

फोटो: इरुगुराला रवि कृष्णा / विकिमीडिया कॉमन्स, सीसी बाय-एसए।
आंध्र प्रदेश की प्रमुख नदियां राज्य की खेती, सिंचाई और जल उपलब्धता में अहम भूमिका निभाती हैं।
गोदावरी, कृष्णा और पेन्नार के साथ वंशधारा, नागावली और कई तटीय नदियां राज्य की विविध नदी प्रणाली बनाती हैं।
अलग-अलग क्षेत्रों में बाढ़, सूखा, जल प्रदूषण, भूजल पर बढ़ता दबाव और नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।
नदियों के बेहतर प्रबंधन के लिए जलग्रहण क्षेत्र, सतही जल, भूजल और तटीय पर्यावरण को एक साथ ध्यान में रखना जरूरी है।
आंध्र प्रदेश की नदियां राज्य के भूगोल, खेती और जल संसाधनों को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। गोदावरी, कृष्णा और पेन्नार राज्य के तीन प्रमुख नदी बेसिन हैं। इनके अलावा उत्तर तटीय और मध्य तटीय क्षेत्रों में वंशधारा, नागावली, गुंडलकम्मा, सरदा, वराह, गोस्तानी और दूसरी छोटी नदियां बहती हैं। इनमें से कई नदियां सीधे बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं।
इन नदियों का महत्व सिंचाई और पेयजल से लेकर मछली पालन, स्थानीय आजीविका और तटीय पर्यावरण तक है। लेकिन बाढ़, सूखा, प्रदूषण, भूजल पर बढ़ता दबाव और नदी के प्रवाह में बदलाव इनके प्रबंधन के लिए बड़ी चुनौतियां हैं।
आंध्र प्रदेश की नदी प्रणाली को तीन बड़े नदी बेसिनों गोदावरी, कृष्णा और पेन्नार और पूर्वी तट की स्वतंत्र नदी प्रणालियों के जरिए समझा जा सकता है। राज्य की कई नदियां दूसरे राज्यों से भी जुड़ी हैं। इसलिए इनके प्रबंधन के लिए राज्यों के बीच समन्वय जरूरी है।
आंध्र प्रदेश की प्रमुख नदियों में गोदावरी, कृष्णा और पेन्नार के अलावा वंशधारा, नागावली, गुंडलकम्मा, स्वर्णमुखी और कई अन्य छोटी-बड़ी नदियां शामिल हैं।
गोदावरी: डेल्टा और सिंचाई की प्रमुख नदी
गोदावरी आंध्र प्रदेश की प्रमुख नदी प्रणालियों में से एक है। राज्य में प्रवेश करने के बाद यह पूर्व की ओर बहती है और डेल्टा क्षेत्र में पहुंचती है। इसके पानी का इस्तेमाल सिंचाई और दूसरी जरूरतों के लिए होता है। पोलावरम और धवलेश्वरम जैसी परियोजनाएं गोदावरी के पानी के प्रबंधन में महत्वपूर्ण हैं।
कृष्णा: सिंचाई और जल प्रबंधन की प्रमुख नदी
कृष्णा नदी महाराष्ट्र से निकलकर कर्नाटक और तेलंगाना से होते हुए आंध्र प्रदेश में आती है। राज्य में यह नदी सिंचाई, जलाशयों और खेती से गहराई से जुड़ी है। श्रीशैलम, पुलिचिंतला और प्रकाशम बैराज जैसी परियोजनाएं इसके जल प्रबंधन का हिस्सा हैं।
पेन्नार: रायलसीमा की जल सुरक्षा से जुड़ी नदी
पेन्नार या पेन्ना कर्नाटक से निकलकर आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र से होकर बहती है और आगे बंगाल की खाड़ी में गिरती है। कम और अनिश्चित बारिश वाले क्षेत्रों में इसका पानी सिंचाई और जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
तुंगभद्रा: कृष्णा की प्रमुख सहायक नदी
तुंगभद्रा तुंगा और भद्रा नदियों के संगम से बनती है। यह कर्नाटक से होते हुए आंध्र प्रदेश के कर्नूल क्षेत्र में आती है और आगे कृष्णा नदी में मिलती है। इसके पानी का इस्तेमाल सिंचाई और जलाशयों के संचालन में होता है।
वंशधारा: ओडिशा और आंध्र प्रदेश से जुड़ी नदी
वंशधारा ओडिशा से निकलकर आंध्र प्रदेश में प्रवेश करती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इसका नदी बेसिन दोनों राज्यों में फैला है। महेंद्रतनया इसकी प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है।
नागावली: उत्तर तटीय आंध्र की महत्वपूर्ण नदी
नागावली ओडिशा से निकलकर आंध्र प्रदेश के पार्वतीपुरम मन्यम, विजयनगरम और श्रीकाकुलम क्षेत्रों से होकर बहती है। नदी का बड़ा और निचला हिस्सा आंध्र प्रदेश में है। यह उत्तर तटीय आंध्र की महत्वपूर्ण नदी प्रणालियों में शामिल है।
गुंडलकम्मा: मध्य तटीय आंध्र की स्वतंत्र नदी
गुंडलकम्मा आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट क्षेत्र से निकलकर प्रकाशम और आसपास के तटीय क्षेत्रों से गुजरती है। यह पूर्व की ओर बहने वाली स्वतंत्र नदियों में शामिल है और आगे बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
स्वर्णमुखी: दक्षिणी तटीय नदी
स्वर्णमुखी दक्षिणी आंध्र प्रदेश की महत्वपूर्ण तटीय नदियों में है। इसका नदी तंत्र तिरुपति और आसपास के क्षेत्रों की जल व्यवस्था तथा स्थानीय कृषि से जुड़ा है।
गोदावरी, कृष्णा और पेन्नार जैसी बड़ी नदियों से कई सहायक नदियां जुड़ी हैं। इनका अपना जलग्रहण क्षेत्र होता है और ये पानी को मुख्य नदी तक पहुंचाती हैं। वंशधारा और नागावली जैसी स्वतंत्र नदियों को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है।
आंध्र प्रदेश की प्रमुख नदी घाटियां
आंध्र प्रदेश की नदी घाटियों को समझने के लिए नदी बेसिन और जलग्रहण क्षेत्र, दोनों को देखना जरूरी है। राज्य की प्रमुख नदी घाटियां गोदावरी, कृष्णा और पेन्नार बेसिन से जुड़ी हैं। इनके अलावा उत्तर और मध्य तटीय क्षेत्रों में कई छोटी और स्वतंत्र नदी घाटियां भी हैं।
आंध्र प्रदेश की नदियों का सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्व
आंध्र प्रदेश की नदियां खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पानी की उपलब्धता के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। बड़े नदी बेसिनों के साथ-साथ छोटी तटीय नदियां भी स्थानीय स्तर पर सिंचाई, घरेलू पानी और पारिस्थितिकी में भूमिका निभाती हैं।
गोदावरी और कृष्णा की नदी घाटियों में डेल्टा और सिंचित कृषि का विशेष महत्व है। दूसरी ओर, रायलसीमा में पेन्नार और उसकी सहायक नदियां ऐसे क्षेत्रों से जुड़ी हैं जहां पानी की उपलब्धता सीमित और अनिश्चित है। तटीय नदियां मुहानों, आर्द्रभूमियों और मत्स्य संसाधनों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
नदियों से मिलने वाले पानी का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता। इससे ग्रामीण रोजगार, खेती से जुड़ी गतिविधियों और स्थानीय बाजारों को भी बढ़ावा मिलता है। वहीं तटीय क्षेत्रों में नदी के मुहाने और आर्द्रभूमियां मत्स्य संसाधनों और स्थानीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं।
आंध्र प्रदेश में नदी प्रबंधन की चुनौती केवल बाढ़ और पानी की कमी तक सीमित नहीं है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में बाढ़, सूखा, पानी की गुणवत्ता, भूजल पर दबाव, नदी के प्रवाह में बदलाव और तटीय पर्यावरण से जुड़ी कई समस्याएं हैं।
1. बाढ़ और नदी कटाव
मानसून के दौरान गोदावरी और कृष्णा जैसी बड़ी नदियों में पानी का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। उत्तर तटीय आंध्र की वंशधारा और नागावली जैसी नदियों में भी भारी बारिश के दौरान बाढ़ का जोखिम रहता है। आंध्र प्रदेश स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर ने गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार, नागावली और वंशधारा के संभावित बाढ़ क्षेत्रों के मानचित्र तैयार किए हैं।
2. सूखा और मौसमी जल कमी
रायलसीमा में बारिश और सतही पानी की अनिश्चित उपलब्धता के कारण पेन्नार और उसकी सहायक नदियां खास महत्व रखती हैं। ऐसे क्षेत्रों में जलाशय, सिंचाई परियोजनाएं और भूजल मिलकर पानी की जरूरत पूरी करने में मदद करते हैं।
3. नदी प्रदूषण
खासकर शहरों में नदी प्रदूषण एक बड़ी चुनौती है। CWC के राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्यक्रम से जुड़े दस्तावेजों में आंध्र प्रदेश की कुंडू, तुंगभद्रा, गोदावरी, कृष्णा और नागावली नदियों के कुछ हिस्सों को प्रदूषित दर्ज किया गया था।
4. भूजल पर बढ़ता दबाव
जब सतही पानी कम मिलता है तो सिंचाई और घरेलू जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भरता बढ़ सकती है। इसलिए नदी और भूजल प्रबंधन को अलग-अलग देखने के बजाय दोनों को एक साथ देखना जरूरी है। जलस्तर, पानी की गुणवत्ता और मौसम के हिसाब से पानी की उपलब्धता की निगरानी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है।
5. प्राकृतिक नदी प्रवाह में बदलाव
बड़े बांध और बैराज सिंचाई, पेयजल और बाढ़ प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके संचालन से नदी में पानी कब और कितना बहेगा, इसमें बदलाव हो सकता है। इसलिए पानी जमा करने और सिंचाई की जरूरतों के साथ नदी के निचले हिस्सों की जरूरत और नदी के जरूरी प्राकृतिक प्रवाह को भी ध्यान में रखना चाहिए।
6. अंतरराज्यीय नदी प्रबंधन
गोदावरी और कृष्णा जैसे बड़े नदी बेसिन कई राज्यों में फैले हैं। वंशधारा और नागावली जैसी नदियां भी ओडिशा और आंध्र प्रदेश से जुड़ी हैं। इसलिए पानी के बंटवारे, परियोजनाओं के संचालन और बाढ़ से निपटने के लिए राज्यों के बीच तालमेल जरूरी है।
APWRIMS आंध्र प्रदेश के जल संसाधनों से जुड़ी जानकारी और उनके प्रबंधन के लिए एकीकृत प्रणाली है। वहीं भूजल एवं जल ऑडिट विभाग जलस्तर, पानी की गुणवत्ता, जल संसाधनों के आकलन और मौसमी जल ऑडिट जैसे काम करता है।
Neeru-Chettu के तहत पानी बचाने, छोटे सिंचाई जलाशयों की मरम्मत और गाद निकालने, चेक डैम बनाने और भूजल रिचार्ज जैसे कामों को बढ़ावा दिया गया। शहरों में AMRUT 2.0 के तहत पानी की आपूर्ति, सीवेज, बारिश के पानी को जमा करने और जल स्रोतों को बनाए रखने से जुड़े काम भी किए जा रहे हैं।
आंध्र प्रदेश में बांध और बैराज सिंचाई, पानी जमा करने, बाढ़ से निपटने और कुछ क्षेत्रों में पेयजल पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। राज्य की कई प्रमुख नदी परियोजनाएं गोदावरी, कृष्णा, पेन्नार और उत्तर तटीय नदियों से जुड़ी हैं।
आंध्र प्रदेश में नदी संरक्षण का मतलब केवल नदी किनारे सफाई करना या नए जल ढांचे बनाना नहीं है। राज्य की नदियां बड़े नदी बेसिन, छोटे जलग्रहण क्षेत्रों, भूजल, खेती और तटीय पर्यावरण से जुड़ी हैं।
नदी प्रबंधन में नदी के प्राकृतिक प्रवाह, जलग्रहण क्षेत्र, सतही पानी, भूजल और तटीय पर्यावरण को एक साथ देखना होगा। बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी को सुरक्षित तरीके से संभालना और सूखे समय में पानी की उपलब्धता बनाए रखना, दोनों जरूरी हैं।
बड़ी नदियों के साथ छोटी नदियों और जलधाराओं को भी नदी प्रबंधन में शामिल करना जरूरी है। वंशधारा और नागावली जैसी अंतरराज्यीय नदियों के लिए राज्यों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण है। वहीं गोदावरी और कृष्णा जैसे बड़े बेसिनों में जल उपलब्धता, जलाशय संचालन और नदी के निचले हिस्सों की जरूरतों को भी साथ लेकर चलना होगा।
आंध्र प्रदेश की नदी प्रणाली में अलग-अलग क्षेत्रों की स्थिति अलग है। गोदावरी और कृष्णा जैसी बड़ी नदियां राज्य के सिंचित कृषि क्षेत्रों और डेल्टा अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं, जबकि पेन्नार और रायलसीमा की नदी प्रणालियां अधिक अनिश्चित जल उपलब्धता वाले क्षेत्रों से जुड़ी हैं। उत्तर तटीय आंध्र की वंशधारा और नागावली जैसी नदियां राज्यों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत दिखाती हैं।
इसलिए राज्य में नदी प्रबंधन का सवाल केवल इस बात का नहीं है कि पानी कितना उपलब्ध है। यह इस बात से भी जुड़ा है कि पानी कब, कहां और कैसे इस्तेमाल हो रहा है और नदी में प्राकृतिक प्रवाह तथा पानी की गुणवत्ता कैसी है।
आगे की चुनौती यह है कि बाढ़ के समय अतिरिक्त पानी को बेहतर तरीके से संभाला जाए, पानी की कमी वाले क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बढ़ाई जाए और नदी, भूजल तथा तटीय पर्यावरण को एक साथ देखा जाए।
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केंद्रीय जल आयोग (CWC), History of Irrigation Development in Andhra Pradesh.
केंद्रीय जल आयोग (CWC), Reassessment of Water Availability in Basins Using Spatial Inputs, 2018.
केंद्रीय जल आयोग (CWC), Vamsadhara Basin / Vamsadhara Water Disputes Tribunal Report.
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