कर्नाटक की प्रमुख नदियां राज्य की खेती, पेयजल, सिंचाई, जलविद्युत, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

कर्नाटक की प्रमुख नदियां राज्य की खेती, पेयजल, सिंचाई, जलविद्युत, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

फ़ोटो: अजय मोहन

कर्नाटक की नदियां: कृष्णा और कावेरी से शरावती और नेत्रावती तक पूरा नदी तंत्र समझें

कर्नाटक की प्रमुख नदियां, सहायक नदियां, नदी घाटियां, बांध और जल संरक्षण की प्रमुख पहलें जानें।
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कर्नाटक का भूगोल, कृषि, शहर, उद्योग और ग्रामीण अर्थव्यवस्था उसकी नदियों पर निर्भर है। राज्य की नदियां अलग-अलग दिशाओं में बहकर अलग-अलग नदी घाटियां बनाती हैं। कुछ नदियां पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं, जबकि पश्चिमी घाट की कई नदियां पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में पहुंचती हैं।

कृष्णा और कावेरी कर्नाटक की दो प्रमुख अंतरराज्यीय नदी प्रणालियां हैं। इनके अलावा तुंगभद्रा, भीमा, घटप्रभा, मलप्रभा, काबिनी, हेमावती और शिम्शा जैसी नदियां राज्य की जल व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 

पश्चिमी घाट से निकलने वाली शरावती, काली, नेत्रावती, अघनाशिनी और वराही जैसी नदियां अपेक्षाकृत छोटी हैं, लेकिन तटीय और पश्चिमी कर्नाटक के लिए इनका महत्व बहुत अधिक है। CGWB के अनुसार कर्नाटक में कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों और पेन्नार की नदी प्रणालियां मौजूद हैं।

कर्नाटक की मुख्य नदी प्रणालियां

कर्नाटक का नदी तंत्र अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों से होकर बहता है। पश्चिमी घाट से निकलने वाली कई नदियां पश्चिम की ओर अरब सागर में मिलती हैं, जबकि कृष्णा, कावेरी, गोदावरी और पेन्नार नदी प्रणालियों से जुड़ी नदियां मुख्य रूप से पूर्व की ओर बहती हैं। कर्नाटक में पांच प्रमुख नदी प्रणालियां - कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, पश्चिमवाहिनी नदियां और पेन्नार - मानी जाती हैं। ये नदियां खेती, पेयजल, जलविद्युत, उद्योग और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

कर्नाटक की प्रमुख नदी प्रणालियां

भारत के नदी बेसिन एटलस में कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, पेन्नार और पश्चिम की ओर बहने वाली नदियों को अलग-अलग बेसिन के रूप में दर्ज किया गया है।

कर्नाटक की प्रमुख नदियों की सूची

कर्नाटक की प्रमुख नदियां राज्य की खेती, पेयजल, सिंचाई, जलविद्युत, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं।

कर्नाटक की प्रमुख नदियां

कृष्णा : उत्तरी कर्नाटक की प्रमुख नदी

महाराष्ट्र के महाबलेश्वर के पास निकलने वाली कृष्णा महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से होकर बंगाल की खाड़ी में मिलती है। कर्नाटक में इसकी प्रमुख सहायक नदियां तुंगभद्रा, भीमा, घटप्रभा और मलप्रभा हैं। अलमट्टी और नारायणपुर इसके प्रमुख जलाशय हैं।

कावेरी : दक्षिणी कर्नाटक की जीवनरेखा

कर्नाटक के कोडगु जिले से निकलने वाली कावेरी राज्य की खेती और पेयजल व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में काबिनी, हेमावती, हरंगी, लक्ष्मणतीर्था और अर्कावती शामिल हैं। कृष्णराज सागर जलाशय और बेंगलुरु की पेयजल व्यवस्था कावेरी पर निर्भर है।

तुंगभद्रा : कृष्णा की प्रमुख सहायक नदी

तुंगा और भद्रा नदियों के संगम से बनने वाली तुंगभद्रा कृष्णा में मिलती है। यह सिंचाई, जल भंडारण और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण है। तुंगभद्रा बांध इसकी प्रमुख परियोजना है।

भीमा : उत्तरी कर्नाटक की महत्वपूर्ण नदी

महाराष्ट्र से निकलने वाली भीमा कर्नाटक के उत्तरी हिस्से से होकर कृष्णा में मिलती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र कृषि और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है। भीमा महाराष्ट्र और कर्नाटक की साझा नदी प्रणाली का हिस्सा है।

घटप्रभा : सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण नदी

पश्चिमी घाट से निकलने वाली घटप्रभा उत्तरी कर्नाटक से होकर कृष्णा में मिलती है। यह बेलगावी क्षेत्र की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है और इसी नदी पर गोकाक जलप्रपात है।

मलप्रभा : उत्तरी कर्नाटक की जल व्यवस्था का आधार

पश्चिमी घाट से निकलने वाली मलप्रभा बेलगावी, धारवाड़ और आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई व जलापूर्ति में महत्वपूर्ण है। नविलतीर्थ जलाशय मलप्रभा की प्रमुख परियोजना है।

काबिनी : कावेरी की प्रमुख सहायक नदी

केरल के वायनाड क्षेत्र से निकलने वाली काबिनी कर्नाटक में प्रवेश कर कावेरी में मिलती है। काबिनी का जलाशय सिंचाई और जल भंडारण के साथ पश्चिमी घाट और नागरहोल की पारिस्थितिकी के लिए भी महत्वपूर्ण है।

हेमावती : कावेरी की महत्वपूर्ण सहायक नदी

पश्चिमी घाट से निकलने वाली हेमावती कावेरी में मिलती है और हेमावती हासन और आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई व जलापूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है।

शरावती : जलविद्युत और पश्चिमी घाट की प्रमुख नदी

पश्चिमी घाट से निकलने वाली शरावती पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में मिलती है। जोग जलप्रपात और जलविद्युत परियोजनाओं के कारण इसका विशेष महत्व है।

काली : उत्तर कन्नड़ की प्रमुख पश्चिमवाहिनी नदी

पश्चिमी घाट से निकलने वाली काली उत्तर कन्नड़ जिले से होकर अरब सागर में मिलती है। काली नदी पर कई जलविद्युत परियोजनाएं हैं। इसका जलग्रहण क्षेत्र पश्चिमी घाट के जंगलों और जैव विविधता से जुड़ा है।

नेत्रावती : तटीय कर्नाटक की प्रमुख नदी

पश्चिमी घाट से निकलने वाली नेत्रावती दक्षिण कन्नड़ से होकर अरब सागर में मिलती है। इसका पानी खेती, पेयजल और उद्योग के साथ तटीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है।

अघनाशिनी : प्राकृतिक तटीय नदी तंत्र की महत्वपूर्ण नदी

पश्चिमी घाट से निकलने वाली अघनाशिनी उत्तर कन्नड़ के तटीय क्षेत्र से होकर अरब सागर में मिलती है। इसका प्राकृतिक मुहाना मछली पालन, कृषि, आर्द्रभूमि और स्थानीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण है।

वराही : पश्चिमी घाट की तेज बहाव वाली नदी

पश्चिमी घाट से निकलने वाली वराही पश्चिम की ओर बहकर अरब सागर में मिलती है। वराही पर जलविद्युत परियोजना है। इसका प्रवाह पश्चिमी घाट में होने वाली भारी बारिश पर निर्भर करता है।

कर्नाटक की प्रमुख सहायक नदियां

कर्नाटक की बड़ी नदियों में कई छोटी-बड़ी सहायक नदियां आकर मिलती हैं। इनमें से कई नदियां स्थानीय सिंचाई, पेयजल, खेती और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण हैं।

केंद्रीय जल आयोग ने कावेरी और कृष्णा नदी प्रणालियों की कई सहायक नदियों पर निगरानी केंद्र बनाए हैं।

कृष्णा नदी की प्रमुख सहायक नदियां

तुंगभद्रा: तुंगा और भद्रा के संगम से तुंगभद्रा नदी बनती है। यह कृष्णा की प्रमुख सहायक नदी है और कर्नाटक की सिंचाई व्यवस्था में महत्वपूर्ण है।

भीमा: महाराष्ट्र से निकलने वाली भीमा कर्नाटक के उत्तरी हिस्से से होकर बहती है और रायचूर के पास कृष्णा में मिलती है।

घटप्रभा: पश्चिमी घाट से निकलने वाली घटप्रभा बेलगावी और बागलकोट क्षेत्र से होकर बहती है और कृष्णा में मिलती है; इस पर गोकाक जलप्रपात भी स्थित है।

मलप्रभा: पश्चिमी घाट से निकलकर बेलगावी और धारवाड़ क्षेत्र से बहने वाली मलप्रभा कृष्णा की प्रमुख सहायक नदी है और सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है।

तुंगभद्रा की प्रमुख सहायक नदियां

तुंगा: पश्चिमी घाट के गंगामूला क्षेत्र से निकलने वाली तुंगा आगे भद्रा के साथ मिलकर तुंगभद्रा नदी बनाती है।

भद्रा: भद्रा भी गंगामूला क्षेत्र से निकलती है और कूडली के पास तुंगा से मिलकर तुंगभद्रा का निर्माण करती है।

वरदा: वरदा शिवमोग्गा, उत्तर कन्नड़ और हावेरी से होकर बहती है और हावेरी जिले में तुंगभद्रा में मिलती है।

वेदावती (हगरी): वेदावती मध्य और उत्तरी कर्नाटक से बहती हुई तुंगभद्रा में मिलती है। यह तुंगभद्रा की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है।

घटप्रभा की प्रमुख सहायक नदियां

हिरण्यकेशी: हिरण्यकेशी पश्चिमी घाट से निकलती है और बेलगावी क्षेत्र से होकर बहती हुई घटप्रभा नदी तंत्र में मिलती है।

मार्कंडेय: मार्कंडेय बेलगावी क्षेत्र की प्रमुख जलधारा है और घटप्रभा की सहायक नदी के रूप में कृष्णा नदी तंत्र से जुड़ती है।

मलप्रभा की प्रमुख सहायक नदियां

बेन्नीहल्ला: बेन्नीहल्ला धारवाड़ और आसपास के क्षेत्रों की महत्वपूर्ण जलधारा है। यह मलप्रभा की सहायक नदी है और कृष्णा नदी तंत्र का हिस्सा है।

कावेरी नदी की प्रमुख सहायक नदियां

हेमावती: पश्चिमी घाट से निकलने वाली हेमावती हासन और आसपास के क्षेत्रों से होकर बहती है और कावेरी की प्रमुख सहायक नदी है।

काबिनी: काबिनी का उद्गम केरल के वायनाड क्षेत्र में होता है और यह कर्नाटक से होकर बहने के बाद तिरुमकुडल नरसिपुर के पास कावेरी में मिलती है।

हरंगी: हरंगी पश्चिमी घाट के पुष्पगिरि क्षेत्र से निकलने वाली कावेरी की सहायक नदी है और हरंगी का पानी कोडगु और आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है।

लक्ष्मणतीर्था: लक्ष्मणतीर्था कोडगु और मैसूरु क्षेत्र से होकर बहने वाली कावेरी की प्रमुख सहायक नदी है।

शिम्शा: शिम्शा दक्षिणी कर्नाटक की प्रमुख जलधाराओं में से एक है और मांड्या तथा आसपास के क्षेत्रों से होकर कावेरी में मिलती है।

अर्कावती: अर्कावती नंदी पहाड़ियों से निकलती है और बेंगलुरु ग्रामीण क्षेत्र से होकर बहती हुई कावेरी नदी तंत्र में शामिल होती है।

सुवर्णवती: सुवर्णवती दक्षिणी कर्नाटक से बहती है और मैसूरु तथा चामराजनगर क्षेत्र से होकर कावेरी नदी तंत्र में मिलती है।

लोकपावनी: लोकपावनी कावेरी की छोटी लेकिन महत्वपूर्ण सहायक नदी है। इसका पानी दक्षिणी कर्नाटक की खेती और स्थानीय जल जरूरतों में काम आता है।

हेमावती और काबिनी की प्रमुख सहायक नदियां

यागची: यागची हेमावती की प्रमुख सहायक नदी है और चिकमगलूरु तथा हासन क्षेत्र की जल व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

तारका: तारका काबिनी की सहायक नदी है और मैसूरु क्षेत्र से होकर बहती है।

नुगु: नुगु काबिनी की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है और मैसूरु क्षेत्र की स्थानीय जल व्यवस्था से जुड़ी है।

अर्कावती की प्रमुख सहायक नदियां

कुमुदवती: कुमुदवती अर्कावती की छोटी सहायक नदी है और बेंगलुरु ग्रामीण क्षेत्र की जल जरूरतों में महत्वपूर्ण है।

भीमा की प्रमुख सहायक नदियां

सीना: सीना महाराष्ट्र और कर्नाटक के भीमा नदी तंत्र से जुड़ी प्रमुख सहायक नदी है और आगे भीमा में मिलती है।

नीरा: नीरा पश्चिमी घाट से निकलने वाली भीमा की सहायक नदी है और महाराष्ट्र से होकर भीमा नदी तंत्र में पहुंचती है।

घोड़: घोड़ महाराष्ट्र में भीमा की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है और आगे भीमा में मिलती है।

मूला-मुठा: मूला और मुठा नदियां पुणे क्षेत्र से होकर बहती हैं और मिलकर भीमा नदी तंत्र में पानी पहुंचाती हैं।

कागिनी: कागिनी उत्तरी कर्नाटक की जलधारा है और भीमा नदी तंत्र की सहायक नदियों में शामिल है।

पश्चिमवाहिनी नदियों की प्रमुख सहायक नदियां

कर्नाटक की पश्चिमवाहिनी नदियां कृष्णा और कावेरी से अलग हैं। शरावती, काली, अघनाशिनी, वराही और नेत्रावती स्वयं प्रमुख नदियां हैं। इनकी सहायक धाराएं छोटी हैं और अलग-अलग जलग्रहण क्षेत्रों में बहती हैं।

कुमारधारा: कुमारधारा दक्षिण कन्नड़ क्षेत्र की प्रमुख सहायक नदी है और नेत्रावती नदी में मिलकर तटीय कर्नाटक की जल व्यवस्था का हिस्सा बनती है।

कर्नाटक की सहायक नदियां केवल बड़ी नदियों में पानी पहुंचाने वाली धाराएं नहीं हैं। इनके जलग्रहण क्षेत्र खेती, जंगल, भूजल पुनर्भरण और स्थानीय आजीविका के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए नदी प्रबंधन में मुख्य नदी के साथ उसकी सहायक नदियों और पूरे जलग्रहण क्षेत्र को भी देखना जरूरी है।

कर्नाटक की प्रमुख नदी घाटियां

कर्नाटक की नदियां राज्य के अलग-अलग हिस्सों में कई नदी घाटियां और जलग्रहण क्षेत्र बनाती हैं। इन घाटियों पर खेती, सिंचाई, पेयजल, जलविद्युत, जंगल और स्थानीय आजीविका निर्भर हैं। राज्य का लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र कृष्णा नदी प्रणाली के जलग्रहण में आता है, जबकि कावेरी का जलग्रहण लगभग 18 प्रतिशत क्षेत्र में फैला है। पश्चिमवाहिनी नदियां राज्य के करीब 13 प्रतिशत क्षेत्र से पानी अरब सागर की ओर ले जाती हैं।

कृष्णा घाटी

कृष्णा कर्नाटक की सबसे बड़ी नदी प्रणालियों में से एक है और राज्य के लगभग 60 प्रतिशत क्षेत्र की जलनिकासी करती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में तुंगभद्रा, भीमा, घटप्रभा और मलप्रभा शामिल हैं। यह घाटी मुख्य रूप से उत्तर और मध्य कर्नाटक में फैली है।

कृष्णा घाटी कर्नाटक की सिंचाई और कृषि व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। अलमट्टी और नारायणपुर जैसे बड़े जलाशय इसी नदी प्रणाली का हिस्सा हैं। घाटी के कई हिस्सों में सिंचाई ने खेती के स्वरूप और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बदला है।

कावेरी घाटी

कावेरी कर्नाटक की दूसरी बड़ी नदी प्रणाली है और राज्य के करीब 18 प्रतिशत क्षेत्र की जलनिकासी करती है। इसका उद्गम कोडगु में तालकावेरी के पास होता है। काबिनी, हेमावती, हरंगी, लक्ष्मणतीर्था, शिम्शा, अर्कावती और सुवर्णवती इसकी प्रमुख सहायक नदियों में शामिल हैं।

कावेरी घाटी दक्षिणी कर्नाटक की कृषि, पेयजल और जल भंडारण व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। मांड्या, मैसूरु, हासन और कोडगु जैसे क्षेत्रों की खेती और बस्तियां इस नदी प्रणाली से जुड़ी हैं। बेंगलुरु की पेयजल व्यवस्था भी कावेरी नदी पर निर्भर है।

पश्चिमवाहिनी नदी घाटियां

कर्नाटक की पश्चिमवाहिनी नदियां कृष्णा और कावेरी से अलग प्रकृति की हैं। ये नदियां पश्चिमी घाट से निकलकर अपेक्षाकृत कम दूरी तय करती हुई अरब सागर में मिलती हैं। इनमें शरावती, काली, नेत्रावती, अघनाशिनी, वराही, गंगावली और महादयी जैसी नदियां शामिल हैं।

इन नदी घाटियों का जलग्रहण क्षेत्र पश्चिमी घाट के घने जंगलों, पहाड़ी ढलानों और तटीय मैदानों से जुड़ा है। भारी मानसूनी बारिश के कारण यहां नदियों में पानी तेजी से बढ़ सकता है। दूसरी ओर, इन नदियों के जंगल और नदी-मुहाने जैव विविधता, मछली पालन और स्थानीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं।

गोदावरी घाटी

कर्नाटक का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा गोदावरी नदी प्रणाली से जुड़ा है। मुख्य रूप से बीदर जिले का क्षेत्र इस नदी प्रणाली के जलग्रहण में आता है। मांजरा गोदावरी की प्रमुख सहायक नदी है और इसका कुछ जलग्रहण कर्नाटक में है।

राज्य में गोदावरी घाटी का क्षेत्र कृष्णा और कावेरी की तुलना में छोटा है, लेकिन उत्तर-पूर्वी कर्नाटक में स्थानीय कृषि और जल संसाधन के लिए इसका महत्व है।

पेन्नार नदी घाटी

दक्षिण-पूर्वी कर्नाटक का कुछ हिस्सा पेन्नार नदी प्रणाली में आता है। उत्तर पेन्नार और दक्षिण पेन्नार की ऊपरी धाराएं कर्नाटक से निकलती हैं और आगे आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु की ओर बहती हैं। 

राज्य में पेन्नार का जलग्रहण क्षेत्र कृष्णा और कावेरी की तुलना में छोटा है, लेकिन दक्षिण-पूर्वी कर्नाटक में कृषि और स्थानीय जल संसाधनों के लिए इसका महत्व है। कम और अनिश्चित वर्षा वाले इस क्षेत्र में नदी, छोटे जल निकाय और भूजल स्थानीय जल सुरक्षा के महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

नदी घाटियों और कर्नाटक की जल सुरक्षा का संबंध

कर्नाटक की नदी घाटियों में पानी की उपलब्धता समान नहीं है। पश्चिमी घाट और तटीय क्षेत्रों में भारी मानसूनी बारिश होती है, जबकि राज्य के आंतरिक और उत्तरी हिस्सों में कई क्षेत्र अपेक्षाकृत कम वर्षा वाले हैं। यही असमानता कर्नाटक की जल व्यवस्था को चुनौतीपूर्ण बनाती है। राज्य के जल संसाधन दस्तावेजों में भी बढ़ती क्षेत्रीय जल मांग और सीमित जल उपलब्धता को बड़ी चुनौती बताया गया है।

कर्नाटक की पश्चिमवाहिनी नदियां कृष्णा और कावेरी से अलग प्रकृति की हैं। ये नदियां पश्चिमी घाट से निकलकर अपेक्षाकृत कम दूरी तय करती हुई अरब सागर में मिलती हैं।

इसलिए कर्नाटक की नदी घाटियों को केवल अलग-अलग नदियों के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। हर घाटी में नदी, सहायक नदियां, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, खेती, शहर और पारिस्थितिकी एक-दूसरे से जुड़े हैं। भविष्य की जल योजना में इन सभी को एक साथ देखना जरूरी होगा।

कर्नाटक की नदियों का सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व

कर्नाटक की नदियां सिर्फ पानी का स्रोत नहीं हैं। वे कृषि, पेयजल, ऊर्जा, पर्यटन, मत्स्य पालन और सांस्कृतिक परंपराओं का भी आधार हैं। कृष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदी प्रणालियों से सिंचाई और जलापूर्ति जुड़ी है, जबकि पश्चिमवाहिनी नदियां पश्चिमी घाट की जैव विविधता और तटीय आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हैं।

 कर्नाटक के प्रमुख बांध और जल परियोजनाएं

कर्नाटक की नदियों पर सिंचाई, पेयजल, जल भंडारण और जलविद्युत के लिए कई बड़े बांध और परियोजनाएं बनाई गई हैं। कृष्णा, कावेरी और तुंगभद्रा जैसी नदी प्रणालियों पर बने जलाशय राज्य की कृषि और जल व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।

पश्चिमी घाट की नदियों पर भी जलविद्युत और सिंचाई से जुड़ी परियोजनाएं विकसित हुई हैं। केंद्रीय जल आयोग और कर्नाटक के जल संसाधन विभाग ने राज्य की कई प्रमुख और मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को दर्ज किया है।

अलमट्टी बांध

अलमट्टी बांध कृष्णा नदी पर बना कर्नाटक का प्रमुख जलाशय है। यह उत्तरी कर्नाटक में सिंचाई और जल भंडारण के लिए महत्वपूर्ण है। अलमट्टी और नारायणपुर जलाशय कृष्णा नदी की राज्य की सिंचाई व्यवस्था के प्रमुख हिस्से हैं। केंद्रीय जल आयोग की परियोजना सूची में अलमट्टी को कर्नाटक की प्रमुख कृष्णा बेसिन परियोजनाओं में शामिल किया गया है।

तुंगभद्रा बांध

तुंगभद्रा बांध तुंगभद्रा नदी पर बना प्रमुख बहुउद्देशीय जलाशय है। इसका पानी सिंचाई और जल भंडारण के साथ जलविद्युत तथा मत्स्य पालन के लिए भी उपयोग होता है। तुंगभद्रा नदी कृष्णा की प्रमुख सहायक नदी है और इसकी परियोजना कर्नाटक के बड़े सिंचाई तंत्रों में शामिल है।

कृष्णराज सागर बांध

कृष्णराज सागर या KRS बांध कावेरी नदी पर बना है और दक्षिणी कर्नाटक की जल व्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे सिंचाई और जल भंडारण के साथ पेयजल की जरूरतें भी पूरी होती हैं। केंद्रीय जल आयोग के बांध रिकॉर्ड में KRS को कर्नाटक के प्रमुख बड़े बांधों में दर्ज किया गया है।

काबिनी और हेमावती परियोजनाएं

काबिनी और हेमावती दोनों कावेरी नदी प्रणाली से जुड़ी प्रमुख परियोजनाएं हैं। काबिनी जलाशय मैसूरु और आसपास के क्षेत्रों की सिंचाई और जल भंडारण के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि हेमावती परियोजना हासन और आसपास के कृषि क्षेत्रों को पानी उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। दोनों बांध कर्नाटक के प्रमुख बड़े बांधों की सरकारी सूची में दर्ज हैं।

प्रस्तावित और विवादित जल परियोजनाएं

कर्नाटक में कुछ बड़ी जल परियोजनाएं अभी प्रस्तावित या विकास के अलग-अलग चरणों में हैं। इनमें मेकेदाटु संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना और कलसा-बंडूरी नाला परियोजना प्रमुख हैं। इन परियोजनाओं को केवल जलापूर्ति या सिंचाई के नजरिये से नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय जल बंटवारे और नदी पारिस्थितिकी के संदर्भ में भी देखा जाता है।

मेकेदाटु परियोजना

मेकेदाटु संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना कावेरी नदी पर प्रस्तावित है। कर्नाटक सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों की पेयजल जरूरतों को पूरा करना तथा जल भंडारण बढ़ाना है। इस परियोजना के तहत कावेरी के मेकेदाटु क्षेत्र में जलाशय बनाने का प्रस्ताव है।

परियोजना को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद है। तमिलनाडु का मुख्य तर्क है कि परियोजना से कावेरी के जल प्रवाह और उसके हिस्से के पानी पर असर पड़ सकता है। परियोजना से कावेरी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र, जंगलों और नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर असर पड़ सकता है। इसलिए इसका पर्यावरणीय पक्ष भी महत्वपूर्ण है।

कलसा-बंडूरी नाला परियोजना

कलसा-बंडूरी परियोजना महादयी (मांडवी) नदी की सहायक धाराओं के पानी को मोड़कर हुब्बली-धारवाड़, गदग और आसपास के क्षेत्रों की पेयजल जरूरतें पूरी करने के उद्देश्य से प्रस्तावित है। परियोजना के तहत कलसा और बंडूरी नालों से पानी मोड़ने की योजना है।

यह परियोजना कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र के बीच महादयी नदी के पानी के बंटवारे से जुड़े लंबे विवाद का हिस्सा है। गोवा ने नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र से पानी मोड़ने पर आपत्ति जताई है। पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी और महादयी नदी तंत्र पर इसके संभावित असर का सवाल भी महत्वपूर्ण है।

क्यों महत्वपूर्ण हैं ये परियोजनाएं?

मेकेदाटु और कलसा-बंडूरी दोनों परियोजनाएं दिखाती हैं कि कर्नाटक में जल सुरक्षा की चुनौती केवल पानी जुटाने तक सीमित नहीं है। एक नदी घाटी से पानी लेने का फैसला दूसरे राज्य, निचले जलग्रहण क्षेत्र और नदी की पारिस्थितिकी को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए ऐसी परियोजनाओं की योजना में पेयजल और सिंचाई की जरूरतों के साथ प्राकृतिक प्रवाह, जलग्रहण क्षेत्र और पर्यावरणीय प्रभावों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

कर्नाटक की नदियों के सामने प्रमुख चुनौतियां

कर्नाटक की अलग-अलग नदी घाटियों में चुनौतियां भी अलग हैं। उत्तरी कर्नाटक में पानी की कमी और सूखा महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जबकि पश्चिमी घाट और तटीय क्षेत्रों में भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और नदी किनारे का क्षरण चिंता का विषय हैं।

पानी की बढ़ती मांग: कर्नाटक में कृषि, शहरीकरण और उद्योगों के विस्तार के साथ पानी की मांग बढ़ रही है। राज्य के जल संसाधन विभाग के अनुसार पानी सीमित है। कृषि, शहरों और उद्योगों में मांग बढ़ने से कई क्षेत्रों में जल तनाव बढ़ रहा है। इसका असर कृष्णा और कावेरी जैसी प्रमुख नदी घाटियों पर भी पड़ रहा है।

नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव: बांधों, जलाशयों और सिंचाई परियोजनाओं ने कई नदी घाटियों में पानी के प्रवाह के समय और मात्रा को प्रभावित किया है। कावेरी और कृष्णा जैसी घाटियों में जलाशयों का संचालन सिंचाई और पेयजल के लिए जरूरी है। लेकिन इससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह और नीचे की ओर रहने वाले पारिस्थितिकी तंत्र के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौती बनता है। इसलिए कर्नाटक में जल संसाधन की योजना नदी बेसिन के स्तर पर बनाने की जरूरत है।

पश्चिमी घाट पर बढ़ता दबाव: शरावती, नेत्रावती, अघनाशिनी, काली और वराही जैसी कई नदियों का उद्गम पश्चिमी घाट में होता है। जंगलों में बदलाव, नदी घाटी में निर्माण, ठोस कचरा और सीवेज जलग्रहण क्षेत्रों तथा नदी तंत्र पर दबाव डालते हैं। पश्चिमी घाट के जलग्रहण क्षेत्रों को बचाना पूरे प्रायद्वीप की जल सुरक्षा के लिए जरूरी है।

बाढ़ और सूखे का दोहरा संकट: कर्नाटक में वर्षा का वितरण बहुत असमान है। उत्तर आंतरिक कर्नाटक में कई क्षेत्रों में सालाना बारिश 500 मिमी से भी कम रहती है, जबकि पश्चिमी घाट और तटीय क्षेत्रों में यह 4,000 मिमी से अधिक हो सकती है। इसी असमानता के कारण राज्य के कुछ हिस्से सूखे और जल संकट से जूझते हैं, जबकि कृष्णा और कावेरी घाटियों में भारी बारिश के दौरान बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

नदी प्रदूषण: घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि से होने वाला प्रदूषण कर्नाटक की कई नदियों और जल निकायों के लिए चुनौती है। कर्नाटक की जल नीति से जुड़े आकलन में निगरानी वाली 17 नदी धाराओं में से 13 में प्रदूषण की समस्या दर्ज की गई थी और सीवेज को इसका प्रमुख स्रोत बताया गया था। इससे नदी के पानी की गुणवत्ता बिगड़ती है और जलीय पारिस्थितिकी तथा मानव उपयोग पर भी असर पड़ता है।

अंतरराज्यीय जल विवाद: कर्नाटक की प्रमुख नदी प्रणालियां कई राज्यों से जुड़ी हैं। कावेरी, कृष्णा और महादयी के जल बंटवारे को लेकर कर्नाटक का क्रमशः तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश/तेलंगाना और गोवा के साथ लंबे समय से विवाद रहा है। 

ऐसे विवादों में सिंचाई और पेयजल की जरूरतों के साथ नदी के प्राकृतिक प्रवाह और निचले जलग्रहण क्षेत्रों के हितों का संतुलन भी महत्वपूर्ण है। कृष्णा बेसिन ही कर्नाटक के अलावा महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में फैला हुआ है।

जलवायु परिवर्तन और अनिश्चित वर्षा: कर्नाटक में मानसून के स्वरूप में बदलाव, लंबे शुष्क दौर और कम समय में होने वाली तेज बारिश नदी और जलग्रहण क्षेत्रों पर दबाव बढ़ा सकते हैं। राज्य की जल नीति में भी जलवायु परिवर्तन को सूखे, अनियमित वर्षा, बदलते नदी प्रवाह और बढ़ती जल मांग से जुड़ी चुनौती माना गया है। इससे राज्य के अलग-अलग हिस्सों में जल संकट और बाढ़ दोनों का खतरा बढ़ सकता है।

कर्नाटक की नदियों के संरक्षण की प्रमुख पहलें

कर्नाटक में नदी संरक्षण के लिए जलग्रहण विकास, भूजल पुनर्भरण, जल निकायों का पुनरुद्धार और पश्चिमी घाट, आर्द्रभूमि तथा जैव विविधता की रक्षा पर काम किया जा रहा है। सुजला-III जैसी पहलें वैज्ञानिक और भू-स्थानिक आंकड़ों के आधार पर जलग्रहण प्रबंधन को बढ़ावा देती हैं।

नदी पुनर्जीवन और भूजल पुनर्भरण

कर्नाटक में कुछ ऐसी नदी प्रणालियों पर पुनर्जीवन के काम किए गए हैं जहां लंबे समय से पानी की कमी रही है। सरकारी दस्तावेज के अनुसार वेदावती, कुमुदवती और पालार नदियों के क्षेत्रों में भूजल स्तर बढ़ाने के लिए परकोलेशन कुएं, रिचार्ज कुएं, बोल्डर चेक और जल तालाब जैसी संरचनाएं विकसित की गईं। इन क्षेत्रों में लगातार सूखे और भूजल पर बढ़ते दबाव के कारण ऐसे उपाय किए गए।

इन उपायों का उद्देश्य केवल नदी में पानी रोकना नहीं, बल्कि बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाकर भूजल भंडार को मजबूत करना भी है। इसलिए छोटे जलग्रहण क्षेत्रों में चेक डैम, खेत तालाब और रिचार्ज संरचनाएं नदी संरक्षण की स्थानीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं।

सुजला-III और वैज्ञानिक जलग्रहण प्रबंधन

कर्नाटक के जलग्रहण विकास विभाग की सुजला-III परियोजना में भू-स्थानिक तकनीक और आंकड़ों की मदद से जलग्रहण क्षेत्र और भूमि संसाधनों की योजना बनाई जा रही है। इसके पोर्टल पर जलविज्ञान और भूमि संसाधन एटलस के साथ विस्तृत परियोजना रिपोर्ट और क्षेत्र-स्तरीय संरक्षण योजनाएं उपलब्ध हैं।

इस योजना में नदी के मुख्य प्रवाह के साथ उस पूरे क्षेत्र को भी देखा जाता है जहां से बारिश का पानी नदी तक पहुंचता है। इससे मिट्टी और पानी का संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और खेती की पानी की जरूरतों की एक साथ योजना बनाई जा सकती है।

जल निकायों और स्थानीय जल स्रोतों का संरक्षण

कर्नाटक में जल संरक्षण के तहत पुराने तालाबों और स्थानीय जल निकायों के पुनरुद्धार, भूजल रिचार्ज संरचनाओं और वर्षाजल संचयन पर भी जोर दिया गया है। सरकारी जल संरक्षण दस्तावेज में जल निकायों की मरम्मत और पुनरुद्धार, बोरवेल रिचार्ज, सोक पिट और जलग्रहण विकास जैसे उपायों को शामिल किया गया है।

स्थानीय तालाब और छोटी जलधाराएं बड़ी नदियों के जलग्रहण क्षेत्र का हिस्सा होती हैं। इसलिए इनके संरक्षण से बारिश का पानी तेजी से बहकर निकलने के बजाय स्थानीय स्तर पर रुकता और जमीन में पहुंचता है।

इसलिए नदी संरक्षण का काम केवल नदी किनारे तक सीमित नहीं रहना चाहिए। ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में जंगलों और प्राकृतिक धाराओं को बचाना भी उतना ही जरूरी है।

पश्चिमी घाट और शरावती घाटी संरक्षण

शरावती घाटी पश्चिमी घाट की महत्वपूर्ण नदी घाटियों में से एक है। यहां वन क्षेत्र, छोटी धाराएं और नदी का जलग्रहण एक-दूसरे से जुड़े हैं। सरकार ने 2019 में 930.16 वर्ग किमी क्षेत्र में शरावती घाटी सिंह-पूंछ वाले मकाक अभयारण्य को अधिसूचित किया था। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में छोटी धाराएं और महत्वपूर्ण नदी जलग्रहण क्षेत्र मौजूद हैं।

शरावती घाटी के संरक्षण का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि नदी पर जलविद्युत परियोजनाएं मौजूद हैं। ऐसे में ऊर्जा उत्पादन के साथ नदी के प्राकृतिक जलग्रहण, जंगल और जैव विविधता को बनाए रखना जरूरी है।

अघनाशिनी नदी और मुहाना संरक्षण

अघनाशिनी का मुहाना नदी, समुद्र और तटीय आर्द्रभूमि को जोड़ता है और इन तीनों के बीच महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संबंध बनाए रखता है। अघनाशिनी को बचाने के लिए पश्चिमी घाट के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र से लेकर तटीय मुहाने तक पूरे नदी तंत्र को एक साथ देखना होगा। 

अघनाशिनी एस्ट्यूरी को रामसर आर्द्रभूमि का दर्जा मिला है, जिससे इसके मुहाने, आर्द्रभूमि, मछली संसाधनों और जैव विविधता के संरक्षण का महत्व और बढ़ जाता है।

जलीय जैव विविधता और समुदाय की भूमिका

कर्नाटक की नदियां मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास हैं। राज्य की जलवायु कार्य-योजना में तुंगभद्रा, तुंगा और अन्य नदी क्षेत्रों में मछली अभयारण्यों तथा नदी-आश्रित जैव विविधता के संरक्षण का उल्लेख मिलता है। नेत्रावती नदी तंत्र की तटीय और नदी-किनारे की वनस्पतियों के संरक्षण पर भी अध्ययन किए गए हैं।

जलग्रहण संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। चेक डैम, खेत तालाब, रिचार्ज कुएं और छोटे जल निकाय तभी लंबे समय तक उपयोगी रह सकते हैं जब उनका रखरखाव स्थानीय स्तर पर हो। कर्नाटक के जल संरक्षण दस्तावेजों में स्थानीय समुदायों और संस्थाओं की मदद से जल संरचनाओं के रखरखाव और बेहतर जल उपयोग पर जोर दिया गया है।

कर्नाटक की नदी व्यवस्था राज्य की भौगोलिक और जलवायु विविधता को दर्शाती है। कृष्णा और कावेरी जैसी बड़ी नदी प्रणालियां कृषि, सिंचाई और पेयजल का आधार हैं, जबकि पश्चिमी घाट से निकलने वाली शरावती, नेत्रावती, अघनाशिनी और काली जैसी नदियां जंगलों, जैव विविधता और तटीय आजीविका से जुड़ी हैं। 

इसलिए नदियों का संरक्षण केवल उनके मुख्य प्रवाह तक सीमित नहीं रहना चाहिए। नदी, सहायक नदियों, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल, तालाबों और आर्द्रभूमियों को एक साथ देखकर ही जल योजना बनानी चाहिए। बढ़ती जल मांग, जलवायु परिवर्तन और नदी घाटियों पर बढ़ते दबाव के बीच कर्नाटक के लिए जल उपयोग और नदी पारिस्थितिकी के बीच संतुलन बनाना आने वाले वर्षों की बड़ी चुनौती होगी।


मुख्य स्रोत: केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB), केंद्रीय जल आयोग (CWC), River Basin Atlas of India (CWC-ISRO/NRSC), कर्नाटक सरकार का जल संसाधन विभाग, कृष्णा नदी प्रबंधन बोर्ड (KRMB), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु।

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