अयोध्‍या में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरयू नदी में वाटर मेट्रो चलाने की योजना अपने शुरुआती परीक्षणों में नाकाम रहने के बाद ठंडे बस्‍ते में पड़ी हुई है। 

अयोध्‍या में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरयू नदी में वाटर मेट्रो चलाने की योजना अपने शुरुआती परीक्षणों में नाकाम रहने के बाद ठंडे बस्‍ते में पड़ी हुई है। 

फोटो : फेसबुक

अयोध्या में चलने से पहले ही 'वाटर मेट्रो' क्‍यों हुई फेल? परियोजना की नाकामी से उठ रहे गंभीर सवाल

पर्यटन विभाग और निजी कंपनियों ने संचालन से झाड़ा पल्‍ला। सरयू तट पर 'सफेद हाथी' बनकर खड़ी हुई हैं केरल से लाई गई 12 करोड़ की नौकाएं।
Published on
9 min read

अयोध्या में वाटर मेट्रो चलाने की योजना सरयू नदी में भारी गाद के जमाव और नदी के बदलते स्वरूप के कारण शुरुआती दौर में ही फेल हो गई। इसके साथ ही इस परियोजना पर करीब 12 करोड़ खर्च किए जाने को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। 

करीब दो साल पहले जनवरी 2024 में केरल के कोच्चि से अयोध्या लाई गई वाटर मेट्रो को सरयू नदी में अयोध्या से गुप्तारघाट तक लगभग 10 किमी वाटर मेट्रो के संचालन की भरपूर तैयारियां की गई थी। पूर्व नियोजित योजना के अंतर्गत कई चक्र सरयू नदी का सर्वे हुआ, चैनल तैयार किया गया। मेट्रो के संचालन के लिए गुप्तार घाट व अयोध्या के पुराने घाट पर चार्जिंग स्टेशन व जेटी की स्थापना की गई। 

अधिकारियों ने इन चीजों का निरीक्षण भी किया। इस सबके बावजूूद लगभग 12 करोड़ की लागत से बनी वाटर मेट्रो जब यहां पहुंची, तो उसे सरयू नदी में चला पाना संभव नहीं हो सका। ऐसे में अब यह वाटर मेट्रो 'सफेद हाथी' बनकर खड़ी हुई है। ऐसे में वाटर मेट्रो चलाने की योजना और उसकी तैयारियों सहित पूरी योजना के औचित्‍य पर ही गंभीर सवाल उठने लगे हैं, क्‍योंकि यह एक निर्णय अदूरदर्शी साबित हुआ है। 

क्‍यों और किसलिए शुरू हुआ वाटर मेट्रो प्रोजेक्‍ट ?

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद यहां तेजी से बढ़ते पर्यटन को देखते हुए केंद्र और राज्‍य सरकार की इसे विश्वस्तरीय धार्मिक-पर्यटन शहर के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षी योजना थी। सरयू में वाटर मेट्रो का संचालन शुरू करने का फैसला इसी के मद्देनज़र लिया गया था। वाटर मेट्रो को अयोध्या लाने का उद्देश्य पर्यटकों को अयोध्या से लेकर गुप्तारघाट तक नदी के सभी घाटों का दिखाना था और रामनगरी की महत्ता से पर्यटकों को परिचित कराना था। 

इसके लिए जनवरी 2024 में कोच्चि से लाई गई अत्याधुनिक इलेक्ट्रिक वाटर मेट्रो को अयोध्या की पहचान बनाने की कोशिश की गई, लेकिन करीब डेढ़ साल बाद भी यह नियमित रूप से संचालित नहीं हो सकी। वाटर मेट्रो के रूप में चलाने के लिए करीब 12 करोड़ रुपये की लागत से लाई गई दो वातानुकूलित इलेक्ट्रिक नौकाएं और उनके लिए बनाई गई जेटी व प्‍लेटफार्म जैसी आधारभूत संरचनाएं आज लगभग निष्क्रिय पड़ी हैं। 

कैसा था परियोजना का स्‍वरूप ?

केंद्र और राज्य सरकार ने सरयू नदी में गुप्तार घाट से तुलसीदास घाट तक लगभग 14 किलोमीटर के जलमार्ग पर आधुनिक इलेक्ट्रिक फेरी सेवा शुरू की जानी थी।  सरकार का मानना था कि इससे पर्यटकों को नया अनुभव मिलेगा, शहर के भीतर परिवहन का एक वैकल्पिक साधन विकसित होगा और सरयू नदी पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। जनवरी 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार ने घोषणा की कि अयोध्या उत्‍तर भारत का पहला शहर होगा जहां कोच्चि के बाद वाटर मेट्रो सेवा शुरू की जाएगी। इसके लिए दो इलेक्ट्रिक नौकाएं खरीदी गईं। इन नौकाओं में लगभग 50 यात्रियों के बैठने की क्षमता थी। इन्हें चार्जिंग स्टेशन से संचालित किया जाना था और पूरी परियोजना को अयोध्या के पर्यटन विकास की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया गया था। कोच्चि में चल रही वाटर मेट्रो सर्विस की तर्ज़ पर इसे भी अयोध्‍या वाटर मेट्रो का नाम दिया गया।

सरयू का बदलता स्‍वरूप और गाद बनी समस्‍या 

अयोध्‍या में वाटर मेट्रो की महत्‍वाकांक्षी परियोजना की विफलता का सबसे बड़ा कारण सरयू नदी का बदलता स्वरूप रहा। गर्मी में सरयू घाटों से इतनी दूर हो जाती है कि संचालन संभव नहीं हो सकता था। बरसात व बाढ़ के समय नदी अपने साथ इतनी सिल्ट लेकर चलती है कि मेट्रो निर्धारित चैनेज से होकर नहीं गुजर सकी। कुछ दिन अयोध्या के घाट के आसपास पर्यटकों को वाटरमेट्रो से घुमाया गया, लेकिन नदी दूर तक सूख गई तो वह भी बंद हो गया। 

सरयू नदी में भारी सिल्ट के कारण लंबे समय तक वाटर मेट्रो खड़ी रही, फिर इसे संचालन के लिए पर्यटन विभाग के सुपुर्द कर दिया गया। पर्यटन विभाग ने भी इससे पल्‍ला झाड़ते हुए वाटर मेट्रो के संचालन का ठेका एक निजी कंपनी को दे दिया, पर सरयू नदी की स्थिति को देखते  हुए उस कंपनी ने वाटर मेट्रो के संचालन से हाथ खड़े कर दिए। तमाम बैठकों के बाद निर्णय हुआ कि बिना ड्रेजिंग कराए संचालन संभव नहीं है। ड्रेजिंग शुरू हुई, जो गुप्तारघाट के पास ही सिमट कर रह गई। पिछले दो वर्षों में किये गये सभी प्रयास फेल हो गये। उसके बाद से ही वाटर मेट्रो सरयू के घाट पर खड़ी धूल खा रही हैं।

कोच्चि में कामयाब प्रोजेक्‍ट अयोध्‍या में क्‍यों हुआ फेल?

अयोध्या परियोजना मूल रूप से कोच्चि मॉडल से प्रेरित थी। लेकिन दोनों स्थानों की परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं। अयोध्‍या में वाटर मेट्रो परियोजना की विफलता का सबसे बड़ा कारण सरयू नदी का प्राकृतिक स्वरूप बना। कोच्चि की बैकवाटर प्रणाली और सरयू नदी की भौगोलिक प्रकृति में बहुत बड़ा अंतर है। कोच्चि में बड़ी नौकाओं के संचालन के लिए सालभर पर्याप्‍त मात्रा में 'बैक वाटर' उपलब्‍ध रहता है। कोच्चि वाटर मेट्रो अपेक्षाकृत स्थिर जलक्षेत्र में चलती है, जहां जलस्तर में अचानक बदलाव कम होता है और नौवहन मार्ग अपेक्षाकृत स्थायी रहते हैं। 

इसके विपरीत सरयू एक हिमालयी नदी है, जिसमें मानसून और मौसम के अनुसार जलस्तर में भारी उतार-चढ़ाव होता है। अयोध्‍या में गर्मी में सरयू घाटों से इतनी दूर हो जाती है कि वाटर मेट्रो का संचालन संभव नहीं था। बरसात व बाढ़ के समय नदी अपने साथ इतनी सिल्ट लेकर चलती है कि मेट्रो निर्धारित चैनेज से होकर नहीं गुजर सकी। विशेषज्ञों के अनुसार सरयू में लगातार गाद (सिल्ट) जमा होने और नदी के प्रवाह क्षेत्र के बदलने के कारण पर्याप्त ड्राफ्ट बनाए रखना मुश्किल हो गया। कई स्थानों पर पानी की गहराई इतनी नहीं बची कि इलेक्ट्रिक जलयान सुरक्षित ढंग से संचालित किए जा सकें। नदी के बीच में उभरते रेत के टापू और बदलते चैनल भी बड़ी बाधा बने।

यही कारण है कि जिस मार्ग को संचालन योग्य माना गया था, वह कुछ ही समय बाद व्यावहारिक रूप से अनुपयुक्त साबित होने लगा। परिणामस्वरूप नियमित सेवा शुरू नहीं हो सकी। कुछ दिन अयोध्या के घाट के आसपास पर्यटकों को वाटरमेट्रो से घुमाया गया, लेकिन नदी दूर तक सूख गई तो वह भी बंद हो गया। 

सरयू नदी में भारी सिल्ट के कारण लंबे समय तक वाटर मेट्रो खड़ी रही, फिर इसे संचालन के लिए पर्यटन विभाग के सुपुर्द कर दिया गया। पर्यटन विभाग ने भी इससे पल्‍ला झाड़ते हुए वाटर मेट्रो के संचालन का ठेका एक निजी कंपनी को दे दिया, पर सरयू नदी की स्थिति को देखते  हुए उस कंपनी ने वाटर मेट्रो के संचालन से हाथ खड़े कर दिए। तमाम बैठकों के बाद निर्णय हुआ कि बिना ड्रेजिंग कराए संचालन संभव नहीं है। ड्रेजिंग शुरू हुई, जो गुप्तारघाट के पास ही सिमट कर रह गई। पिछले दो वर्षों में किये गये सभी प्रयास फेल हो गये। उसके बाद से ही वाटर मेट्रो सरयू के घाट पर खड़ी धूल खा रही हैं। दूसरी ओर Kochi में वाटर मेट्रो एक व्यापक शहरी परिवहन नेटवर्क का हिस्सा है। वहां जलमार्ग स्थायी हैं, टर्मिनल आपस में जुड़े हुए हैं और हजारों दैनिक यात्री इसका उपयोग करते हैं।

<div class="paragraphs"><p>सरयू नदी में भारी मात्रा में गाद का जमाव और नदी का बदलता स्‍वरूप वाटर मेट्रो के संचालन में बाधक बन रहा है।&nbsp;</p></div>

सरयू नदी में भारी मात्रा में गाद का जमाव और नदी का बदलता स्‍वरूप वाटर मेट्रो के संचालन में बाधक बन रहा है। 

फोटो : विकी कॉमंस

केरल से अयोध्या तक कैसे पहुंची वाटर मेट्रो?

अयोध्या लाई गई वाटर मेट्रो मूल रूप से कोच्चि वाटर मेट्रो परियोजना के लिए निर्मित इलेक्ट्रिक जलयानों की श्रेणी की थी। इन्हें कोच्चि शिपयार्ड में तैयार किया गया था। जब अयोध्या में सेवा शुरू करने का निर्णय हुआ, तब दो जलयानों को विशेष ट्रेलरों पर लादकर सड़क मार्ग से केरल से उत्तर प्रदेश लाया गया।

करीब ढाई हजार किलोमीटर से अधिक की इस यात्रा में कई राज्यों से होकर गुजरना पड़ा। चूंकि जलयान आकार में बड़े और तकनीकी रूप से संवेदनशील थे, इसलिए उनके परिवहन के लिए विशेष अनुमति, एस्कॉर्ट व्यवस्था और भारी-भरकम ट्रांसपोर्ट वाहनों का उपयोग किया गया। उस समय इन नौकाओं के अयोध्या पहुंचने की तस्वीरें और वीडियो व्यापक रूप से प्रचारित किए गए थे और इसे रामनगरी के लिए नई सौगात बताया गया था।

अयोध्या पहुंचने के बाद इन्हें सरयू नदी में उतारने और संचालन की तैयारियां शुरू की गईं। उम्मीद थी कि कुछ ही समय में नियमित यात्री सेवा शुरू हो जाएगी, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग निकली।

संचालन से पहले क्या-क्या तैयारियां की गई थीं?

वाटर मेट्रो परियोजना को लागू करने से पहले कई स्तरों पर तैयारी की गई थी। सरयू नदी में संभावित जलमार्ग का सर्वे कराया गया। गुप्तार घाट और तुलसीदास घाट के बीच चैनल चिह्नित किए गए। नौवहन के लिए उपयुक्त मार्ग तय करने का प्रयास हुआ। अधिकारियों ने कई बार निरीक्षण किया और नदी की गहराई का अध्ययन कराया।

परियोजना के लिए दोनों घाटों पर जेटी बनाई गईं। इलेक्ट्रिक नौकाओं को चार्ज करने के लिए चार्जिंग स्टेशन स्थापित किए गए। यात्रियों के चढ़ने-उतरने के लिए फ्लोटिंग प्लेटफॉर्म तैयार किए गए। सुरक्षा मानकों को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त व्यवस्थाएं भी की गईं। सरकारी स्तर पर यह संदेश दिया गया कि सभी तकनीकी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं और सेवा जल्द शुरू होगी।

लेकिन बाद में सामने आया कि जिन आधारों पर योजना बनाई गई थी, वे सरयू नदी की वास्तविक और बदलती परिस्थितियों के सामने टिक नहीं सके।

क्या सर्वे में सरयू की स्थिति का सही आकलन नहीं हुआ?

परियोजना की विफलता के बाद सबसे बड़ा सवाल सर्वेक्षण प्रक्रिया पर उठ रहा है। यदि नदी में गाद जमने, जलस्तर बदलने और चैनल खिसकने की समस्या पहले से मौजूद थी, तो क्या इसका आकलन नहीं किया गया?

जल विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी नदी परिवहन परियोजना के लिए केवल एक बार का सर्वे पर्याप्त नहीं होता। नदी की मौसमी प्रकृति, मानसून के बाद का व्यवहार, गाद जमाव का पैटर्न और दीर्घकालिक जल प्रवाह का अध्ययन जरूरी होता है।

आलोचकों का कहना है कि संभवतः परियोजना को शीघ्रता से लागू करने के दबाव में व्यवहार्यता अध्ययन की सीमाओं को नजरअंदाज कर दिया गया। यदि विस्तृत हाइड्रोलॉजिकल अध्ययन किया गया होता तो शायद यह स्पष्ट हो जाता कि सरयू में स्थायी वाटर मेट्रो संचालन बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।

12 करोड़ रुपये के निवेश पर उठ रहे सवाल

वाटर मेट्रो के निष्क्रिय होने के बाद सबसे अधिक चर्चा सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर हो रही है। जलयान, जेटी, चार्जिंग स्टेशन और अन्य ढांचागत सुविधाओं पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए। लेकिन यदि सेवा नियमित रूप से संचालित ही नहीं हो पाई, तो इस निवेश का औचित्य क्या है?

स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या परियोजना की लागत-लाभ समीक्षा की गई थी। यदि नदी की परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं तो वैकल्पिक पर्यटन गतिविधियों या नदी संरक्षण परियोजनाओं पर यह धन खर्च किया जा सकता था। हालांकि सरकार की ओर से अभी तक परियोजना को औपचारिक रूप से बंद करने की घोषणा नहीं की गई है, लेकिन लंबे समय से सेवा शुरू न हो पाने के कारण इसकी उपयोगिता पर सवाल लगातार बढ़ रहे हैं। 

अब यह परियोजना प्रशासनिक दूरदर्शिता, तकनीकी व्यवहार्यता और सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। सवाल यह है कि क्या सरयू नदी की वास्तविक परिस्थितियों को समझे बिना ही यह फैसला लिया गया था? क्या परियोजना शुरू करने से पहले किए गए सर्वे पर्याप्त थे? और क्या यह केवल अयोध्या को आधुनिक दिखाने की जल्दबाजी में लिया गया निर्णय था?

12 करोड़ की मेट्रो के लिए बनेगा 29 हजार करोड़ का बैराज?

अयोध्‍या में वाटर मेट्रो के संचालन के लिए अब सरयू नदी पर बैराज बनाने की बात भी कही जा रही है। बताया जा रहा है कि सरयू नदी पर बैराज बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। पर गौर करने वाली बात यह है कि अयोध्या में इस बैराज के निर्माण पर करीब 29 हजार करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्‍या 12 करोड़ की वाटर मेट्रो को चलाने के लिए 29 हजार करोड़ रुपये का बैराज बनाया जाएगा या इस परियोजना के अन्‍य भी उद्देश्‍य होंगे। अगर ऐसा होगा तो वाटर मेट्रो की परियोजना को पहले ही क्‍यों लॉन्‍च कर दिया गया, जब‍कि मेट्रो का संचालन बैराज बनने के बाद ही संभव हो सकेगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि बैराज बनने के बाद वाटर मेट्रो ही नहीं राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या-40 पर अन्य यात्री व कैरेज वाटर व्हीकल का संचालन आसानी से संभव हो सकेगा। इसी को देखते हुए बैराज निर्माण की परियोजना पर विचार चल रहा है।

आगे क्या-क्‍या हैं विकल्प ?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार इस परियोजना को बचाना चाहती है तो सबसे पहले सरयू नदी की नौगम्यता यानी बड़ी नौकाओं के संचालन का नए सिरे से अध्ययन कराया जाना चाहिए। यह पता लगाना जरूरी है कि क्या सीमित दूरी पर या केवल कुछ मौसमों में सेवा चलाई जा सकती है।

दूसरा विकल्प यह है कि इन जलयानों का उपयोग पर्यटन आधारित अल्प दूरी की क्रूज सेवाओं के रूप में किया जाए। इससे कम से कम पहले से किए गए निवेश का कुछ लाभ मिल सकता है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण विकल्प यह है कि भविष्य की ऐसी परियोजनाओं के लिए विस्तृत व्यवहार्यता अध्ययन को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि केवल आकर्षक अवधारणाओं के आधार पर करोड़ों रुपये खर्च न हों।

निष्कर्ष : विकास में व्यवहारिकता का सबक

अयोध्या वाटर मेट्रो परियोजना केवल एक परिवहन योजना की विफलता नहीं है, बल्कि यह इस बात की सीख देती है कि किसी भी विकास परियोजना की सफलता उसके तकनीकी और भौगोलिक यथार्थ को समझने पर निर्भर करती है। आधुनिक तकनीक, आकर्षक डिजाइन और बड़े सरकारी दावे तब तक पर्याप्त नहीं होते जब तक स्थानीय परिस्थितियां उनके अनुकूल न हों।

सरयू नदी में गाद जमाव, बदलते जलमार्ग और मौसमी प्रवाह जैसी चुनौतियां कोई नई बात नहीं थीं। यदि वाटर मेट्रो पर बड़ा निवेश करने से पहले इन चीजों का समुचित अध्ययन और आकलन कर लिया गया होता, तो संभवतः करोड़ों रुपये की यह परियोजना आज "सफेद हाथी" बनकर खड़ी न होती। अयोध्या वाटर मेट्रो की कहानी भविष्य की अवसंरचना परियोजनाओं के लिए इस बात का एक महत्वपूर्ण सबक है कि विकास की दौड़ में व्यवहारिकता को नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है।

Also Read
सीएमसी की 21वीं बैठक में हुई नदी पुनर्जीवन प‍रियोजनाओं की रफ्तार पर चर्चा
<div class="paragraphs"><p>अयोध्‍या में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सरयू नदी में वाटर मेट्रो चलाने की योजना अपने शुरुआती परीक्षणों में नाकाम रहने के बाद ठंडे बस्‍ते में पड़ी हुई है।&nbsp;</p></div>

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

India Water Portal - Hindi
hindi.indiawaterportal.org