वुलर झील
फोटो- वाहिद भट
वुलर लेक के घावों को भरने के बजाए सुंदर पट्टियों से सजा रहे हैं ‘तीमारदार’ - क्या ऐसे होगा झील का पुनरुद्धार?
उत्तरी कश्मीर में वुलर झील के पास बांदीपोरा जिले की ओर जाने वाली सड़क पहाड़ों के बीच से एक शांत नदी की तरह घुमावदार रास्ते से गुजर रही है। शरद ऋतु की हवा में लकड़ी के धुएं की हल्की सी महक फैली हुई है। सड़क के किनारे के पेड़ पीले और लाल रंग के दिख रहे हैं, जो कश्मीर में पतझड़ के मौसम की निशानी हैं।
पहली नज़र में, हल्की धूप में चमकता घास का विशाल मैदान लगने वाली जगह वास्तव में कुछ और ही है। इस हरे-भरे फैलाव के नीचे पानी छिपा है। दरअसल यह वुलर झील है। कभी इसकी गिनती एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झीलों में की जाती थी, लेकिन अब इसका बड़ा हिस्सा तैरती वनस्पतियों, खेतों के टुकड़ों और दशकों पहले लगाए गए विलो के पेड़ों के नीचे दब गया है।
वुलर झील के पास मछुआरा
फोटो- वाहिद भट
लकड़ी के बने ‘वुलर व्यू पॉइंट’ से जो नज़ारा दिखता है, वह थोड़ा भ्रम में डालने वाला है। हवा चलती है, सरकंडे हिलते हैं, और एक पल को लगता है जैसे झील अब भी ज़िंदा है। लेकिन पानी का जो विस्तार दिखाई पड़ता है वह वास्तव में दलदली ज़मीन है। दरअसल वुलर वो झील है, जिसे बीते वर्षों में तमाम घाव दिए गए और अब प्रशासन रूपी तीमारदार सौंदर्यीकरण के नाम पर इसे सुंदर पट्टियों से सजाने की बात कर रहे हैं।
गूगल अर्थ के नक्शे पर वुलर झील
लंकरेशीपोरा के 27 साल के मछुआरे उमर शफ़ी रेशी (बदला हुआ नाम) कहते हैं, “लोग यहां आते हैं और पूछते हैं कि झील कहां है? ‘वुलर चू लाचार गोमुत’ (वुलर लाचार हो गई है)। लंकरेशीपोरा उन बत्तीस गांवों में से एक है जो आज भी जीवनयापन के लिए वुलर झील पर निर्भर हैं। वे आगे कहते हैं, “मैं पर्यटकों को बताता हूं कि आप उसी पर खड़े हैं।” वे हंसते हैं, और फिर अपने पैरों की ओर देखते हैं, जहां मिट्टी में दरारें पड़ी हुई हैं और मिट्टी पर जमी पपड़ी उखड़ रही है। तो वे चकित रह जाते हैं।
बांदीपोरा जिले में स्थित वुलर झील, हरमुख की बर्फ से ढकी चोटियों से घिरी हुई है। यह कभी घाटी का प्राकृतिक बाढ़ बेसिन और जीवन रेखा थी और जिसका पानी झेलम नदी से आता था। यह झील जलभंडारों को रिचार्ज करती थी और किनारों पर बसे हजारों परिवारों का भरण-पोषण करती थी।
साल 1990 में, वुलर को अंतरराष्ट्रीय महत्व की रामसर आर्द्रभूमि घोषित किया गया था। यह एक वैश्विक मान्यता थी जो अब दिए गए सम्मान से अधिक एक चेतावनी की तरह लगती है।
वुलर का विस्तार कभी 217 वर्ग किलोमीटर (84 वर्ग मील) में था, जिसमें लगभग 58 वर्ग किलोमीटर दलदली ज़मीन भी शामिल थी, जो उत्तरी कश्मीर में बारामूला और बांदीपोरा जिलों के बीच स्थित थी। आज, इसका क्षेत्रफल घटकर लगभग 80 वर्ग किलोमीटर रह गया है, जिसमें पानी का विस्तार क्षेत्रफल 30 वर्ग किलोमीटर से भी कम है। बाक़ी का हिस्सा या तो खेतों में तब्दील हो गया है या फिर दशकों पहले लकड़ी और जलावन के लिए लगाए गए विलो के पेड़ों से ढंक चुका है।
यह नुकसान अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे सालों में बढ़ता गया। एक सदी से चली आ रही यह गिरावट पानी की गहराई में भी दिखती है और लोगों की यादों में भी।
वुलर झील पर घास चरती गाय
फोटो- वाहिद भट
घंटों बाद मिलता है जाल डालने लायक गहरा पानी
भोर होने से पहले ही उमर अकेले नाव लेकर निकल पड़ते हैं। कोहरा इतना घना होता है कि ज़मीन और आसमान का फर्क तक समझ नहीं आता। बस चप्पू के धीरे-धीरे घास-फूस में धंसने की आवाज़ सुनाई देती है। जाल डालने लायक गहरा पानी मिलने से पहले वे करीब घंटा भर नाव चलाते हैं।
सूरज निकलते-निकलते कोहरा छंट जाता है और सामने धूसर, साफ़ पानी दिखने लगता है, जिस पर प्लास्टिक के टुकड़े और कमल के पौधों की पीली जड़ें तैरती रहती हैं। आज उन्होंने करीब तीन किलो मछली पकड़ी, जिनमें ज़्यादातर कार्प थीं। बाज़ार में इनकी कीमत लगभग नौ सौ रुपये है। लेकिन डीज़ल और खाने-पीने का खर्च निकालने के बाद दो सौ रुपये से भी कम बचते हैं। वे कहते हैं, “किसी-किसी दिन तो कुछ भी हाथ नहीं लगता। लेकिन अगर मैं घर पर बैठ जाऊं, तो रात का खाना भी नसीब नहीं होगा।”
उमर ने अपने पिता के बीमार हो जाने के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया था, उस समय उनकी उम्र ग्यारह साल थी। मछली पकड़ने के अलावा उन्हें दूसरा कोई काम भी नहीं आता है। उन्हें आज भी अपने पिता की बातें याद हैं, जब वे उन्हें बताते थे कि कैसे सूरज निकलने के समय झील नीले रंग से जगमगाती थी, कैसे नावें बांदीपोरा से सोपोर तक बिना कीचड़ में फंसे आसानी से निकल जाती थीं। अब, आधे रास्ते में ही चप्पू कीचड़ में फंस जाता है। “हमें मछलियों से ज़्यादा प्लास्टिक मिलता है,” वे अपने जूते के तलवे में लिपटी हुई खरपतवारों को खींचते हुए कहते हैं।
वुलर झील में घट रही मछलियों की संख्या
वेटलैंड्स इंटरनेशनल के एक अध्ययन से पता चलता है कि वुलर झील में मछली पकड़ने की कुल मात्रा 10,544 टन से घटकर मात्र 1,476 टन प्रति वर्ष रह गई है। झील के आसपास की आबादी तीन गुना बढ़ने के बावजूद, प्रति व्यक्ति मछली पकड़ने की मात्रा बीस गुना कम हो गई है।
शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि प्रति घंटे औसत पकड़, जिसे “प्रति इकाई प्रयास पकड़” के रूप में जाना जाता है, दो दशक पहले के कई किलो से घटकर मात्र 237 ग्राम रह गई है। विश्वविद्यालय के मत्स्य वैज्ञानिक डॉ. फ़िरोज़ अहमद भट कहते हैं, “यह एक पारिस्थितिक पतन है। झील में पोषक तत्व बहुत ज़्यादा हो गए हैं। पानी में ऑक्सीजन कम पड़ रही है और उस पर रसायनों का दबाव भी बढ़ गया है। यानी झील में इतने ज़्यादा पोषक तत्व हो गए हैं कि वह धीरे-धीरे मरने की हालत में पहुंच गई है।”
वुलर की दास्तां सुनाते वहाब मोहम्मद डार
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सरकूट गांव के वहाब मोहम्मद डार कहते हैं, “अब मैं जो कमाता हूं, उससे हमारी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं होतीं। पहले एक मछुआरा एक दिन में 15 से 20 किलो मछली पकड़ लेता था। अब तो बस पांच किलो ही पकड़ पाता है।”
उमर यूट्रोफिक जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। वह बस इतना जानते हैं कि जब वह अपना जाल डालते हैं, तो उन्हें कचरा मिलता है। वह कहते हैं, “पानी में पहले जीवन की महक हुआ करती थी। अब उसमें नाले जैसी बदबू आती है।”
सूरज निकलते ही, लंकाशीपोरा की महिलाएं अपनी नावों को उथले पानी में धकेलती हैं। उनमें 42 साल की नईमा बेगम भी शामिल हैं। उनकी नाव सरकंडों से भरी हुई है, जिन्हें स्थानीय भाषा में आबगासे कहा जाता है। वह चुपचाप सरकंडों से भरी सतह पर चप्पू चलाती हैं और एक छोटी सी हंसिया से सरकंडों को काटती हैं। काम धीमा है, मजदूरी कम है, लगभग चार सौ रुपये प्रतिदिन, लेकिन इससे सर्दियों में उनके परिवार का गुजारा हो जाता है।
वुलर झील से निकाले गए रीड
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शुरुआत में नईमा भी कैमरे पर बोलने से हिचक रही थीं। गांव की ढेर सारी महिलाओं की तरह ही उन्हें भी इस बात की चिंता थी कि उनकी तस्वीर कहीं समुदाय के लोगों तक न पहुंच जाए। वह धीरे से बोलीं, “लोग बातें बनाते हैं,” और हमने कैमरा नीचे कर लिया। फिर हमने रिकॉर्डिंग के बजाय झील, उनके कम और पानी के आसपास बीतने वाले उनके रोज़ के शांत और धीमे जीवन के बारे में बातें की।
उनके हाथ खुरदरे हो गए हैं और सरकंडों के धारदार तनों से जगह-जगह कट भी गए हैं। वे बचपन से ही इस काम को कर रही हैं, शायद तब से जब न तो मशीनें थीं और न ही झील के संरक्षण और पुनरोद्धार की योजनाएं ही। सर्दियों में वह मवेशियों के लिए चारा सुखाने का काम करती हैं। उनके पास जो कुछ भी है वह उन्हें इस झील से ही मिला है, खाना, ईंधन और भरोसा सब कुछ। वे कहती हैं, “यह झील हमारा खेत है। लेकिन अब यह खेत मर रहा है।”
किनारों की तरफ़ लौटते हुए नईमा अपनी नाव के पास तैरते कमल के गुलाबी फूलों को देखने के लिए रुक गईं। 1992 की बाढ़ के बाद वे अगले तीस सालों के लिए ग़ायब हो गए थे क्योंकि इनके बीज गाद के नीचे दब गए थे। अभी कुछ ही दिनों पहले वे फिर से खिलने लगे हैं। वे कहती हैं, “ऐसा लग रहा है जैसे झील में दोबारा जान आ गई है। लेकिन ऐसा कितने दिनों तक रह सकेगा?”
वुलर झील में जमा कचरा
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गाद हटाना और विलो के पेड़ों को काटना
गांव से कुछ मील पूर्व की ओर जाते ही पक्षियों की चहचहाहट मशीनों के शोर में दब जाती है। खनन वाली जगह पर सुबह की फीकी रोशनी में एक मशीन से काली मिट्टी की खुदाई का काम हो रहा है। हमें वहां आता देखकर वन विभाग का एक कर्मचारी हमारे क़रीब आ गया। उसका नाम रियाज़ (बदला हुआ नाम) था और उसने हमसे बातचीत शुरू कर दी। हालांकि उसकी आंखें मशीनों पर ही टिकी हुई थीं। रियाज़ जम्मू और कश्मीर वन विभाग और वुलर संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के साथ काम करते हैं। इस एजेंसी की स्थापना साल 2012 में झील के जीर्णोद्धार के लिए की गई थी।
“हम अभी तक विलो (बेंत की तरह पतली लचकदार डाली वाला पेड़) के लगभग एक लाख बीस हज़ार पेड़ काट चुके हैं। और चार वर्ग किलोमीटर से भी ज़्यादा इलाके में फिर से पानी को मुक्त कर दिया है”, रियाज़ ने मशीनों की तरफ़ देखते हुए कहा। “झील की स्थिति बेहतर हो रही है लेकिन गति बहुत धीमी है। जितने हिस्से को हम साफ करते हैं, बारिश के साथ उतना ही नया कचरा और गाद वापस आ जाता है।” उनके पीछे ऊपर की तरफ़ जा रही ट्रक की क़तार अपने साथ झील के अतीत को एक-एक करके बाहर ले जा रही थी।
1980 के दशक में, सरकार ने लकड़ी और जलावन दोनों की मांग को पूरा करने के लिए विलो के लाखों पेड़ लगाए थे। ये पेड़ तेजी से बढ़े और झील के तल पर फैल गए, जिससे गाद फंस गई और नहरें जाम हो गईं। आज की तारीख़ में लगभग उस सत्ताईस वर्ग किलोमीटर भूभाग में ये पेड़ फैले हुए हैं जहां कभी पानी का अस्तित्व था। इन पेड़ों की जड़ें झील का सारा पानी सोंख लेती हैं। उनकी छाया के नीचे सरकंडे पनप नहीं पाते हैं।
अधिकारियों का कहना है कि झील का इस तरह से दोबारा ज़िंदा होना वुलर संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (WUCMA) द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए गाद हटाने के अभियान का ही नतीजा है। एजेंसी ने कटर-सक्शन ड्रेजर का उपयोग करके लगभग 80 लाख घन मीटर गाद हटाई है, जिससे झील का लगभग पांच वर्ग किलोमीटर क्षेत्र फिर से जीवित हो गया। WUCMA के ज़ोनल अधिकारी मुदासिर अहमद कहते हैं, “जैसे ही झील की तलहटी तक सूरज की रोशनी दोबारा पहुंची, कमल अपने आप ही खिलने लगे। यह इस बात का संकेत है कि पारिस्थितिकी तंत्र ठीक हो रहा है।”
पाइप जिसके जरिए शहर का गंदा पानी गिरता है वुलर झील में
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कश्मीर विलो क्रिकेट बैट के लिए वुलर झील की बर्बादी
दशकों से कश्मीर की आर्द्रभूमि पर अध्ययन कर रहे सेवानिवृत्त जलविज्ञानी डॉ एम.आर.डी. कुंदनगर कहते हैं, “विलो के ये पेड़ लोगों की मदद के लिए लगाए गए थे। लेकिन इन्होंने झील का गला घोंट दिया।” बावजूद इसके इनकी कटाई से एक अलग समस्या खड़ी हो जाती है: विलो के इन्हीं पेड़ से ही कश्मीर में क्रिकेट के बैट बनाने वाली फ़ैक्ट्रियों को लकड़ी मिलती है और दस हज़ार से अधिक लोग इस उद्योग से जुड़े हुए हैं। कुंदनगर आगे कहते हैं, “पेड़ कटते ही कमाई ख़त्म हो जाती है। और न काटो तो झील हाथ से चली जाती है। दोनों ही मामलों में विकल्प केवल इस बात को चुनने का है कि कौन सी चीज पहले मरेगी, रोज़गार या झील?”
वुलर झील पर इस तरह उगी झाड़ियां
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रियाज इस दुविधा को बहुत अच्छे से समझते हैं। वे कहते हैं, “हम दोनों को बचाने और संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि कुछ ख़ास सुधार नहीं हुआ है लेकिन कम से कम झील सांस लेती दिखाई पड़ रही है।” उन्होंने दूर इशारा करते हुए दिखाया जहां झील के खुले विस्तार में पक्षियों का एक झुंड चक्कर लगा रहा था। 2025 की एशियाई जलपक्षी जनगणना में वुलर में प्रवासी पक्षी की संख्या तीन लाख से अधिक दर्ज की गई, जो पिछले साल की तुलना में चार गुना ज़्यादा है। इनमें स्म्यू नामक एक छोटी उत्तरी बत्तख भी शामिल थी, जो अस्सी सालों से यहां नहीं देखी गई थी। रियाज कहते हैं, “यह इस बात का सबूत है कि हमारा काम मायने रखता है। पक्षी ठहरे या सड़े पानी में नहीं आते हैं।”
हालांकि वे सीमाओं को भी मानते हैं। “हम यहां खुदाई करते हैं और अगली ही बाढ़ में फिर से गाद जमा हो जाता है। ऊपर जंगल की कटाई भी चालू है, और अब भी श्रीनगर के नालों का पानी इसी में गिरता है। इधर हम इसकी सफ़ाई कर रहे हैं जबकि दूसरी तरफ़ से प्रदूषित पानी और कचरा बह कर इसमें मिल रहा है।”
करोड़ों रुपए खर्च हुए लेकिन साफ नहीं हो पायी वुलर
वुलर संरक्षण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (डब्ल्यूयूसीएमए) ने साल 2012 से अब तक झील को प्रदूषित करने वाले विलो के पेड़ों को हटाने और गाद निकालने पर करोड़ों रुपये खर्च किए। अधिकारियों का कहना है कि अब तक लगभग 79 लाख घन मीटर से अधिक गाद हटाई जा चुकी है। फिर भी, 17 वर्ग मील में फैली इस झील का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही पुनर्जीवित हो पाया है।
वुलर के विनाश की कहानी बहुत धीमी गति से लिखी जा रही है। इस झील का अट्ठासी फ़ीसद पानी झेलम नदी से आता है। और वर्तमान में इस नदी में प्रदूषित जल और कचरा बहता है। श्रीनगर से रोज़ करीब 70 मिलियन लीटर गंदा और दूषित पानी सीधे नदी में चला जाता है। धान के खेतों और बागों से बहकर आने वाले खाद और कीटनाशक भी इसमें मिल जाते हैं। नतीजतन, पानी में काई तेज़ी से बढ़ती है और ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, 2018 तक झील का करीब 57 फ़ीसद हिस्सा यूट्रोफिक हो चुका था। यानी पानी में पोषक तत्वों की अधिकता के कारण काई और खरपतवार बहुत ज़्यादा बढ़ गए थे। यह स्थिति सीवेज के अनुपचारित पानी और खेतों से बहकर आने वाले उर्वरकों के कारण बनी थी।
वुलर प्रबंधन प्राधिकरण कार्यालय
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23 फीसदी तक कम हुआ जल क्षेत्र
इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के कुलपति प्रोफेसर शकील रोमशू कहते हैं, “यह झील घाटी का जल संग्रहण केंद्र बन गई है। हर साल इसमें गाद बढ़ती जा रही है, विषैले पदार्थ बढ़ते जा रहे हैं और पानी कम होता जा रहा है।” भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रह आंकड़ों से पता चलता है कि 2008 और 2019 के बीच वुलर झील का खुला जल क्षेत्र तेईस फ़ीसद कम हो गया है। रोमशू कहते हैं, “हमारी भंडारण क्षमता कम हो रही है। बाढ़ आने पर शहर को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है।” 2014 की विनाशकारी बाढ़ के दौरान श्रीनगर की सड़कें नदियों में बदल गई थीं। वे कहते हैं, “वुलर नदी उस अतिरिक्त पानी को सोख लेती थी। हमने उस सोखने वाले तंत्र को ही नष्ट कर दिया जिसने हमारी रक्षा की।”
वुलर की कहानी सुनाते गानी भट्ट
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वुलर के पास ही सरकूट गांव में रहने वाले 87 साल के गनी भट के लिए वुलर की कहानी केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि यादें हैं। उनका पूरा जीवन दक्षिणी तट के पास ही बीता जहां उन्होंने तैरना और मछली पकड़ना सीखा था। वे कहते हैं, “जब मैं छोटा था तब इसका पानी नीला था। अब इसका पानी धूसर हो गया है।”
गनी का मानना है कि समस्या प्रकृति की नहीं बल्कि इसे नज़रअंदाज़ करने की है। वे अपना सिर हिलाते हुए कहते हैं, “प्लास्टिक की एक बोतल चुनने के लिए दस तरह की अनुमतियों की ज़रूरत होती है। यह भारत की एकमात्र ऐसी झील है जिसकी सुरक्षा का जिम्मा नेवी यानी जल सेना का है।” कुछ देर रुककर पानी को निहारने के बाद उन्होंने फिर से कहा, “वुलर को आप बिना इसके लोगों की भागीदारी के नहीं बचा सकते हैं। उन्हें इसका हिस्सा बना दीजिए और देखिए कि वे इसकी रक्षा किसी और से बेहतर करेंगे।”
सरकूट गांव में, 80 साल के वहाब मोहम्मद डार अपनी नाव से झुककर कमल के फूल को छूने की कोशिश करते हुए कहते हैं, “मुझे लगा था कि हम इस फूल को हमेशा के लिए खो चुके हैं।”
नद्रू के सहारे तमाम परिवारों की आजीविका
कमल के तने को वहां की स्थानीय भाषा में नद्रू कहते हैं। तीन दशक पहले बाढ़ के साथ आई गाद में इस पौधे के बीज दब गए थे और वे खिलना बंद हो गये थे। WUCMA के गाद हटाने के अभियान के शुरू होने के बाद गाद के नीचे दबे उन बीजों तक सूरज की रोशनी पहुंचने लगी। उनके वापस लौट आने से जीवन भी बदल गया है। नद्रू के एक किलो की क़ीमत लगभग एक सौ बीस रुपये तक होती है। सर्दियों में जब मछली पकड़ने का काम मंद पड़ जाता है तब नद्रू की फसल ही परिवारों की आजीविका का साधन बनती है। डार कहते हैं, “ऐसा लगता है जैसे ईश्वर ने झील को दूसरा जीवन दिया है।”
वुलर विंटेज
फोटो- वाहिद भट
फिर भी, इस पतन के बीच कुछ उम्मीद की झलक दिखती है। सर्दियों में वुलर झील के ऊपर आसमान फिर से पक्षियों से भर जाता है, नॉर्दर्न शोवेलर, गैडवॉल, मल्लार्ड, पिंटेल जैसी प्रजातियां लौटती दिखती हैं, जिन्हें कभी घाटी से गायब माना जाने लगा था। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार पिछले मौसम में यहां पक्षियों की 200 से ज़्यादा प्रजातियां उपस्थित थीं।
रियाज़ कहते हैं, “पक्षी हमारे सबसे सच्चे गवाह होते हैं। वे तभी लौटते हैं, जब इस पारिस्थितिकी तंत्र में थोड़ी सी भी जान बची होती है। इस समस्या का समाधान इस झील के किनारे रहने वाले लोगों के पास ही है। आप इसके आसपास बसे समुदायों की भागीदारी के बिना वुलर को नहीं बचा सकते। आपको उन्हें इसके संरक्षण का हिस्सा बनाना ही होगा और उन्हें अधिकार देने ही होंगे।”
ठीक इसी समय सरकार एक नई योजना को बढ़ावा दे रही है: पर्यावरण पर्यटन, पैदल पथ, पक्षी अवलोकन (बर्ड-वॉचिंग) टावर, और नौका विहार। अधिकारियों का कहना है कि इस योजना से लोगों का ध्यान इधर जाएगा और रोज़गार भी मिलेगा। लेकिन गनी जैसे स्थानीय निवासियों को डर है कि इसका हश्र भी डल झील जैसा ही हो जाएगा। जहां पर्यावरणीय क्षति को छुपाने के लिए सौंदर्यीकरण का रास्ता अपनाया गया। गनी कहते हैं, “पर्यटन संरक्षण का रास्ता नहीं है। फ़ोटो में अच्छा दिखाने के लिए डल झील को ऊपर से सुंदर बना दिया गया जबकि वास्तव में वह मर रही थी। वुलर का भी यही हाल होगा।”
वुलर का परिस्थितिक परिवर्तन
फोटो- वाहिद भट
ठहरे पानी में क्या बच जाता है
हालांकि रियाज़ इस बात से सहमत नहीं है। वे कहते हैं, “जब लोग अपनी आंखों से झील देखेंगे तो उन्हें इसकी चिंता होगी।” वे बोलते-बोलते रुक जाते हैं। फिर कहते हैं, “हमें केवल इसका ध्यान रखना है कि उनके ख़्याल रखने की इस प्रक्रिया में जो बचा है वह भी न बर्बाद हो जाए।”
यह बहस कश्मीर के व्यापक विरोधाभास को उजागर करती है। एक ऐसी जगह जो अपनी अपार प्राकृतिक सुंदरता के बावजूद राजनीतिक उथल-पुथल से अछूती नहीं है।
वुलर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जो अपने भीतर आश्चर्य और सीमाओं दोनों को समेटे हुए है। इस झील के चारों तरफ़ सेना की चौकियां बनी हुई हैं, पानी वाले इलाक़े की निगरानी का जिम्मा कमांडो का है और इसका भविष्य कई अलग-अलग सरकारी विभागों के अधिकारियों के हाथों में है। यहां तक कि इसकी मरम्मत या सुधार के लिए भी आधा दर्जन विभागों से मंज़ूरी लेनी पड़ती है।
गनी भट सिर हिलाते हुए कहते हैं, “इस झील में तो जैसे सांस लेने के लिए भी कागज़ी इजाज़त चाहिए।”
दोपहर होते-होते रोशनी धीमी होने लगती है। नईमा सरकंडों से लदी अपनी नाव घर की तरफ़ ले जा रही है। उमर अपने पिता की पुरानी झोपड़ी के पास बैठकर फटे जाल की मरम्मत कर रहे हैं। बच्चे उस सूखी ज़मीन पर क्रिकेट खेल रहे हैं जहां कभी तालाब था। गेंद दरार पड़ी ज़मीन से लुढ़कती हुई आगे चली जाती है। एक बगुला उड़ता है और धुंध में गायब हो जाता है।
उमर कहते हैं, “अब गर्मियों में यहां का तापमान भी बहुत अधिक हो जाता है। साल दर साल पानी भी कम होता जा रहा है। कभी-कभी तो हमें मरी हुई मछलियां तैरती दिख जाती है। शायद गर्मी या फिर रसायनों के कारण वे मर रही हैं।” उमर को इसके बारे में कुछ नहीं पता। वे कहते हैं, “मैं बस इतना जानता हूं कि मेरे पिता की झील अब नहीं रही।”
ऐसा लगता है जैसे इन शब्दों को कई बार दोहराया गया है। लेकिन बाहर गाद से भरे ट्रक झील के तट पर नए निशान छोड़कर आगे बढ़ रहे हैं। बारिश होने पर ये गाद बहकर फिर से पानी में चले जाते हैं। गुजर रहे ट्रकों को निहारते हुए गनी भट कहते हैं, “इस झील को केवल पैसा नहीं बल्कि समय और सम्मान की भी ज़रूरत है।”
शाम होते-होते हवा थम जाती है। झील की सतह शीशे जैसी चिकनी हो जाती है, जिस पर हरमुख की बर्फ से ढकी चोटियों का हल्का गुलाबी रंग चमकने लगता है। मछुआरे अपनी नावों को खींचकर किनारों पर ले आते हैं। हवा में डीज़ल और शैवाल की हल्की गंध फैल जाती है। किनारे पर बने मिट्टी के घरों से धुआं उठना शुरू हो जाता है।
वुलर का भविष्य इस बात पर टिका है कि सुधार का काम सिर्फ़ दिखावे तक सीमित न रहे, बल्कि प्रदूषण, गाद और ऊपर के इलाकों में पानी के प्रबंधन जैसी असली समस्याओं को भी ठीक करे।
गाद निकालने से पानी का रास्ता तो खुल सकता है, लेकिन अगर लोगों की भागीदारी न हो और पूरे जलग्रहण क्षेत्र की देखभाल न की जाए, तो यह सुधार टिकाऊ नहीं होगा।
यह सिर्फ़ झील को ठीक करने का काम नहीं है, बल्कि यह इस बात की भी परीक्षा है कि नीतियों, धैर्य और सही देखभाल जैसी पहलों का असर थोड़े समय तक न रह कर टिकाऊ और स्थायी हो सकता है।
नोट- यह ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया वाटर फेलोशिप के अंतर्गत अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसका हिन्दी अनुवाद डॉ. कुमारी रोहिणी ने किया है।
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