पटना का जेपी गंगा पथ, जिसे आम बोलचाल में मरीन ड्राइव कहा जाता है, शहर के लिए तेज़ कनेक्टिविटी और आधुनिकता का प्रतीक बन चुका है।

पटना का जेपी गंगा पथ, जिसे आम बोलचाल में मरीन ड्राइव कहा जाता है, शहर के लिए तेज़ कनेक्टिविटी और आधुनिकता का प्रतीक बन चुका है।

चित्र: BSRDC

पटना मरीन ड्राइव: क्या गंगा के बाढ़क्षेत्र की कीमत पर हो रहा है विकास?

जेपी गंगा पथ ने पटना को तेज़ कनेक्टिविटी दी है, लेकिन क्या यह परियोजना गंगा के स्वाभाविक बाढ़क्षेत्र, भूजल पुनर्भरण और नदी-तंत्र की कीमत पर खड़ी हुई है? यह लेख विकास और जल-पर्यावरण के बीच संतुलन के कठिन सवाल उठाता है।
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शाम उतरते ही पटना के गंगा वाले इलाक़े की हवा में एक अलग तरह की चहल-पहल घुलने लगती है। गंगा किनारे बनी नई सड़क पर गाड़ियों की रोशनी लंबी लकीरों की तरह बहती है, और दूसरी ओर नदी अपने बचे-खुचे अस्तित्व के साथ उसी पुराने धीरज भरे स्वभाव में चुपचाप बहती रहती है। यह पटना शहर की नई पहचान के रूप में जानी जाती है जिसका नाम है मरीन ड्राइव।

लेकिन किसी भी नदी के किनारे जो चमकीली, फिसलती सड़क बनती और बनाई जाती है उसके नीचे एक बहुत ही खुरदरा सवाल मुंह बाए खड़ा रहा है। सवाल जो पूछता है कि क्या यह विकास नदी के स्वाभाविक जीवन-क्षेत्र की कीमत पर खड़ा है?

क्या है पटना का मरीन ड्राइव 

पटना का जेपी गंगा पथ, जिसे आम बोलचाल में मरीन ड्राइव कहा जाता है, शहर के लिए तेज़ कनेक्टिविटी और आधुनिकता का प्रतीक बन चुका है। बिहार राज्य सड़क विकास निगम लिमिटेड (BSRDCL) और राज्य सरकार के आधिकारिक बयानों के अनुसार, जेपी गंगा पथ परियोजना की लागत लगभग 3,800 करोड़ रुपये से भी ज़्यादा है। 20.5 किलोमीटर लंबी यह सड़क दीघा से दीदारगंज तक गंगा के दक्षिणी तट के समानांतर फैली है।

यातायात के लिहाज़ से देखा जाए तो यह परियोजना बेशक यहां के लोगों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आई है लेकिन जल-पर्यावरण के दृष्टिकोण से कई गंभीर सवाल अब भी जवाब के इंतज़ार में हैं।

सड़कें शहर को जोड़ती हैं, लेकिन नदियां शहर को बचाती हैं।

नदी का किनारा: सतह से भूजल तक एक जीवित तंत्र

गंगा का तट केवल वह जगह नहीं है जहां पानी बहता दिखाई देता है। नदी का एक बड़ा हिस्सा उसका बाढ़क्षेत्र (floodplain) होता है, जहां मानसून, ऊंचे जलस्तर और अतिरिक्त प्रवाह के समय नदी स्वाभाविक रूप से फैलती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से बाढ़क्षेत्र नदी का सक्रिय पारिस्थितिक विस्तार होता है। नदी केवल अपने दृश्य जल-मार्ग में नहीं रहती, बल्कि अपने किनारों, रेतीले तटों, आर्द्रभूमियों, मौसमी जलभराव क्षेत्रों और भूमिगत जलभृतों (aquifers) के साथ मिलकर एक जीवित तंत्र बनाती है। यही कारण है कि नदी-विज्ञान के विशेषज्ञ इसे नदी गलियारा (river corridor) या नदी-क्षेत्र (river space) के रूप में देखते हैं।

बाढ़-क्षेत्र कई महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है:

  • अतिरिक्त जल को अपने भीतर समाहित करता है

  • भूजल पुनर्भरण में मदद करता है

  • तलछट (sediment) के प्राकृतिक जमाव को संभव बनाता है

  • तटीय जैव विविधता को सहारा देता है

विशेषज्ञों के अनुसार, गंगा जैसी मैदानी नदियों में सतही जल और भूजल के बीच गहरा और निरंतर संबंध होता है। नदी के किनारे फैले बाढ़क्षेत्र और रेतीले जमाव पानी को जमीन में रिसने देते हैं, जिससे आसपास के जलभृतों का पुनर्भरण होता है।

नदी केवल अपने दृश्य जल-मार्ग में नहीं रहती, बल्कि अपने किनारों, रेतीले तटों, आर्द्रभूमियों, मौसमी जलभराव क्षेत्रों और भूमिगत जलभृतों (aquifers) के साथ मिलकर एक जीवित तंत्र बनाती है।

एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि गंगा के मैदानी हिस्सों में गर्मियों के दौरान नदी के प्रवाह का बड़ा हिस्सा भूजल से मिलने वाले बेसफ़्लो (baseflow) पर निर्भर करता है। अध्ययन के अनुसार पिछले दशकों में भूजल भंडारण में आई गिरावट से गर्मी के दिनों में नदी के प्रवाह में लगभग 59 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है।

इससे स्पष्ट होता है कि नदी का किनारा केवल सतही भूमि नहीं, बल्कि वह अदृश्य जल-भंडार भी है जो नदी के प्रवाह और शहर की दीर्घकालिक जल-सुरक्षा को बनाए रखता है। 

गंगा जैसी जलोढ़ नदियों में तलछट का परिवहन और उसका मौसमी जमाव नदी के मार्ग, तटरेखा और बाढ़क्षेत्र की संरचना को लगातार प्रभावित करता है। यही प्रक्रिया तटीय आर्द्रभूमि और रेतीले टापुओं के निर्माण की आधारशिला है।

तलछट, कटाव और नदी की बदलती भू-आकृति

गंगा एक जलोढ़ नदी प्रणाली (alluvial river system) का हिस्सा है। यानी यह अपने साथ लगातार हिमालय और मैदानी क्षेत्रों के तलछट भी लाती और जमा करती है। यही तलछट बाढ़-क्षेत्रों, रेतीले टापुओं, दलदली भूमि और खेती के लिए उपजाऊ ज़मीन का निर्माण करती है।

उत्तर बिहार की गंगा घाटी पर हुए भू-आकृतिक अध्ययनों से स्पष्ट है कि बाढ़क्षेत्र आर्द्रभूमि और तटीय भूमि का विकास इसी तलछट-आधारित प्रक्रिया से होता है।

जब नदी के किनारे रिवरफ़्रंट, इमारत आदि जैसे स्थायी मानव निर्मित ढांचे खड़े कर दिए जाते हैं, तो तलछट के प्राकृतिक फैलाव और जमाव का पैटर्न बदल सकता है। इससे कुछ हिस्सों में कटाव बढ़ता है, जबकि अन्य हिस्सों में असामान्य जमाव होने लगता है। यही कारण है कि नदी-वैज्ञानिक रिवरफ़्रंट विकास को केवल शहरी परियोजना नहीं, बल्कि भू-आकृतिक हस्तक्षेप (geomorphic intervention) मानते हैं।

हालिया हाइड्रो-बायो-जीयोमॉर्फिक शोध यह बताता है कि नदी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त पार्श्व स्थान (lateral space) बेहद ज़रूरी है। यानी वह चौड़ाई जिसमें बाढ़, तलछट और जैविक प्रक्रियाएं स्वाभाविक रूप से संचालित हो सकें।

आसान शब्दों में कहा जाए तो नदी को केवल बहने के लिए नहीं, फैलने, रिसने, जमा होने और पुनर्जीवित होने के लिए भी जगह चाहिए।

क्या मरीन ड्राइव ने गंगा के बाढ़क्षेत्र को संकरा किया है?

गंगा बेसिन के आधिकारिक जल-डेटा प्लेटफ़ॉर्म India-WRIS के अनुसार गंगा भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी घाटियों में से एक है, जिसकी बाढ़ प्रवृत्ति और तलछटी प्रकृति इसे विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है।

ऐसे में जब नदी के किनारे बड़े पैमाने पर सड़क, रिटेनिंग संरचनाएं और रिवरफ्रंट जैसी सुविधाएं विकसित की जाती हैं, तो यह केवल भूमि उपयोग का परिवर्तन नहीं होता बल्कि इससे नदी के पूरे व्यवहार में भी बदलाव आने की पूरी संभावना होती है।

मरीन-ड्राइव के निर्माण और गंगा के बाढ़क्षेत्र में आए संकुचन के एक दूसरे से जुड़े होने का सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है और इसे परियोजना के संदर्भ में गंभीरता से उठाया जाना चाहिए।

दरअसल, जेपी गंगा पथ का अधिकांश हिस्सा नदी के तट के बहुत निकट विकसित हुआ है। दीघा से कंगन घाट stretch तक कई खंडों में सड़क संरचना नदी की ओर बढ़ाकर विकसित की गई है, जिसके कारण बाढ़-क्षेत्र की चौड़ाई और मौसमी जल फैलाव के स्थानिक बदलाव के प्रश्न का महत्त्व बढ़ जाता है।

शहरी किनारों पर बढ़ते निर्माण नदी के प्राकृतिक फैलाव और ऊर्जा-वितरण की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

पटना के बाढ़क्षेत्र की ज़मीनी तस्वीर

2019 की गंगा बाढ़ पर आधारित रिमोट सेंसिंग अध्ययन यह संकेत देता है कि पटना जिला और इसके आसपास का गंगा बाढ़क्षेत्र अत्यंत सक्रिय और गतिशील है। इस वैज्ञानिक अध्ययन में अगस्त से अक्टूबर 2019 के बीच गंगा के बाढ़-फैलाव का विश्लेषण किया गया। इसमें यह स्पष्ट हुआ कि मानसून के दौरान नदी का जल कई हिस्सों में अपने सामान्य चैनल से बाहर फैलकर व्यापक बाढ़क्षेत्र में प्रवेश करता है। 

अध्ययन का फोकस पटना ज़िले के लगभग 6100 वर्ग किलोमीटर के फ्लूवियल परिदृश्य पर था, जो यह दिखाता है कि यह इलाका केवल नदी किनारा नहीं बल्कि एक सक्रिय बाढ़-मैदान है।

यही कारण है कि दीघा से कंगन घाट तक फैले जेपी गंगा पथ के संदर्भ में बाढ़क्षेत्र की चौड़ाई और उसके उपयोग में आए बदलाव को केवल शहरी विकास के रूप में नहीं देखा जा सकता। 

केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में यह बताया जाना भी महत्त्वपूर्ण है कि पटना में गंगा के बाढ़क्षेत्र पर अनधिकृत निर्माणों की पहचान के लिए geo-mapping exercise शुरू की गई है। यह तथ्य इस बहस को और गंभीर बनाता है कि नदी के तटीय क्षेत्र में स्थायी संरचनाओं का विस्तार किस सीमा तक नदी के स्वाभाविक फैलाव-क्षेत्र को प्रभावित कर रहा है।

इस तरह की तटीय सड़क परियोजनाओं का एक सामान्य प्रभाव यह होता है कि नदी के फैलाव का प्राकृतिक क्षेत्र सीमित हो जाता है। इसका असर कई स्तरों पर दिख सकता है:

बाढ़ के दौरान दबाव: जब नदी का फैलाव क्षेत्र कम होता है, तो उच्च जलस्तर के दौरान प्रवाह का दबाव अन्य किनारों और निचले इलाकों पर बढ़ सकता है।

तटीय अपरदन: नदी अपना मार्ग और किनारे समय-समय पर बदलती है। कृत्रिम किनारी संरचनाएं इस प्राकृतिक गतिशीलता को बाधित करती हैं, जिससे दूसरे हिस्सों में कटाव बढ़ सकता है।

भूजल पुनर्भरण: कंक्रीट और ठोस निर्माण वर्षाजल और नदी के रिसाव को जमीन में अवशोषित होने से रोकते हैं। पटना जैसे शहर में यह लंबी अवधि की जल-सुरक्षा का प्रश्न है।

निचले इलाक़ों के निवासियों की चिंता बार-बार सामने आई है कि जलस्तर बढ़ने पर सबसे पहले घाट, पहुंच मार्ग और आसपास की निचली सड़कें प्रभावित होती हैं।

ज़मीन की आवाज़ और विशेषज्ञों की चिंता

पटना के दीघा, गांधी घाट और कंगन घाट के आसपास रहने वाले लोगों के लिए गंगा का बढ़ता जलस्तर किसी अमूर्त पर्यावरणीय बहस का विषय नहीं, बल्कि हर मानसून का प्रत्यक्ष अनुभव है। 

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट में घाट किनारे रहने वाले लोगों और निचले इलाक़ों के निवासियों की चिंता बार-बार सामने आई है कि जलस्तर बढ़ने पर सबसे पहले घाट, पहुंच मार्ग और आसपास की निचली सड़कें प्रभावित होती हैं।

मानसून और शहर की जल-सुरक्षा

पिछले कई सालों में पटना ने शहरी जलभराव और मानसूनी संकट को कई बार झेला है। से हालात यह दिखाते हैं कि यह कॉरिडोर केवल यातायात का मार्ग नहीं, बल्कि शहर की बाढ़-प्रबंधन रणनीति से सीधे जुड़ा क्षेत्र है।

नदी-विज्ञान और बाढ़-जोखिम के विशेषज्ञ लंबे समय से यह रेखांकित करते रहे हैं कि गंगा जैसी जलोढ़ नदियों के बाढ़क्षेत्र को संकरा करना दीर्घकाल में जोखिम बढ़ा सकता है। 

साल 2025 में गंगा बेसिन के बढ़ते बाढ़-जोखिम पर प्रकाशित एक शोध-पत्र में यह स्पष्ट किया गया कि जलवायु परिवर्तन, तीव्र वर्षा और भू-आकृतिक हस्तक्षेप मिलकर बाढ़ की संवेदनशीलता को बढ़ा रहे हैं। विशेष रूप से शहरी किनारों पर बढ़ते निर्माण नदी के प्राकृतिक फैलाव और ऊर्जा-वितरण की क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं।

अगर इसी तरह नदी के प्राकृतिक बफर ज़ोन को लगातार संकुचित किया जाता रहा, तो भविष्य में अत्यधिक वर्षा की स्थिति में बाढ़ का जोखिम बढ़ सकता है।

विकास बनाम नदी-तंत्र: क्या यह द्वंद्व टाला जा सकता है?

समस्या विकास से नहीं है, बल्कि उस विकास के मॉडल से है जो नदी को केवल दृश्य पृष्ठभूमि मान लेता है।

पटना मरीन ड्राइव की सफलता को देखते हुए बिहार सरकार अब गंगा किनारे अन्य शहरों, विशेषकर मुंगेर और भागलपुर में भी इसी तरह के तीन और मरीन ड्राइव शैली कॉरिडोर विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 42 किमी लंबे नए गंगा पथ परियोजना के लिए सर्वेक्षण पूरा हो चुका है और इसकी अनुमानित लागत 5,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई गई है।

यही वह समय है जब नीतिगत-स्तर पर कुछ बुनियादी सवाल किए जाने चाहिए

  • क्या विस्तृत बाढ़क्षेत्र प्रभाव मूल्यांकन की रिपोर्ट सार्वजनिक है?

  • क्या इसके लिए स्वतंत्र हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग कराई गई है?

  • क्या 50-वर्षीय और 100-वर्षीय बाढ़ परिदृश्य की मॉडलिंग हुई है?

  • क्या संचयी प्रभाव अध्ययन (cumulative impact study) किया गया है?

  • क्या NGT / MoEFCC के दिशानिर्देशों का पालन हुआ? यानी शहर-दर-शहर नहीं बल्कि नदी के प्रवाह का अध्ययन घाटी-दर-घाटी करना ज़रूरी होगा क्योंकि एक शहर का रिवरफ़्रंट दूसरे शहर की बाढ़-गतिकी को प्रभावित कर सकता है।

इन सवालों के बिना नदी-तटीय विकास मॉडल दीर्घकाल में जल-संकट को गहरा कर सकता है।
यूं भी पटना के मामले में गंगा के बाढ़क्षेत्र पर अतिक्रमण का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और बाद में सुप्रीम कोर्ट तक गया है। केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि पटना में गंगा बाढ़क्षेत्र पर अनधिकृत निर्माणों की पहचान के लिए जीयो-मैपिंग प्रक्रिया (geo-mapping exercise) शुरू की गई है।

असली मुद्दा यह नहीं है कि नदी किनारे सड़क बननी चाहिए या नहीं बल्कि सवाल यह है कि क्या वह सड़क नदी से उसकी जगह छीनकर बनाई जाएगी, या नदी के साथ संवाद के बाद सामंजस्य स्थापित करके। क्योंकि शहर को सड़क चाहिए, लेकिन नदी को भी अपनी जगह चाहिए।

पटना का मरीन ड्राइव इस बात का प्रतीक है कि भारत के शहर अब नदियों की ओर लौट रहे हैं। लेकिन यह लौटना तभी सार्थक होगा जब नदी को एक जीवित बाढ़क्षेत्र पारिस्थितिकी के रूप में समझा जाए।

नदी को दृश्य नहीं, जीवित तंत्र की तरह देखना होगा

एक बार फिर से यह सोचना होगा कि गंगा किनारे शाम की चमकती रोशनी और तेज़ रफ्तार सड़क शहर के लिए गर्व का विषय हो सकती है। लेकिन नदी के अस्तित्व से जुड़ा वह सवाल अब भी अनुत्तरित ही है।

दरअसल नदियां केवल शहर को सुंदर बनाने के लिए नहीं होतीं। वे शहर को जीवित रखती हैं।

पटना का मरीन ड्राइव इस बात का प्रतीक है कि भारत के शहर अब नदियों की ओर लौट रहे हैं। लेकिन यह लौटना तभी सार्थक होगा जब नदी को एक जीवित बाढ़-क्षेत्र पारिस्थितिकी के रूप में समझा जाए। क्योंकि सड़कें शहर को जोड़ती हैं, लेकिन नदियां शहर को बचाती हैं।
भविष्य के नदी-तटीय विकास मॉडल में बाढ़क्षेत्र जॉनिंग और पारिस्थितिक वहन क्षमता (ecological carrying capacity) को मुख्य मानदंड बनाया जाना चाहिए।

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