वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (पश्चिमी विक्षोभ) क्या है?

जानिए क्‍या होता है पश्चिमी विक्षोभ यानी (Western Disturbance) और कैसे भारत में बारिश, तेज़ हवाओं और बर्फबारी को ये नियंत्रित करता है।
बीते कुछ वर्षों में भारत में मौसमी घटनाओं में देखे जा रहे परिवर्तनों की वजह पश्चिमी विक्षोभ को बताया जा रहा है 

बीते कुछ वर्षों में भारत में मौसमी घटनाओं में देखे जा रहे परिवर्तनों की वजह पश्चिमी विक्षोभ को बताया जा रहा है 

स्रोत : विकी कॉमंस

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इस बार मॉनसून ने देश के कई हिस्सों में मौसम ने बिल्कुल उलट तस्वीर पेश की है। उत्तर भारत से लेकर मध्य और पूर्वी क्षेत्रों तक मूसलाधार बारिश, ओलावृष्टि, तेज आंधियां और पहाड़ों में बर्फबारी ने लोगों को चौंका दिया है।

मानसून आने में अभी दो-तीन महीने बाकी हैं, फिर भी पूरा देश बारिश में तरबतर है। दरअसल, देशभर में हो रही इस पूरे घटनाक्रम  के पीछे एक अनूठी मौसमी घटना का हाथ है। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे पश्चिमी विक्षोभ या Western Disturbance के नाम से जाना जाता है।

अक्सर एक और कभी कभी दो-दो पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो जाते हैं, जिनके असर से देश के मौसम का मिजाज बदल जाता है। इसी के चलते पश्चिमी हिमालय से पूर्वी हिस्सों तक बारिश और पहाड़ों में भारी हिमपात होता है। जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और पूर्वी मध्य प्रदेश में ओले और तेज हवाएं भी इसी के कारण चलती हैं।

मौसम विभाग IMD जब किसी क्षेत्र में आंधी और ओलावृष्टि का अलर्ट जारी करता है तब वो स्थिति केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु और वैश्विक मौसमी तंत्र में हो रहे बदलावों की झलक भी दिखाती है। आखिर यह पश्चिमी विक्षोभ क्या है, कैसे बनता है, और क्यों अब इसका असर पहले से अधिक तीव्र दिख रहा है, इस लेख में हम इन्हीं सवालों के जवाब विस्‍तार से देने की कोशिश कर रहे हैं।

एक साथ दो पश्चिमी विक्षोभ हुए सक्रिय

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार 2026 में देश के मौसम पर दो पश्चिमी विक्षोभों का संयुक्त असर देखने को मिल रहा है। जहां एक सक्रिय विक्षोभ पाकिस्तान और पंजाब के आसपास ऊपरी वायुमंडल में मौजूद है, वहीं दूसरा पश्चिमी विक्षोभ वर्तमान में ईरान–अफगानिस्तान क्षेत्र के ऊपर सक्रिय है और वहीं से पूर्व की ओर बढ़ रहा है।

यह दूसरा सिस्टम पश्चिमी एशिया के इसी इलाके से आगे बढ़ते हुए धीरे-धीरे पाकिस्तान और फिर उत्तर-पश्चिम भारत की ओर बढ़ रहा है। रास्ते में यह भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आई नमी को साथ समेटता चल रहा है। इस तरह, यह दूसरा सिस्टम पहले से मौजूद विक्षोभ के साथ मिलकर एक व्यापक मौसम तंत्र तैयार कर रहा है। दोनों प्रणालियों के आपसी प्रभाव के कारण नमी की आपूर्ति बढ़ जाती है और वायुमंडल में अस्थिरता (instability) पैदा होती है। यही वजह है कि उत्तर भारत से लेकर मध्य और पूर्वी हिस्सों तक तेज आंधी, बारिश और ओलावृष्टि की घटनाएं अधिक तीव्र रूप में देखने को मिल रही हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, जब दो पश्चिमी विक्षोभ एक साथ सक्रिय होते हैं, तो उनका प्रभाव सामान्य से कहीं ज्यादा व्यापक और असरदार हो जाता है। जब यह दूसरा विक्षोभ पहले से सक्रिय सिस्टम के करीब पहुंचता है, तो दोनों के बीच परस्पर क्रिया (interaction) होती है। इससे वायुमंडल में अस्थिरता बढ़ती है और नमी की आपूर्ति अधिक हो जाती है, जिसके कारण बारिश, आंधी और ओलावृष्टि की घटनाएं ज्यादा व्यापक और तीव्र रूप में सामने आती हैं।

<div class="paragraphs"><p>पश्चिमी विक्षोभ एक प्रकार की सीजनल मौसम प्रणाली है, जो भारतीय उपमहाद्वीप सहित एशिया के कई देशों पर अपना असर दिखाती है।&nbsp;</p></div>

पश्चिमी विक्षोभ एक प्रकार की सीजनल मौसम प्रणाली है, जो भारतीय उपमहाद्वीप सहित एशिया के कई देशों पर अपना असर दिखाती है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

क्‍या होता है पश्चिमी विक्षोभ

पश्चिमी विक्षोभ एक प्रकार की एक्स्ट्रा-ट्रॉपिकल स्टॉर्म प्रणाली है, जो मुख्य रूप से भूमध्यसागर (Mediterranean Sea) के आसपास बनती है और पश्चिम से चलने वाली हवाओं (Westerlies) के साथ भारत की ओर बढ़ती है। यह प्रणाली जब भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्सों, खासकर पश्चिमी हिमालय से टकराती है, तो यह अपने साथ नमी लेकर आती है और वर्षा, बर्फबारी तथा आंधी-तूफान जैसी घटनाओं को जन्म देती है। सामान्यतः यह विक्षोभ सर्दियों में सक्रिय रहते हैं और उत्तर भारत की रबी फसलों के लिए जरूरी वर्षा प्रदान करते हैं। लेकिन इस बार अप्रैल में इनकी सक्रियता ने मौसम के सामान्य चक्र को बाधित कर दिया है।

पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव सबसे पहले जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में दिखता है, जहां यह भारी बर्फबारी कराता है। इसके बाद यह धीरे-धीरे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत की ओर बढ़ता है। इस बार दो सक्रिय पश्चिमी विक्षोभों के एक साथ प्रभाव के कारण बारिश का दायरा बढ़ गया है। IMD के अनुसार, इस तरह की स्थिति दुर्लभ नहीं है, लेकिन अप्रैल में इसकी तीव्रता असामान्य मानी जा रही है।

जाड़े की 70–80% बारिश Western Disturbance के कारण
उत्तर भारत में सर्दियों की 70–80% वर्षा पश्चिमी विक्षोभ के कारण ही होती है। दिसंबर से मार्च तक उत्तर भारत में हल्की से मध्यम बारिश और पहाड़ों में बर्फबारी का बड़ा हिस्सा इन्हीं पश्चिमी विक्षोभों के कारण होता है।
<div class="paragraphs"><p>पश्चिमी विक्षोभ अकसर भूमध्‍य सागर, काला सागर के इलाके से उठ कर पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली हवाओं के साथ भारत आकर अनियमित बारिश का कारण बनता है।&nbsp;</p></div>

पश्चिमी विक्षोभ अकसर भूमध्‍य सागर, काला सागर के इलाके से उठ कर पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली हवाओं के साथ भारत आकर अनियमित बारिश का कारण बनता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

पश्चिमी विक्षोभ बनने के कारण

पश्चिमी विक्षोभ के निर्माण के पीछे कई जटिल वायुमंडलीय प्रक्रियाएं काम करती हैं। इसका मुख्य स्रोत भूमध्यसागर और उसके आसपास का क्षेत्र है, जहां तापमान में अंतर और समुद्री नमी मिलकर निम्न दबाव क्षेत्र (Low Pressure System) बनाते हैं। जब यह निम्न दबाव क्षेत्र पश्चिमी हवाओं के साथ पूर्व की ओर बढ़ता है, तो यह रास्ते में नमी और ऊर्जा जुटाता जाता है। भारत पहुंचने तक यह एक सक्रिय मौसम प्रणाली में बदल जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि महासागरों का बढ़ता तापमान इस प्रक्रिया को और तीव्र बना रहा है। गर्म समुद्र अधिक नमी छोड़ते हैं, जिससे विक्षोभ अधिक ताकतवर हो जाते हैं।

इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से हो रही गर्मी (Arctic Amplification) भी जेट स्ट्रीम को प्रभावित कर रही है। जेट स्ट्रीम की दिशा और गति में बदलाव से पश्चिमी विक्षोभ की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ सकती हैं। इस बार अप्रैल में दो पश्चिमी विक्षोभों का एक साथ सक्रिय होना इसी वैश्विक बदलाव की ओर संकेत कर रहा है।

पश्चिमी विक्षोभ और मानसून में अंतर

पश्चिमी विक्षोभ और मानसून दोनों ही वर्षा लाने वाली प्रणालियां हैं, लेकिन इनकी प्रकृति, स्रोत और समय पूरी तरह अलग होते हैं। पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों और कभी-कभी प्री-समर (जैसे अप्रैल) में सक्रिय होता है, जबकि मानसून जून से सितंबर तक भारत में वर्षा लाता है। मानसून का स्रोत हिंद महासागर और अरब सागर होता है, जबकि पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर से उत्पन्न होता है।

मानसून एक व्यापक और स्थायी प्रणाली है, जो पूरे देश में लंबी अवधि तक वर्षा करता है। इसके विपरीत, पश्चिमी विक्षोभ एक अस्थायी और गतिशील प्रणाली है, जिसका प्रभाव कुछ दिनों तक ही रहता है। इसके अलावा, मानसून दक्षिण-पश्चिम दिशा से आता है, जबकि पश्चिमी विक्षोभ पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता है। इस अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि अप्रैल में हो रही बारिश को कई लोग मानसून की शुरुआती आहट समझ लेते हैं, जबकि यह पूरी तरह अलग मौसमी घटना है।

गेहूं, चना और सरसों के लिए उपयोगी
पश्चिमी विक्षोभ के कारण हुई बारिश की नमी गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलों के लिए उपयोगी होती है। अगर पश्चिमी विक्षोभ कमजोर पड़ जाएं, तो सर्दियां सूखी हो सकती हैं और फसल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। वहीं, अगर ये बहुत ज्यादा सक्रिय हो जाएं (जैसा कि इस बार अप्रैल में दिख रहा है) तो खेती को नुकसान पहुंचता है।

वेस्टर्न डिस्टर्बन्स का खेती पर असर

पश्चिमी विक्षोभ का कृषि पर प्रभाव दोधारी तलवार जैसा होता है। जहां सर्दियों में यह रबी फसलों के लिए वरदान साबित होता है, वहीं अप्रैल में इसकी तीव्रता किसानों के लिए नुकसान का कारण बन सकती है। इस समय गेहूं, सरसों और चना जैसी फसलें कटाई के चरण में होती हैं। अचानक आई बारिश और ओलावृष्टि से इन फसलों को भारी नुकसान होता है। खेतों में खड़ी फसलें गिर जाती हैं और गुणवत्ता भी खराब हो जाती है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में हाल की बारिश और ओलों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। IMD ने भी चेतावनी दी है कि तेज हवाएं और ओलावृष्टि फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। हालांकि, कुछ मामलों में यह बारिश मिट्टी में नमी बढ़ाकर अगली फसल के लिए लाभकारी भी हो सकती है, लेकिन कुल मिलाकर अप्रैल में इसका प्रभाव अधिकतर नकारात्मक ही रहता है।

<div class="paragraphs"><p>मौसम विभाग के मुताबिक इस समय एक साथ दो&nbsp;पश्चिमी विक्षोभों के सक्रिय होने के कारण उत्‍तर भारत में तगड़ी बारिश देखने को मिल रही है।&nbsp;</p></div>

मौसम विभाग के मुताबिक इस समय एक साथ दो पश्चिमी विक्षोभों के सक्रिय होने के कारण उत्‍तर भारत में तगड़ी बारिश देखने को मिल रही है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

बदलता मौसम और बढ़ती अनिश्चितता

पश्चिमी विक्षोभ की बढ़ती तीव्रता केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का संकेत भी हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे मौसम प्रणालियों का व्यवहार भी बदल रहा है। पहले जहां पश्चिमी विक्षोभ मुख्यतः सर्दियों तक सीमित रहता था, अब यह प्री-समर और कभी-कभी गर्मियों में भी सक्रिय हो रहा है। इससे मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है और पूर्वानुमान भी चुनौतीपूर्ण हो रहा है। इसके अलावा, शहरीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव और प्रदूषण भी स्थानीय मौसम को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे इन प्रणालियों का असर और जटिल हो जाता है।

आपदा प्रबंधन और चेतावनी प्रणाली की भूमिका

एक साथ कई तगड़े पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता की स्थिति में मौसम विभाग (IMD) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। समय रहते चेतावनी जारी करना और लोगों तक सही जानकारी पहुंचाना नुकसान को कम करने में मदद कर सकता है।

हाल के वर्षों में IMD ने अपनी तकनीक और पूर्वानुमान क्षमता में सुधार किया है, जिससे अब अधिक सटीक और समय पर अलर्ट जारी किए जा रहे हैं। लेकिन, केवल चेतावनी पर्याप्त नहीं है। स्थानीय प्रशासन, किसानों और आम लोगों को भी इन अलर्ट्स को गंभीरता से लेना और आवश्यक सावधानियां बरतना भी ज़रूरी है।

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