कर्नाटक की अर्कवती नदी में मिले कैंसर वाले रसायन, कीटनाशक और पारे का ज़हर

एनजीटी में केंद्र सरकार ने मामले से पल्‍ला झाड़ा : कहा, पानी राज्‍य का विषय हम केवल कानून बना सकते हैं, नदी साफ नहीं कर सकते
कैंसर वाले रसायनों, कीटनाशक और पारे के प्रदूषण से जूझ रही कर्नाटक की अर्कवती नदी।

कैंसर वाले रसायनों, कीटनाशक और पारे के प्रदूषण से जूझ रही कर्नाटक की अर्कवती नदी।

फोटो : विकी कॉमंस

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कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाने वाली अर्कवती नदी प्रतिबंधित ज़हरीले रसायनों, कैंसरकारी कीटनाशकों और पारे (मर्करी) के प्रदूषण से बुरी तरह दूषित हो चुकी है। इसका काफी बुरा असर नदी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने के साथ ही इसके पानी पर आश्रित एक बड़ी आबादी को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी और अन्‍य स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का खतरा पैदा हो गया है।  

रा‍ष्‍ट्रीय हरित अभिकरण यानी NGT ने इस बारे में प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेकर जब जवाब तलब किया तो मामला केंद्र और राज्‍य सरकार के बीच आकर अटक गया। मामले से पल्‍ला झाड़ते हुए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने NGT में दाखिल अपने हलफनामे में कहा कि ‘पानी राज्य का विषय और हमार मुख्य काम प्रदूषण को कम करने, नियंत्रित करने और रोकने के लिए नीतियां बनाना और पर्यावरण से जुड़े मानक तय करना है।’ 

एनजीटी के आदेश पर मंत्रालय में वैज्ञानिक के तौर पर काम कर रही डॉ. डोला भट्टाचार्जी ने यह हलफनामा दाखिल किया है। इसमें कहा गया है कि हमारा मुख्य काम प्रदूषण को कम करने, नियंत्रित करने और रोकने के लिए नीतियां बनाना और पर्यावरण से जुड़े मानक तय करना है। इन मानकों को केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPBC) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPBC) या प्रदूषण नियंत्रण कमेटियों (PCCS) द्वारा लागू किया जाता है। इस तरह NGT के हस्तक्षेप के बावजूद यह मामला अब राज्‍य और केंद्र सरकार के बीच जिम्मेदारी तय करने का सवाल बना गया है।

नदी में क्या मिला और प्रदूषण कितना गंभीर है?

इस कहानी की शुरुआत नवंबर 2024 में प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट से हुई। इसके बाद सामने आए एक अलग वैज्ञानिक अध्ययन ने भी नदी में खतरनाक रसायनों की मौजूदगी को लेकर चिंता बढ़ाई। नवंबर 2024 में डेक्कन हेराल्ड ने नदी के पानी और तलछट के नमूनों की जांच के आधार पर “Mercury, cancer-causing pesticide found in Arkavathy river water samples” शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें पारा, प्रतिबंधित कीटनाशक DDT, कैंसर के जोखिम से जुड़े पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAH) और फ्लोराइड जैसे प्रदूषकों की मौजूदगी की जानकारी दी गई। इस रिपोर्ट पर NGT ने स्वतः संज्ञान लिया और दिसंबर 2024 में संबंधित सरकारी एजेंसियों से जवाब मांगा।

इसके बाद जनवरी 2025 में पानी अर्थ फाउंडेशन ने इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लीन वाटर के सहयोग से एक विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया। इसका शीर्षक था Uncovering the Hidden Pollution in the Arkavathi: Emerging Contaminants Impacting Bengaluru & Beyond। 

इस अध्ययन में फरवरी और मार्च 2024 के दौरान नदी और उसकी सहायक वृशभावती के सात स्थानों से लिए गए नमूनों की जांच के नतीजों के बारे में बताया गया था। इस अध्‍ययन के तहत शोधकर्ताओं ने पानी के 65 और तलछट के 20 पैरामीटर जांचे थे। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ नमूनों में प्रतिबंधित कीटनाशक DDT और एंडोसल्फान सल्फेट की मात्रा स्वीकार्य सीमाओं से बहुत अधिक पाई गई। इसके अलावा पानी में पारे (Mercury) का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों से 26 गुना तक और बहुचक्रीय एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन श्रेणी के औद्योगिक प्रदूषक Polycyclic Aromatic Hydrocarbons यानी PAH का स्तर 3,000 गुना तक अधिक दर्ज किया गया। कीटनाशकों का स्तर स्वीकार्य सीमाओं से 25,000 गुना तक देखने को मिला।

हालांकि इन आंकड़ों के मद्देनजर एक महत्वपूर्ण बात को ध्यान में रखना चाहिए कि यह सात स्थानों पर किया गया सीमित अध्ययन था, न कि नदी के हर हिस्से में प्रदूषण की मात्रा का सर्वेक्षण। इसी तरह, अलग-अलग रसायनों के लिए तुलना के मानक अलग हो सकते हैं। फिर भी नदी के पानी में पारे, प्रतिबंधित कीटनाशकों और खतरनाक औद्योगिक रसायनों का एक साथ मिलना गंभीर चिंता का विषय है। पारा पर्यावरण में लंबे समय तक बना रह सकता है और जलीय खाद्य शृंखला में जमा हो सकता है। कुछ कीटनाशकों के अवशेष भी लंबे समय तक मिट्टी और तलछट में रह सकते हैं। PAH के कुछ यौगिक कैंसरकारी जोखिम से जुड़े हैं। इसलिए इनका पता लगना केवल पानी के रंग, गंध या झाग का मामला नहीं है, बल्कि ऐसे प्रदूषण का संकेत है जिसे सामान्य निरीक्षण से पहचानना मुश्किल हो सकता है। इन पूरे मामले को समझने के लिए अर्कवती नदी के भूगोल, बेंगलुरु की जलापूर्ति में उसकी ऐतिहासिक भूमिका और प्रदूषण के स्रोतों को एक साथ देखना जरूरी है। 

प्रदूषण के स्रोत: घरेलू सीवेज से औद्योगिक रसायनों तक

अर्कवती के प्रदूषण को किसी एक स्रोत से जोड़ना उपलब्ध उचित नहीं होगा। अध्ययन के आधार पर नदी का जलग्रहण क्षेत्र कृषि, उद्योग, खदानों और पत्थर खनन, तेजी से बढ़ती बस्तियों तथा शहरी गतिविधियों से प्रभावित है। पानी अर्थ की रिपोर्ट में इन गतिविधियों से पैदा होने वाले अपशिष्ट और सीवेज को नदी के प्रदूषण का प्रमुख कारण बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक नदी में तैरता कचरा, बिना उपचार का सीवेज, औद्योगिक निकास से बदले रंग का पानी और जलकुंभी जैसी समस्याओं का भी उल्लेख है। हालांकि इस प्रदूषण में किसी खास रसायन का स्रोत निश्चित करने के लिए संबंधित उद्योग या नाले से निकलने वाले सीवेज की भूमिका के लिए अलग से जांच जरूरी होगी।

रिपोर्ट के मुताबिबक नदी में घरेलू सीवेज गिरने का संकट उन इलाकों में अधिक गंभीर है, जहां आबादी तेजी से बढ़ने के बावजूद सीवेज नेटवर्क और उपचार संयंत्र उसी अनुपात में विकसित नहीं हुए हैं। इस कारण बिना उपचार का गंदा पानी नदी में पहुंचने से जैविक प्रदूषण बढ़ रहा है और पानी में घुली ऑक्सीजन कम हो सकती है। इस सीवेज में मौजूद डिटर्जेंट और फॉस्फेट भी पानी में झाग और पोषक तत्वों की अधिकता से जुड़ा है। औद्योगिक प्रदूषण का मामला भी गंभीर है। 

कुछ औद्योगिक प्रक्रियाओं से भारी धातुएं और खतरनाक कार्बनिक रसायन अपशिष्ट जल में पहुंच रहे हैं। यदि इनका पर्याप्त उपचार न होने के कारण यह खतरनाक रसायन नदी के पानी के साथ तलछट में भी जमा हो रहे हैं। खासकर, पारा और PAH की मौजूदगी गंभीर चिंता पैदा करती है। आसपास के खेतों से बारिश के पानी के साथ बहकर नदी में आने वाले कीटनाशकों का बहाव भी प्रदूषण एक संभावित स्रोत है। इसलिए प्रदूषण नियंत्रण के लिए केवल नदी की सफाई या किनारे से कचरा हटाना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ ही सीवेज उपचार संयंत्रों के संचालन, औद्योगिक अपशिष्ट की नियमित जांच, प्रतिबंधित रसायनों के इस्तेमाल पर निगरानी की व्‍यवस्‍था करना जरूरी है। 

अर्कवती में प्रदूषण के कुछ प्रमुख आंकड़े

स्रोत: पानी अर्थ फाउंडेशन और इंटरनेशनल सेंटर फॉर क्लीन वाटर की जनवरी 2025 की रिपोर्ट। नमूने फरवरी-मार्च 2024 में लिए गए थे।

पहले भी उठ चुके हैं सवाल, हाईकोर्ट तक पहुंचा था मामला

अर्कवती के प्रदूषण की समस्या को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट तक मामले चल चुके हैं। NGT के 1 अप्रैल 2025 के आदेश के अनुसार टिप्पागोंडनहल्ली जलाशय के आसपास बफर जोन के संरक्षण से संबंधित एक याचिका कर्नाटक हाईकोर्ट में लंबित थी। यह जलाशय अर्कवती और कुमुदवती नदियों के संगम के पास स्थित है। इसके अलावा बेंगलुरु की वृशभावती नदी घाटी के पुनरुद्धार से जुड़ा मामला भी हाईकोर्ट की निगरानी में था। 

NGT ने कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को विवादित क्षेत्रों से पानी के नमूने लेकर उनकी जांच कराने और जल गुणवत्ता पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया था। बाद की सुनवाइयों में भी अदालत में पहले से लंबित मामलों से जुड़े आदेश और हलफनामे पेश करने का सवाल उठा।

इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ी चुनौती यह सामने आई कि नदी संरक्षण से संबंधित जिम्मेदारियां कई संस्थाओं में बटी होने के कारण प्रदूषण पर नियंत्रण में व्‍यावहारिक दिक्‍कतें पेश आ रही हैं। सीवेज का प्रबंधन स्थानीय निकायों और जलापूर्ति-सफाई संस्थाओं से जुड़ा है, जबकि औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहीं मानकों पर नज़र रखने और निगरानी की व्यवस्था केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के तहत आती है। नदी से जुड़ी नीतिगत और नियामकीय भूमिका केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय निभाता है। ऐसे में इन संस्थाओं के बीच समन्वय के बिना नदी में प्रदूषण की समस्या का समाधान मुश्किल हो जाता है।

केंद्र और राज्‍य की क्‍या-क्‍या हैं भूमिकाएं?

संविधान की सातवीं अनुसूची में जल आपूर्ति, सिंचाई, नहरों, जल निकासी और जल भंडारण जैसे कई विषय राज्य सूची की प्रविष्टि 17 में आते हैं। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं है कि केंद्र सरकार की पर्यावरण संरक्षण में कोई भूमिका नहीं है। जल प्रदूषण रोकने के लिए बनाए गए केंद्रीय कानून, पर्यावरण संरक्षण संबंधी नियम और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की भूमिका अलग-अलग कानूनी प्रावधानों से संचालित होती है। जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को प्रदूषण रोकने, जल गुणवत्ता की निगरानी करने और निर्धारित मानकों के पालन से संबंधित जिम्मेदारियां दी गई हैं। 

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 भी केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने और मानक निर्धारित करने की शक्तियां देता है। इसलिए पानी राज्य का विषय होने और पर्यावरण संरक्षण में केंद्र की भूमिका होने के बीच विरोधाभास मान लेना सही नहीं होगा।

अर्कवती के मामले में असली सवाल यह है कि जब नदी में प्रतिबंधित कीटनाशक, पारा और औद्योगिक प्रदूषक पाए जाने की रिपोर्ट सामने आई है, तो संबंधित संस्थाएं इसे लेकर किस तरह समन्वित कार्रवाई करें? क्या प्रदूषण के स्रोतों की पहचान की गई है? क्या औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट की जांच हो रही है? क्‍या सीवेज उपचार संयंत्रों की क्षमता और संचालन की समीक्षा की जा रही है? क्या पानी और तलछट में पाए गए रसायनों की दोबारा जांच कराई जाती है? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या नदी की हालत में सुधार का आकलन करने के लिए नियमित निगरानी होती है? इन सवालों का जवाब केवल अधिकार क्षेत्र की दुहाई देने से नहीं मिल सकता। इसके लिए प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, जिम्मेदार एजेंसियों की समयबद्ध कार्ययोजना और परिणामों की सार्वजनिक निगरानी जरूरी है।

<div class="paragraphs"><p>अर्कवती नदी कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है।&nbsp;</p></div>

अर्कवती नदी कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु और उसके आसपास के इलाकों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती है। 

फोटो : विकी कॉमंस

अर्कवती : भूगोल, इतिहास और बेंगलुरु के पानी से रिश्ता

अर्कवती कर्नाटक की प्रमुख नदी कावेरी की एक महत्‍वपूर्ण सहायक नदी है। इसका उद्गम प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नंदी हिल्स की पहाड़ियों से होता है और यह दक्षिण की ओर बहते हुए अंततः कनकपुरा तालुका में कावेरी से मिलती है। पर्यावरण प्रबंधन एवं नीति अनुसंधान संस्थान (EMPRI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, नदी की लंबाई लगभग 190 किलोमीटर और इसका जलग्रहण क्षेत्र करीब 4,150 वर्ग किलोमीटर है। इसका जलग्रहण क्षेत्र बेंगलुरु के तेजी से फैलते शहरी इलाके और उसके आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों तक फैला है। 

नदी का प्रवाह डोड्डबल्लापुर, नेलमंगला, मगड़ी और बेंगलुरु के उत्तरी तथा दक्षिणी हिस्सों से जुड़े क्षेत्रों को प्रभावित करता है। नदी के रास्ते में कई पारंपरिक जलाशय और तालाब हैं, जिनमें हेेसरघट्टा झील तथा टीजी हल्ली यानी टिप्पागोंडनहल्ली जलाशय ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं। नदी इन स्‍थानीय जलस्रोतों को पानी देने में भी अहम भूमिका निभाती है। इस तरह अर्कवती का महत्व केवल भौगोलिक नहीं है। इसने बेंगलुरु जैसे तेजी से बढ़ते महानगर के एक बड़े हिस्‍से को लंबे समय तक पानी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

शुरुआती दौर में बेंगलुरु की जलापूर्ति व्यवस्था का ढांचा 1894 में अर्कवती पर बांध बनाकर हेसरघट्टा जलाशय तैयार किया गया था। उस समय शहर की आबादी महज़ 1.8 लाख थी और जलाशय की योजना बढ़ती आबादी की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। बाद के दशकों में शहर की आबादी और पानी की मांग उम्मीद से कहीं तेजी से बढ़ी। 1925 के आसपास हेसरघट्टा झील लगभग सूख गई, जिससे शहर के लिए वैकल्पिक जल स्रोत तलाशने पड़े। इसके बाद विश्वेश्वरैया की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों पर अर्कवती पर आगे टीजी हल्ली जलाशय विकसित किया गया। यह जलाशय 1933 में चालू हुआ और बेंगलुरु की जलापूर्ति के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव बना।

आज भी अर्कवती का जलग्रहण क्षेत्र शहर के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। नदी और उसके जलाशय केवल पेयजल की संभावनाओं से नहीं जुड़े हैं, बल्कि आसपास की खेती, बागवानी, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय पारिस्थितिकी को भी सहारा देते हैं। इसलिए नदी में पानी का प्रदूषण बढ़ने या प्रवाह घटने का असर जलाशयों, मिट्टी, जलीय जीवों और उन समुदायों पर पड़ रहा है, जो सिंचाई तथा दूसरे स्थानीय इस्तेमाल के लिए इन जल स्रोतों पर निर्भर हैं। इसलिए अर्कवती की बहाली केवल नदी सफाई का कार्यक्रम नहीं, बल्कि बेंगलुरु की दीर्घकालिक जल सुरक्षा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्र के पर्यावरण की रक्षा का सवाल भी है।

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