बहराइच की प्रसिद्ध कतर्नियाघाट सेंचुरी से सटी गेरुआ नदी में विशालकाय घड़ियाल और मगरमच्‍छ देखने को मिलते हैं। 

बहराइच की प्रसिद्ध कतर्नियाघाट सेंचुरी से सटी गेरुआ नदी में विशालकाय घड़ियाल और मगरमच्‍छ देखने को मिलते हैं। 

फोटो : घड़ियाल कंजर्वेशन प्रोग्राम, कतर्नियाघाट

गाद जमाव, घटते जल स्‍तर से बहराइच की गेरुआ नदी का अस्तित्‍व और जैव विविधता खतरे में

सांसद ने लोकसभा में उठाया नदी के संरक्षण और इसके इको सिस्‍टम को बचाने का सवाल
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बहराइच की जीवनरेखा मानी जाने वाली गेरुआ नदी आज अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर संकटों में से एक का सामना कर रही है। नदी में लगातार बढ़ रहे गाद जमाव, कई हिस्सों में घटते प्राकृतिक जल प्रवाह और बदलते नदी स्वरूप ने इसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर खतरा पैदा कर दिया है। इसका असर केवल नदी तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती, मत्स्य पालन, भूजल, वन्यजीव और लाखों लोगों की आजीविका पर भी पड़ रहा है। 

इसी गंभीर मुद्दे को बहराइच से लोकसभा सांसद डॉ. आनंद कुमार गोंड ने संसद में उठाते हुए केंद्र सरकार से गेरुआ नदी के संरक्षण, गाद निकासी, प्राकृतिक प्रवाह की बहाली और नदी से जुड़ी जैव विविधता को बचाने के लिए प्रभावी एवं समयबद्ध कार्रवाई की मांग की। उनका कहना था कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह नदी भविष्य में और अधिक गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना कर सकती है। 

बहराइच के लोकसभा सांसद डॉ. आनंद कुमार गोंड ने बीते सप्‍ताह संसद में बहराइच की गेरुआ नदी के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे पर प्रश्‍न पूछते हुए नदी और उससे जुड़ी समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण का मुद्दा उठाया। उन्‍होंने नदी में बढ़ते गाद जमाव, घटते जल प्रवाह और इसके कारण स्थानीय पर्यावरण व वन्यजीवों पर पड़ रहे प्रभाव की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया। साथ ही नदी के संरक्षण, गाद निकासी, प्राकृतिक प्रवाह की बहाली तथा जैव विविधता की सुरक्षा के लिए प्रभावी और समयबद्ध कदम उठाने का आग्रह सरकार से किया। 

उन्‍होंने कहा कि गेरुआ नदी बहराइच के एक बड़े इलाके के लोगों की जीवन रेखा है। इसलिए इसे बचाना जरूरी है। यह केवल एक जल का स्रोत नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य धरोहर है।

गाद जमाव, कटाव और बदलते नदी मार्ग की समस्‍या बढ़ी

हाल के वर्षों में गेरुआ नदी के सामने कई गंभीर चुनौतियां उभरकर आई हैं। नदी तल में लगातार बढ़ रहा गाद जमाव, बदलता नदी मार्ग, तटों का कटाव, अनियोजित मानवीय हस्तक्षेप तथा कुछ स्थानों पर घटता जल प्रवाह इसके अस्तित्व के लिए चिंता का विषय बन रहे हैं। नदी की धारा उथली होने से बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, जबकि गर्मियों में कई हिस्सों में जल उपलब्धता प्रभावित होती है। इससे किसानों, मछुआरों और नदी पर निर्भर हजारों परिवारों की आजीविका पर भी असर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते वैज्ञानिक ढंग से गाद निकासी, प्राकृतिक प्रवाह की बहाली, तटीय हरित पट्टी का संरक्षण और नियमित पर्यावरणीय निगरानी जैसे उपाय नहीं किए गए, तो भविष्य में गेरुआ नदी की पारिस्थितिकीय क्षमता और जैव विविधता को गंभीर क्षति पहुंच सकती है। इसलिए इस नदी के संरक्षण को केवल जल प्रबंधन का नहीं, बल्कि पर्यावरणीय सुरक्षा और सतत विकास के व्यापक लक्ष्य से जोड़कर देखने की आवश्यकता है।

<div class="paragraphs"><p>गेरुआ नदी अपनी समृद्ध जैव विविधता के कारण पर्यावरण की दृष्टि से भी काफी महत्‍वपूर्ण मानी जाती है।&nbsp;</p></div>

गेरुआ नदी अपनी समृद्ध जैव विविधता के कारण पर्यावरण की दृष्टि से भी काफी महत्‍वपूर्ण मानी जाती है। 

फोटो : घड़ियाल कंजर्वेशन प्रोग्राम, कतर्नियाघाट

केवल पानी तक सीमित नहीं गेरुआ नदी का संकट 

गेरुआ नदी का महत्व केवल एक जलधारा के रूप में नहीं है। यह उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र के संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र की आधारशिला है। नदी का पानी खेतों की सिंचाई, भूजल पुनर्भरण और मत्स्य पालन के साथ-साथ आसपास के आर्द्र क्षेत्रों (वेटलैंड्स) को भी जीवन देता है। गाद जमाव बढ़ने से नदी की जलधारण क्षमता लगातार घट रही है, जिससे एक ओर बरसात में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है तो दूसरी ओर गर्मियों में जल प्रवाह कम होने लगता है। इससे नदी के प्राकृतिक आवास प्रभावित होते हैं और जलीय जीवों के प्रजनन चक्र पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नदी के संरक्षण को केवल बाढ़ नियंत्रण परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि एक समग्र नदी पुनर्जीवन कार्यक्रम के रूप में देखा जाना चाहिए।

सिंचाई, पशुपालन, मत्‍स्‍य पालन के लिए महत्‍वपूर्ण 

गेरुआ नदी केवल एक प्राकृतिक जलधारा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक जीवन-रेखा है। नदी का जल आसपास के खेतों की सिंचाई, पशुपालन और मत्स्य पालन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। मानसून के दौरान यह नदी बड़ी मात्रा में तलछट (सेडिमेंट) लाती है, जिससे बाढ़ के मैदानों की मिट्टी उपजाऊ बनती है। यही कारण है कि इसके किनारे कृषि गतिविधियां लंबे समय से फलती-फूलती रही हैं। गेरुआ नदी का प्रवाह तराई के आर्द्र क्षेत्रों (वेटलैंड्स) और भूजल भंडार को भी पुनर्भरित करता है, जिससे क्षेत्र में जल संतुलन बना रहता है। हालांकि जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, अत्यधिक गाद जमाव और नदी तटों पर बढ़ते मानवीय दबाव ने इसकी प्राकृतिक प्रणाली को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि गेरुआ नदी का संरक्षण केवल नदी को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि तराई की पूरी पारिस्थितिकी, स्थानीय अर्थव्यवस्था और जल सुरक्षा को सुरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

कतर्नियाघाट सेंचुरी के इको सिस्‍टम के लिए अहम है नदी  

गेरुआ नदी उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र की प्रमुख नदियों में मानी जाती है। यह नेपाल से आने वाली कर्णाली नदी की धारा का ही एक रूप है और बहराइच जिले में बहते हुए घाघरा नदी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है। यह नदी न केवल सिंचाई, मत्स्य पालन और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, बल्कि तराई के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र और समृद्ध जैव विविधता को भी सहारा देती है। इसका पारिस्थितिकी तंत्र अनेक देशी मछलियों, कछुओं, जलीय जीवों और प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल आवास उपलब्ध कराता है। इस वजह से नदी के आसपास के क्षेत्र और इसके तटीय इलाकों का सीधा संबंध कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य के पारिस्थितिकी तंत्र से भी माना जाता है।

गेरुआ नदी देश में घड़ियालों के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों में से एक है। नदी के रेतीले तट घड़ियालों के भोजन, धूप सेंकने और अंडे देने के लिए आदर्श परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं। बहराइच में नियमित निगरानी क्षेत्र में 500 से अधिक वयस्क घड़ियाल पाए जाते हैं। बारिश के मौसम में कतर्नियाघाट अकसर सैकड़ों शिशु घड़‍ियालों को भी यहां स्‍पॉट किया जाता रहा है।महत्वपूर्ण बात यह है कि घड़ियाल केवल अपेक्षाकृत स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त नदियों में ही अच्छी तरह जीवित रहते हैं। उनकी मौजूदगी बताती है कि नदी में पर्याप्त मछलियां हैं और खाद्य तत्व भी संतुलित हैं। जहां घड़ियाल होते हैं, वहां अक्सर कछुए, ऊदबिलाव, डॉल्फिन, प्रवासी पक्षी और अनेक मछली प्रजातियां भी मिलती हैं। इस तरह देखा जाए तो गेरुआ नदी जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

गेरुआ नदी की आर्द्रभूमियां प्रवासी पक्षियों और गंगा डॉल्फिन का सुरक्षित बसेरा

गेरुआ नदी के किनारे विकसित आर्द्रभूमियां (वेटलैंड्स), दलदली क्षेत्र और उथले जलाशय हर वर्ष बड़ी संख्या में स्थानीय और प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करते हैं। सर्दियों के मौसम में मध्य एशिया, साइबेरिया और हिमालयी क्षेत्रों से आने वाले अनेक जलपक्षी इन आर्द्र क्षेत्रों में भोजन, विश्राम और सुरक्षित आवास पाते हैं। नदी के शांत जल, प्राकृतिक वनस्पति, कीट-पतंगे, छोटी मछलियां और अन्य जलीय जीव इनके लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराते हैं। यही वजह है कि गेरुआ नदी का तटीय क्षेत्र तराई के महत्वपूर्ण पक्षी आवासों में गिना जाता है।

नदी में गाद जमाव लगातार अगर यूं ही बढ़ता रहा, जल प्रवाह कम होता गया और आर्द्रभूमियां सिकुड़ती रहीं, तो इन प्रवासी पक्षियों के प्राकृतिक आवास भी प्रभावित होंगे। इससे पक्षियों की संख्या में गिरावट आने के साथ-साथ पूरे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है। पक्षी जैव विविधता के महत्वपूर्ण संकेतक माने जाते हैं। उनकी मौजूदगी किसी नदी और आर्द्रभूमि की पर्यावरणीय सेहत को दर्शाती है। इसलिए गेरुआ नदी के संरक्षण के साथ-साथ उससे जुड़ी आर्द्रभूमियों का संरक्षण भी समान रूप से आवश्यक है, ताकि यह क्षेत्र भविष्य में भी प्रवासी पक्षियों के सुरक्षित आश्रय के रूप में अपनी पहचान बनाए रख सके।

गेरुआ नदी से जुड़े महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य

  • गेरुआ नदी नेपाल से आने वाली कर्णाली नदी तंत्र की प्रमुख धाराओं में से एक मानी जाती है।

  • यह उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में शामिल है।

  • नदी का प्रवाह तराई क्षेत्र के भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

  • इसके बाढ़ मैदानों में जमा होने वाली गाद कृषि भूमि की उर्वरता बढ़ाती है।

  • नदी का पारिस्थितिकी तंत्र अनेक स्थानीय मछलियों, जलीय जीवों और प्रवासी पक्षियों का आवास है।

  • गेरुआ नदी का संबंध कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र से भी जुड़ा माना जाता है।

  • नदी के किनारे बसे हजारों परिवार खेती, मत्स्य पालन और अन्य आजीविकाओं के लिए इस पर निर्भर हैं।

  • अत्यधिक गाद जमाव से नदी की जलधारण क्षमता घटती है और बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।

  • गर्मियों में जल प्रवाह कम होने से सिंचाई और जलीय जीवों दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

  • विशेषज्ञ गेरुआ नदी के संरक्षण के लिए वैज्ञानिक गाद प्रबंधन, प्राकृतिक प्रवाह की बहाली, तटीय हरित पट्टी के संरक्षण और नियमित पर्यावरणीय निगरानी पर जोर देते हैं।

<div class="paragraphs"><p>बबहराइच की मशहूर चित्‍तौरा झील को हाल ही में एक पर्यटन स्‍थल के रूप में‍ विकसित किया गया है।&nbsp;</p></div>

बबहराइच की मशहूर चित्‍तौरा झील को हाल ही में एक पर्यटन स्‍थल के रूप में‍ विकसित किया गया है। 

फोटो : फेसबुक

गंधक के पानी वाली बहराइच की चित्तौरा झील भी है खास

बहराइच जिले में स्थित पौराणिक चित्तौरा झील (मसीहाबाद) को यहां की स्थानीय व ऐतिहासिक कुटिला नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। इसके पानी में गंधक की अधिकता पाई जाती है। इस कारण इसमें स्‍नान करना चर्म रोगियों के लिए फायदेमंद माना जाता है।  इतिहास की बात करें, तो यह झील महाराजा सुहेल देव व महमूद गजनवी के भांजे सैय्यद सालार मसूद की रणभूमि की साक्षी रही है। इस झील का उल्‍लेख पौराणिक कथाओं में भी मिलता है, जिसके मुताबिक महाराजा जनक के गुरु महर्षि अष्टावक्र इस चित्तौरा झील के किनारे आश्रम बनाकर रहते थे। झील से निकली कुटिला नदी में स्नान से उनके शरीर का टेढ़ापन खत्म होने का उल्‍लेख भी कुछ कथाओं में मिलता है।

चित्तौरा झील केवल आस्था और इतिहास का केंद्र ही नहीं, बल्कि स्थानीय जलीय पारिस्थितिक तंत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। बरसात के मौसम में यह झील आसपास के क्षेत्र के वर्षाजल को संचित कर भूजल पुनर्भरण में योगदान देती है, जबकि सर्दियों में इसके आसपास का इलाका विभिन्न प्रकार के जलीय जीवों और पक्षियों के लिए अनुकूल आवास बन जाता है। पर्यटन और धार्मिक महत्व के बावजूद झील पर बढ़ता मानवीय दबाव, गाद जमाव, जलकुंभी जैसी जलीय खरपतवार का प्रसार और समय-समय पर होने वाला अतिक्रमण इसकी प्राकृतिक सेहत के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस झील का नियमित वैज्ञानिक प्रबंधन, गाद निकासी, जल गुणवत्ता की निगरानी और तटीय हरित क्षेत्र का संरक्षण किया जाए, तो इसे पूर्वांचल के एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक एवं इको-टूरिज्म केंद्र के रूप में भी विकसित किया जा सकता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे और इस ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण भी सुनिश्चित हो सकेगा।

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