

मृतप्राय हो चुकी नदियों को प्रदूषण और अतिक्रमण मुक्त करने के अभियान चलाकर पुनर्जीवित किया जा सकता है।
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प्रदूषण, अतिक्रमण और अन्य कारणों से देशभर में कई नदियां मर चुकी हैं या मृतप्राय हो गई हैं। पितृपक्ष में इन सूखी हुई नदियों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करना हमारे पितरों को सच्चा तर्पण हो सकता है। पानी प्रकृति की ओर से सौंपी गई संपदा है। हमें इसे संकट में डालने के बजाय जल संपदा का संरक्षक बनना चाहिए। यह बात देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कही। वह राजधानी लखनऊ के राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में अखिल विश्व गायत्री परिवार की ओर से आयोजित प्रांतीय शिक्षक गरिमा कार्यशाला में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि हमारे पुरखे जिन नदियों के किनारे बसे और सैकड़ों-हजारों साल तक इन नदियों के सहारे रहे, उनमें से कई नदियां आज सूख गईं या विलुप्त होने के कगार पर पहुंचती जा रही हैं। नदियों को अतिक्रमण मुक्त और प्रदूषण मुक्त करने के अपने प्रयासों से हम इन मृतप्राय नदियों को पुनर्जीवित करने की कोशिशें कर रहे हैं। इन प्रयासों के जरिए हम एक तरह से पुरखों को पानी पिला रहे हैं, उनका तर्पण कर रहे हैं। इस समय पितृ पक्ष चल रहा है। इस मौके पर हमें इस बात को समझना चाहिए कि नदी, तालाब, पेड़ को बचाना केवल पर्यावरण का संरक्षण नहीं, बल्कि पितृ-ऋण चुकाने जैसा है। हमें आने वाली पीढ़ियों को कुछ उपहार देकर अपने जीवन को प्रकृति के उस चक्र से जुड़ना है जहां पानी से लेकर पर्यावरण तक सबकुछ सुरक्षित हो ।
उन्होंने कहा कि 2017 से अब तक हमने उत्तर प्रदेश में कई मरी हुई नदियों को जिंदा किया है। सरकार की ओर से किए गए प्रयासों से कई नदियां फिर बहने लगी हैं। इसके अलावा एक जिला-एक नदी योजना के तहत नदियों की दशा सुधारने का काम भी किया जा रहा है। यह हमारे लिए सिर्फ सरकारी योजना नहीं, बल्कि नदियों के प्रति हमारा एक संकल्प है। उन्होंने शिक्षकों से कहा कि शिक्षकों का काम सिर्फ पढ़ाना नहीं, बल्कि समाज को दिशा दिखाना भी है। उन्होंने पानी का उदाहरण देते हुए कहा कि शिक्षकों को अपने जीवन में पानी के पांच गुणों को अपनाना चाहिए। पानी के यह पांच अनुकरणीय गुण इस प्रकार हैं -
जल का स्वभाव होता है कि वह हमेशा नीचे की ओर बहता है। गंगा पहाड़ से नीचे, बावड़ी में नीचे। अहंकार ऊपर जाता है, जल नीचे। जल का यह गुण हमें बताता है कि जो झुकता है, विनम्र होता है, वह भरता है। तालाब झुका है, इसलिए भरा है। इसलिए शिक्षक के लिए विनम्र होना और नीचे की ओर बहना एक महत्वपूर्ण गुण है। जो शिक्षक विनम्र है और नीचे तक जाकर कमजोर से कमजोर को शिक्षित करता है, उसके पास बच्चे ख़ुद ही पहुंचते हैं।
जल का अपना कोई आकार नहीं होता। वह लोटे में लोटा, घड़े में घड़ा, हाथ में हाथ जैसा बन जाता है। सोना अपना आकार नहीं छोड़ता, जल छोड़ देता है। जल का यह दूसरा नियम बताता है कि उपयोगी वही है, जो जगह, स्थितियों या जरूरत के हिसाब से खुद को ढाल ले। बजाय इसके कि सबको एक आकार में ढालना चाहे। जल के इस गुण से शिक्षकों को समझना चाहिए कि हर बच्चा अलग घड़ा है, उसको उसी के आकार में ढल कर शिक्षित किया जा सकता है।
जल सबको अपने में घोल लेता है। नमक को, शक्कर को, यहां तककि जहर को भी। सबको अपना बना लेता है। इसके बावजूद वह खुद वैसा नहीं बनता। नदी में गंदा नाला भी मिलता है, नदी उसे भी नदी बना देती है। यही तीसरा नियम - बड़ा वही जो सबको खुद में समा ले। शिक्षक को पानी की ही तरह समावेशी होना चाहिए। उसके लिए - क्लास में कोई बच्चा कमजोर हो या तेज, सबको समा लेना व समकक्ष लाना ही गुरु धर्म है।
पानी का एक महत्वपूर्ण गुण भंवर बनाकर चीजों को अपनी ओर खींचने का होता है। नदी मोड़ पर भंवर बनाती है। इस भंवर से पानी में एक ऊर्जा बनती है। सीधा बहता जल धीमा पड़कर ठहर जाता है, जबकि भंवर वाला जल लंबी दूरी तक गतिशील बना रहता है। आरओ का धीमा जल भंवर यानि ऊर्जा खो देता है, इसलिए मरा हुआ सा होता है। प्रकृति का भी यही नियम है कि जीवन सीधी लाइन में नहीं, बल्कि अपने साथ भंवर बनाता हुआ चलता है। शिक्षक के लिए भी भंवर बनाने का गुण मत्वपूर्ण होता है कक्षा में सवाल पूछना, बातों को घुमाकर रोचक बनाना भंवर बनाने जैसा है, जो शिक्षा को जीवंत बनाता है। इससे बच्चों में सोच विकसित होती है। इसके विपरीत केवल रटने-रटाने पर जोर देना सीधी लाइन में चलने जैसा है, जो नीरसता और जड़ता पैदा करता है।
जल अपना रास्ता याद रखता है। मघा का जल साल भर याद रखता है कि वो कब बरसा था। बावड़ी का जल याद रखता है कि किसने उसे खोदा था। गंगाजल हजारों साल से याद रखता है कि उसे मंत्र सुनाए गए हैं। इसीलिए माना जाता है कि वेद, पुराण या ऐसे ग्रंथ जिनको कभी लिखा नहीं गया, सिर्फ उनको कंठस्थ किया गया यानी याद रखा गया। उनकी उत्पत्ति जल के इस गुण से ही हुई। यही कारण है कि प्रकृति का विधान उतना ही सरल और पवित्र है, जितना जल होता हैं । सोना, चाुंदी और धन जैसी दौलतों की कोई याददाश्त नहीं होती, लेकिन जल याद रखता है। जल का यह पांचवां गुण हमें बताता है कि धरोहर वही है, जो याद रखे। जो शिक्षक अपने गांव की सूखी नदी को याद रखे, वही आने वाली पीढ़ी को पानी पिला सकता है। मरती नदियों को फिर से जिलाना ही पितृ पक्ष का असली तर्पण है। पुरखों को पानी पिलाने का मतलब लोटे से जल चढ़ाना नहीं, उस नदी को जिंदा करना है जिसके किनारे पुरखे बसे थे। गोमती की कई सहायक नदियां, छोटी गंडक, नून, पीली नदी आज फिर बही है, यही पितरों का तर्पण है।
शिक्षक पानी के इन पांचों गुणों को खुद में आत्मसात करके बच्चों का भविष्य संवार सकते हैं। क्योंकि, बच्चा जब अपने शिक्षक से विनम्रता, समर्पण, करुणा, जीवंतता और लक्ष्य पर दृष्टि रखने के गुण सीखेगा तो उसका जीवन खुद ब खुद संवर जाएगा। सोने को अगर तिजोरी में रखा जाता है, तो वह किसी काम का नहीं रहता। आभूषण बनने पर या उपयोग में होने पर ही उसका महत्व होता है। जल की धरोहर भी इसी तरह इसी तरह होती है, जो गतिशील होने पर तरोताजा और जीवंत बनी रहती है। इसलिए पितृपक्ष में हमें नदियों की थमती रफ्तार को नई गति देकर उन्हें फिर से जीवंत बनाने का संकल्प लेना होगा। अपने पितरों के प्रति यही हमारा सच्चा तर्पण होगा।
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में कई छोटी, सूख चुकी या लगभग लुप्त हो चुकी नदियों को दोबारा प्रवाह में लाने के प्रयास हुए हैं। खासतौर पर 2024–26 में यह काम “एक जिला, एक नदी” योजना के तहत तेज हुआ है। हालांकि, सरकारी भाषा में “पुनर्जीवन” का अर्थ हर जगह नदी को पूरी तरह से उसकी पूरी पुरानी अवस्था में वापस लाना नहीं है। कई मामलों में जलधारा, नदी का पुराना रास्ता, कैचमेंट और बाढ़ क्षेत्र को ही बहाल किए जाने को पुनर्जीवन माना गया है।
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