

बाणासुर सागर बांध करमनाथोडु नदी पर बनाया गया है, जो कबिनी नदी की एक सहायक नदी है।
फोटो: अजय मोहन
केरलम में 44 नदियां हैं। इनमें 41 पश्चिम की ओर और तीन पूर्व की ओर बहती हैं।
पेरियार, भरतपुझा, पंबा और चालियार राज्य की चार मध्यम श्रेणी की नदियां हैं। राष्ट्रीय मानक के अनुसार केरलम में कोई बड़ी नदी नहीं है।
भारी मानसूनी बारिश के बावजूद गर्मियों में पानी की कमी, नदी प्रदूषण, खारे पानी का प्रवेश और बाढ़ राज्य की प्रमुख जल चुनौतियां हैं।
केरलम की नदियों को पश्चिमी घाट, बांधों, भूजल, बैकवाटर, आर्द्रभूमि और समुद्र से जोड़कर देखना जरूरी है।
केरलम में बारिश भरपूर होती है। पश्चिमी घाट से निकलने वाली अनेक नदियां, झीलें, बैकवाटर और आर्द्रभूमियां राज्य की जल व्यवस्था का आधार हैं। इसके बावजूद यहां पानी की स्थिति हर मौसम और हर इलाके में एक जैसी नहीं रहती। मानसून में कुछ नदी घाटियों में बाढ़ आती है, जबकि गर्मियों में कई जगह पानी की कमी और खारे पानी के प्रवेश की समस्या सामने आती है।
केरलम की नदियां दूसरे राज्यों की कई बड़ी नदियों की तुलना में छोटी हैं। उनका बहाव तेज है और समुद्र तक की दूरी भी कम है। इसलिए भारी बारिश होने या बांधों से पानी छोड़े जाने पर निचले इलाकों में जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। नदी में जमा तलछट और तटीय जल की स्थिति भी इसके बहाव को प्रभावित करती है।
केरलम वन विभाग के अनुसार राज्य में 44 नदियां हैं। इनमें 41 पश्चिम की ओर बहकर लक्षद्वीप सागर में मिलती हैं। कबानी, भवानी और पांबर नाम की तीन नदियां पूर्व की ओर बहती हैं और कावेरी नदी तंत्र से जुड़ती हैं।
राष्ट्रीय वर्गीकरण के अनुसार केरलम में कोई बड़ी नदी नहीं है। पेरियार, भरतपुझा, पंबा और चालियार को मध्यम श्रेणी में रखा गया है। बाकी नदियां छोटी हैं। ज्यादातर नदियों का उद्गम पश्चिमी घाट में है। ऊंचाई वाले इलाकों में ये नदियां तेज ढाल से बहती हैं। मैदानी और तटीय इलाकों में पहुंचकर कई नदियां बैकवाटर और झीलों से जुड़ती हुई समुद्र तक पहुंचती हैं।
जिस पूरे इलाके का बारिश का पानी बहकर किसी मुख्य नदी और उसकी सहायक धाराओं में पहुंचता है, उसे नदी बेसिन कहा जाता है। केरलम में बेसिनों का आकार अपेक्षाकृत छोटा है, लेकिन घनी आबादी, खेती, पहाड़ी ढाल और तटीय भूगोल के कारण उनका महत्व बहुत अधिक है।
पेरियार केरलम की सबसे लंबी नदी है। इसका जलग्रहण क्षेत्र पश्चिमी घाट से इडुक्की और एर्नाकुलम के कई इलाकों तक फैला है। नदी और इसकी परियोजनाएं जलविद्युत, सिंचाई और पेयजल आपूर्ति में भूमिका निभाती हैं। पेरियार के निचले हिस्से में औद्योगिक और शहरी गतिविधियों के कारण पानी की गुणवत्ता भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
भरतपुझा को नीला नदी भी कहा जाता है। यह पालक्काड दर्रे और दक्षिण मालाबार के कई क्षेत्रों से होकर अरब सागर में मिलती है। नदी और इसकी सहायक धाराएं खेती, सिंचाई और स्थानीय जल स्रोतों से जुड़ी हैं। इस बेसिन में मालमपुझा, वालायर, मंगलम और पोथुंडी जैसी सिंचाई परियोजनाएं हैं।
पंबा पश्चिमी घाट से निकलकर निचले इलाकों में पहुंचती है और कुट्टनाड-वेम्बनाड जल तंत्र से जुड़ती है। इसका धार्मिक महत्व भी है, क्योंकि सबरीमला यात्रा पंबा से जुड़ी है। निचले इलाकों में पंबा का पानी खेतों, नहरों, बैकवाटर और आर्द्रभूमियों तक पहुंचता है। इसलिए कुट्टनाड की खेती और जल प्रबंधन में इस नदी की अहम भूमिका है।
चालियार 169 किलोमीटर लंबी नदी है। यह पश्चिमी घाट से निकलकर मलप्पुरम और कोझिकोड क्षेत्र की ओर बहती है। नदी स्थानीय जल जरूरतों, खेती और तटीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है।
केरलम की नदी व्यवस्था को समझने में वेम्बनाड झील और उसका जलग्रहण क्षेत्र खास महत्व रखते हैं। पंबा, मीनाचिल, मणिमाला, अचनकोविल और मुवाट्टुपुझा जैसी नदियां इस बड़े जल तंत्र से जुड़ी हैं। केंद्रीय जल आयोग की 2018 की केरलम बाढ़ रिपोर्ट में वेम्बनाड झील में दस नदियों से पानी पहुंचने का उल्लेख है।
केरलम की करमनाथोडु नदी
फोटो: अजय मोहन
इसलिए इन नदियों को केवल अलग-अलग जलधाराओं के रूप में नहीं देखा जा सकता। ऊपरी इलाकों में भारी बारिश, भूस्खलन, बांधों से छोड़ा गया पानी और नदी में बढ़ी तलछट का असर नीचे कुट्टनाड और वेम्बनाड तक पहुंच सकता है। निचले इलाकों से पानी कितनी तेजी से निकल पाएगा, यह समुद्र के जलस्तर और निकासी की स्थिति पर भी निर्भर करता है।
केरलम की सभी छोटी नदियां किसी बड़ी नदी की सहायक नदी नहीं हैं। इनमें से कई का अपना अलग जलग्रहण क्षेत्र है और वे सीधे बैकवाटर या समुद्र में मिलती हैं। इसलिए नीचे केवल प्रमुख नदी प्रणालियों से जुड़ी चुनिंदा सहायक नदियां दी गई हैं।
केरलम की नदियां खेती, पेयजल, सिंचाई, जलविद्युत, मत्स्य संसाधन और स्थानीय आजीविका से जुड़ी हैं। पेरियार पर जलविद्युत और सिंचाई परियोजनाएं हैं। भरतपुझा पालक्काड और मलप्पुरम के कृषि क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि पंबा और उससे जुड़ी नदियां कुट्टनाड की खेती और जल निकासी व्यवस्था से जुड़ी हैं।
नदियों का संबंध बैकवाटर और अंतर्देशीय जल परिवहन से भी है। केरलम आर्थिक समीक्षा 2017 के अनुसार राज्य की नदियां, झीलें, मुहाने और बैकवाटर अंतर्देशीय जल परिवहन का आधार हैं।
केरलम में मानसून के दौरान कम समय में बहुत अधिक बारिश हो सकती है। ऐसे में बाढ़ का खतरा केवल बारिश की मात्रा से तय नहीं होता। जलाशयों और नदियों में पहले से कितना पानी है और निचले इलाकों से पानी कितनी तेजी से निकल सकता है, यह भी महत्वपूर्ण है। 2018 की बाढ़ के बाद जलाशय संचालन, बाढ़ पूर्वानुमान और नदी बेसिन स्तर पर योजना पर अधिक ध्यान दिया गया।
केरलम आर्थिक समीक्षा 2025 के अनुसार पेरियार, मणिमाला, चालकुडी, पंबा और अचनकोविल बेसिनों को बाढ़ पूर्व चेतावनी व्यवस्था के शुरुआती चरण के लिए चुना गया। पेरियार और चालकुडी में यह व्यवस्था राष्ट्रीय जल विज्ञान परियोजना (National Hydrology Project) के तहत स्थापित की जा चुकी है।
अधिक बारिश होने का अर्थ यह नहीं है कि पानी पूरे साल समान रूप से उपलब्ध रहेगा। केरलम की कई नदियां छोटी हैं और उनकी ढाल तेज है। मानसून में मिलने वाले पानी का बड़ा हिस्सा नदियों के जरिए तेजी से निचले इलाकों और समुद्र की ओर बह जाता है। इस कारण बारिश के कुछ महीने बाद कई जगह नदी प्रवाह और स्थानीय जल स्रोतों में पानी कम हो सकता है।
केरलम राज्य योजना बोर्ड भी भारी बारिश के बावजूद राज्य में गर्मियों के दौरान पानी की कमी की समस्या का उल्लेख करता है। मीनाचिल बेसिन के बारे में केरलम सिंचाई विभाग ने गर्मियों में जल की कमी और खारे पानी के प्रवेश, दोनों को चुनौती माना है।
सीवेज, शहरी कचरा, औद्योगिक गतिविधियां और दूसरी मानवीय गतिविधियां कई नदी-खंडों की जल गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी नदी प्रदूषित है। निगरानी में जिन हिस्सों में प्रदूषण मिलता है, उन्हें ‘प्रदूषित नदी-खंड’ के रूप में दर्ज किया जाता है।
केरलम आर्थिक समीक्षा 2024 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2022 की सूची के आधार पर राज्य में 18 प्रदूषित नदी-खंड दर्ज हैं। इनमें करमना, नेय्यार, वामनपुरम, पंबा, मणिमाला, पेरियार, चालकुडी और कदलुंडी सहित अन्य नदी-खंड शामिल हैं। उस सूची में केरलम का कोई नदी-खंड सबसे गंभीर प्राथमिकता श्रेणी–I (Priority I) या प्राथमिकता श्रेणी–II (Priority II) में नहीं था। करमना का संबंधित हिस्सा Priority III में, नेय्यार और वामनपुरम के हिस्से Priority IV में और बाकी दर्ज हिस्से Priority V में थे।
भारी बारिश और भूस्खलन के बाद मिट्टी, पत्थर और दूसरी सामग्री नदियों में पहुंचती है। हर जगह इसका असर एक जैसा नहीं होता। लेकिन ज्यादा तलछट जमा होने पर नदी उथली हो सकती है और उसके बहाव का रास्ता भी बदल सकता है।
केरलम इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट वेम्बनाड में मिलने वाली पंबा, मीनाचिल, मणिमाला, अचनकोविल और मुवाट्टुपुझा नदियों में तलछट के आकलन की जरूरत बताती है। इसलिए किसी बाढ़ के लिए केवल तलछट को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। अलग-अलग नदियों और उनके हिस्सों में इसके असर का वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी है।
समुद्र और बैकवाटर के पास स्थित नदियों के निचले हिस्सों में गर्मियों के दौरान खारा पानी ऊपर की ओर बढ़ सकता है। नदी में मीठे पानी का प्रवाह कम होने पर इसका खतरा बढ़ जाता है। इससे पेयजल स्रोत और खेती प्रभावित हो सकते हैं। मीनाचिल बेसिन में सिंचाई विभाग ने गर्मियों की जल कमी के साथ खारे पानी के प्रवेश को दर्ज किया है।
केरलम की कई नदियों पर जलविद्युत, सिंचाई और जल आपूर्ति से जुड़ी परियोजनाएं हैं। जलाशय पानी जमा करते हैं और बाढ़ प्रबंधन में मदद कर सकते हैं। लेकिन बांध से पानी कब और कितना छोड़ा जाता है, इसका असर नदी के निचले हिस्से के बहाव पर पड़ता है।
इसलिए पानी छोड़ते समय जलाशय की सुरक्षा के साथ नीचे बसे इलाकों की जरूरत और नदी के प्राकृतिक बहाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
केरलम में नदी प्रबंधन अब केवल बांध और सिंचाई परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। नदी बेसिन प्रबंधन, बाढ़ की पूर्व चेतावनी, जल आंकड़ों की निगरानी, जलाशयों के संचालन और आर्द्रभूमियों के संरक्षण को भी इसमें शामिल किया जा रहा है। राज्य में चल रही कुछ प्रमुख पहल इस प्रकार हैं।
केरलम जल संसाधन विभाग ने पंबा नदी बेसिन के लिए समेकित नदी बेसिन प्रबंधन योजना तैयार की है। इसका उद्देश्य पानी की उपलब्धता, बाढ़ के खतरे और नदी की पारिस्थितिकी को साथ लेकर योजना बनाना है। राज्य योजना बोर्ड की नदी बेसिन नियोजन रिपोर्ट भी अलग-अलग विभागों के बजाय बेसिन स्तर पर समन्वित योजना की जरूरत बताती है।
केरलम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार प्रमुख बांधों के लिए जलाशय संचालन नियम और आपात कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं। बांध का जलस्तर ऑरेंज अलर्ट तक पहुंचने या जलग्रहण क्षेत्र में अत्यधिक बारिश का पूर्वानुमान होने पर अलग-अलग विभाग मिलकर बांध संचालन की निगरानी करते हैं
केरलम में नदी संरक्षण का अर्थ केवल नदी की सफाई या किनारे पर निर्माण रोकना नहीं है। पश्चिमी घाट से निकलने वाली नदियां रास्ते में जंगलों, खेतों, शहरों, बांधों, भूजल, बैकवाटर और आर्द्रभूमियों से जुड़ते हुए समुद्र तक पहुंचती हैं।
इसलिए ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में जंगल, मिट्टी और छोटी धाराओं की स्थिति पर निगरानी जरूरी है। निचले हिस्से में सीवेज, औद्योगिक प्रदूषण, खारे पानी का प्रवेश, तटीय निर्माण और आर्द्रभूमि की जल धारण क्षमता पर ध्यान देना होगा।
वेम्बनाड इसका स्पष्ट उदाहरण है। वेम्बनाड से जुड़ी नदियों का प्रबंधन अलग-अलग करने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। इसके लिए नदी के बहाव, बांधों से छोड़े जाने वाले पानी, निचले इलाकों की जल धारण क्षमता और समुद्र तक पानी की निकासी, इन सभी को साथ देखना जरूरी है।
बाढ़ पूर्व चेतावनी, बांधों के संचालन नियम और पंबा की समेकित नदी बेसिन प्रबंधन योजना की दिशा में उठाए गए महत्वपूर्ण कदम हैं। लंबे समय के लिए नदी, भूजल, जलग्रहण क्षेत्र, बांध, आर्द्रभूमि और तट को जोड़कर जल प्रबंधन की योजना बनानी होगी।
केरलम की जल सुरक्षा केवल ज्यादा पानी जमा करने से तय नहीं होगी। जरूरी यह भी है कि मानसून के पानी का बेहतर इस्तेमाल हो, नदियों का प्राकृतिक बहाव बना रहे और पानी की गुणवत्ता तथा तटीय जल तंत्र सुरक्षित रहें।
केरलम वन विभाग: भौगोलिक स्वरूप
अर्थशास्त्र एवं सांख्यिकी विभाग: केरलम पर्यावरण सांख्यिकी संकलन 2014-15
केरलम राज्य योजना बोर्ड: आर्थिक समीक्षा 2024
केरलम राज्य योजना बोर्ड: आर्थिक समीक्षा 2025
केरलम सिंचाई विभाग: नदी बेसिन मानचित्र
पंबा नदी बेसिन के लिए समेकित नदी बेसिन प्रबंधन योजना
केरलम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण: बांध प्रबंधन
केंद्रीय जल आयोग: केरलम बाढ़ 2018 रिपोर्ट
केरलम इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान: वेम्बनाड नदी तलछट अध्ययन
केरलम वन विभाग: आर्द्रभूमियां
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