ट्रकों का धुआं कार्बन डाईऑसाइड (CO₂) जैसी ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन तक सीमित नहीं है, बल्कि नाइट्रस ऑक्साइड (NOx) और सल्फर डाईऑसाइड (SOx) जैसी ज़हरीली गैसें हवा की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर ही हैं।
स्रोत : विकी कॉमंस
केवल 3% ट्रक क्यों फैला रहे देश में 50% से ज़्यादा वायु प्रदूषण ? विज्ञान की भाषा में समझिये पूरा समीकरण
देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने में ट्रकों की अहम भूमिका है। भारत में ट्रकों के ज़रिये हर साल अरबों टन माल का परिवहन किया जाता है। देश की कुल माल ढुलाई का एक बड़ा हिस्सा ट्रकों द्वारा ही पहुंचाया जाता है। इसके अलावा ट्रकें इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि वह ऐसी दुर्गम जगहों पर भी माल को पहुंचाती हैं, जहां ट्रेन या नौकाओं के ज़रिये नहीं पहुंचा जा सकता। अपने इस महत्व के साथ ही ट्रकें देश में हो रहे वायु प्रदूषण का भी एक बड़ा कारण हैं। यह बात एक हालिया अध्ययन में उभर कर सामने आई है।
स्मार्ट फ्रेट सेंटर (एसएफसी) इंडिया, टीईआरआई और आईआईएम-बैंगलोर की “Institutionalizing Freight Emissions Accounting in India: Pathways for Clean Freight Programs and Policy Integration शीर्षक से प्रकाशित हालिया रिपोर्ट में भारत के ट्रकों द्वारा उत्सर्जित प्रदूषण की दर को उजागर किया गया है। आंकड़ों के विश्लेषण पर आधारित इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय सड़कों पर चलने वाले सभी वाहनों में ट्रकों की संख्या मात्र 3% है, फिर भी देश में हो रहे कुल कण पदार्थ उत्सर्जन यानी Particulate matter emissions का 53% हिस्सा ट्रकों के ज़रिये ही हो रहा है। इसमें पूरे सड़क परिवहन क्षेत्र से निकलने वाले काले कार्बन का 60% से अधिक और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) उत्सर्जन का 70% से अधिक हिस्सा शामिल है। कुल सड़क परिवहन उत्सर्जन में मध्यम और भारी वाहनों के उत्सर्जन की हिस्सेदारी 35%, जो 2019-20 के 27% थी।
रिपोर्ट की खास बातें
फ्रेट सेक्टर का बढ़ता एमिशन: भारत में फ्रेट ट्रांसपोर्ट सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन डेटा बिखरा हुआ है। पद्धतियां अलग-अलग हैं और नीति निर्माण अनुमान पर आधारित रहता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि NOx, SOx, पार्टिकुलेट मैटर और ब्लैक कार्बन जैसे प्रदूषक लॉजिस्टिक्स हब और कॉरिडोर के आसपास शहरी हवा को प्रभावित कर रहे हैं।
राष्ट्रीय फ्रेमवर्क की जरूरत: दस्तावेज एक समन्वित राष्ट्रीय फ्रेमवर्क की बात करता है, जो ISO 14083 और GLEC Framework जैसे वैश्विक मानकों से जुड़ा है। लेकिन इसे भारत के डेटा, ईंधन मिश्रण और संचालन की वास्तविकताओं के मुताबिक ढाला गया है।
डिजिटल MRV सिस्टम: रिपोर्ट में डिजिटल मॉनिटरिंग, रिपोर्टिंग और वेरिफिकेशन (MRV) सिस्टम, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए भारत-विशेष एमिशन फैक्टर, Transportation Emissions Measurement Tool का प्रदर्शन और TERI का क्लीन फ्रेट प्रोग्राम बेसलाइन स्टडी जैसे समाधान सुझाए गए हैं।
SFC India की टेक्निकल प्रमुख दीपाली ठाकुर ने कहा: “मानकीकृत और भारत-विशेष एमिशन फैक्टर नीति को अनुमान से निकालकर सटीक हस्तक्षेप की दिशा में ले जाते हैं।”
TERI के अनुसार, फ्रेट एमिशन का हिसाब सिर्फ रिपोर्टिंग का अभ्यास नहीं है। यह भविष्य के क्लीन फ्रेट प्रोग्राम्स, डीकार्बनाइजेशन रणनीतियों और उभरते कार्बन मार्केट्स में भारत की भागीदारी की बुनियाद है।
भारत में ज़्यादातर ट्रकें डीजल से चलती हैं, जो एक ज़्यादा प्रदूषण वाला जीवाश्म ईंधन है।
स्रोत : विकी कॉमंस
ट्रक क्यों फैलाते हैं ज्यादा प्रदूषण ?
भारी-भरकम बोझ ढोने के लिए इस्तेमाल होने वाले ट्रक कार या अन्य वाहनों की तुलना में अधिक प्रदूषण क्यों फैलाते हैं? इसका जवाब छिपा है इनमें इस्तेमाल होने वाले ईंधन, वाहनों की उम्र और इन पर ढोए जाने वाले सामान की मात्रा में।
भारत के अधिकांश ट्रक डीजल पर चलते हैं, जो ज़्यादा प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन होता है। इसके अलावा माल ढुलाई कर रहे ज़्यादातर ट्रक 10 साल से अधिक पुराने हैं। यह पुराने डीजल ट्रक पर्यावरण के लिए काफी नुकसान दायक साबित हो रहे, क्योंकि इनसे निकलने वाले काले धुएं में काफी अधिक मात्रा में कार्बन और कण पदार्थ शामिल होते हैं।
माल ढुलाई के व्यस्त मार्गों और क्षेत्रों में पाए जाने वाले पर्टिकुलेट मैटर (पीएम) और नाइट्रस ऑक्साइड (एनओएक्स) उत्सर्जन ज़हरीले होने के कारण खतरनाक प्रदूषण की श्रेणी में आते हैं, जो आसपास के माहौल और काम करने वाले लोगों की सेहत पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। यह वायु प्रदूषण के ऐसे हॉटस्पॉट हैं, जिन्हें शहरों की वायु गुणवत्ता नियमन प्रणालियां पकड़ने में विफल रहती हैं, क्योंकि यह एक स्थान पर स्थिर नहीं रहते।
ट्रकों का उत्सर्जन नापने की क्या है व्यवस्था?
माल ढुलाई वाले ट्रकों से होने वाले उत्सर्जन की भारी मात्रा और निरंतरता के बावजूद हमारे देश में इनके उत्सर्जन का कोई नियमित या निरंतर मापन नहीं हो रहा है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के अनिवार्य बिजनेस रिस्पॉन्सिबिलिटी एंड सस्टेनेबिलिटी रिपोर्टिंग (बीआरएसआर) फ्रेमवर्क के तहत रिपोर्टिंग करने वाली 800 कंपनियों में से केवल 7% ही माल ढुलाई से संबंधित उत्सर्जन का खुलासा करती हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे एक सीमेंट कंपनी के माल ढुलाई उत्सर्जन की गणना पांच अलग-अलग वैश्विक ढांचों के आधार पर की गई, जो प्रति वर्ष 265 से 3,000 टन CO₂ तक थी। यह चार गुना भिन्नता माप की कोई आकस्मिक त्रुटि नहीं है, बल्कि यह एक प्रणालीगत विफलता है जो माल ढुलाई पर कंपनियों द्वारा किए जाने वाले जलवायु संबंधी खुलासों को प्रभावी रूप से अर्थहीन बना देती है।
भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के लॉजिस्टिक्स डिवीजन के डायरेक्टर सागर काडू ने इस बारे में मे बात करते हुए इंडिया टुडे से कहा, "आगे चलकर, माल ढुलाई उत्सर्जन लेखांकन को लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढांचे के अन्य स्तंभों के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता होगी, जो दक्षता, प्रतिस्पर्धात्मकता और स्थिरता को एक साथ समर्थन प्रदान करेगा।"
क्या ट्रकों के उत्सर्जन को कम किया जा सकता है, कैसे?
रिपोर्ट के अनुसार भारत में ट्रकों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए सबसे पहले सटीक उत्सर्जन लेखांकन (Emissions Accounting) और डेटा पारदर्शिता की जरूरत है। रिपोर्ट बताती है कि यदि कंपनियां और लॉजिस्टिक्स ऑपरेटर अपने फ्लीट का ईंधन उपभोग, दूरी और कार्गो लोड का नियमित रिकॉर्ड रखें और एक मानकीकृत फ्रेमवर्क के तहत उत्सर्जन की गणना करें, तो वास्तविक प्रदूषण स्तर स्पष्ट होगा। इससे सरकार और उद्योग, दोनों के लिए लक्ष्य आधारित नीतियां बनाना आसान होगा। रिपोर्ट ‘ग्रीन फ्रेट प्रोग्राम’ को संस्थागत रूप देने की सिफारिश करती है, ताकि बड़े शिपर्स अपने सप्लाई चेन पार्टनर्स पर कम-उत्सर्जन वाले परिवहन विकल्प अपनाने का दबाव बना सकें।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रत्येक मालवाहक, ट्रक संचालक और लॉजिस्टिक्स कंपनी को काम करने के लिए समान पैमाना देने का प्रस्ताव है। वह पैमाना आईएसओ 14083 है, जो परिवहन उत्सर्जन की गणना के लिए विश्व स्तर पर स्वीकृत मानक है, जिसे भारत-विशिष्ट डेटा के साथ अनुकूलित किया गया है जो दर्शाता है कि माल वास्तव में राज्य राजमार्गों पर कैसे चलता है।
रिपोर्ट तकनीकी और संचालन स्तर पर भी कई उपाय सुझाती है। इसमें बेहतर वाहन दक्षता, बीएस-VI मानकों का सख्त अनुपालन, पुराने ट्रकों की चरणबद्ध विदाई, वैकल्पिक ईंधन (एलएनजी, सीएनजी, बिजली, ग्रीन हाइड्रोजन) की ओर संक्रमण और मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट (रेल व जलमार्ग का अधिक उपयोग) को बढ़ावा देना शामिल है। साथ ही, बेहतर रूट प्लानिंग, लोड कंसॉलिडेशन और डिजिटल ट्रैकिंग से खाली दौड़ (empty runs) कम करने पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि नीतिगत समर्थन, वित्तीय प्रोत्साहन और उद्योग की सक्रिय भागीदारी के बिना ट्रक क्षेत्र का डीकार्बोनाइजेशन संभव नहीं होगा। जब सभी कंपनियां एक समान तरीके से मापन करने लगेंगी, तब डेटा उपयोगी हो जाएगा। कंपनियां अपने सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले मार्गों की पहचान कर उनमें सुधार कर सकती हैं। नीति निर्माता अनुमान लगाने के बजाय सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले मार्गों को पहचान सकते हैं और परिवहन कंपनियां भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना के तहत कार्बन क्रेडिट का उपयोग करके उन मार्गों पर सुधारों को लागू कर सकती हैं।
भारत ने ट्रकों से होने वाले प्रदूषण पर लगाम नहीं लगाई, तो 2070 तक के नेट ज़ीरो जलवायु लक्ष्य को पाना कठिन हो जाएगा।
स्रोत : विकी कॉमंस
नहीं लगी लगाम, तो भारत को होगा बड़ा नुकसान
रिपोर्ट के मुताबिक ट्रकों प्रदूषण की समस्या का सही ढंग से और समय पर समाधान नहीं किया गया, तो भारत को बहुत नुकसान उठाना पड़ेगा। यह नुकसान केवल वायु गुणवत्ता या प्रदूषण से जुड़ा नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक क्षति के रूप में भी होगा।
दुनिया के कई देश, खासकर यूरोपीय देश अब उन उत्पादों के आयात पर प्रदूषण होने वाले नुकसान की कीमत वसूलने की व्यवस्था लागू कर रहे हैं। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म ऐसी ही एक व्यवस्था है। इसका मतलब यह है कि यदि कोई भारतीय निर्यातक यह साबित नहीं कर पाता कि उसके उत्पाद के निर्माण और शिपिंग में कितना कार्बन लगा, तो उसे यूरोपीय सीमा पर जुर्माना देना होगा। यह सड़क मार्ग से माल की ढुलाई कराने वाली भारत की ऐसी कंपनियों को बड़ी आर्थिक चोट दे सकता है, जिनके पास उत्सर्जन संबंधी कोई विश्वसनीय डेटा नहीं है।
रिपोर्ट संकेत देती है कि यदि ट्रकों से होने वाले उत्सर्जन पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो भारत को बहुस्तरीय नुकसान झेलना पड़ेगा। सड़क माल परिवहन देश के लॉजिस्टिक्स का मुख्य आधार है, लेकिन यही क्षेत्र डीजल खपत और कार्बन उत्सर्जन का बड़ा स्रोत भी है। अनियंत्रित उत्सर्जन से शहरी और औद्योगिक इलाकों में पीएम 2.5 और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषकों का स्तर बढ़ेगा, जिससे दमा, हृदय रोग और समयपूर्व मृत्यु के मामलों में वृद्धि हो सकती है। स्वास्थ्य पर बढ़ता बोझ सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों पर अतिरिक्त दबाव डालेगा।
रिपोर्ट यह भी चेतावनी देती है कि यदि भारत ने फ्रीट सेक्टर का डीकार्बोनाइजेशन तेज नहीं किया, तो जलवायु लक्ष्यों को पाना कठिन हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी असर पड़ सकता है। कई वैश्विक कंपनियां और बाजार अब सप्लाई चेन के कार्बन फुटप्रिंट को महत्व दे रहे हैं; ऐसे में उच्च उत्सर्जन वाले परिवहन तंत्र से जुड़े भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धात्मकता घट सकती है। साथ ही, ईंधन आयात पर निर्भरता बनी रहने से ऊर्जा सुरक्षा और चालू खाता संतुलन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। कुल मिलाकर, ट्रक प्रदूषण का समाधान न होना स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण तीनों के लिए दीर्घकालिक जोखिम पैदा करेगा।
हालांकि, अच्छी खबर यह है कि इस समस्या का समाधान संभव है। आंकड़े मौजूद हैं, वैश्विक रूपरेखाएं उपलब्ध हैं, और भारत के पास अब कार्रवाई करने के लिए स्थानीय स्तर पर आधारित एक रोडमैप है। लक्षित कार्रवाई करके प्रभावी नतीजे प्राप्त किए जा सकते हैं।
देश में ट्रकों से हो रहे प्रदूषण पर लगाम कसने के लिए एक कारगर फ्रेमवर्क तैयार करके उसे सख्ती से लागू किया जाना ज़रूरी है।
स्रोत : विकी कॉमंस
चुनौतियां और आगे का रास्ता
यह रिपोर्ट समस्याएं गिनाने के बजाय आगे का रास्ता भी सुझाती है। रिपोर्ट के अनुसार फ्रेट ट्रांसपोर्ट उत्सर्जन कम करने की आगे की राह इन तीन स्तंभों पर आधारित है-
मापन
प्रबंधन
रूपांतरण
सबसे पहले, एक राष्ट्रीय स्तर का मानकीकृत उत्सर्जन लेखांकन ढांचा विकसित करने की सिफारिश की गई है, ताकि कंपनियां अपने फ्लीट का सटीक कार्बन आकलन कर सकें। दूसरे, ग्रीन फ्रेट प्रोग्राम के माध्यम से उद्योगों को दक्ष वाहनों, बेहतर लॉजिस्टिक्स प्लानिंग और डिजिटल ट्रैकिंग अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना जरूरी है। तीसरे, वैकल्पिक ईंधन, इलेक्ट्रिक ट्रक और मल्टी-मॉडल परिवहन को नीतिगत समर्थन और वित्तीय प्रोत्साहन देकर डीकार्बोनाइजेशन की प्रक्रिया तेज करने पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि फ्रेट ट्रांसपोर्ट उत्सर्जन केवल कार्बन डाईऑसाइड (CO₂) जैसी ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन तक सीमित नहीं है, बल्कि नाइट्रस ऑक्साइड (NOx) और सल्फर डाईऑसाइड (SOx) जैसी ज़हरीली गैसें शहरी क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर ही हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और आसपास के क्षेत्रों में वायु प्रदूषण की निगरानी और नियंत्रण के लिए गठित वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) जैसे संस्थान दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण के पर पैनी नज़र रखे हुए हैं। इसके हस्तक्षेप से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र व देश के अन्य औद्योगिक और लॉजिस्टिक्स क्लस्टर्स के लिए वायु प्रदूषण नियंत्रण के मॉडल बन सकते हैं। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय का भी स्पष्ट संदेश है कि फ्रेट एमिशन लेखांकन को लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर, दक्षता और प्रतिस्पर्धा से अलग करके नहीं देखा जा सकता। रिपोर्ट बताती है कि भारत के पर्यावरणी परिदृष्य में ट्रक ट्रांसपोर्ट से होने वाले प्रदूषण का मुद्दा अब हाशिए पर नहीं रहेगा। आने वाले वर्षों में हर ट्रक को अपने कार्बन उत्सर्जन का हिसाब देना होगा। यहीं से भारत की लॉजिस्टिक्स और क्लाइमेट नीति की अगली कहानी शुरू होगी।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

