कभी बुंदेलखंड की जीवन रेखा के रूप में जानी जाने वाली पहूज नदी प्रदूषण और अतिक्रमण की मार से नाले जैसी दिखने लगी है। 

कभी बुंदेलखंड की जीवन रेखा के रूप में जानी जाने वाली पहूज नदी प्रदूषण और अतिक्रमण की मार से नाले जैसी दिखने लगी है। 

फोटो : विकी कॉमंस

बुंदेलखंड की पहूज नदी पर अतिक्रमण और प्रदूषण पर NGT ने केंद्र व UP,MP सरकार को दिया नोटिस

नदी के प्राकृतिक जलमार्गों को अवरुद्ध किए जाने पर ट्रिब्‍यूनल का सख्‍त रुख, सरकार से मांगा हलफनामे पर जवाब
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  • बुंदेलखंड की जीवन रेखा के रूप में भी जानी जाती है पहूज नदी। 

  • पहूज नदी को प्राचीन ग्रंथों में “पुष्पावती” के नाम से भी उल्लेखित किया गया है।

  • स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस नदी के जल में औषधीय गुण पाए जाते हैं, जिससे चर्म रोगों में लाभ होता है।  

बुंदेलखंड क्षेत्र की महत्वपूर्ण नदी पहूज नदी पर अतिक्रमण, अवैध निर्माण, प्रदूषण और प्राकृतिक जलमार्गों को अवरुद्ध किए जाने पर राष्ट्रीय हरित न्‍यायाधिकरण (NGT) ने सख्‍ती दिखाई है। इससे जुड़े एक मामले में NGT की नई दिल्ली स्थित प्रधान पीठ ने केंद्र और उत्‍तर प्रदेश व मध्‍य प्रदेश की राज्‍य सरकारों (प्रतिवादियों) को नोटिस जारी किया है। सरकारों से मामले की अगली सुनवाई से पहले हलफनामे के साथ जवाब दाखिल करने को कहा गया है। 

पाहूज नदी की दुर्दशा से जुड़ा यह मामला मूल आवेदन संख्या 323/2026 के रूप में दर्ज किया गया है, जिसकी सुनवाई 25 मई 2026 को हुई। मामले की सुनवाई एनजीटी की प्रधान पीठ के न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव (अध्यक्ष) एवं डॉ। अफरोज अहमद (विशेषज्ञ सदस्य) द्वारा की गई। मामले के याचिकाकर्ताओं में केसर सिंह, नरेन्द्र कुशवाहा, पंकज रावत, प्रवीण कुमार पाण्डेय, चंदन एन। सिंह तथा ओम प्रकाश शामिल हैं। मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त 2026 को होनी है। नदी तंत्र और पर्यावरण संरक्षण के संरक्षण से जुड़े इस मामले पर अब क्षेत्र के लोगों और पर्यावरणविदों की निगाहें टिकी हुई हैं।

क्‍या है मामला ?

याचिका में कोर्ट को बताया गया कि मध्य प्रदेश के दतिया जनपद स्थित उनाव क्षेत्र में पहूज नदी एवं उसके डूब क्षेत्र की भूमि पर स्थानीय प्रशासन द्वारा नियमविरुद्ध कंक्रीट निर्माण कार्य कराया जा रहा है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार यह निर्माण नदी के प्राकृतिक प्रवाह, बाढ़ क्षेत्र एवं पारिस्थितिक संतुलन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है।

इसके अलावा याचिका में मध्य प्रदेश के दतिया जनपद स्थित उनाव, भांडेर और उत्तर प्रदेश के झांसी एवं जालौन जिलों के लहरगिर्द, नयागांव, सिमरधा, पोहरा, धमना, पण्डोखर एवं नदीगांव आदि गांवों में राजस्व अभिलेखों में “नाला” के रूप में दर्ज प्राकृतिक जलमार्गों एवं पहूज नदी के फीडर चैनलों पर अतिक्रमण कर अवैध निर्माण किए जाने का आरोप लगाया गया है। 

याचिका में कहा गया है कि ये प्राकृतिक नाले और फीडर चैनल पहूज नदी के भूजल पुनर्भरण, वर्षाजल निकासी तथा पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, पर वर्तमान में इनमें सीवेज और गंदे नालों का दूषित पानी छोड़ा जा रहा है। इससे वर्षाजल का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, जलभराव की समस्या उत्पन्न हो रही है तथा प्रदूषित जल सीधे पहूज नदी में पहुंच कर नदी की जल गुणवत्ता एवं जलीय पारिस्थितिकी को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।

याचिका में कहा गया है कि नदी क्षेत्र में किए जा रहे अवैध कंक्रीटीकरण, निर्माण कार्य एवं प्राकृतिक जलधारा में हस्तक्षेप से न केवल नदी का प्राकृतिक स्वरूप नष्ट हो रहा है, बल्कि इसकी पारंपरिक धार्मिक, सांस्कृतिक एवं औषधीय महत्ता पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। 

याचिका में पहूज नदी के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को यह भी बताया कि दतिया के उनाव स्थित पहूज नदी क्षेत्र का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व अत्यंत प्राचीन है। दतिया जिले के प्रसिद्ध उनाव बालाजी धाम में आने वाले श्रद्धालु परंपरागत रूप से स्नान करने के पश्चात भगवान सूर्य बालाजी को जल अर्पित करते हैं। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इस नदी के जल में औषधीय गुण पाए जाते हैं, जिससे चर्म रोगों में लाभ होता है। 

सुनवाई के दौरान आवेदकों की ओर से नदी तल में चल रहे कथित अवैध निर्माणों एवं प्रदूषण संबंधी फोटोग्राफ्स भी अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत किए गए। इन तस्वीरों के आधार पर आवेदकों ने आरोप लगाया कि नदी के प्राकृतिक स्वरूप में व्यापक बदलाव किए जा रहे हैं। इस पर अधिकरण ने केंद्र व उत्‍तर प्रदेश व मध्‍य प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वे अगली सुनवाई से पूर्व शपथपत्र सहित अपना जवाब दाखिल करें। मामले की अगली सुनवाई 17 अगस्त 2026 को निर्धारित की गई है।  

बुंदेलखंड की जीवन रेखा मानी जाती है पहूज नदी

पहूज नदी, जिसे प्राचीन ग्रंथों में “पुष्पावती” के नाम से भी उल्लेखित किया गया है। पहूज नदी (Pahuj River) मुख्य रूप से काली सिंध नदी (Kali Sindh River) की सहायक नदी है, जो खुद यमुना की सहायक नदी है। पहूज नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के शिवपुरी जनपद स्थित सुजावनी ग्राम के समीप होता है तथा यह लगभग 265 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के कई जनपदों से होकर बहती है और उत्‍तर प्रदेश के यह जालौन में यमुना से कुछ ही दूरी पर बहती काली सिंध नदी में समाहित हो जाती है, जोकि कुछ ही दूरी पर खुद यमुना में मिल जाती है। लगभग 3,648 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में विस्तृत यह पहूज नदी बुंदेलखंड क्षेत्र की जल सुरक्षा, भूजल पुनर्भरण एवं पर्यावरणीय संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस कारण इस नदी को बुंदेलखंड की जीवन रेखा के रूप में भी जाना जाता है।

<div class="paragraphs"><p>पहूज नदी किनारे से लगे क्षेत्रों जैसे सीप्रिबजर, नंदनपुरा आदि से नालों का गंदा अपशिष्ट नदी में धडल्ले से गिराया जा रहा है, जिससे नदी का जलीय जीवन लगभग मृत हो चुका है।</p></div>

पहूज नदी किनारे से लगे क्षेत्रों जैसे सीप्रिबजर, नंदनपुरा आदि से नालों का गंदा अपशिष्ट नदी में धडल्ले से गिराया जा रहा है, जिससे नदी का जलीय जीवन लगभग मृत हो चुका है।

फोटो : विकी कॉमंस 

पचनद में से एक है "पहूज"

बुंदेलखंड के झांसी से आगे बहते हुए पहूज नदी इटावा और जालौन जिलों की सीमा पर पहुंचती है। इस क्षेत्र को पचनद के नाम से जाना जाता है क्योंकि यहां यमुना, चंबल, काली सिंध और क्वारी नदियों का संगम होता है। पांच नदियों का यह अनूठा संगम अपने आप में अनूठा है। हालांकि आज के समय में प्रदूषण और अतिक्रमण जैसी मानवीय गतिविधियों के चलते यह पवित्र पचनद संगम अपने पुराने व्‍यापक स्‍वरूप को खोता जा रहा है। 

संगम के बाद यह पचनद जब आगे बहता है, तो लोग इसमें शवों को प्रवाहित कर देते हैं। इसके कारण खासतौर पर जालौन जिले के कंजौसा गांव के आसपास के इलाके में पचनद के आसपास सांस लेना भी दूभर हो जाता है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि नदी में शव प्रवाहित करने की परंपरा सदियों पुरानी रही है, लेकिन पहले नदी में मौजूद मगरमच्‍छ और अन्‍य मांसाहारी जलचर जीव शवों को खाकर खत्‍म कर दिया करते थे और बहता हुआ पानी खुद ब खुद साफ होता रहता था। 
बीते कुछ दशकों के दौरान जैसे-जैसे नदी का प्रवाह घटा और प्रदूषण के चलते जलीय जीवन समाप्त हुआ, वैसे-वैसे अब इन शवों का निस्तारण नहीं हो पता है। नतीजतन, अब पचनद में बहाए जाने वाले शव बहने या अपघटित होने के बजाय महीनों तक यहीं किनारों पर पड़े सड़ते और दुर्गंध फैलाते रहते हैं।

प्रदूषण और अतिक्रमण की मार से बिगड़ी हालत

कभी लाखों की आबादी के लिए स्वच्छ जल का स्त्रोत रही यह नदी आज गंभीर रूप से प्रदूषित है। इसके जल को पीना तो दूर बल्कि लोग इसे हाथ लगाने से भी डरते हैं कि कहीं किसी भयंकर रोग की चपेट में न आ जाये। 

आज नदी किनारे से लगे क्षेत्रों जैसे सीप्रिबजर, नंदनपुरा आदि से नालों का गंदा अपशिष्ट नदी में धडल्लें से गिराया जा रहा है, जिससे नदी का जलीय जीवन लगभग मृत हो चुका है। यहां तक कि नदी पर बने पुलों से नगरवासी बेरोकटोक नदी में कचरा डाल रहे हैं और प्रशासन इससे अनभिज्ञ बनकर बैठा है। प्रदेश के बहुत से बिजली संयंत्रों का कचरा भी पहूज नदी के हवाले किया जा रहा है, जिससे नदी प्रदूषण के कारण बदतर हालत में है। आज नदी की दोनों तरफ की जमीन पर लोगों ने अतिक्रमण करके कॉलोनियां विकसित कर ली हैं, जिससे नदी का प्राकृतिक वेग बेहद कम हुआ है। इसके अतिरिक्त नदी से अवैध रूप से की जा रही माइनिंग के चलते भी नदी के सूखने का सिलसिला जारी है। गर्मी के मौसम में यह नदी लगभग सूख ही जाती है।

अविरल गंगा योजना के तहत उमा भारती ने लिया था गोद

पहूज नदी के बारे में एक खास बात यह भी है कि बुंदेलखंड में इसके व्‍यापक महत्‍व के चलते 2014 में तत्‍कालीन केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने "अविरल गंगा योजना" तहत पहूज नदी को गोद लिया था। उन्होंने घोषणा की थी कि पहूज को प्रदूषण मुक्त बनाने के साथ साथ इसमें जल भराव की भी व्यवस्था की जाएगी।

इसी तरह पहूज नदी को स्वच्छ बनाने की दिशा में 40 करोड़ की एक परियोजना भी बनाई गयी थी, जो कागजों में ही कैद हो कर रह गई। इस कारण इस नदी को अभी तक जीवन नहीं दिया सका है और एक दशक से ज्‍यादा समय बीत जाने के बाद भी पहूज की दशा और उसके प्रदूषण में कोई सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। 

6 साल पहले नीति आयोग दे चुका है STP बनाने का सुझाव

पहूज को स्वच्छ बनाने के लिए नीति आयोग ने करीब छह साल पहले 2020 में विशेषज्ञों की एक टीम भेजकर नदी का निरीक्षण कराया था। इस निरीक्षण के आधार पर एक वृहद रिपोर्ट तैयार की गई। नीति आयोग की इस रिपोर्ट में सीपरी बाजार, नंदनपुरा में गिर रहे गंदे नालों पर सीवेज ट्रीटमेंट प्‍लांट यानी एसटीपी लगाने का सुझाव दिया गया था। लेकिन, इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है और नदी में प्रदूषण की न केवल हालत जस की तस बनी हुई है, बल्कि उसमें बढ़ोतरी भी हुई है।

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