मिज़ोरम की प्रमुख नदियों की सूची: नदी बेसिन, सहायक नदियां और जल संसाधन

त्लावंग नदी

त्लावंग नदी

फोटो: कूलकोल्नी | CC BY-SA 3.0 | विकिमीडिया कॉमन्स

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Summary
  • मिज़ोरम की नदियां मुख्य रूप से तीन नदी बेसिन में बंटी हैं - बराक, कर्णफुली और कालादान।

  • त्लावंग राज्य की सबसे लंबी नदी है। इसकी लंबाई लगभग 185 किलोमीटर है।

  • मिज़ोरम की प्रमुख नदियां असम, बांग्लादेश और म्यांमार की नदी प्रणालियों से जुड़ी हैं।

  • भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन, मिट्टी का कटाव और नदी प्रदूषण राज्य की प्रमुख जल प्रबंधन चुनौतियां हैं।

मिज़ोरम का अधिकांश हिस्सा पहाड़ी और वन क्षेत्र है। यहां की नदियां पहाड़ियों से निकलती हैं और संकरी घाटियों से होकर बहती हैं। ये नदियां खेती, सिंचाई, पेयजल, मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मिज़ोरम की नदियां अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं। उत्तर में त्लावंग, तुइरियल और तुइवावल जैसी नदियां असम की बराक नदी प्रणाली से जुड़ती हैं। पश्चिम में खावथलांगतुइपुई नदी बांग्लादेश की ओर बहती है। वहीं, दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों की छिमतुइपुई और तियाउ जैसी नदियां कालादान नदी प्रणाली का हिस्सा हैं। इनका पानी म्यांमार से होकर बंगाल की खाड़ी तक पहुंचता है।

मिज़ोरम सरकार के अनुसार राज्य का क्षेत्रफल लगभग 21,081 वर्ग किलोमीटर है। ऊंची पहाड़ियों और तेज ढलान के कारण बारिश का पानी तेजी से नीचे उतरता है। इससे नदियों का जलस्तर कम समय में बढ़ सकता है।

मिज़ोरम की नदी प्रणाली

मिज़ोरम की नदियां तीन प्रमुख नदी बेसिन में बंटी हैं - बराक, कर्णफुली और कालादान। ये राज्य के अलग-अलग हिस्सों में फैले हैं और इनकी नदियां अलग-अलग दिशाओं में बहती हैं।

बराक नदी बेसिन: यह उत्तरी मिज़ोरम में फैला है। त्लावंग, तुइरियल, तुइवावल और तुत जैसी नदियां इसी बेसिन का हिस्सा हैं। ये नदियां आगे असम में बराक नदी प्रणाली का हिस्सा बनती हैं। राज्य में इस बेसिन का क्षेत्रफल लगभग 8,176 वर्ग किलोमीटर है।

कर्णफुली नदी बेसिन: यह पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी मिज़ोरम में स्थित है। इस बेसिन की प्रमुख नदी खावथलांगतुइपुई है। यह आगे बांग्लादेश में प्रवेश करती है। मिज़ोरम में इस बेसिन का क्षेत्रफल लगभग 4,002 वर्ग किलोमीटर है।

कालादान नदी बेसिन: यह पूर्वी और दक्षिणी मिज़ोरम में फैला है। छिमतुइपुई, तियाउ, तुइचांग और मात जैसी नदियां इससे जुड़ी हैं। छिमतुइपुई को कालादान या कोलोडाइन भी कहा जाता है। राज्य में इस बेसिन का क्षेत्रफल लगभग 8,903 वर्ग किलोमीटर है।

मिज़ोरम विश्वविद्यालय के 2022 के एक भौगोलिक अध्ययन के अनुसार कालादान राज्य का सबसे बड़ा नदी बेसिन है। इसके बाद बराक और कर्णफुली नदी बेसिन आते हैं।

मिज़ोरम के प्रमुख नदी बेसिन

नोट: तालिका में दिया गया क्षेत्रफल संबंधित नदी बेसिन के केवल मिज़ोरम राज्य में आने वाले हिस्से का है।

मिज़ोरम की प्रमुख नदियों की सूची

मिज़ोरम में कई छोटी-बड़ी नदियां और पहाड़ी जलधाराएं हैं। राज्य की सभी नदियों की कोई निश्चित आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है। मिज़ोरम सरकार की सांख्यिकी पुस्तिका 2010 में 13 प्रमुख नदियों के नाम और उनकी लंबाई दी गई है। इनकी सूची नीचे दी गई है।

इन नदियों के उद्गम स्थल, प्रमुख प्रवाह क्षेत्र और संबंधित नदी प्रणालियों की जानकारी नीचे दी गई है।

मिज़ोरम की प्रमुख नदियों का परिचय

त्लावंग: मिज़ोरम की सबसे लंबी नदी

त्लावंग मिज़ोरम की सबसे लंबी नदी है। इसकी लंबाई लगभग 185 किलोमीटर है। इसे धलेश्वरी और कटाखाल के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्गम लुंगलेई के पास ज़ोपुई पहाड़ियों में लगभग 1,395 मीटर की ऊंचाई पर होता है।

त्लावंग उत्तर की ओर बहती है और आगे असम के कछार जिले में बदरपुर के पास बराक नदी से मिलती है। तुत और तेइरेई इसकी प्रमुख सहायक नदियां हैं। मिज़ोरम की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2016 के अनुसार इस नदी में छोटी नावों का इस्तेमाल होता रहा है। आसपास के इलाकों में पानी की जरूरतें पूरी करने और स्थानीय परिवहन में भी इसकी भूमिका रही है।

छिमतुइपुई: जलप्रवाह के लिहाज से मिज़ोरम की सबसे बड़ी नदी

छिमतुइपुई को कालादान या कोलोडाइन के नाम से भी जाना जाता है। मिज़ोरम सरकार की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2016 के अनुसार इसमें राज्य की दूसरी नदियों के मुकाबले सबसे अधिक पानी बहता है।

इसका उद्गम म्यांमार के पहाड़ी क्षेत्र में होता है। मिज़ोरम में प्रवेश करने के बाद यह कुछ दूरी तक भारत-म्यांमार सीमा के साथ बहती है। आगे तियाउ, तुइचांग, मात और मेंगपुई जैसी नदियां इसमें मिलती हैं। यह नदी आगे म्यांमार से होकर बहती है और बंगाल की खाड़ी में गिरती है।

तुइरियल: जलविद्युत उत्पादन से जुड़ी नदी

तुइरियल उत्तरी मिज़ोरम की प्रमुख नदी है। इसका उद्गम आइज़ोल जिले में चाविलुंग पहाड़ी के उत्तर में होता है। यह उत्तर की ओर बहते हुए असम में बराक नदी से मिलती है। तुइरिनी इसकी प्रमुख सहायक नदी है और इस पर 60 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना बनाई गई है। 

खावथलांगतुइपुई: बांग्लादेश की ओर बहने वाली नदी

खावथलांगतुइपुई मिज़ोरम के पश्चिमी और दक्षिण-पश्चिमी हिस्से की प्रमुख नदी है। इसे कर्णफुली के नाम से भी जाना जाता है। इसका उद्गम मिज़ोरम के सैथाह गांव के पास बताया गया है।

यह दक्षिण-पश्चिम की ओर बहते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। कावरपुई, तुइचावंग, फैरुआंग, काउ और देह इसकी सहायक नदियां हैं। मिज़ोरम सरकार की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट के अनुसार इस नदी में छोटी नावों का इस्तेमाल होता रहा है। इससे सीमावर्ती इलाकों में लोगों की आवाजाही और स्थानीय व्यापार में मदद मिलती रही है।

तियाउ: भारत-म्यांमार सीमा पर बहने वाली नदी

तियाउ पूर्वी मिज़ोरम की प्रमुख नदी है। इसकी लंबाई लगभग 159 किलोमीटर है। इसका उद्गम राज्य के उत्तर-पूर्वी हिस्से में खुआंगफाह गांव के पास होता है।

यह दक्षिण-पश्चिम की ओर बहती है और भारत-म्यांमार सीमा के एक हिस्से का निर्धारण करती है। आगे तुइपुई नदी इसमें मिलती है और इसके बाद तियाउ छिमतुइपुई नदी से जुड़ती है।

तुइवावल: उत्तर-पूर्वी मिज़ोरम की नदी

तुइवावल मिज़ोरम के उत्तर-पूर्वी हिस्से की प्रमुख नदी है। इसका उद्गम छावर्तुई गांव के पास होता है। यह उत्तर की ओर बहती है और मणिपुर की सीमा के पास तुइवई नदी इसमें मिलती है। तुइवावल बराक नदी प्रणाली का हिस्सा है। कई छोटी पहाड़ी जलधाराएं भी इसमें मिलती हैं।

तुइचांग और मात: छिमतुइपुई की सहायक नदियां

तुइचांग और मात दक्षिणी मिज़ोरम की प्रमुख नदियों में शामिल हैं। तुइचांग की लंबाई लगभग 121 किलोमीटर और मात की लगभग 90 किलोमीटर है।

दोनों नदियां पहाड़ी क्षेत्रों से होकर बहती हैं और आगे छिमतुइपुई नदी में मिलती हैं।

मिज़ोरम की प्रमुख सहायक नदियां

मिज़ोरम की बड़ी नदियों में कई छोटी नदियां और पहाड़ी जलधाराएं मिलती हैं। नीचे प्रमुख नदियों और उनकी सहायक नदियों की सूची दी गई है।

मिज़ोरम की नदियों का सामाजिक और आर्थिक महत्व

मिज़ोरम की नदियों का पानी खेती, सिंचाई और पेयजल के काम आता है। इनका उपयोग मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन के लिए भी किया जाता है। लेकिन पहाड़ी भूभाग के कारण कई बस्तियों तक नदी का पानी पहुंचाना मुश्किल होता है। 

कई गांव ऊंचाई पर बसे हैं, जबकि नदियां नीचे घाटियों में बहती हैं। राज्य की जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के अनुसार सभी इलाकों में नियमित रूप से साफ पानी पहुंचाना बड़ी चुनौती है।

मिज़ोरम के ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी नदियां और प्राकृतिक झरने भी पानी के महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन स्रोतों को बनाए रखने के लिए आसपास के जंगलों और जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण जरूरी है।

मिज़ोरम की प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं

मिज़ोरम की पहाड़ी नदियों का उपयोग बिजली उत्पादन के लिए भी किया जाता है। तुइरियल के अलावा राज्य में कई छोटी जलविद्युत परियोजनाएं भी हैं। नीचे इनकी स्थापित क्षमता दी गई है।

नोट: तालिका में परियोजनाओं की स्थापित क्षमता दी गई है। वास्तविक बिजली उत्पादन और परियोजनाओं की संचालन स्थिति इससे अलग हो सकती है।

तुइरियल जलविद्युत परियोजना का संचालन उत्तर पूर्वी विद्युत शक्ति निगम (NEEPCO) करता है। राज्य की दूसरी छोटी परियोजनाओं में सेरलुई बी, तेइरेई और काउ-त्लाबुंग शामिल हैं।

राज्य की जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना में तुइवाई और तुइरिनी जैसी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं के प्रस्तावों का भी उल्लेख है। इन परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति की पुष्टि अलग से करना जरूरी है।

मिज़ोरम की नदियों के सामने प्रमुख चुनौतियां

बाढ़ और नदी तट कटाव

मिज़ोरम में भारी बारिश के दौरान नदियों और पहाड़ी जलधाराओं का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। इससे नदी किनारे के खेतों, मकानों और सड़कों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है।

राज्य की आपदा प्रबंधन योजना 2021 के अनुसार मिज़ोरम में लगभग 37.25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र बाढ़ संभावित है। यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 0.17 प्रतिशत है।

मात, छिमतुइपुई, त्लावंग, तुत, तेइरेई, तुइरियल और तुइवावल जैसी नदियों के किनारे भारी बारिश के दौरान बाढ़ और मिट्टी के कटाव का खतरा रहता है।

मिट्टी का कटाव और गाद

मिज़ोरम में तेज ढलान और भारी बारिश के कारण पहाड़ियों की मिट्टी बहकर नदियों में पहुंचती है। जंगलों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव से कुछ क्षेत्रों में मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है।

बारिश के पानी के साथ बहकर आने वाली मिट्टी नदियों और जलाशयों में गाद के रूप में जमा हो सकती है। इससे जलाशयों में पानी जमा करने की क्षमता घट सकती है। गाद का जमाव नदी के बहाव और सिंचाई व्यवस्था पर भी असर डाल सकता है।

भूस्खलन और नदी प्रवाह

मिज़ोरम में भारी बारिश के दौरान पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन होता है। इससे मिट्टी, पत्थर और मलबा नदियों तक पहुंच सकता है। कई बार यह मलबा नदियों और जलधाराओं का रास्ता रोक देता है। इससे पानी जमा हो सकता है और अचानक तेज बहाव का खतरा बढ़ सकता है। ऐसे इलाकों में नदी के साथ पहाड़ी ढलानों की निगरानी भी जरूरी है।

नदी प्रदूषण

मिज़ोरम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिसंबर 2024 में आइज़ोल की चिते लुई, तुइकुआल लुई और लाविबुआल लुई जलधाराओं में सफाई अभियान चलाया था। बोर्ड के अनुसार इन जलधाराओं में कचरा फेंके जाने से प्रदूषण की समस्या थी।

ये जलधाराएं त्लावंग नदी से जुड़ी हैं, जो आइज़ोल की पेयजल आपूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत है। ऐसे में छोटी जलधाराओं में पहुंचने वाला कचरा बड़ी नदियों की जल गुणवत्ता के लिए भी खतरा बन सकता है।

पेयजल की उपलब्धता 

मिज़ोरम में अधिक बारिश होने के बावजूद सभी बस्तियों तक नियमित पेयजल पहुंचाना आसान नहीं है। कई गांव पहाड़ियों पर बसे हैं, जबकि नदियां नीचे घाटियों में बहती हैं।

बारिश और गर्मी के महीनों में पानी की उपलब्धता अलग-अलग होती है। इसलिए जलापूर्ति की बेहतर व्यवस्था और प्राकृतिक जलस्रोतों का संरक्षण जरूरी है।

नदी तट का कटाव

भारी बारिश के समय नदियों का तेज प्रवाह किनारों की मिट्टी को काट सकता है। इससे नदी किनारे के खेतों, सड़कों और बस्तियों को नुकसान हो सकता है।

राज्य की आपदा प्रबंधन योजना में कई प्रमुख नदियों की घाटियों में नदी तट कटाव को समस्या के रूप में दर्ज किया गया है। इसलिए संवेदनशील क्षेत्रों में नदी तट संरक्षण और नदी प्रवाह की निगरानी जरूरी है।

मिज़ोरम में नदी प्रबंधन की प्रमुख पहलें

मिज़ोरम में नदियों और जलस्रोतों के संरक्षण के लिए कई योजनाएं चल रही हैं। इनके तहत जलग्रहण क्षेत्रों का विकास, मिट्टी और पानी का संरक्षण, सिंचाई सुविधाओं में सुधार और पानी की गुणवत्ता की निगरानी जैसे काम किए जाते हैं। इनमें केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं शामिल हैं।

मिज़ोरम सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड 121 केंद्रों पर पानी की गुणवत्ता की निगरानी कर रहा था। इनमें नदियों के साथ अन्य जलस्रोतों की निगरानी भी शामिल थी। त्लावंग और तुइरियल जैसी नदियां भी इस कार्यक्रम का हिस्सा थीं।

राज्य की जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना में जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण, सिंचाई और जलस्रोतों को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया है। सियाहा जिले में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत मिट्टी और जल संरक्षण के साथ प्राकृतिक जलस्रोतों की स्थिति सुधारने के काम भी शामिल हैं।

बेहतर नदी प्रबंधन के लिए आगे क्या जरूरी है?

मिज़ोरम की नदियों के संरक्षण के लिए उनके जलग्रहण क्षेत्रों में भी काम करना जरूरी है। पहाड़ियों में मिट्टी का कटाव रोकने, भूस्खलन वाले इलाकों की निगरानी करने और प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने से नदियों में गाद और मलबे की समस्या कम हो सकती है।

शहरी क्षेत्रों में कचरे और गंदे पानी को नदियों तक पहुंचने से रोकना भी जरूरी है। इसके लिए छोटी जलधाराओं की नियमित सफाई और पानी की गुणवत्ता की जांच होनी चाहिए।

मिज़ोरम की कई नदियां आगे असम, बांग्लादेश और म्यांमार की नदी प्रणालियों से जुड़ती हैं। इसलिए इनके संरक्षण के लिए राज्य की सीमाओं के बाहर बहने वाले हिस्सों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। नदियों की बेहतर देखभाल से खेती, पेयजल और स्थानीय आजीविका के लिए पानी के स्रोतों को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।

प्रमुख प्रामाणिक स्रोत

  • मिज़ोरम सरकार – राज्य की भौगोलिक स्थिति और प्रमुख नदियां

  • मिज़ोरम सरकार – State of Environment Report 2016

  • मिज़ोरम सरकार – Statistical Handbook 2010

  • मिज़ोरम विश्वविद्यालय – Geographic, Volume 17, 2022

  • मिज़ोरम सरकार – State Disaster Management Plan 2021

  • मिज़ोरम सरकार – Economic Survey 2024–25

  • मिज़ोरम सरकार – State Action Plan on Climate Change up to 2030

  • मिज़ोरम सरकार – जलग्रहण क्षेत्र विकास कार्यक्रम

  • भारत सरकार – तुइरियल जलविद्युत परियोजना

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