गर्मी में तमिलनाडु के होगेनेक्कल फॉल्स
फोटो - अजय मोहन
भारत में जल्दी आ गई गर्मी, सिमट रही सर्दियां - प्रशांत और हिंद महासागर से जुड़ा है मौसम का बदलता पैटर्न
भारत में मौसम के पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सामान्यतः ला नीना जैसे प्राकृतिक जलवायु चक्र वैश्विक तापमान को कुछ हद तक ठंडा करते हैं, लेकिन अब वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं के असर को कमजोर कर दिया है। इसका परिणाम यह है कि भारत में सर्दियां छोटी होती जा रही हैं और गर्मी पहले से कहीं जल्दी दस्तक दे रही है। और वर्तमान में चल रहे मार्च के महीना में ऐसा देखने को भी मिल रहा है।
एक समय था जब मार्च के मध्य तक उत्तर भारत में लोग कम से कम हाफ स्वेटर पहन कर रहते थे। दिन में भले ही थोड़ी गर्मी हो, लेकिन रातें ठंडी रहती थीं। ओर जब बात हीट वेव की आती थी, तब मार्च में लोग केवल यह सोच कर रहत में रहते थे कि अभी मई-जून दूर है। लेकिन अब मौसम पहले जैसा नहीं रहा है।
क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष भी भारत में फरवरी के पहले पखवाड़े में ही सर्दी लगभग समाप्त हो गई और कई क्षेत्रों में असामान्य रूप से जल्दी गर्मी शुरू हो गई। यह बदलाव केवल तापमान का नहीं है, बल्कि इससे जल संकट, कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है।
फरवरी से ही बढ़ने लगी गर्मी
मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार फरवरी के दूसरे पखवाड़े से ही उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया गया। कई स्थानों पर तापमान हीटवेव की सीमा तक पहुंचने लगा।
तीन प्रमुख स्थान जहां हीटवेव जैसा महसूस हुआ वो हैं:
मुंबई : जहां 10 मार्च को तापमान 40°C दर्ज हुआ, जो सामान्य से 7.6°C अधिक था और इसे गंभीर हीटवेव की श्रेणी में रखा गया।
दिल्ली-एनसीआर : यहां अधिकतम तापमान लगभग 35°C रहा, जो सामान्य से 5–7°C अधिक है।
हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्र: पहाड़ होने के बावजूद यहां सामान्य से 5.1°C से 8°C अधिक तापमान दर्ज किया गया।
मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि मार्च से मई के बीच देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक हीटवेव वाले दिन देखने को मिल सकते हैं।
क्या होता है हीटवेव?
भारतीय मौसम विभाग (IMD) हीट वेव को इस प्रकार परिभाषित करता है- जब तापमान सामान्य से काफी अधिक हो या वास्तविक तापमान एक निश्चित सीमा पार कर जाए तब उस क्षेत्र में हीट वेव घोषित की जाती है। क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के अनुसार तापमान का पैमाना इस प्रकार है-
मैदानी क्षेत्रों में: जब अधिकतम तापमान 40°C या उससे अधिक हो
पहाड़ी क्षेत्रों में: जब तापमान 30°C या उससे अधिक हो
तटीय क्षेत्रों में: जब तापमान 37°C या उससे अधिक हो
यदि यह स्थिति लगातार दो दिन तक बनी रहती है और एक से अधिक मौसम केंद्रों पर दर्ज होती है, तब इसे आधिकारिक रूप से हीटवेव घोषित किया जाता है।
हीटवेव को विस्तार से समझिए इस टेबल में -
सर्दियां क्यों हो रही हैं छोटी?
रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष उत्तर भारत में दिसंबर से फरवरी तक सर्दियों में बारिश और बर्फबारी बेहद कम हुई।
फरवरी में 81% वर्षा की कमी दर्ज की गई।
सामान्यतः फरवरी में लगभग 22.7 मिमी बारिश होती है, लेकिन इस बार केवल 4.2 मिमी बारिश हुई।
इस दौरान पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) सामान्य से अधिक आए, लेकिन अधिकांश कमजोर रहे और पर्याप्त बारिश नहीं कर सके। कम बारिश और बादलों की कमी के कारण तापमान तेजी से बढ़ने लगा और सर्दी जल्दी समाप्त हो गई।
ला नीना भी नहीं रोक पा रहा गर्मी का बढ़ना
आमतौर पर ला नीना प्रशांत महासागर में ठंडे समुद्री तापमान से जुड़ा एक जलवायु चक्र है, जो वैश्विक तापमान को कुछ हद तक कम करता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह पैटर्न बदलता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2025, ला नीना की स्थिति के बावजूद 1901 के बाद आठवां सबसे गर्म वर्ष रहा। पिछले 11 वर्षों में से सभी 11 वर्ष रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ गया है कि अब प्राकृतिक शीतलन प्रभाव भी पर्याप्त नहीं रह गया।
बढ़ती आर्द्रता और ‘वेट बल्ब तापमान’ का खतरा
तटीय क्षेत्रों में केवल तापमान ही नहीं, बल्कि नमी भी तेजी से बढ़ रही है। इससे वेट बल्ब तापमान बढ़ता है। यानी वह तापमान जिसे शरीर महसूस करता है। जब नमी अधिक होती है तो शरीर पसीने के माध्यम से खुद को ठंडा नहीं कर पाता। इससे हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण, हृदय और श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ने के साथ-साथ अन्य कई स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है।
हिंद महासागर की बढ़ती गर्मी
वैज्ञानिकों के अनुसार, हिंद महासागर का तेजी से गर्म होना भी मौसम के असंतुलन का बड़ा कारण है।
1950 से 2020 के बीच हिंद महासागर का तापमान लगभग 1.2°C प्रति शताब्दी की दर से बढ़ा।
भविष्य के मॉडल बताते हैं कि 2000 से 2100 के बीच यह वृद्धि 1.7°C से 3.8°C प्रति शताब्दी तक हो सकती है।
यह समुद्री गर्मी मानसून, वर्षा और चक्रवातों के पैटर्न को भी प्रभावित कर सकती है। समुद्र का तापमान जितना अधिक होगा मॉनसून में आने वाले चक्रवात उतने अधिक विनाशकारी होंगे। बीते वर्षों में बुलबुल, फानी, मोचा, सितरंग, आदि कितने भयावह थे, यह भारत व पड़ोसी देशों के तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं।
उत्तर भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
उत्तर भारत विशेषकर इंडो-गंगेटिक मैदान, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली पहले से ही गर्मी की लहरों के प्रति संवेदनशील क्षेत्र हैं। यहां पर मई-जून में लू चलना आम बात है। हीट-वेव के दिन बढ़ने के कारण गर्म हवाएं और अधिक गर्म हो सकती हैं।
इससे इन राज्यों में निम्नलिखित जोखिम बढ़ सकते हैं:
लंबी हीटवेव से ज्यादा समय तक गर्म हवाएं
रात्रि के तापमान में वृद्धि
पेट संबंधी बीमारियों का खतरा
जल संकट और भूजल पर दबाव
गेहूं जैसी रबी फसलों पर असर
शहरी क्षेत्रों में हीट आइलैंड प्रभाव
श्रम उत्पादकता में गिरावट
भारत में मौसम के पैटर्न के बदलने के कारण जो सरकार ने बताए
राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार:
भारत में तापमान बढ़ने के कारण जो सरकार ने बताए
राज्य सभा में पूछे गए एक प्रश्न में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की ओर से वर्षा और तापमान के विभिन्न पहलुओं की मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। रिपोर्ट के अनुसार:
भारत में तापमान में परिवर्तन
1901 से 2018 के बीच भारत का औसत तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। तापमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से ग्रीनहाउस गैसों के कारण होने वाली वैश्विक गर्मी का परिणाम है, हालांकि मानव गतिविधियों से उत्पन्न एरोसोल तथा भूमि उपयोग और भूमि आवरण (LULC) में बदलाव इसके प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करते हैं। पिछले तीन दशकों (1986–2015) के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष के सबसे गर्म दिन का तापमान लगभग 0.63 डिग्री सेल्सियस और सबसे ठंडी रात का तापमान लगभग 0.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है।
समुद्र के स्तर में वृद्धि
वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण महाद्वीपीय हिमखंड तेजी से पिघल रहे हैं और समुद्री जल का तापीय प्रसार भी बढ़ रहा है, जिसके चलते दुनिया भर में समुद्र का स्तर लगातार ऊपर उठ रहा है। उत्तरी हिंद महासागर (NIO) में 1874 से 2004 के बीच समुद्र स्तर में वृद्धि की दर लगभग 1.06 से 1.75 मिमी प्रति वर्ष रही, जो पिछले लगभग ढाई दशकों (1993–2017) में बढ़कर करीब 3.3 मिमी प्रति वर्ष तक पहुंच गई है।
उष्णकटिबंधीय चक्रवात
बीसवीं शताब्दी के मध्य से लेकर 1951–2018 के बीच उत्तरी हिंद महासागर बेसिन में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की कुल वार्षिक संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि इसके विपरीत, मानसून के बाद के मौसम में आने वाले बहुत गंभीर चक्रवाती तूफानों (Very Severe Cyclonic Storms - VSCS) की आवृत्ति पिछले दो दशकों (2000–2018) में स्पष्ट रूप से बढ़ी है, जिसमें औसतन प्रति दशक लगभग एक अतिरिक्त घटना दर्ज की गई है।
हिमालय में परिवर्तन
हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में 1951 से 2014 के बीच औसत तापमान में लगभग 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। हाल के दशकों में इस क्षेत्र के कई हिस्सों में हिमपात में कमी और ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रवृत्ति देखी गई है। हालांकि इसके विपरीत, उच्च ऊंचाई वाले काराकोरम हिमालय में सर्दियों के दौरान अपेक्षाकृत अधिक हिमपात हुआ है, जिसके कारण यहां के ग्लेशियर अन्य क्षेत्रों की तुलना में सिकुड़ने से काफी हद तक बचे हुए हैं।
भारी वर्षा और सूखा
1950 से 2015 के बीच अत्यधिक वर्षा की घटनाओं—यानी एक दिन में 150 मिमी से अधिक बारिश—की आवृत्ति में लगभग 75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं दूसरी ओर, 1951 से 2015 के दौरान भारत में सूखे की घटनाओं की संख्या और उनका भौगोलिक विस्तार भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है।
आगे क्या करना होगा?
रिपोर्ट के माध्यम से विशेषज्ञों ने कहा है कि बदलते मौसम से निपटने के लिए केवल चेतावनी र्याप्त नहीं होगी। इसके लिए कई स्तरों पर कदम जरूरी हैं:
शहरों में हीट एक्शन प्लान लागू करना
जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना
जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों को अपनाना
शहरी क्षेत्रों में हरित क्षेत्र और जल निकायों का संरक्षण
कुल मिलाकर भारत में मौसम के पारंपरिक पैटर्न तेजी से बदल रहे हैं। सर्दियों का छोटा होना और गर्मी का जल्दी आना अब अपवाद नहीं बल्कि नया सामान्य बनता जा रहा है। यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया और स्थानीय स्तर पर अनुकूलन रणनीतियां नहीं अपनाई गईं, तो आने वाले वर्षों में हीटवेव, जल संकट और मौसम की अनिश्चितता भारत के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है।
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