दिल्ली में जलभराव केवल भारी बारिश का परिणाम नहीं, बल्कि बदलती शहरी संरचना और सीमित स्टॉर्मवाटर क्षमता का संकेत भी है।

दिल्ली में जलभराव केवल भारी बारिश का परिणाम नहीं, बल्कि बदलती शहरी संरचना और सीमित स्टॉर्मवाटर क्षमता का संकेत भी है।

चित्र: bricksnwall

आने वाले मानसून में क्या जलभराव से निपटने को तैयार है दिल्ली? क्या कहती है CAG और IIT Delhi की रिपोर्ट?

हर साल बारिश से पहले तैयारियों का दावा होता है, लेकिन कुछ घंटों की बरसात ही दिल्ली की जलनिकासी व्यवस्था की असलियत उजागर कर देती है। सवाल यह है कि समस्या मौसम की है या शहर की संरचना की?
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इस साल दिल्ली का मौसम लगातार अपने मिज़ाज बदल रहा है। अप्रैल की शुरुआत से ही शहर भीषण गर्मी और लू जैसी परिस्थितियों का सामना कर रहा है, लेकिन इसी बीच हर सप्ताह-दस दिन पर अचानक बारिश और आंधी की बौछारें भी देखने को मिल रही हैं। मौसम का यह बदलता व्यवहार सिर्फ तापमान का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु अस्थिरता का संकेत है।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं कि मानसून कब आएगा, बल्कि यह भी है कि क्या दिल्ली उसके लिए तैयार है? दिल्ली में बारिश सिर्फ मौसम नहीं, अक्सर संकट भी बन जाती है। बारिश के मौसम में दिल्ली की “चमकती” व्यवस्था की असलियत सामने आ जाती है।

कुछ घंटों की तेज बारिश के बाद मिंटो रोड का अंडरपास भर जाता है। आईटीओ पर गाड़ियों की लंबी कतारें लग जाती हैं, निचले इलाकों में पानी घरों तक पहुंच जाता है और सड़कें धीरे-धीरे अवरोध बन जाती हैं। जिन रास्तों पर रोज़ लाखों लोग चलते हैं, वही रास्ते कुछ घंटों में शहर के आवागमन को ठप कर देते हैं।

दिल्ली की वर्तमान तैयारी क्या पर्याप्त है?

दिल्ली में मानसून के पहले की तैयारियों का सबसे बड़ा हिस्सा हर साल डिसिल्टिंग (desilting) यानी नालों से गाद निकालना होता है। 2026-27 में भी सरकार और विभिन्न एजेंसियों ने इसी रणनीति को प्राथमिकता दी है। दिल्ली नगर निगम के अनुसार इस साल लगभग 800 बड़े और 12,892 छोटे नालों की सफाई का लक्ष्य रखा गया है। 

इसके साथ ही फरवरी 2026 से शुरू हुए अभियान में 6,000 किलोमीटर से अधिक छोटे नालों और 530 किलोमीटर बड़े नालों की सफाई की जा रही है। अप्रैल तक करीब 1.41 लाख मीट्रिक टन गाद हटाने के लिए लगभग 36 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। हालांकि, यह तैयारी अधिकतर रखरखाव आधारित है, संरचनात्मक सुधार आधारित नहीं।

2025 की शुरुआती बारिशों ने ही कई हिस्सों में जलभराव की समस्या उजागर कर दी थी। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जून की शुरुआत तक कई प्रमुख नालों की डिसिल्टिंग का काम अधूरा था और शहर का बड़ा हिस्सा समयसीमा से पीछे चल रहा था। यानी असली सवाल यह है कि क्या मौजूदा ढांचा बदलते शहरी दबाव को संभाल पा रहा है।

अध्ययनों के अनुसार दिल्ली के कई स्टॉर्म ड्रेन उस समय की बारिश को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, जब बारिश की तीव्रता अपेक्षाकृत कम होती थी। लेकिन अब दिल्ली में कम समय में बहुत तेज बारिश होने की घटनाएं बढ़ रही हैं।

दिल्ली की जलनिकासी व्यवस्था: पुरानी योजना, नया शहर

दिल्ली का मौजूदा स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज सिस्टम मुख्य रूप से 1970 के दशक की योजना पर आधारित है। Drainage Master Plan for NCT of Delhi के अनुसार, शहर की अधिकांश जलनिकासी संरचनाएं उस समय विकसित की गई थीं जब दिल्ली का शहरी विस्तार, आबादी और पक्की सतह (paved surface) क्षेत्र आज की तुलना में काफी कम था।

लेकिन पिछले कुछ दशकों में तेज़ी से हुए शहरीकरण और बढ़ते कंक्रीटीकरण ने इस व्यवस्था पर भारी दबाव डाला है। इसके साथ समस्या केवल क्षमता की नहीं, बल्कि प्रणालीगत डिज़ाइन की भी है।

मास्टर प्लान यह भी बताता है कि दिल्ली की ड्रेनेज व्यवस्था कई अलग-अलग एजेंसियों में बंटी हुई है। हर एजेंसी अपने हिस्से की जिम्मेदारी संभालती है, लेकिन प्राथमिकताएं अलग-अलग होने के कारण समन्वय की कमी बनी रहती है। इसका असर यह होता है कि बाढ़ जैसी स्थिति में एकीकृत और तेज़ कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है।

अध्ययनों के अनुसार दिल्ली के कई स्टॉर्म ड्रेन उस समय की बारिश को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, जब बारिश की तीव्रता अपेक्षाकृत कम होती थी। लेकिन अब दिल्ली में कम समय में बहुत तेज बारिश होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे में कुछ घंटों की भारी बारिश भी कई इलाकों में जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति पैदा कर देती है।

आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) के अध्ययनों में यह सामने आया है कि दिल्ली में बढ़ता जलभराव केवल भारी बारिश की वजह से नहीं है। दिल्ली ड्रेनेज मास्टर प्लान की रिपोर्ट भी यही कहती है कि शहर के कई प्राकृतिक जल-निकासी स्रोत (drainage channels), आर्द्रभूमियां (wetlands) और पुनर्भरण क्षेत्र (recharge zones) समय के साथ सिकुड़ते गए हैं। इससे वर्षा जल का प्राकृतिक अवशोषण कम हुआ और नालों पर दबाव बढ़ा। 

CAG और DPCC की रिपोर्ट में भी यह सामने आया है कि पुरानी डिजाइन, कचरा, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण नालों की क्षमता लगातार घट रही है। नालों में अनुपचारित गंदा पानी जाने और ठोस कचरा जमा होने से नालों में गाद की मात्रा बढ़ती है।

एजेंसी आधारित व्यवस्था और तालमेल की कमी

दिल्ली में मानसून पूर्व तैयारियों का एक बड़ा हिस्सा हर साल desilting यानी नालों से गाद निकालना होता है। जैसा कि पहले भी बताया गया है, साल 2026 में भी दिल्ली सरकार, MCD और IFCD ने इसे जलभराव रोकने की मुख्य रणनीति के रूप में पेश किया है। इसके लिए करोड़ों रुपये का बजट आवंटित किया गया है और दावा किया जा रहा है कि फरवरी में ही मशीन से गाद निकालने का काम शुरू हो चुका है।

यदि शहर की जल-निकासी क्षमता पुरानी योजना पर आधारित हो, जल-निकासी के सभी मार्ग अवरुद्ध हों और बारिश के दर में लगातार बढ़ोतरी हो रही हो, तो केवल गाद हटाने से बाढ़ या जल-जमाव का जोखिम पूरी तरह कम नहीं होता है।

शहर के कई नालों में पानी निकालने की क्षमता, ढलान और प्रवाह की दक्षता से जुड़ी समस्याएं हैं। कई जगह नालों का आकार मौजूदा बारिश के पानी की मात्रा के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। वहीं कई छोटे नाले कचरे और अतिक्रमण की वजह से लगातार संकरे होते जा रहे हैं।

इसके अलावा silting केवल प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है। दिल्ली जैसे अत्यधिक urbanised शहर में इसके पीछे कई मानवीय और संरचनात्मक कारण काम करते हैं: निर्माण स्थलों से निकलने वाला मलवा और मिट्टी, कच्ची सड़कों के किनारे से गाद का प्रवाह, प्लास्टिक और ठोस कचरा, नालों का अनुपचारित गंदा पानी, नालों के टूटे ढक्कन और प्लास्टिक आदि जैसा कचरा, नालों के मुहानों पर घास-फूस का उगना और अतिक्रमण।

इन कारणों से नालों की हाइड्रोलिक दक्षता (hydraulic efficiency) लगातार कम होती जाती है और पानी के बहाव में रुकावट बढ़ती है।

CAG और DPCC की रिपोर्ट में भी यह सामने आया है कि पुरानी डिजाइन, कचरा, अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण नालों की क्षमता लगातार घट रही है। नालों में अनुपचारित गंदा पानी जाने और ठोस कचरा जमा होने से नालों में गाद की मात्रा बढ़ती है।

हाल के वर्षों में भी यही समस्या विभिन्न स्तरों पर बनी हुई दिखाई देती है। कई विशेषज्ञ ने सवाल किए हैं कि क्या डिसिल्टिंग का मूल्यांकन केवल “कितनी गाद निकाली गई” के आधार पर होना चाहिए, या फिर “जलभराव कितना कम हुआ” जैसे परिणाम आधारित संकेतकों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

पिछले अनुभव: तैयारी, राहत और दोहराता संकट

दिल्ली में हर साल मानसून से पहले डिसिल्टिंग, मशीनों की तैनाती, नियंत्रण कक्ष, और हॉटस्पॉट मैपिंग का एक पूरा चक्र चलता है। कागज़ों पर यह तैयारी लगातार बेहतर होती दिखती है, लेकिन ज़मीन पर जलभराव की तस्वीर बहुत अलग रहती है।

2023 और 2024 के मानसून ने यह साफ किया कि कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में सुधार हुआ है, खासकर उन जगहों पर जहां स्थानीय स्तर पर पंपिंग और निगरानी मजबूत की गई। मिंटो रोड जैसी जगहों पर त्वरित हस्तक्षेप से स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रित रही। लेकिन दूसरी तरफ कई नए और पुराने जलभराव बिंदु फिर से सक्रिय हो गए।

CAG की 2014 की ऑडिट रिपोर्ट ने पहले ही यह रेखांकित किया था कि दिल्ली की ड्रेनेज व्यवस्था में केवल भौतिक क्षमता ही नहीं, बल्कि प्रशासन के स्तर पर और ज़िम्मेदारी की भी गंभीर कमी है।

नालों की सफाई बनाम वास्तविक समस्या

हाल के वर्षों में दिल्ली में स्टॉर्मवाटर प्रबंधन को लेकर कुछ महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव देखने को मिले हैं। IFCD ने ड्रेनेज मास्टर प्लानिंग को अपडेट करने की दिशा में कदम उठाए हैं, जिसमें जीआईएस आधारित मानचित्रण (GIS Mapping), बाढ़ के प्रमुख क्षेत्रों की पहचान और जलग्रहण क्षेत्र स्तर पर योजना बनाना को शामिल किया गया है।

इसके साथ ही, NGT ने बार-बार यह निर्देश दिया है कि मानसून से पहले सभी प्रमुख नालों की डिसिल्टिंग समय पर पूरी की जाए और गाद के निस्तारण की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि वह दोबारा ड्रेनेज प्रणाली में न लौटे।

नीति स्तर पर एक दूसरा बदलाव यह है कि अब केवल काम कितना हुआ नहीं, बल्कि जलभराव कितना कम हुआ जैसे परिणाम-आधारित संकेतकों पर भी चर्चा शुरू हुई है। यह बदलाव महत्वपूर्ण है, लेकिन अभी प्रारंभिक चरण में है।

अब नालों की सफाई के लिए मशीनों से गाद निकालने (mechanised desilting) का इस्तेमाल बढ़ा है। बाढ़-प्रभावित इलाकों की पहचान करके उन पर खास ध्यान दिया जा रहा है।

कंट्रोल रूम, रियल-टाइम निगरानी और बाढ़-प्रभावित इलाकों की पहचान जैसी व्यवस्थाएं शुरू की गई हैं। इसके साथ कुछ संवेदनशील क्षेत्रों में नालों की क्षमता बढ़ाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, जिससे त्वरित प्रतिक्रिया संभव हो सके। 

दिल्ली के कई प्राकृतिक जल-निकासी स्रोत, आर्द्रभूमियां और पुनर्भरण क्षेत्र समय के साथ सिकुड़ते गए हैं। इससे स्टॉर्मवॉटर प्रणालियों पर निर्भरता बढ़ी है। लेकिन इन ढांचों का विस्तार उसी गति से नहीं हो पाया।

संरचनात्मक समस्याआएं

इन कोशिशों का असर यह हुआ है कि कुछ इलाकों में जलभराव की गंभीरता कम हुई है, खासकर उन जगहों पर जहां स्थानीय प्रशासन और इंजीनियरिंग विभाग के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिला है। यह दिखाता है कि समस्या केवल प्रबंधन की नहीं, बल्कि डिजाइन और योजना के स्तर की भी है।

हाल के वर्षों में तकनीकी सुधारों, मशीनरी के उपयोग और योजनाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद दिल्ली की जलनिकासी व्यवस्था की मूल संरचनात्मक समस्याएँ लगभग जस की तस बनी हुई हैं।

सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण समस्या खंडित प्रशासन (fragmented governance) की हैदिल्ली में स्टॉर्मवाटर ड्रेनेज का प्रबंधन MCD, PWD, IFCD और दिल्ली जल बोर्ड जैसी कई एजेंसियों के बीच बंटा हुआ है।

हर एजेंसी अपने हिस्से की जिम्मेदारी संभालती है, लेकिन प्राथमिकताएं अलग-अलग होने के कारण समन्वय की कमी बनी रहती है। इसका असर यह होता है कि बाढ़ जैसी स्थिति में एकीकृत और तेज़ कार्रवाई करना मुश्किल हो जाता है।

दूसरी बड़ी समस्या पुरानी डिजाइन क्षमता की है। कई स्टॉर्म नाले अभी भी उस समय की बारिश के अनुमान के आधार पर डिज़ाइन किए गए हैं जब दिल्ली का शहरी क्षेत्र और पानी न सोखने वाली सतह (impermeable surface) बहुत सीमित था। लेकिन वर्तमान में स्थिति बदल चुकी है।

तीसरी और उतनी ही महत्वपूर्ण समस्या पारिस्थितिकी क्षति की है। दिल्ली के कई प्राकृतिक जल-निकासी स्रोत, आर्द्रभूमियां और पुनर्भरण क्षेत्र समय के साथ सिकुड़ते गए हैं। इससे स्टॉर्मवॉटर प्रणालियों पर निर्भरता बढ़ी है। लेकिन इन ढांचों का विस्तार उसी गति से नहीं हो पाया। क्योंकि ये प्राकृतिक तंत्र वर्षा जल को धीमा करने, फैलाने और जमीन में समाहित करने का काम करते थे। इनके कमजोर होने से स्टॉर्मवाटर सीधे मानव-निर्मित नालों पर दबाव डालता है। नीति दस्तावेज़ भी जलनिकासी को पारिस्थितिक और जलग्रहण-आधारित दृष्टिकोण से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर देते हैं।

इसे भूमि के बदलते उपयोग पैटर्न, पारिस्थितिक बहाली (ecological restoration) और जलग्रहण क्षेत्र आधारित (catchment-based) दृष्टिकोण के साथ जोड़ना जरूरी है।

यानी समस्या अब केवल यह नहीं है कि बारिश के पानी को निकाला कैसे जाए, बल्कि यह भी है कि शहर ने उसे संभालने की अपनी प्राकृतिक और संरचनात्मक क्षमता कितनी हद तक खो दी है।

आगे की राह: सिर्फ रखरखाव से आगे

दिल्ली में जलभराव को लेकर जो चर्चा हो रही है, वह धीरे-धीरे इस समझ की तरफ बढ़ रही है कि सिर्फ हर साल नालों की सफाई या आपातकाल में पानी निकाल देना ही काफी नहीं है। अब असली चुनौती यह है कि पानी को शहर के भीतर बेहतर तरीके से संभाला जाए, न कि सिर्फ बाहर निकाला जाए।

Stormwater planning framework में अब डिजिटल मैपिंग, जलभराव वाले संवेदनशील इलाकों की पहचान और पूरे जलग्रहण क्षेत्र की योजना जैसे पहलुओं को शामिल किया जा रहा है।

दिल्ली के जल प्रबंधन में अब तीन स्तरों पर बदलाव की आवश्यकता स्पष्ट होती जा रही है:

ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार: शहर में तालाबों और वेटलैंड को फिर से मजबूत करना, बारिश के पानी को इकट्ठा करने की व्यवस्था को ड्रेनेज सिस्टम से जोड़ना और ऐसी सतहों को बढ़ाना जो पानी को जमीन में जाने दें। ये अब केवल पर्यावरण के उपाय नहीं, बल्कि बाढ़ रोकने की रणनीति का हिस्सा हैं।

हर इलाके में अलग से पानी प्रबंधन: हर वार्ड और स्थानीय स्तर पर पानी को रोकने, जमीन में उतारने और छोटे जल-संग्रह ढांचे बनाए जाएँ, ताकि भारी बारिश का दबाव सीधे बड़े नालों पर न पड़े।

रियल-टाइम निगरानी और डेटा आधारित सिस्टम: बारिश मापने वाले सेंसर, बाढ़ का अनुमान लगाने वाले सिस्टम और एकीकृत कंट्रोल रूम के जरिए पहले से चेतावनी और तेज प्रतिक्रिया संभव हो सकती है।

जल नीति से जुड़े विश्लेषणों और संस्थानों का कहना है कि दिल्ली जैसे शहरों में अब सिर्फ इंजीनियरिंग आधारित सोच पर्याप्त नहीं है। जल निकासी को एक प्राकृतिक प्रणाली और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों के रूप में समझना होगा। इसमें जमीन का उपयोग, पानी का बहाव और शहर की योजना एक-दूसरे से जुड़े होने चाहिए। इन उपायों का प्रभाव तभी दिखेगा जब इन्हें एकीकृत शहरी नियोजन के साथ जोड़ा जाएगा।

हर साल की तैयारियों के बावजूद परिणाम यह दिखाते हैं कि समस्या केवल ऑपरेशनल नहीं, बल्कि संरचनात्मक है। जब तक शहरी नियोजन को जल-प्रणाली से अलग करके नहीं देखा जाएगा, तब तक डिसिल्टिंग जैसे उपाय केवल अस्थायी राहत ही देते रहेंगे।

असल सवाल यह नहीं है कि नाले कितने साफ हैं, बल्कि यह है कि क्या शहर केवल पानी निकालने के लिए बना है, या उसे संभालने के लिए भी तैयार है?

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