करता है। 

जब यह पॉलिमर पानी के संपर्क में आता है, तो इसके सक्रिय स्थल यूरानिल आयन के ऑक्सीजन परमाणुओं के साथ समन्वय बंध (coordination bond) बना लेते हैं। यह प्रक्रिया भौतिक अवशोषण और रासायनिक बंधन दोनों का संयोजन होती है। भौतिक स्तर पर पॉलिमर की झरझरी (porous) संरचना पानी को अपने भीतर आने देती है, जिससे अधिकतम सतह क्षेत्र उपलब्ध होता है। रासायनिक स्तर पर इसके फंक्शनल ग्रुप्स यूरेनियम को मजबूती से पकड़ लेते हैं, जबकि अन्य सामान्य आयनों को छोड़ देते हैं। बाद में नियंत्रित रासायनिक प्रक्रिया द्वारा यूरेनियम को पॉलिमर से अलग भी किया जा सकता है, जिससे पॉलिमर दोबारा उपयोग में लाया जा सके। यही इसकी प्रभावशीलता और उपयोगिता की सबसे बड़ी खासियत है।

कंप्यूटर मॉडलिंग से भी यह स्पष्ट हुआ है कि यूरेनियम को मजबूती और चुनिंदा तरीके से पकड़ने में यूराजोल समूह की भूमिका निर्णायक है। सबसे खास बात यह है कि यह पॉलिमर कई बार उपयोग होने के बाद भी अपनी प्रभावशीलता बनाए रखता है। यही गुण इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए बेहद उपयोगी बनाता है। इस अध्ययन के नतीजे जर्नल ऑफ मैटेरियल्स केमिस्ट्री ए में प्रकाशित हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई तकनीक भविष्य में दूषित जल स्रोतों की सफाई के साथ-साथ परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम जैसे महत्वपूर्ण संसाधन की पुनर्प्राप्ति में भी अहम भूमिका निभा सकती है। यह खोज जल शुद्धिकरण और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

तेज रफ़्तार और असरदार नतीजे

वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों में ‘यूराजॉल’ पॉलिमर ने सामान्य पीएच स्तर पर भी उल्लेखनीय दक्षता दिखाई। आम तौर पर यूरेनियम को प्रभावी ढंग से सोखने के लिए विशेष रासायनिक परिस्थितियों की जरूरत पड़ती है, लेकिन यह पॉलिमर बिना जटिल पूर्व-प्रसंस्करण के ही बड़ी मात्रा में यूरेनियम को आकर्षित करने में सफल रहा। परीक्षणों में पाया गया कि यह एक घंटे से भी कम समय में अपनी अधिकतम अवशोषण क्षमता तक पहुंच गया। खास बात यह रही कि महज 15 मिनट के भीतर ही यह तीन-चौथाई से अधिक यूरेनियम हटाने में सक्षम था, जो मौजूदा पारंपरिक ऐडसॉर्बेंट तकनीकों की तुलना में कहीं अधिक तेज है। प्रयोगशाला से आगे बढ़ते हुए, जब इसे दूषित भूजल और औद्योगिक अपशिष्ट जल के नमूनों पर परखा गया, तब भी इसके परिणाम उत्साहजनक रहे। जांच में यह 90 प्रतिशत से अधिक यूरेनियम निकालने में सक्षम पाया गया, जिससे जल शुद्धिकरण के क्षेत्र में इसके व्यावहारिक उपयोग की संभावनाएं मजबूत हुई हैं।

<div class="paragraphs"><p>कई बार परमाणु संयंत्रों से भी पानी में यूरेनियम का प्रदूषण फैलता है।&nbsp;</p></div>

कई बार परमाणु संयंत्रों से भी पानी में यूरेनियम का प्रदूषण फैलता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

समुद्री खारे पानी में भी कारगर

शोधकर्ताओं ने इस पदार्थ का परीक्षण समुद्री जल पर भी किया, जो अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। समुद्री पानी में यूरेनियम की औसत मात्रा लगभग 3 माइक्रोग्राम प्रति लीटर के आसपास होती है, यानी अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर। इसके अलावा इसमें सोडियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फेट और क्लोराइड जैसे आयनों की सांद्रता बहुत अधिक होती है। रासायनिक रूप से यूरेनियम यहां प्रायः कार्बोनेट कॉम्प्लेक्स के रूप में घुला रहता है, जिससे उसे चयनात्मक रूप से पकड़ना और भी कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में सामान्य अवशोषक पदार्थ अक्सर अन्य आयनों के साथ प्रतिस्पर्धा में प्रभावी नहीं रह पाते।

इन जटिलताओं के बावजूद ‘यूराजॉल’ पॉलिमर ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। इसकी संरचना ऐसे फंक्शनल समूहों से युक्त है जो समुद्री जल में मौजूद यूरानिल-कार्बोनेट कॉम्प्लेक्स को भी पहचानकर उससे मजबूत समन्वय बंध बना सकते हैं। भौतिक रूप से इसकी झरझरी बनावट अधिक सतह क्षेत्र प्रदान करती है, जिससे पानी का प्रवाह बना रहता है और अधिक आयनों के संपर्क का अवसर मिलता है। परीक्षणों में पाया गया कि तीन दिनों के भीतर यह 70 प्रतिशत से अधिक यूरेनियम अलग करने में सफल रहा। कॉलम प्रयोग, जो वास्तविक जल शोधन संयंत्रों की तरह निरंतर प्रवाह पर आधारित होते हैं, में भी यह पदार्थ स्थिर और दोहराए जा सकने वाले परिणाम देता दिखा। इससे संकेत मिलता है कि इसे बड़े पैमाने पर लगातार उपयोग में लाया जा सकता है।

मौजूदा तकनीकों से तुलना

पानी से यूरेनियम हटाने के लिए आयन-एक्सचेंज, रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) और केमिकल प्रीसिपिटेशन जैसी तकनीकें पहले से इस्तेमाल में हैं। आयन-एक्सचेंज रेज़िन यूरेनियम आयनों को अपने साथ बदल लेती है, लेकिन पानी में मौजूद अन्य आयनों के साथ प्रतिस्पर्धा के कारण इसकी चयनात्मकता घट सकती है। रेज़िन को बार-बार रिजनरेट करने के लिए रसायनों की जरूरत पड़ती है, जिससे लागत और अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या बढ़ती है।

रिवर्स ऑस्मोसिस झिल्ली आधारित तकनीक है, जो भारी धातुओं सहित कई घुले पदार्थों को रोक सकती है, लेकिन यह ऊर्जा-खपत वाली प्रक्रिया है और बड़े पैमाने पर संचालन में महंगी साबित होती है। इसके अलावा, यह केवल यूरेनियम ही नहीं बल्कि आवश्यक खनिजों को भी हटा देती है। केमिकल प्रीसिपिटेशन में रसायन मिलाकर यूरेनियम को ठोस रूप में गिराया जाता है, पर इसमें कीचड़ (स्लज) बनता है, जिसके सुरक्षित निपटान की चुनौती रहती है। इसके मुकाबले नया पॉलिमर अधिक चयनात्मक, तेज और संभावित रूप से पुन: उपयोग योग्य बताया जा रहा है। यदि यह कम ऊर्जा और कम रासायनिक उपयोग के साथ काम करता है, तो ग्रामीण और विकेंद्रीकृत जल शोधन प्रणालियों के लिए अधिक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।

समुद्री जल में घुले यूरेनियम को निकालने के लिए यदि कम लागत और उच्च चयनात्मकता वाली तकनीकें विकसित हो जाती हैं, तो यह न केवल ऊर्जा सुरक्षा की तस्वीर बदल सकती हैं। वर्तमान में दुनिया के परमाणु रिएक्टर हर साल करीब 60–65 हजार टन यूरेनियम का उपयोग करते हैं। इस हिसाब से महासागरों में घुला लगभग 4 अरब टन यूरेनियम 60,000 वर्ष से अधिक की वैश्विक परमाणु ईंधन आवश्यकता पूरी कर सकता है।
<div class="paragraphs"><p>चट्टानों में खनिज या अयस्‍क के रूप में मौजूद यूरेनियम धीरे-धीरे भूजल में घुल कर उसे प्रदूषित करता है।&nbsp;</p></div>

चट्टानों में खनिज या अयस्‍क के रूप में मौजूद यूरेनियम धीरे-धीरे भूजल में घुल कर उसे प्रदूषित करता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

यूरेनियम का स्वास्थ्य पर प्रभाव

यूरेनियम युक्त पानी का लंबे समय तक सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। आम धारणा यह है कि यूरेनियम का जोखिम केवल उसकी रेडियोधर्मिता से जुड़ा है, जबकि वास्तव में इसका रासायनिक विषाक्त प्रभाव अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। शरीर में प्रवेश करने पर घुलनशील यूरेनियम सबसे पहले किडनी पर असर डालता है। यह गुर्दों की नलिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे उनकी फिल्टर करने की क्षमता प्रभावित होती है। लगातार संपर्क से किडनी फेल्योर का खतरा बढ़ सकता है। इस बारे में विस्‍तार से जानने के लिए आप हमारी हाल ही में प्रकाशित स्‍टोरी दिल्ली के भूजल में घुल रहा यूरेनियम सेहत से लेकर इको सिस्‍टम तक के लिए ख़तरा भी पढ़ सकते हैं। इसके आलावा पानी में घुले यूरेनियम के मां के दूध में पहुंचने और उसके ख़तरों की जानकारी आपको हमारी स्‍टोरी बिहार में मांओं के दूध में पहुंचा यूरेनियम: नवजातों की सेहत ख़तरे में ! से मिल सकती है। 

कुछ अध्ययनों में हड्डियों में यूरेनियम के जमाव और दीर्घकालिक संपर्क से कैंसर जोखिम की आशंका भी जताई गई है, हालांकि यह स्तर और अवधि पर निर्भर करता है। World Health Organization ने पीने के पानी में यूरेनियम की सुरक्षित सीमा लगभग 30 माइक्रोग्राम प्रति लीटर निर्धारित की है। इस सीमा से अधिक मात्रा स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित मानी जाती है। इसलिए जल स्रोतों की नियमित जांच और प्रभावी शोधन तकनीक बेहद जरूरी है।

भारत में यूरेनियम प्रदूषण की पृष्ठभूमि और भविष्य की संभावनाएं

देश के कुछ राज्यों, खासकर बिहार, झारखंड, राजस्थान, पंजाब और आंध्र प्रदेश के कई इलाकों में भूजल में स्वाभाविक या खनन गतिविधियों के कारण यूरेनियम की मात्रा अधिक पाई गई है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी Indian Council of Medical Research और Bhabha Atomic Research Centre की रिपोर्टों में भूजल में भारी धातुओं की मौजूदगी पर चिंता जताई गई है। यह संदर्भ जोड़ने से रिसर्च का सामाजिक महत्व स्पष्ट होगा। क्या यह तकनीक ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं में लागू की जा सकती है? क्या इसे पोर्टेबल फिल्टर के रूप में विकसित किया जा सकता है? क्या यह समुद्री जल से यूरेनियम निकालकर परमाणु ईंधन के वैकल्पिक स्रोत के रूप में भी उपयोगी हो सकता है? ऐसे सवाल स्टोरी को आगे की दिशा देंगे।

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