कुमाऊं की झीलें साफ दिखती हैं, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों में इनके पानी में माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी दर्ज की गई है। 

कुमाऊं की झीलें साफ दिखती हैं, लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों में इनके पानी में माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी दर्ज की गई है। 

चित्र: https://m.jagran.com

पहाड़ों का पानी अब शुद्ध नहीं? कुमाऊं की झीलों तक पहुंचा माइक्रोप्लास्टिक का प्रदूषण

नैनीताल, भीमताल और गरुड़ ताल जैसी कुमाऊं की झीलों में हाल के अध्ययनों ने माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी दर्ज की है। यह स्थिति संकेत देती है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब हिमालयी ताजे जल स्रोतों तक भी पहुंच चुका है, जो पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए नई चिंता का विषय है।
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उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की नैनीताल, भीमटल और गरुड़ ताल केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं। ये झीलें हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और आसपास के समुदायों के लिए पेयजल, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का स्रोत रही हैं।

हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों में इन झीलों के पानी में माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी दर्ज की गई है, जो एक नया और लगभग अदृश्य पर्यावरणीय जोखिम बनकर सामने आया है।

माइक्रोप्लास्टिक के लगातार और अंधाधुंध इस्तेमाल का परिणाम यह हुआ है कि ये कण अब समुद्रों से लेकर नदियों और झीलों तक पहुंच चुके हैं। हिमालय जैसी अपेक्षाकृत साफ़ और संवेदनशील मानी जाने वाली पारिस्थितिक प्रणालियों में इनका मिलना इस बात का संकेत है कि प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या दूर स्थित पहाड़ी क्षेत्रों तक भी फैल चुकी है।

क्यों है माइक्रोप्लास्टिक इतना ख़तरनाक

माइक्रोप्लास्टिक वे सूक्ष्म प्लास्टिक कण हैं जिनका आकार आम तौर पर 5 माइक्रोमीटर से भी कम होता है। ये अलग से भी निर्मित हो सकते हैं (जैसे कॉस्मेटिक माइक्रोबीड्स) या बड़े प्लास्टिक कचरे के टूटकर निकलने से बनने वाले छोटे टुकड़े हो सकते हैं। इन कणों का आकार इतना छोटा होता है कि वे पानी, ठहरे हुए पानी में पनपने वाले जलीय जीव, खानपान की श्रृंखला और अंततः मनुष्यों तक पहुंच सकते हैं।

वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि भारत के झील, नदियां और ताजे जल स्रोत माइक्रोप्लास्टिक से गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। जहां इनके स्रोत में घरेलू अपशिष्ट, औद्योगिक कचरा, सीवेज आउटफ्लो, कृषि बहाव और वायु प्रदूषण के कण शामिल हैं। 

एक व्यापक समीक्षा में बताया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति ताजे पानी के पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरे का संकेत है। ये कण न केवल प्लास्टिक के विशुद्ध रूप में मौजूद रह सकते हैं, बल्कि भारी धातु, पीसीबी जैसे टॉक्सिक रसायनों को भी अपने साथ बांध सकते हैं, जिससे उनका प्रभाव और जटिल हो जाता है।

ऐसा नहीं है कि माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण का यह ख़तरा केवल कुमाऊं क्षेत्र के झीलों और जल-स्रोतों तक ही सीमित है। दक्षिण भारत की वेल्लयानी झील पर किए गए एक अध्ययन में ताजे पानी के नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक के कण पाए गए हैं।

माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति ताजे पानी के पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरे का संकेत है। ये कण न केवल प्लास्टिक के विशुद्ध रूप में मौजूद रह सकते हैं, बल्कि भारी धातु, पीसीबी जैसे टॉक्सिक रसायनों को भी अपने साथ बांध सकते हैं, जिससे उनका प्रभाव और जटिल हो जाता है।

शोधकर्ताओं को इस झील के पानी में हाई डेंसिटी पॉलीएथिलीन (HDPE), लो डेंसिटी पॉलीएथिलीन (LDPE), पॉलीप्रोपाइलीन (PP) और पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) जैसे प्लास्टिक पॉलीमर पाए जाने के संकेत मिले। इनकी मात्रा मौसम और मानव गतिविधियों के अनुसार लगभग 20 से 100 कण प्रति घन मीटर तक पाई गई। 

अध्ययन यह भी संकेत देता है कि बारिश के दौरान बहकर आने वाले शहरी अपशिष्ट, घरेलू कचरा और सतही बहाव झीलों में माइक्रोप्लास्टिक के स्तर को बढ़ा सकते हैं।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

माइक्रोप्लास्टिक केवल पानी की सतह पर तैरते नहीं रहते। बल्कि जलजीव के खानपान की श्रृंखला में भी प्रवेश कर जाते हैं। नतीजतन कई बार भोजन के माध्यम से जलीय जीवों के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इन छोटे-छोटे कणों के कारण:

  • फाइटोप्लांकटन और सूक्ष्मजीवों की वृद्धि और प्रकाश संश्लेषण क्षमता प्रभावित हो सकती है, जिससे खाद्य जाल और जैविक उत्पादकता में गिरावट आ सकती है। 

  • मछलियों और अन्य जलीय जीवों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक जमा हो सकते हैं, जिससे उनके पोषण, विकास और प्रजनन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

शोध में यह भी सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक पारिस्थितिक तंत्र में जैव सांद्रण (समय के साथ जीवों के शरीर में हानिकारक पदार्थों का जमा होना) और पारगम्यता (शरीर के अंदर चीज़ों के आने-जाने की प्राकृतिक प्रक्रिया) को बदल सकता है। यह प्रभाव केवल ऊपरी जलस्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि तलछट और जलीय जीवों में भी जमा हो सकता है।

<div class="paragraphs"><p>बढ़ता पर्यटन और शहरी गतिविधियां झीलों में प्लास्टिक कचरे के दबाव को बढ़ा सकती हैं। </p></div>

बढ़ता पर्यटन और शहरी गतिविधियां झीलों में प्लास्टिक कचरे के दबाव को बढ़ा सकती हैं।

चित्र: हिंदुस्तान टाइम्स

मानव स्वास्थ्य पर संभावित खतरे

हालांकि ताजे पानी में माइक्रोप्लास्टिक के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव से जुड़े प्रारंभिक अध्ययन और विश्लेषण बताते हैं कि: 

  • ये कण जीवों के शरीर के ऊतकों में जमा हो सकते हैं और खाद्य श्रृंखला (यहां पर पानी के माध्‍यम से माइक्रोप्लास्टिक मछलियों के शरीर में जाती है और फिर उसे खाने पर मनुष्‍य के शरीर में) के माध्यम से आख़िरकार मनुष्यों तक पहुंच सकते हैं।

  • अध्ययनों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी मानव शरीर में भी पाई गई है, जिनके कारण ऑक्सीडेटिव तनाव, सूजन और संभावित स्वास्थ्य बदलाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

माइक्रोप्लास्टिक ऐसे प्रदूषक हैं
जो पर्यावरण में बहुत लंबे समय तक बने रहते हैं। इनके बहुत छोटे होने के कारण जलीय जीव इन्हें आसानी से निगल लेते हैं और इस तरह ये भोजन श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं।

तीनों झीलों में माइक्रोप्लास्टिक का विस्तार

नेचर पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र के तीन झील यानी नैनीताल झील, भीमताल झील और गरुड़ताल झील में क्रमशः 200-1300 items/m³, 60-960 items/m³ और 40-320 items/m³ में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति पाई गई है। दरअसल प्रदूषण स्तर में यह अंतर मुख्यतः जनसंख्या घनत्व और पर्यटन-मानव गतिविधियों से आता है।

जोखिम और इको-इफेक्ट: इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन झीलों का पोल्युशन लोड इंडेक्स (PLI) दर्शाता है कि प्रदूषण स्तर गंभीर नहीं लेकिन चिंता का विषय है। इतना ही नहीं, पॉलीमर हजार्ड इंडेक्स (PHI) के ऊंचे आंकड़े यह संकेत देते हैं कि इकोसिस्टम पर जोखिम बढ़ रहा है क्योंकि अधिकांश माइक्रोप्लास्टिक फाइबर पॉलीएस्टर से बने होते हैं।

ताजे पानी के स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति संकेत देती है
कि पानी में प्लास्टिक प्रदूषण सिर्फ समुद्रों तक सीमित नहीं है, यह हमारी झीलों, नदियों और गुरुत्वाकर्षण वाली जगहों तक फैल चुका है।

पानी में रहने वाले जीवों के लिए ये फाइबर अधिक खतरनाक होते हैं क्योंकि वे खाने में जाने पर भोजन श्रृंखला में फैल सकते हैं। हालांकि, जल-स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति का यह ख़तरा केवल कुमाऊं की झीलों तक ही सीमित नहीं है। बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी हालत कमोबेश यही है।

अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि श्रीनगर के डल झील जैसी भारत की अन्य झीलों में भी माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति दर्ज की गई है, जहां फाइबर, PE, PP जैसे प्लास्टिक शामिल हैं।

इसके अलावा मणिपुर के लोकतक झील में मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति पाई गई है, जो आहार श्रृंखला में मानव जोखिम को बढ़ाती है।

झीलों तक कैसे पहुंच रहा है माइक्रोप्लास्टिक

  • कुमाऊं की झीलों में माइक्रोप्लास्टिक के बढ़ने का एक प्रमुख कारण बढ़ती मानव गतिविधियाँ और पर्यटन दबाव माना जा रहा है।

  • अध्ययन बताते हैं कि जिन झीलों के आसपास पर्यटन, शहरीकरण और आबादी अधिक है, वहां माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा भी अधिक पाई जाती है।

  • घरेलू प्लास्टिक कचरा, पैकेजिंग सामग्री और पर्यटन से उत्पन्न अपशिष्ट झीलों में माइक्रोप्लास्टिक के प्रमुख स्रोत बन सकते हैं।

  • सतही बहाव (runoff) और बारिश के दौरान बहकर आने वाला कचरा भी झीलों में सूक्ष्म प्लास्टिक कण पहुंचा सकता है।

  • सिंथेटिक कपड़ों से निकलने वाले सूक्ष्म रेशे (microfibres) सीवेज के माध्यम से जल स्रोतों में पहुंच सकते हैं।

  • कई मामलों में अपशिष्ट जल शोधन संयंत्र (sewage treatment plants) भी इन सूक्ष्म कणों को पूरी तरह रोक नहीं पाते।

  • पहाड़ी झीलें अक्सर जल प्रणाली आधी खुली और आधी बंद होती हैं, इसलिए इनमें पहुंचे माइक्रोप्लास्टिक लंबे समय तक पानी और तलछट में बने रह सकते हैं।

  • कुछ मामलों में स्थानीय ठोस कचरा प्रबंधन की सीमाएं भी इस समस्या को बढ़ाती हैं। वेबसाइट नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार नैनीताल शहर से रोज़ाना लगभग 22-28 टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है, और इसका कुछ हिस्सा वर्षा के दौरान बहकर झील में पहुंच सकता है।

पानी, तलछट और जलीय जीवों में माइक्रोप्लास्टिक की नियमित वैज्ञानिक निगरानी से प्रदूषण के स्तर और स्रोतों की पहचान संभव हो सकती है।

समाधान: नीति, निगरानी और जागरूकता

विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी झीलों में बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए नीति, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय भागीदारी, तीनों स्तरों पर समन्वित कदम उठाने की आवश्यकता है।

  • झील-आधारित निगरानी: पानी, तलछट और जलीय जीवों में माइक्रोप्लास्टिक की नियमित वैज्ञानिक निगरानी से प्रदूषण के स्तर और स्रोतों की पहचान संभव हो सकती है।

  • स्थानीय कचरा प्रबंधन: नैनीताल जैसे पर्यटन शहरों में बेहतर ठोस कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक संग्रह व्यवस्था झीलों में कचरे के बहाव को कम कर सकती है। स्थानीय समुदाय, स्वयंसेवी समूह और झील संरक्षण समितियां सफाई अभियान, निगरानी और जागरूकता प्रयासों को अधिक प्रभावी बना सकती हैं।

  • पर्यटन प्रबंधन: नैनीताल और भीमताल झीलों जैसी जगहों पर सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर नियंत्रण और कचरा प्रबंधन से पर्यटन जनित प्रदूषण घटाया जा सकता है।

  • सरकार और संस्थानों की भागीदारी: राष्ट्रीय प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट नीति और नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा जैसी जल-संरक्षण परियोजनाओं में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण को स्पष्ट रूप से शामिल करना।

  • तकनीकी और सामाजिक उपाय: वॉशिंग मशीन फिल्टर, बेहतर सीवेज उपचार प्रणाली और प्लास्टिक बैग पर प्रतिबंध आदि को लागू करना।

कुमाऊं की झीलों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी यह संकेत देती है कि पहाड़ी जल स्रोत भी अब वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण से अछूते नहीं रहे हैं। यदि समय रहते निगरानी, कचरा प्रबंधन और समुदाय आधारित पहलें मजबूत की जाएं, तो इन झीलों की पारिस्थितिक सेहत को बचाया जा सकता है। अन्यथा, ये सूक्ष्म कण धीरे-धीरे झीलों की जल गुणवत्ता, जैव विविधता और उन पर निर्भर समुदायों के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।

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