बाणासुर सागर बांध वायनाड,केरल।
फ़ोटो - अजय मोहन
बाणासुर सागर बांध: भारत का सबसे बड़ा मृदा बांध, जानिए इतिहास, विशेषताएं और महत्व
केरल के वायनाड जिले की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच फैला बाणासुर सागर बांध केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि यह जल प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय आजीविका के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। पश्चिमी घाट में स्थित यह बांध अपनी प्राकृतिक सुंदरता, विशाल जलाशय और पहाड़ी द्वीपों के कारण प्रसिद्ध है और यह भारत का सबसे बड़ा मिट्टी से बना बांध है। वायनाड लंबे समय से अपनी जैव विविधता, मसालों की खेती, कॉफी बागानों और आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है।
कब और क्यों बना यह बांध ?
बाणासुर सागर बांध करामनथोडु नदी पर बनाया गया है, जो कबिनी नदी की सहायक धारा है। कबिनी नदी आगे चलकर कावेरी नदी का हिस्सा बनती है। इसका उद्देश्य सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए जल संग्रहण करना था। बांध का निर्माण 1979 में शुरू हुआ और इसे बाद में विकसित किया गया।
वायनाड जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में मानसून के दौरान भारी वर्षा होती है, लेकिन गर्मियों में कई इलाकों में जल संकट भी देखने को मिलता है। इसको देखेते हुए बाणासुर सागर परियोजना विकसित की गई थी। यह बांध पत्थरों और मिट्टी की विशाल परतों से निर्मित है। इसकी संरचना इसे पारंपरिक कंक्रीट बांधों से अलग बनाती है।
पौराणिक कथाओं से जुड़ा इतिहास
ऐसा मन जाता है की बाणासुर सागर बांध का नाम पौराणिक असुर राजा बाणासुर के नाम पर रखा गया है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार राजा बाणासुर ने आसपास की पहाड़ियों में कठोर तपस्या की थी। इन्हीं पहाड़ियों को आज बाणासुर हिल्स कहा जाता है। इन पहाड़ियों और जंगलों से जुड़ी कई लोक कथाएं सुनाई जाती हैं। वायनाड के सांस्कृतिक इतिहास में प्रकृति और पौराणिक कथाओं का गहरा संबंध दिखाई देता है।
बाणासुर सागर बांध।
फ़ोटो - अजय मोहन
पानी और पहाड़ों के बीच बनते द्वीप
बाणासुर सागर बांध भारत का सबसे बड़ा मिट्टी से बना बांध माना जाता है। यहां की भौगोलिक संरचना ऐसी है कि जब बांध पूरी तरह भर जाता है, तब इसके ऊपरी जलक्षेत्र में कई छोटे-छोटे द्वीप उभर आते हैं। बाणासुर पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में दिखाई देने वाले ये द्वीप पर्यटकों के लिए बेहद मनमोहक और आकर्षक दृश्य प्रस्तुत करते है।
विशाल चट्टानों और पत्थरों से निर्मित यह बांध केरल के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। हरियाली से घिरी पहाड़ियां, शांत जलाशय और प्प्रकृति की सुंदरता यहां आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। बोटिंग, प्रकृति भ्रमण और फोटोग्रफी जैसी गतिविधियां इस क्षेत्र को इको-टूरिज्म के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण बनाती है।
यह कलपेट्टा शहर के पास है, जो वायनाड का मुख्यालय भी है। यहाँ से बांध तक पहुँचना बेहद आसान है। निकटतम रेलवे स्टेशन कोझिकोड (कालीकट) है और निकटतम हवाई अड्डा कालीकट अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है।
क्या होता है मृदा बांध (Earthen Dam)?
अभी तक हमने सीमेंट और पक्के डेम के बारे में ज्यादा सुना है, लेकिन बाणासुर बांध कंक्रीट, पत्थर, मिट्टी या रॉक-फिल से नहीं बना है। जब किसी बांध का निर्माण मुख्यतः मिट्टी, रेत, बजरी और चट्टानों के टुकड़ों को परतो को दबाकर किया जाता है, तो उसे मृदा बांध या अर्थन डैम कहते है। यह बांध किसी नदी की घाटी में एक विशाल तटबंध की तरह होता है।
मृदा बांध की विशेषता यह होती है कि इसमें एक कोर वॉल होती है, यानी बीच में एक ऐसी दीवार जो पानी को रिसने से रोकती है। इसके दोनों तरफ मिट्टी और पत्थरों की मोटी परतें चढ़ाई जाती हैं। बांध का ढलान सावधानी से डिजाइन किया जाता है ताकि पानी के दबाव में वह टिका रहे। बांध के ऊपर एक जल निकासी द्वार भी बनाया जाता है जिससे की अधिक पानी को नियंत्रित तरीके से बाहर निकाला जा सके।
मृदा बांध की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें बनाने में स्थानीय सामग्री, मिट्टी, बालू, और पत्थर का उपयोग होता है। इससे निर्माण लागत कम होती है और स्थानीय भूगोल के अनुसार इन्हें आकार दिया जा सकता है। लेकिन इनके लिए बेहद सावधानीपूर्वक इंजीनियरिंग की जरूरत होती है, क्योंकि एक छोटी सी चूक से पूरा बांध क्षतिग्रस्त हो सकता है।
मृदा बांध के प्रकार
मृदा बांध कई प्रकार के होते हैं। केंद्रीय जल आयोग की तकनीकी सूची में समांगी, विषमांगी रॉक-फिल और क्षेत्रीकृत मृदा बांधों का उल्लेख मिलता है।
समांगी मृदा बांध - इस प्रकार के बांध में लगभग एक जैसी मिट्टी का उपयोग किया जाता है। इसकी संरचना सरल होती है लेकिन पानी के रिसाव को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त सावधानी रखनी पड़ती है।
विषमांगी मृदा बांध - इसमें अलग-अलग प्रकार की सामग्री का उपयोग किया जाता है। बीच में अभेद्य मिट्टी और किनारों पर अपेक्षाकृत मजबूत सामग्री भरी जाती है।
रॉक-फिल बांध - इस प्रकार के बांध में पत्थरों और चट्टानों का अधिक उपयोग होता है। बीच में जलरोधी परत बनाई जाती है।
क्षेत्रीकृत बांध - इसमें बांध को विभिन्न हिस्सों में विभाजित कर अलग-अलग सामग्री भरी जाती है ताकि संरचना अधिक मजबूत हो सके।
भारत में कई बड़े बांधों में मृदा संरचना का उपयोग किया गया है। पहाड़ी और ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे चेक डैम, तालाब और जल संरक्षण संरचनाएं भी अक्सर मिट्टी आधारित होती हैं। बाणासुर सागर बांध इसी का एक उदाहरण है। केरल का बाणासुर सागर बांध भारत का सबसे बड़ा मिट्टी से बना बांध माना जाता है। यह बांध जल संरक्षण के साथ-साथ पर्यटन का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
मृदा बांध के फायदे
कम लागत - मृदा बांधों के निर्माण में स्थानीय मिट्टी और सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिससे लागत कम होती है।
पर्यावरण के अनुकूल - इनका निर्माण स्थानीय भूगोल के अनुरूप किया जा सकता है। इससे प्राकृतिक परिदृश्य पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है।
भूजल पुनर्भरण - छोटे मृदा बांध वर्षा जल को रोककर भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करते है।
सिंचाई और जल संरक्षण - ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के लिए पानी उपलब्ध कराने में ये महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।
बाढ़ नियंत्रण - अचानक आने वाले जल प्रवाह को नियंत्रित करने में भी मृदा बांध उपयोगी हो सकते है। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के अनुसार बड़े बांध जल भंडारण, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण है।
मृदा बांधो की क्या चुनौतियां है ?
हालांकि मृदा बांधों के कई फायदे हैं, लेकिन इनके साथ कुछ जोखिम भी जुड़े होते हैं।
पानी का रिसाव - यदि निर्माण गुणवत्ता अच्छी न हो, तो बांध में रिसाव शुरू हो सकता है।
कटाव का खतरा - भारी बारिश या तेज जल प्रवाह मिट्टी के कटाव का कारण बन सकते हैं।
नियमित रखरखाव की जरूरत - मृदा बांधों की नियमित निगरानी और मरम्मत जरूरी होती है।
पर्यटन और साहसिक गतिविधियां
एक रिपोर्ट के अनुसार बाणासुर सागर बांध न केवल एक इंजीनियरिंग उपलब्धि है, बल्कि केरल का एक प्रमुख इको-टूरिज्म डेस्टिनेशन भी बन गया है। यहां पर्यटक ट्रैकिंग और कैंपिंग का लुत्फ उठाते है-
नौकायन - जलाशय में पेडल बोट और स्पीड बोट उपलब्ध है। द्वीपों के बीच से गुजरते हुए नाव चलाना एक अविस्मरणीय अनुभव है।
ट्रेकिंग - बाणासुर पहाड़ी तक ट्रेकिंग ट्रेल्स हैं जो पर्यटकों में बेहद लोकप्रिय है। ट्रेक के दौरान बांध, जलाशय और पूरी वायनाड घाटी का विहंगम दृश्य मिलता है।
पिकनिक स्पॉट - परिवार और मित्रों के साथ समय बिताने के लिए शांत और छायादार स्थान उपलब्ध है।
बर्ड वॉचिंग - इस क्षेत्र में पक्षियों की अनेक प्रजातियाँ पाई जाती हैं। पक्षी प्रेमियों के लिए यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं।
फ़ोटो - अजय मोहन
पश्चिमी घाट और जैव विविधता
बाणासुर सागर बांध पश्चिमी घाट क्षेत्र में स्थित है, जिसे यूनेस्को विश्व धरोहर क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त है। यह इलाका जैव विविधता के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील माना जाता है। यहां कई दुर्लभ वनस्पतियां और जीव-जंतु पाए जाते हैं। वायनाड वन्यजीव अभयारण्य के नजदीक होने के कारण यह क्षेत्र हाथियों, हिरणों, पक्षियों और अनेक प्रकार की तितलियों के लिए महत्वपूर्ण आवास माना जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में वायनाड और केरल के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं बढ़ी है। जलवायु वैज्ञानिक इसे बदलते मौसम पैटर्न से जोड़ते है। पहाड़ी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण और अत्यधिक पर्यटन भी जोखिम बढ़ाते हैं। बड़े रिसॉर्ट, सड़क विस्तार और जंगलों में हस्तक्षेप से प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली प्रभावित होती है। ऐसे समय में बाणासुर सागर बांध जैसे जलाशयों की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि वे जल संग्रहण और प्रवाह नियंत्रण में मदद कर सकते है।
वायनाड के कई ग्रामीण और आदिवासी समुदाय लंबे समय से खेती, जंगल आधारित आजीविका और मसाला उत्पादन पर निर्भर रहे है। पर्यटन बढ़ने के बाद रोजगार के नए अवसर सामने आए है। अब कई स्थानीय युवा पर्यटन गाइड, नाव चालक, होम-स्टे संचालक और हस्तशिल्प विक्रेता के रूप में काम कर रहे है। महिलाओं के स्वयं सहायता समूह स्थानीय खाद्य पदार्थ और उत्पाद बेच रहे है। हालांकि कुछ समुदायों का मानना है कि तेजी से बढ़ते पर्यटन के कारण जमीन की कीमतें बढ़ी है और पारंपरिक जीवन शैली प्रभावित हो रही है।
प्रकृति और विकास के बीच संतुलन
बाणासुर सागर बांध इस बात का उदाहरण है कि जल संरचना केवल तकनीकी परियोजना नहीं होतीं, बल्कि वे समाज, पर्यावरण और स्थानीय संस्कृति को भी प्रभावित करती है। यह बांध एक ओर सिंचाई और जल संरक्षण में मदद करता है, वहीं दूसरी ओर पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।
लेकिन इसके साथ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। पर्यावरण संरक्षण, कचरा प्रबंधन, जैव विविधता की सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बीच संतुलन बनाए रखना भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता होगी।
एक तरफ जहां देश के कई हिस्से जल संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का सामना कर रहे है, तब बाणासुर सागर बांध जैसी परियोजनाएँ विकास और प्रकृति के बीच संतुलन बना सकती है। वायनाड की पहाड़ियों के बीच फैला यह जलाशय केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि पानी और पर्यावरण को समझने के लिए बेहद जरुरी है।
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