अप्रैल के महीने में गर्मी की दस्तक के बजाय भारी बारिश की वजह पश्चिमी विक्षोभ नाम की मौसमी घटना को बताया जा रहा है।
स्रोत : विकी कॉमंस
वेस्टर्न डिस्टर्बेंस (पश्चिमी विक्षोभ) क्या है? जानिए भारी बारिश को लेकर IMD का अलर्ट (23 जुलाई)
इस बार मॉनसून ने देश के कई हिस्सों में मौसम ने बिल्कुल उलट तस्वीर पेश की है। उत्तर भारत से लेकर मध्य और पूर्वी क्षेत्रों तक मूसलाधार बारिश, ओलावृष्टि, तेज आंधियां और पहाड़ों में बर्फबारी ने लोगों को चौंका दिया है।
मानसून आने में अभी दो-तीन महीने बाकी हैं, फिर भी पूरा देश बारिश में तरबतर है। दरअसल, देशभर में हो रही इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक अनूठी मौसमी घटना का हाथ है। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे पश्चिमी विक्षोभ या Western Disturbance के नाम से जाना जाता है।
गौरतलब यह है कि देश में इस समय एक नहीं, बल्कि दो-दो पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हैं, जिनके असर से देश के मौसम का मिजाज बदला हुआ है। इसी के चलते पश्चिमी हिमालय से पूर्वी हिस्सों तक बारिश और पहाड़ों में भारी हिमपात हुआ। जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और पूर्वी मध्य प्रदेश में ओले और तेज हवाएं चलीं।
इसे देखते हुए मौसम विभाग IMD ने 10 अप्रैल तक कई क्षेत्रों में आंधी और ओलावृष्टि का अलर्ट जारी किया है। यह स्थिति केवल मौसम का उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि जलवायु और वैश्विक मौसमी तंत्र में हो रहे बदलावों की भी झलक दिखाती है। आखिर यह पश्चिमी विक्षोभ क्या है, कैसे बनता है, और क्यों अब इसका असर पहले से अधिक तीव्र दिख रहा है, इस लेख में हम इन्हीं सवालों के जवाब विस्तार से देने की कोशिश कर रहे हैं।
एक साथ दो पश्चिमी विक्षोभ हुए सक्रिय
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार इस समय देश के मौसम पर दो पश्चिमी विक्षोभों का संयुक्त असर देखने को मिल रहा है। जहां एक सक्रिय विक्षोभ पाकिस्तान और पंजाब के आसपास ऊपरी वायुमंडल में मौजूद है, वहीं दूसरा पश्चिमी विक्षोभ वर्तमान में ईरान–अफगानिस्तान क्षेत्र के ऊपर सक्रिय है और वहीं से पूर्व की ओर बढ़ रहा है।
यह दूसरा सिस्टम पश्चिमी एशिया के इसी इलाके से आगे बढ़ते हुए धीरे-धीरे पाकिस्तान और फिर उत्तर-पश्चिम भारत की ओर बढ़ रहा है। रास्ते में यह भूमध्यसागरीय क्षेत्र से आई नमी को साथ समेटता चल रहा है। इस तरह, यह दूसरा सिस्टम पहले से मौजूद विक्षोभ के साथ मिलकर एक व्यापक मौसम तंत्र तैयार कर रहा है। दोनों प्रणालियों के आपसी प्रभाव के कारण नमी की आपूर्ति बढ़ जाती है और वायुमंडल में अस्थिरता (instability) पैदा होती है। यही वजह है कि उत्तर भारत से लेकर मध्य और पूर्वी हिस्सों तक तेज आंधी, बारिश और ओलावृष्टि की घटनाएं अधिक तीव्र रूप में देखने को मिल रही हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, जब दो पश्चिमी विक्षोभ एक साथ सक्रिय होते हैं, तो उनका प्रभाव सामान्य से कहीं ज्यादा व्यापक और असरदार हो जाता है। जब यह दूसरा विक्षोभ पहले से सक्रिय सिस्टम के करीब पहुंचता है, तो दोनों के बीच परस्पर क्रिया (interaction) होती है। इससे वायुमंडल में अस्थिरता बढ़ती है और नमी की आपूर्ति अधिक हो जाती है, जिसके कारण बारिश, आंधी और ओलावृष्टि की घटनाएं ज्यादा व्यापक और तीव्र रूप में सामने आती हैं।
पश्चिमी विक्षोभ एक प्रकार की सीजनल मौसम प्रणाली है, जो भारतीय उपमहाद्वीप सहित एशिया के कई देशों पर अपना असर दिखाती है।
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क्या होता है पश्चिमी विक्षोभ
पश्चिमी विक्षोभ एक प्रकार की एक्स्ट्रा-ट्रॉपिकल स्टॉर्म प्रणाली है, जो मुख्य रूप से भूमध्यसागर (Mediterranean Sea) के आसपास बनती है और पश्चिम से चलने वाली हवाओं (Westerlies) के साथ भारत की ओर बढ़ती है। यह प्रणाली जब भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी हिस्सों, खासकर पश्चिमी हिमालय से टकराती है, तो यह अपने साथ नमी लेकर आती है और वर्षा, बर्फबारी तथा आंधी-तूफान जैसी घटनाओं को जन्म देती है। सामान्यतः यह विक्षोभ सर्दियों में सक्रिय रहते हैं और उत्तर भारत की रबी फसलों के लिए जरूरी वर्षा प्रदान करते हैं। लेकिन इस बार अप्रैल में इनकी सक्रियता ने मौसम के सामान्य चक्र को बाधित कर दिया है।
पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव सबसे पहले जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में दिखता है, जहां यह भारी बर्फबारी कराता है। इसके बाद यह धीरे-धीरे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत की ओर बढ़ता है। इस बार दो सक्रिय पश्चिमी विक्षोभों के एक साथ प्रभाव के कारण बारिश का दायरा बढ़ गया है। IMD के अनुसार, इस तरह की स्थिति दुर्लभ नहीं है, लेकिन अप्रैल में इसकी तीव्रता असामान्य मानी जा रही है।
पश्चिमी विक्षोभ अकसर भूमध्य सागर, काला सागर के इलाके से उठ कर पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली हवाओं के साथ भारत आकर अनियमित बारिश का कारण बनता है।
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पश्चिमी विक्षोभ बनने के कारण
पश्चिमी विक्षोभ के निर्माण के पीछे कई जटिल वायुमंडलीय प्रक्रियाएं काम करती हैं। इसका मुख्य स्रोत भूमध्यसागर और उसके आसपास का क्षेत्र है, जहां तापमान में अंतर और समुद्री नमी मिलकर निम्न दबाव क्षेत्र (Low Pressure System) बनाते हैं। जब यह निम्न दबाव क्षेत्र पश्चिमी हवाओं के साथ पूर्व की ओर बढ़ता है, तो यह रास्ते में नमी और ऊर्जा जुटाता जाता है। भारत पहुंचने तक यह एक सक्रिय मौसम प्रणाली में बदल जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि महासागरों का बढ़ता तापमान इस प्रक्रिया को और तीव्र बना रहा है। गर्म समुद्र अधिक नमी छोड़ते हैं, जिससे विक्षोभ अधिक ताकतवर हो जाते हैं।
इसके अलावा, आर्कटिक क्षेत्र में तेजी से हो रही गर्मी (Arctic Amplification) भी जेट स्ट्रीम को प्रभावित कर रही है। जेट स्ट्रीम की दिशा और गति में बदलाव से पश्चिमी विक्षोभ की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ सकती हैं। इस बार अप्रैल में दो पश्चिमी विक्षोभों का एक साथ सक्रिय होना इसी वैश्विक बदलाव की ओर संकेत कर रहा है।
पश्चिमी विक्षोभ और मानसून में अंतर
पश्चिमी विक्षोभ और मानसून दोनों ही वर्षा लाने वाली प्रणालियां हैं, लेकिन इनकी प्रकृति, स्रोत और समय पूरी तरह अलग होते हैं। पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों और कभी-कभी प्री-समर (जैसे अप्रैल) में सक्रिय होता है, जबकि मानसून जून से सितंबर तक भारत में वर्षा लाता है। मानसून का स्रोत हिंद महासागर और अरब सागर होता है, जबकि पश्चिमी विक्षोभ भूमध्यसागर से उत्पन्न होता है।
मानसून एक व्यापक और स्थायी प्रणाली है, जो पूरे देश में लंबी अवधि तक वर्षा करता है। इसके विपरीत, पश्चिमी विक्षोभ एक अस्थायी और गतिशील प्रणाली है, जिसका प्रभाव कुछ दिनों तक ही रहता है। इसके अलावा, मानसून दक्षिण-पश्चिम दिशा से आता है, जबकि पश्चिमी विक्षोभ पश्चिम से पूर्व की ओर बढ़ता है। इस अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि अप्रैल में हो रही बारिश को कई लोग मानसून की शुरुआती आहट समझ लेते हैं, जबकि यह पूरी तरह अलग मौसमी घटना है।
वेस्टर्न डिस्टर्बन्स का खेती पर असर
पश्चिमी विक्षोभ का कृषि पर प्रभाव दोधारी तलवार जैसा होता है। जहां सर्दियों में यह रबी फसलों के लिए वरदान साबित होता है, वहीं अप्रैल में इसकी तीव्रता किसानों के लिए नुकसान का कारण बन सकती है। इस समय गेहूं, सरसों और चना जैसी फसलें कटाई के चरण में होती हैं। अचानक आई बारिश और ओलावृष्टि से इन फसलों को भारी नुकसान होता है। खेतों में खड़ी फसलें गिर जाती हैं और गुणवत्ता भी खराब हो जाती है।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कई इलाकों में हाल की बारिश और ओलों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। IMD ने भी चेतावनी दी है कि तेज हवाएं और ओलावृष्टि फसलों को नुकसान पहुंचा सकती हैं। हालांकि, कुछ मामलों में यह बारिश मिट्टी में नमी बढ़ाकर अगली फसल के लिए लाभकारी भी हो सकती है, लेकिन कुल मिलाकर अप्रैल में इसका प्रभाव अधिकतर नकारात्मक ही रहता है।
मौसम विभाग के मुताबिक इस समय एक साथ दो पश्चिमी विक्षोभों के सक्रिय होने के कारण उत्तर भारत में तगड़ी बारिश देखने को मिल रही है।
स्रोत : विकी कॉमंस
बदलता मौसम और बढ़ती अनिश्चितता
पश्चिमी विक्षोभ की बढ़ती तीव्रता केवल एक मौसमी घटना नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन का संकेत भी हो सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, वैसे-वैसे मौसम प्रणालियों का व्यवहार भी बदल रहा है। पहले जहां पश्चिमी विक्षोभ मुख्यतः सर्दियों तक सीमित रहता था, अब यह प्री-समर और कभी-कभी गर्मियों में भी सक्रिय हो रहा है। इससे मौसम की अनिश्चितता बढ़ रही है और पूर्वानुमान भी चुनौतीपूर्ण हो रहा है। इसके अलावा, शहरीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव और प्रदूषण भी स्थानीय मौसम को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे इन प्रणालियों का असर और जटिल हो जाता है।
आपदा प्रबंधन और चेतावनी प्रणाली की भूमिका
एक साथ कई तगड़े पश्चिमी विक्षोभ की सक्रियता की स्थिति में मौसम विभाग (IMD) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। समय रहते चेतावनी जारी करना और लोगों तक सही जानकारी पहुंचाना नुकसान को कम करने में मदद कर सकता है।
हाल के वर्षों में IMD ने अपनी तकनीक और पूर्वानुमान क्षमता में सुधार किया है, जिससे अब अधिक सटीक और समय पर अलर्ट जारी किए जा रहे हैं। लेकिन, केवल चेतावनी पर्याप्त नहीं है। स्थानीय प्रशासन, किसानों और आम लोगों को भी इन अलर्ट्स को गंभीरता से लेना और आवश्यक सावधानियां बरतना भी ज़रूरी है।
IMD ने कहां-कहां दी बारिश एक चेतावनी (22 जुलाई)
आज देश के कई हिस्सों में भारी से बहुत भारी बारिश की चेतावनी जारी की गई है। गुजरात, मध्य महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, कोंकण-गोवा, कर्नाटक, तेलंगाना और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में विशेष सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।
उत्तर भारत में भारी बारिश की चेतावनी
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में अगले 24 घंटे के दौरान कुछ स्थानों पर भारी बारिश की संभावना है।
पूर्वी राजस्थान में अगले 24 घंटे के दौरान भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना है।
23 से 28 जुलाई तक हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में अधिकांश स्थानों पर बारिश जारी रहने की संभावना है। उत्तराखंड में 23 से 28 जुलाई, पंजाब में 23 व 25 जुलाई, हरियाणा-दिल्ली में 23 जुलाई, पूर्वी उत्तर प्रदेश में 26 से 28 जुलाई, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व पूर्वी राजस्थान में 27 से 28 जुलाई तथा पश्चिमी राजस्थान में 23 से 26 जुलाई कुछ स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है।
पंजाब (27–28 जुलाई), हरियाणा-दिल्ली (27–28 जुलाई) और पूर्वी राजस्थान (23–26 जुलाई) में कुछ स्थानों पर बहुत भारी बारिश की संभावना है।
मध्य भारत में अगले 24 घंटों का अलर्ट
मध्य प्रदेश में अगले 24 घंटे के दौरान कुछ स्थानों पर भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना है।
छत्तीसगढ़ में अगले 24 घंटे के दौरान कुछ स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है।
23 जुलाई को पश्चिमी और पूर्वी मध्य प्रदेश में बहुत भारी बारिश तथा 24 से 25 जुलाई को भारी बारिश की संभावना है। छत्तीसगढ़ में 23 जुलाई को भारी बारिश हो सकती है।
पूर्वी भारत में अगले सप्ताह तक भारी बारिश के संकेत
बिहार, झारखंड और गंगा के मैदानी पश्चिम बंगाल में अगले 24 घंटे के दौरान कुछ स्थानों पर भारी बारिश की संभावना है।
23 से 28 जुलाई के दौरान झारखंड और ओडिशा में कई दिनों तक भारी बारिश की संभावना है। बिहार में 23–24 जुलाई तथा 27–28 जुलाई को भारी बारिश हो सकती है। गंगा के मैदानी पश्चिम बंगाल में 23–24 जुलाई को और उप-हिमालयी पश्चिम बंगाल एवं सिक्किम में 26–28 जुलाई के दौरान भारी बारिश की संभावना है।
पश्चिम भारत - अरब सागर में 50-60 km/hr की हवाएं
अरब सागर में 50-60 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से हवाएं चलने की संभावना है जिसका प्रभाव महाराष्ट्र के तटीय इलाकों में देखने को मिलेगा।
गुजरात क्षेत्र और मध्य महाराष्ट्र में अगले 24 घंटे के दौरान भारी से बहुत भारी बारिश के साथ कुछ स्थानों पर अत्यंत भारी बारिश की संभावना है।
कोंकण और गोवा में अगले 24 घंटे के दौरान भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना है।
23 से 24 जुलाई के दौरान गुजरात क्षेत्र तथा 23 जुलाई को मध्य महाराष्ट्र में कुछ स्थानों पर अत्यंत भारी बारिश की चेतावनी है। कोंकण और गोवा में 23 जुलाई को बहुत भारी बारिश तथा 24–25 व 28 जुलाई को भारी बारिश की संभावना है।
दक्षिण भारत में भारी बारिश हो सकती है
कर्नाटक, केरल और तेलंगाना में अगले 24 घंटे के दौरान कुछ स्थानों पर भारी बारिश की संभावना है।
23 जुलाई को उत्तर आंतरिक कर्नाटक, दक्षिण आंतरिक कर्नाटक, केरल और तेलंगाना में भारी बारिश हो सकती है। तटीय कर्नाटक में 23 जुलाई तथा 26 से 28 जुलाई के दौरान भारी बारिश की संभावना है।
पूर्वोत्तर भारत में भी भारी बारिश के संकेत
नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में अगले 24 घंटे के दौरान भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना है।
अरुणाचल प्रदेश तथा असम-मेघालय में अगले 24 घंटे के दौरान कुछ स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है।
23 जुलाई को नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा में बहुत भारी बारिश तथा 24 से 28 जुलाई तक भारी बारिश की संभावना है। अरुणाचल प्रदेश और असम-मेघालय में 23 से 28 जुलाई तक कुछ स्थानों पर भारी बारिश हो सकती है।
स्रोत: IMD ऑल इंडिया वेदर समरी एंड फोरकास्ट बुलेटिन (23 जुलाई, प्रातः) एवं मौसम चेतावनी अनुभाग।
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