

कोसी नदी
फोटो: नीतू सिंह
बिहार सरकार और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के बीच 3 नवंबर 2026 को समझौता हुआ।
16 चालू राजमार्ग परियोजनाओं में 243 लाख घनमीटर उपयुक्त गाद इस्तेमाल करने की बात है।
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, गाद निकालने से बाढ़ में राहत सीमित और कम समय के लिए हो सकती है।
बिहार की नदियों और जलस्रोतों से निकाली गई गाद अब सड़क निर्माण में इस्तेमाल की जाएगी। इसके लिए बिहार सरकार और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के बीच 3 नवंबर 2026 को समझौता हुआ। नदी संजीवनी पहल से जल निकासी सुधारने और निर्माण के लिए खेतों की मिट्टी पर निर्भरता घटाने की उम्मीद है।
लेकिन क्या गाद से सड़क बनने के साथ बाढ़ का खतरा भी घटेगा? इस सवाल पर सरकारी दस्तावेजों को साथ रखकर पढ़ना जरूरी है। सड़क परिवहन मंत्रालय की घोषणा में बहाव सुधारने और बाढ़ का जोखिम घटाने की उम्मीद है। वहीं, जल शक्ति मंत्रालय गाद निकालने से मिलने वाली बाढ़ संबंधी राहत को सीमित और कम समय का बताता है।
दोनों बातों से एक फर्क सामने आता है। निकाली गई गाद का उपयोग सड़क में हो सकता है। लेकिन उससे बाढ़ कितनी घटेगी, यह खुदाई के स्थान, नदी की स्थिति और बाद की निगरानी पर निर्भर करेगा। इसी तरह, मुफ्त गाद मिलने और सड़क की कुल लागत घटने के बीच भी खुदाई और ढुलाई का खर्च जुड़ा है।
जल शक्ति मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में राज्यसभा को बताया कि केवल गाद निकालकर बाढ़ की समस्या हल नहीं की जा सकती। इससे बाढ़ की तीव्रता में मामूली कमी हो सकती है। यह असर भी थोड़े समय तक रहता है। हालांकि, कुछ खास स्थानों पर वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर कुछ चुने हुए हिस्सों से गाद निकाली जा सकती है। इनमें नदियों के संगम पर वे स्थान भी शामिल हैं, जहां बहाव का रास्ता संकरा है।
यहां स्थानीय जल निकासी और पूरी नदी में बाढ़ का खतरा घटने के बीच फर्क समझना जरूरी है। किसी खास हिस्से में गाद हटाने से पानी का रास्ता खुल सकता है। इससे आसपास का जलभराव कम होने की संभावना है। लेकिन यह अपने आप पूरी नदी में बाढ़ घटने का प्रमाण नहीं होगा।
जल शक्ति मंत्रालय का उत्तर भी खास परिस्थितियों में वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर चुनिंदा खुदाई की गुंजाइश रखता है। इसलिए बिहार की पहल का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि चुने गए स्थान पर समस्या क्या थी और काम के बाद उसमें कितना बदलाव आया। केवल निकाली गई गाद की मात्रा से यह जवाब नहीं मिलेगा।
यह भी देखना होगा कि हटाई गई गाद दोबारा कितनी जल्दी जमा होती है। यदि हर मानसून के बाद उसी स्थान पर फिर खुदाई करनी पड़े, तो उसके खर्च और लाभ का हिसाब बदल जाएगा। बाढ़ से राहत के आकलन में यह सवाल भी शामिल होना चाहिए।
पर्यावरण मंत्रालय के 2016 के दिशानिर्देशों में दर्ज मित्तल समिति के निष्कर्ष भी बड़ी नदियों में बाढ़ नियंत्रण के लिए व्यापक खुदाई की सीमाएं बताते हैं।
समझौते की आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार, 16 चालू परियोजनाओं के अलावा 27 भावी राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में करीब 835 लाख घनमीटर गाद के उपयोग का प्रस्ताव है। इसका इस्तेमाल तभी होगा, जब सामग्री जांच में सड़क निर्माण के योग्य मिले और जरूरी मंजूरियां मिल जाएं। ये आंकड़े गाद के नियोजित और प्रस्तावित इस्तेमाल के हैं। इन्हें अब तक निकाली गई गाद की मात्रा न समझें।
इन आंकड़ों से सड़क परियोजनाओं में गाद के उपयोग की योजना पता चलती है। लेकिन नदी से कितनी गाद सुरक्षित रूप से निकाली जा सकती है, यह अलग सवाल है। निर्माण में सामग्री की जरूरत को खुदाई की अनुमति के बराबर नहीं माना जा सकता।
पहले नदी के चुने हुए हिस्से का अध्ययन करके स्थान और मात्रा तय होनी चाहिए। उसके बाद उस सामग्री की जांच और निर्माण में उपयोग का फैसला होगा। इस क्रम को उलटने पर सड़क की मांग खुदाई की सीमा तय करने लग सकती है।
उपलब्ध मंत्रालय की विज्ञप्ति में 16 परियोजनाओं का कुल आंकड़ा है। लेकिन उनके नाम, प्रत्येक परियोजना को मिलने वाली गाद और संबंधित नदी-स्रोत की सूची नहीं दी गई है। इसलिए अभी इस घोषणा से परियोजनावार खुदाई और उपयोग का मिलान नहीं किया जा सकता।
नदी के लिए गाद भी ज़रूरी है
नदी की तलछट में मिट्टी, रेत और दूसरे कण होते हैं। इनका बहना, कटना और जमा होना प्राकृतिक प्रक्रिया है। राष्ट्रीय गाद प्रबंधन ढांचा बताता है कि नदी के साथ आई तलछट किनारे के बाढ़ मैदानों में जमा होकर मिट्टी को उपजाऊ बनाती है। मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के आवास में भी इसकी भूमिका है।
इसलिए नदी में जमा सारी गाद निकाल देना उचित नहीं है। खुदाई से पहले देखना होगा कि उससे धारा, किनारों और जलीय आवास पर क्या असर पड़ सकता है।
शुरुआती अध्ययन में मछलियों के प्रजनन स्थलों, खुदाई के उपयुक्त मौसम और नदी पर निर्भर मछुआरों व किसानों की आजीविका को भी शामिल करना जरूरी है। स्थानीय लोग नदी में लंबे समय से हो रहे बदलाव बता सकते हैं। एक बार के सर्वेक्षण में ये बातें छूट सकती हैं।
इसके साथ परिणाम भी सार्वजनिक होने चाहिए। रिपोर्ट में खुदाई का स्थान, गहराई और मात्रा दर्ज हो। अगले मानसून में वहां जलभराव और कटाव की स्थिति भी बताई जाए।
नदी से निकली सारी सामग्री एक जैसी नहीं होती। उसे सीधे सड़क निर्माण में नहीं लगाया जा सकता। उसकी गुणवत्ता और उपयोग की जगह के अनुसार जाँच जरूरी है।
राष्ट्रीय गाद प्रबंधन ढांचा उपयोग से पहले सामग्री की गुणवत्ता जांचने पर जोर देता है। इसमें कणों का आकार, मजबूती और संभावित प्रदूषण देखा जाता है। यह भी परखा जाता है कि दबाने पर सामग्री कितनी सघन होती है।
इसका अर्थ है कि निकाली गई कुल गाद और निर्माण में इस्तेमाल हो सकने वाली गाद की मात्रा अलग हो सकती है। इसलिए योजना की समीक्षा में दोनों आंकड़े अलग दर्ज होने चाहिए।
नदी में जमा सारी गाद निकाल देना उचित नहीं है। खुदाई से पहले देखना होगा कि उससे धारा, किनारों और जलीय आवास पर क्या असर पड़ सकता है।
ढांचा निकाली गई गाद से आर्द्रभूमियों और दूसरे जलस्रोतों को भरने से भी मना करता है। सड़क में काम न आने वाली सामग्री को कहीं और डाल देना समाधान नहीं होगा। उसके लिए सुरक्षित स्थान और तरीका तय करना जरूरी है।
बिहार मुख्यमंत्री कार्यालय की विज्ञप्ति में 16 परियोजनाओं के लिए मुफ्त गाद का उल्लेख है। इससे सामग्री लेने का खर्च घट सकता है। लेकिन नदी से सड़क तक पहुंचने के दौरान होने वाले खर्च अलग हैं।
गाद निकालने, जरूरत पड़ने पर उसका पानी कम करने, सुखाने, लादने और ढोने में खर्च होगा। जांच के बाद जो हिस्सा निर्माण में इस्तेमाल नहीं हो सकेगा, उसके सुरक्षित निपटान की व्यवस्था भी चाहिए। इसलिए मुफ्त सामग्री को मुफ्त भराई नहीं माना जा सकता।
किसी जलाशय में बढ़ी भंडारण क्षमता को नदी में बाढ़ घटने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
खेतों की मिट्टी से तुलना करते समय दोनों विकल्पों का पूरा खर्च जोड़ना होगा। मिट्टी के लिए खरीद, खुदाई और ढुलाई का खर्च होगा। गाद के लिए खुदाई, तैयारी और ढुलाई का। स्रोत की दूरी बढ़ने पर परिवहन में होने वाला खर्च संभावित बचत घटा सकता है।
तुलना की इकाई भी एक होनी चाहिए, सड़क पर बिछाई और दबाई गई एक घनमीटर स्वीकार्य सामग्री। नदी में पड़ी गीली गाद के एक घनमीटर को तैयार भराई के एक घनमीटर के बराबर मानकर तुलना नहीं की जा सकती।
उपलब्ध घोषणा में परियोजनावार स्रोत, ढुलाई दूरी और दरें नहीं दी गई हैं। इसलिए अभी यह कहना संभव नहीं है कि गाद कितने रुपये सस्ती पड़ेगी। लागत घटने का दावा परखने के लिए इन्हीं विवरणों की जरूरत है।
जलाशय से गाद हटाने पर पानी रखने की जगह बढ़ सकती है। बहती नदी में सवाल पानी गुजरने के रास्ते और आसपास के इलाकों पर उसके असर का है। इसलिए दोनों की सफलता एक ही पैमाने से नहीं मापी जा सकती।
किसी जलाशय में बढ़ी भंडारण क्षमता को नदी में बाढ़ घटने का प्रमाण नहीं माना जा सकता। नदी के लिए देखना होगा कि खुदाई के बाद जलस्तर, जलभराव और कटाव में क्या बदलाव आया। इस फर्क के बिना अलग-अलग जलस्रोतों के परिणाम जोड़ने से तस्वीर अधूरी रहेगी।
जल शक्ति मंत्रालय गाद निकालने के साथ उसके बनने को कम करने पर भी जोर देता है। इसलिए खुदाई के साथ यह समझना जरूरी है कि जलस्रोत में गाद कहां से आ रही है और किन कारणों से जमा हो रही है।
सिर्फ जमा सामग्री हटाने से काम पूरा नहीं होगा। अध्ययन से गाद जमने के जो कारण पता चलें, उन्हें कम करने के उपाय करने होंगे। इससे यह भी स्पष्ट होगा कि कहां एक बार की खुदाई पर्याप्त हो सकती है और कहां लंबे समय तक रखरखाव की जरूरत पड़ेगी।
इस काम में विभागों के बीच तालमेल की जिम्मेदारी पथ निर्माण विभाग की होगी। राज्यस्तरीय समिति निगरानी करेगी। संबंधित विभाग मिलकर गाद की मात्रा मापेंगे और उसका डिजिटल रिकॉर्ड रखेंगे। इससे पता चलेगा कि कितनी गाद निकली, कितनी पहुंचाई गई और कितनी इस्तेमाल हुई।
सामग्री का डिजिटल हिसाब यह बताएगा कि कितनी गाद निकली और कितनी सड़क में लगी। नदी को हुए लाभ के लिए अलग रिकॉर्ड चाहिए। काम से पहले की स्थिति दर्ज हो और बाद में उसी स्थान पर जलभराव, जलस्तर तथा कटाव की तुलना की जाए।
इस तरह समीक्षा के तीन हिस्से होंगे। पहला, सड़क में कितनी स्वीकार्य सामग्री इस्तेमाल हुई। दूसरा, उसकी कुल लागत कितनी पड़ी। तीसरा, नदी और आसपास के लोगों को क्या लाभ या नुकसान हुआ। इनमें से किसी एक की सफलता को बाकी दोनों की सफलता नहीं माना जा सकता।
सिर्फ एक साल नुकसान कम होने से निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। बारिश और नदी में आए पानी की मात्रा अलग हो सकती है। इसलिए नुकसान की तुलना करते समय यह भी देखना होगा कि दोनों वर्षों में बारिश और नदी में आया पानी कितना था।
नदी संजीवनी से सड़क निर्माण को सामग्री मिल सकती है। लेकिन कम लागत और बाढ़ से राहत के दावों को अलग-अलग प्रमाणों पर परखना होगा। उपलब्ध दस्तावेज पहल का उद्देश्य बताते हैं; परियोजनावार बचत और बाढ़ में कमी का उत्तर अभी उनसे नहीं मिलता। वह खुदाई के अध्ययन, वास्तविक खर्च और अगले मानसूनों के परिणामों से सामने आएगा।
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