अपने विशाल आकार के चलते अनंत सी नज़र आती है ओडिशा के तट पर स्थित चिल्का झील।
स्रोत : विकी कॉमंस
चिल्का झील के बिगड़ते पारिस्थितिक संतुलन को इस तरह बचाएगी ओडिशा सरकार
एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील के रूप में विश्व विख्यात ओडिशा की चिल्का झील कई प्रजातियों के विदेशी पक्षियों के प्रवास के लिए जानी जाती है। साथ ही यह अपनी व्यापक जैव-विविधता के चलते विशेष पर्यावरणीय महत्व भी रखती है। साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर आर्द्रभूमि (वेटलैंड) के रूप में एक वैश्विक पहचान रखती है। पर, हाल के वर्षों में प्रदूषण, गाद के जमाव (सिल्टेशन) जैसी समस्याओं के चलते इसका पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है।
झील के मुहाने पर बढ़ रही गाद के कारण झील और समुद्र के बीच प्राकृतिक जल विनिमय बाधित हो रहा है, जिससे झील की लवणता (सैलिनिटी) धीरे-धीरे कम हो रही है। झील की लवणता में यह असंतुलन उसकी समृद्ध जैव विविधता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। इसके कारण झील में रहने वाली मछलियों और अन्य जलीय जीवों पारिस्थितिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
इससे उनकी संख्या में कमी आने के साथ ही कई प्रजातियों में स्पष्ट बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं। इसे देखते हुए ओडिशा सरकार ने चिल्का झील के संरक्षण, जैव-विविधता के संवर्धन और आसपास के क्षेत्रों के संतुलित विकास के लिए एक बड़ी योजना की घोषणा की है। इस योजना के तहत 1500 से 2000 करोड़ रुपये की लागत से झील के पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के साथ-साथ इसे एक नया स्वरूप दिया जाएगा।
पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा के साथ झील को नया स्वरूप देने की तैयारी
झील के संरक्षण के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की जा रही है। हाल ही में इसे लेकर ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में राज्य के कानून, लोक निर्माण एवं आबकारी मंत्री पृथ्वीराज हरिचंदन की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई।
बैठक में चिलिका झील के सामने मौजूद पर्यावरणीय चुनौतियों, खासतौर पर गाद जमाव (सिल्टेशन) की समस्या और इसके समाधान के लिए ज़रूरी उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। बैठक के बाद मंत्री हरिचंदन ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के सहयोग से डीपीआर तैयार किया जा रहा है, जिससे झील के पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के साथ-साथ इसे एक नया स्वरूप दिया जा सके। योजना का काम चिल्का विकास प्राधिकरण (CDA) की देखरेख में होगा।
राज्य की सबसे बड़ी संरक्षण एवं पर्यटन योजना का दावा
मंत्री हरिचंदन ने कहा कि यह परियोजना झील के लिए कई तरह की आधुनिक अवसंरचनाओं (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के विकास के साथ ही प्राकृतिक और वैज्ञानिक तरीके से इसके पर्यावरणीय संरक्षण का काम करेगी। चिल्का झील के लिए शुरू की जा रही यह योजना राज्य के इतिहास की सबसे बड़ी संरक्षण एवं पर्यटन योजनाओं में से एक साबित होगी। योजना के तहत चिलिका झील के आसपास के क्षेत्रों का विकास करने के साथ ही झील से जुड़े जलमार्गों को अवरोध-मुक्त बना कर नौपरिवहन और पर्यटन सुविधाओं का विस्तार किया जाएगा।
बैठक में झील के बंद मुहाने की ड्रेजिंग कर गाद हटाने, झील की जल भंडारण क्षमता को बढ़ाने लिए खुदाई करके गहराई बढ़ानक, जैव विविधता के संरक्षण और चिल्का पर निर्भर समुदायों की आजीविका की रक्षा के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया। इस परियोजना से पर्यटन को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ स्थानीय मछुआरों की आजीविका में सुधार और जैव-विविधता संरक्षण को मजबूती मिलेगी। इन कामों के लिए केंद्र सरकार की जलीय पारिस्थितिकी संरक्षण की राष्ट्रीय योजना के अंतर्गत मिलने वाली राशि के का भी इस्तेमाल किया जाएगा। बैठक में वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन विभाग, चिल्का विकास प्राधिकरण और आईआईटी चेन्नई के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
यूनेस्को हेरिटेज साइट में शामिल चिल्का एशिया की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील होने के कारण ओडिशा आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है।
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हर साल जम रही 8 लाख टन गाद
साइंस जर्नल साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक चिल्का झील में महानदी जैसी बड़ी नदी समेत कुल 52 नदियां गिरती हैं। ये नदियां भारी मात्रा में गाद और तलछट झील में लाती हैं, जिससे उसका तल भर जाता है। वर्तमान में चिल्का झील की गहराई 0.38 मीटर से 6.20 मीटर के बीच है, लेकिन नदियों और नहरों से हर वर्ष लगभग 8 लाख टन गाद झील में जमा हो रही है, जिससे इसकी क्षमता प्रभावित हो रही है। झील के मुहाने पर गाद जमने से झील और समुद्र के बीच पानी के प्राकृतिक आदान-प्रदान में बाधा उत्पन्न हुई है।
समुद्र का पानी ठीक से झील में प्रवेश नहीं कर पा रहा है, जिससे इसके खारेपन पर असर पड़ रहा है और पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ रहा है। इस बाधा के कारण मछलियों और अन्य समुद्री जीवों की आबादी में काफी उतार-चढ़ाव आया है, जिससे झील की समृद्ध जैव विविधता को खतरा पैदा हो गया है। इसके अलावा झील के आस-पास के क्षेत्रों में भूमि उपयोग के पैटर्न में बदलाव से भी कटाव बढ़ता है, जिससे और अधिक गाद झील में आती है।
एनजीटी की सख्ती के बावज़ूद नहीं हुआ सुधार, प्रदूषण झेल रही चिल्का
प्रदूषण के कारण चिल्का झील जैसी जल विरासत जीवों और वनस्पतियों के सुरक्षित न रह जाने को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण यानी एनजीटी भी चिंता जता चुका है। प्राधिकरण ने नवंबर 2021 में इस मामले केंद्र सरकार के जल संसाधन विभाग से जवाब मांगा था, जिसके बाद विभाग के प्रधान सचिव ने 23 जिलों के कलेक्टरों को पत्र लिखकर 55 जल भंडारों की सफाई के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया था।
पत्र बालेश्वर, बरगढ़, भद्रक, बलांगीर, बौध, कटक, देवगढ़, ढेंकनाल, गजपति, गंजम, जगतसिंहपुर, जाजपुर, झारसुगुड़ा, कालाहांडी, कंधमाल, केंदुझार, खोरदा, मयूरभंज, रायगढ़, पुरी और सुंदरगढ़ के कलेक्टरों को लिखा गया था। राज्य सरकार को प्रदूषण रोकने के लिए एक कार्य योजना तैयार करने को भी कहा गया था। प्रधान सचिव अनु गर्ग ने अपने पत्र में कहा था कि चिल्का झील लंबे समय से प्रदूषित है। प्रदूषण का मुख्य कारण झींगा पालन है। इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जरूरत है। उन्होंने मुख्य अभियंता, कार्यकारी अभियंता को स्थिति पर नजर रखने का निर्देश दिया। साथ ही झील में प्रदूषण के कारणों, जल के स्रोत और उपयोग पर एक रिपोर्ट तैयार करने और आवश्यकतानुसार जलाशयों के नवीनीकरण के लिए कदम उठाने का भी निर्देश दिया था।
चिल्का झील में प्रदूषण का एक और बड़ा कारण गंगुआ नदी है जो अब एक नाला बन चुकी है। इस नाले में भुवनेश्वर के 10 बड़े नालों से आने वाला सीवर का पानी कचरे के साथ, बिना उपचार के गिरता है। और गंगुआ नदी आगे चलकर दया नदी में मिलती है। दया नदी उसी पानी को चिल्का झील तक ले जाती है।
नासा द्वारा सेटेलाइट से लिया गया चिल्का झील का विहंगम दृश्य, जिसमें समुद्र तट के पास स्थित झील लैगून के रूप मेंअपनी अलग ही रंगत में नज़र आती है।
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लैगून क्या होता है और क्यों खास है चिल्का का लैगून?
लैगून एक उथला जलक्षेत्र होता है, जो समुद्र से आंशिक रूप से अलग रहता है और आमतौर पर रेत की पट्टी, बालू-टीले या प्रवाल भित्तियों के जरिए समुद्र से अलग होता है। इसमें समुद्री खारे पानी और मीठे पानी दोनों का मिश्रण (Brackish water) होता है। नदियों, नालों और समुद्र के ज्वार-भाटे से जुड़े होने के कारण लैगून जैव विविधता के लिहाज़ से बेहद समृद्ध होते हैं और ये मछलियों, पक्षियों व अन्य जलीय जीवों के लिए प्राकृतिक नर्सरी का काम करते हैं।
चिल्का झील एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की लैगून झील है और भारत की सबसे महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों में गिनी जाती है। यह भारत के पूर्वी तट पर ओडिशा राज्य के पुरी, खोरधा और गंजाम जिलों में फैली हुई है। यह बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली दया नदी के मुहाने पर स्थित है। करीब 1,100 वर्ग किलोमीटर (420 वर्ग मील) से अधिक क्षेत्र में फैली हुई यह झील दुनिया की दूसरी सबसे बड़ा तटीय लैगून है, जो यह ओडिशा तट पर बंगाल की खाड़ी से जुड़ी हुई है। यहां मीठे पानी की नदियों तथा समुद्री पानी का अनोखा संगम देखने को मिलता है। चिल्का झील की लवणता क्षेत्र के अनुसार भिन्न होती है। जहां नदियां झील में मिलती हैं वहां मीठे पानी से लेकर समुद्र तटीय इलाके में ज्वारीय प्रवाह के कारण महासागरीय लवणता के स्तर तक होता है। यही मिश्रण चिल्का को अत्यंत उत्पादक पारिस्थितिकी तंत्र बनाता है। चिल्का न केवल लाखों प्रवासी पक्षियों का शीतकालीन आश्रय स्थल है, बल्कि यह स्थानीय मछुआरा समुदाय की आजीविका का भी आधार है।
इरावदी डॉल्फ़िन और प्रवासी पक्षियों का पसंदीदा आवास स्थल
चिल्का विकास प्राधिकरण (सीडीए) द्वारा 2018 फरवरी में किए गए वार्षिक निगरानी सर्वेक्षण के दौरान अधिकारियों ने झील में 155 इरावदी डॉल्फ़िन देखी गईं। इस समय झील में इनकी अनुमानित जनसंख्या 160 से 170 के बीच है। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत इन्हें अनुसूची-I के अंतर्गत रखा गया है।
झील के उन हिस्सों में इन शर्मीले स्तनधारियों की खोज, जहाँ वे पहले कभी नहीं देखे गए थे, ने वन्यजीव अधिकारियों को खुश कर दिया है। सीडीए के मुताबिक पहले डॉल्फ़िन मुख्य रूप से बाहरी नहर तक ही सीमित थीं और बाधाओं के कारण झील के पार जाने में असमर्थ थीं। अब डॉल्फ़िन ने मुख्य रूप से झील के दक्षिणी और मध्य क्षेत्रों में नए इलाकों में अपना बसेरा बना लिया है, जहां कभी अवैध मत्स्य पालन प्रणालियां मौजूद थीं। इसलिए इस पर्यावास विस्तार का श्रेय गिल नेट के उपयोग और घेरियों की उपस्थिति जैसी प्रवास बाधाओं को दूर करने को दिया जाता है।
सीडीए के इस सर्वेक्षण का उद्देश्य झील की प्रमुख प्रजाति की संख्या और विस्तार का मानचित्रण करना और स्थानीय रूप से घेरी के नाम से जानी जाने वाली बाड़े संस्कृति को हटाने के जलवैज्ञानिक प्रभावों का अध्ययन करना था।
चिल्का झील अपने खारे और मीठे पानी के अनूठे मिश्रण के कारण दर्ज़नों प्ररजातियों के प्रवासी पक्षियों के लिए एक प्रिय आश्रय व प्रजनन स्थल हैं। इनमें तस्वीर में दिखाई दे रहा पर्पल हेरॉन और सफे़द राजहंस प्रमुख हैं।
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अवैध तालाबों और जालों से झील के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान
चिल्का में अवैध मछली और झींगा पालन दो दशकों से अधिक समय से जारी है, जिसने लैगून के मध्य और दक्षिणी क्षेत्रों में और इसके बाहरी चैनल के साथ अत्यधिक उत्पादक किनारों को लगभग पूरी तरह से घेर लिया है। झील के तटों पर मछली और झींगा पालन के लिए अवैध रूप से सैकड़ों तालाब बनाए गए हैं।
इस तरह के अवैध तालाबों के कारण झील का पानी प्रदूषित हो जाता है और जल विज्ञान बुरी तरह प्रभावित होता है। साथ ही इससे झील में गाद तेजी से भर जाती है और झील की समुद्री घास भी गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है। इससे झील का पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाता है और मछलियों के प्रजनन के लिए उपयुक्त स्थान नष्ट हो जाते हैं।
इसके अलावा झील में मछली पकड़ने के लिए नायलॉन के जालों का इस्तेमाल भी झील के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बना हुए है। झील में इन जालों को अवैज्ञानिक तरीके से बिछाने से किशोर मछलियों के प्रवास मार्ग में बाधा उत्पन्न होती है और झील में गाद का जमाव भी बढ़ रहा है।
ये जाल या 'नेट बॉक्स' एक भूलभुलैया जैसी संरचना बनाते हैं जिसमें मछलियां आसानी से प्रवेश कर सकती हैं, लेकिन एक बार अंदर जाने के बाद, वे आसानी से बाहर नहीं निकल पातीं। इसी तरह झील के किनारों पर जाल से घेरेबंदी करके झींगा पालन के लिए बड़े-बड़े बाड़े भी बनाए गए हैं। इन जालों को हटाने के लिए सीडीए समय-समय पर अभियान चलाता है, जिससे इसमें कमी आई है। पर, सीडीए के पास स्वयं कोई नियामक शक्तियां नहीं होने के कारण इसे पूरी तरह से खत्म कर पाने में दिक्कते आती हैं।
गूगल अर्थ की मदद से निगरानी और अध्ययन
चिलिका झील मानवजनित गतिविधियों और प्रदूषण के कारण यह झील गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रही है। इस पर रोक लगाने व नियंत्रण के लिए झील की निरंतर सख्त निगरानी ज़रूरी है। पर निगरानी के पारंपरिक इन-सीटू तरीके अक्सर श्रमसाध्य और समय लेने वाले होते हैं। इसे देखते हुए गूगल अर्थ और स्पेक्ट्रल इंडेक्स का उपयोग करके झील के जल की गुणवत्ता निगरानी शुरू की गई।
इसी के आधार पर पर्यावरण विज्ञानियों ने अपनी रिपोर्ट में एक नया दृष्टिकोण पेश किया। यह अध्ययन भारत के पूर्वी तट पर स्थित चिलिका झील में जल गुणवत्ता की निगरानी के लिए एक नवीन दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसमें गूगल अर्थ इंजन (जीईई) और स्पेक्ट्रल इंडेक्स, जैसे कि नॉर्मलाइज़्ड डिफरेंस टर्बिडिटी इंडेक्स (एनडीटीआई), नॉर्मलाइज़्ड डिफरेंस क्लोरोफिल इंडेक्स (एनडीसीआई) और टोटल सस्पेंडेड सॉलिड्स (टीएसएस) का उपयोग किया गया है।
यह अध्ययन तैरते हुए शैवालों के प्रस्फुटन यानी एल्गल ब्लूम का प्रभावी ढंग से पता लगा सकता है, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान कर सकता है और समय के साथ पर्यावरणीय परिवर्तनों का निर्धारण कर सकता है। इस पद्धति में टर्बिडिटी, क्लोरोफिल-ए सांद्रता और सस्पेंडेड सेडिमेंट्स जैसे प्रमुख जल गुणवत्ता मापदंडों का आकलन करने के लिए मल्टी-टेम्पोरल सैटेलाइट इमेजरी और उन्नत स्पेक्ट्रल इंडेक्स का एकीकरण शामिल है।
झील में एनडीटीआई का मान 2019 से 2021 तक बढ़ा, और ऑटोमैटिक वॉटर एक्सट्रैक्शन इंडेक्स (एडब्ल्यूईआई) विधि द्वारा टीएसएस सांद्रता का अनुमान लगाया गया। मानचित्र और दृश्य प्रस्तुतिकरण जीआईएस सॉफ़्टवेयर का उपयोग करके पेश किए गए परिणाम चिलिका झील के सतत प्रबंधन के लिए आवश्यक सटीक और व्यापक जल गुणवत्ता आकलन प्रदान करने में इस दृष्टिकोण की प्रभावशीलता को दर्शाते हैं। इससे डेटा-आधारित जानकारियां जुटाने, झील के संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने और प्रदूषण के स्रोतों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
चिल्का झील का मानचित्र देख कर समझा जा सकता है कि किस प्रकार समुद्र का खारा पानी ज्वार आने पर झील में प्रवेश करता है।
स्रोत : चिल्का विकास प्राधिकरण
चिल्का झील की कुछ ख़ासियतें
चिल्का झील का आकार नाशपाती जैसा है। इसका क्षेत्रफल मौसम के साथ बदलता रहता है। मानसून में यह फैल जाती है और गर्मियों में सिकुड़ जाती है। यह झील ओडिशा की पारंपरिक मत्स्य संस्कृति और अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है।
चिल्का एशिया की उन गिनी-चुनी लैगून में शामिल है, जहाँ ज्वार-भाटा का प्रभाव साफ़ तौर पर देखा जा सकता है। समुद्र से जुड़े मुहानों के ज़रिये ज्वार के समय खारे पानी का झील में प्रवेश और भाटे के समय पानी का बाहर निकलना, इसके जलस्तर, लवणता और पोषक तत्वों के संतुलन को लगातार प्रभावित करता है। यही गतिशीलता चिल्का को एक सक्रिय और जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र बनाती है।
इसी कारण चिल्का झील में मीठे, खारे और समुद्री जल—तीनों तरह की प्रजातियाँ एक साथ पाई जाती हैं। नदियों से आने वाला मीठा पानी और समुद्र से जुड़ा खारा पानी मिलकर ऐसी परिस्थितियाँ बनाते हैं, जहाँ मछलियों, झींगों और केकड़ों की विविध प्रजातियाँ पनपती हैं। अब तक झील में 150 से अधिक मछली प्रजातियों की मौज़ूदगी दर्ज की जा चुकी है, जो इसे भारत की सबसे जैव-विविध आर्द्रभूमियों में शामिल करती हैं और स्थानीय मत्स्य समुदाय की आजीविका का मजबूत आधार बनाती हैं।
हर साल सर्दियों में यहां लाखों प्रवासी पक्षी साइबेरिया और मध्य एशिया से आते हैं। प्रवासी जलपक्षियों के झुंड कैस्पियन सागर, बैकाल झील, रूस के सुदूर क्षेत्रों, मंगोलिया, मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया, लद्दाख और हिमालय से यहाँ भोजन और प्रजनन के लिए आते हैं।
चिल्का के भीतर कई छोटे-छोटे द्वीप हैं, जिनमें नलबन द्वीप पक्षियों के लिए खास है। नालाबाना 15.53 वर्ग किलोमीटर में फैले विशाल कीचड़युक्त मैदानों वाला एक जलमग्न द्वीप है, दिसंबर से मई तक शुष्क मौसम के दौरान ही दिखाई देता है। यह द्वीप तीन लाख से अधिक जलपक्षियों को आकर्षित करता है और हज़ारों राजहंसों का आश्रय स्थल है।
सन 2000 के बाद समुद्र से नए मुहाने (न्यू माउथ) खोले जाने से चिल्का की सेहत में सुधार हुआ। इससे झील और बंगाल की खाड़ी के बीच पानी का आदान-प्रदान बेहतर हुआ। इससे झील में लवणता का संतुलन बहाल हुआ, जलीय वनस्पतियों की अत्यधिक बढ़ोतरी कम हुई और मछलियों व डॉल्फ़िन जैसी प्रजातियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनीं। नतीजतन चिल्का की पारिस्थितिक सेहत और जैव विविधता में स्पष्ट सुधार देखा गया।

