अटलांटिक महासागर में उभर रहे मौसमी पैटर्न 'अटलांटिक नीना' से भारत में इस बार अलनीलो के कारण कमजोर पड़े मानसून में तेजी आने की उम्मीद है।
फोटो : विकी कॉमंस
क्या है ‘अटलांटिक नीना’? जो कर सकता है सुपर अलनीनो से बिगड़े मॉनसून की भरपाई
इस लेख में हम आपको बताने जा रहे हैं कि अटलांटिक नीना क्या है? यह कैसे और क्यों उत्पन्न होता है और यह भारत के मानसून को कैसे व कितना प्रभावित कर सकता है? साथ ही इसके असर से भारत में आने वाले समय में मौसम का मिजाज पर क्या असर पड़ सकता है?
इस साल अलनीलो (El Niño) के कारण मानसून के कमजोर पड़ने के कारण बारिश में हुई कमी की कसर आने वाले कुछ दिनों में पूरी होने के आसार हैं। ऐसा हो सकता है भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर अटलांटिक महासागर में उभरते एक मौसमी बदलाव के कारण, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में अटलांटिक नीना (Atlantic Nina) कहा जाता है। कई दशकों में एकाध बार ही उभरने वाले मौसम के इस पैटर्न के कारण अटलांटिक महासागर के तापमान में अचानक गिरावट आने से दुनिया भर में मौसम के पैटर्न (Weather patterns) पर असर पड़ता है। इसका असर भारत के मानसून पर भी पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
मैसम वैज्ञानिक 'अटलांटिक नीना' के उभार से मानसून को कमजोर करने वाले अलनीनो का असर कम होने की संभावना जता रहे हैं। इसका मतलब यह है कि अलनीनों की वजह से कमजोर पड़ा मानसून आने वाले दिनों में अटलांटिक नीना के कारण मजबूत होकर देश में अच्छी बारिश कर सकता है। इससे इस साल मानसून सीजन में देखी गई बारिश की कमी की कसर पूरी हो सकती है।
भारतीय मूल के वैज्ञानिक प्रीतम बोरा, वी. वेणुगोपाल, जय सुखात्मे, बी.एन. गोस्वामी के Role of the North Atlantic in Indian Monsoon Droughts शीर्षक से प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में इस बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है। यह अध्ययन बताता है कि उत्तर अटलांटिक महासागर में समुद्री की असामान्य ठंडक भारतीय मानसून, विशेषकर उसके बाद के चरण, को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा Prediction and Predictability of the Wet-Season Rainfall over Southeast India (2026) शीर्षक से प्रकाशित एक अध्ययन में भी भारत में इस मानसून सीजन में होने वाली वर्षा पर अटलांटिक नीना के संभावित असर के बारे में बताया गया है।
क्या है अटलांटिक नीना?
दुनिया में मौसम को प्रभावित करने वाली घटनाओं का जिक्र होते ही सबसे पहले अलनीनो (El Nino) और ला नीना (la niña) का नाम सामने आता है, क्योंकि ये प्रशांत महासागर में विकसित होने वाली जलवायु घटनाएं हैं और पूरी पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करती हैं। लेकिन, वैज्ञानिकों का ध्यान अब एक और अपेक्षाकृत कम चर्चित समुद्री घटना की ओर तेजी से गया है, जिसे अटलांटिक नीना (Atlantic Niña) कहा जाता है। यह घटना भूमध्यरेखा के पास अटलांटिक महासागर के पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के सामान्य से ठंडा होने से जुड़ी है।
अटलांटिक नीना हर वर्ष नहीं बनता। पिछले पांच दशकों में केवल छह बार ही इसे देखा गया है। यानी औसतन एक दशक में केवल एक बार। अटलांटिक नीना (Atlantic Niña) का कोई नियमित चक्र नहीं होता, इसलिए अलग-अलग शोध संस्थान इसकी घटनाओं की सूची में थोड़ा अंतर बताते हैं। फिर भी NOAA और जलवायु अध्ययनों में पिछले लगभग पांच दशकों में जिन वर्षों को प्रमुख अटलांटिक नीना घटनाओं के रूप में माना जाता है, वे मोटे तौर पर इस प्रकार हैं:
बीते 5 दशकों में कब-कब देखा गया अटलांटिक नीना
दुनिया भर के महासागरों में तापमान के बदलाव के कारण ही अटलांटिक नीना और अलनीनो जैसे मौसमी पैटर्न उभरते हैं, जो वर्षा को प्रभावित करते हैं
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कई बार इसके बनने में कई साल का अंतर आ जाता है। यही वजह है कि इस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती रही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में हुए शोधों से पता चला है कि यह घटना अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, यूरोप और एशिया तक के मौसम को प्रभावित कर सकता है। भारत का मानसून भी इससे अछूता नहीं रहता।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि अटलांटिक नीना पर्याप्त रूप से विकसित हो जाए तो यह वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में ऐसे बदलाव ला सकती है, जो दक्षिण एशिया के मानसून को मजबूती देने में मददगार साबित हों।
कैसे बनता है अटलांटिक नीना?
अटलांटिक महासागर में सामान्य परिस्थितियों में व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। जब किसी कारण से ये हवाएं सामान्य से अधिक मजबूत हो जाती हैं तो समुद्र की ऊपरी गर्म परत पश्चिम की ओर धकेल दी जाती है। इसके परिणामस्वरूप अफ्रीका के पश्चिमी तट के पास समुद्र की गहराई से ठंडा पानी ऊपर आने लगता है। इस प्रक्रिया को अपवेलिंग (Upwelling) कहा जाता है।
ठंडा पानी सतह पर आने से समुद्र का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। यही तापमान गिरावट अटलांटिक नीना की पहचान होती है। समुद्र के तापमान में यह बदलाव केवल स्थानीय प्रभाव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वायुमंडल में बनने वाले निम्न और उच्च दाब क्षेत्रों तथा बादलों के बनने की प्रक्रिया को भी प्रभावित करता है। यही परिवर्तन आगे चलकर दुनिया के दूसरे हिस्सों के मौसम पर असर डालते हैं।
अटलांटिक नीना एक नज़र में
अलनीनो और अटलांटिक नीना में क्या अंतर है?
दोनों जलवायवीय घटनाओं के नाम मिलते-जुलते से जरूर हैं, लेकिन इनकी उत्पत्ति अलग-अलग महासागरों में होती है। अलनीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ा है, जबकि अटलांटिक नीना अटलांटिक महासागर के पूर्वी भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र के सामान्य से ठंडा होने की स्थिति है।
अलनीनो प्रायः भारत में मानसून को कमजोर करता है, जबकि अटलांटिक नीना कई परिस्थितियों में मानसून के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकती है। हालांकि इसका प्रभाव अलनीनो जितना शक्तिशाली नहीं माना जाता, लेकिन यदि दोनों घटनाएं एक साथ मौजूद हों तो अटलांटिक नीना अलनीनो के प्रतिकूल प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकती है।
अलनीनो बनाम अटलांटिक नीना (तुलनात्मक अध्ययन)
भारत के मानसून पर कैसे पड़ता है असर?
भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून केवल हिंद महासागर से नियंत्रित नहीं होता। यह प्रशांत, हिंद और अटलांटिक महासागरों सहित पूरी उष्ण कटिबंधीय जलवायु प्रणाली का परिणाम है। इसलिए अटलांटिक नीना की वजह से जब अटलांटिक महासागर के तापमान में गिरावट आती है तो वहां बनने वाले संवहनीय बादलों (Convective Clouds) का वितरण बदल जाता है। इससे वैश्विक स्तर पर वायुमंडलीय परिसंचरण में परिवर्तन होता है। इन बदलावों का प्रभाव हिंद महासागर और भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुंच सकता है।
अमेरिका की Atlantic Oceanographic and Meteorological Laboratory के शोध बताते हैं कि अटलांटिक नीना की स्थिति में अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से भारत की ओर आने वाली नमी युक्त हवाएं अधिक सक्रिय हो सकती हैं। इससे मानसूनी बादलों के मजबूत होने और निम्न दाब क्षेत्रों के अधिक बनने से तगड़ी बारिश की संभावना बढ़ जाती है।
मौसम पूर्वानुमान में क्यों बढ़ रहा है अटलांटिक का महत्व?
पहले भारतीय मानसून के पूर्वानुमान में मुख्य रूप से अलनीनो, ला नीना और हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole) को ही महत्व दिया जाता था। लेकिन, अब जलवायु वैज्ञानिक पृथ्वी की समुद्री प्रणालियों को एक-दूसरे से जुड़े तंत्र के रूप में देखने लगे हैं।
सुपर कंप्यूटर आधारित आधुनिक जलवायु मॉडल यह दिखा रहे हैं कि अटलांटिक महासागर में होने वाले छोटे-छोटे बदलाव भी हजारों किलोमीटर दूर एशिया के मानसून को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि भविष्य में मानसून पूर्वानुमान मॉडल में अटलांटिक महासागर के तापमान को भी नियमित रूप से शामिल किया जा सकता है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ : मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अटलांटिक नीना को मानसून के लिए "गेम चेंजर" कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। यह उन वैश्विक समुद्री संकेतकों में शामिल हो चुकी है, जो भारत में वर्षा के स्वरूप को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। यदि इसके अनुकूल प्रभाव अन्य मौसम प्रणालियों के साथ मिल जाते हैं तो मानसून के कमजोर पड़ने की आशंका काफी हद तक कम हो सकती है।
अटलांटिक नीना के प्रभाव से मानसून की कमजोरी दूर होने पर आने वाले दिनों में देश में भारी वर्षा देखने को मिल सकती है।
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क्या वास्तव में बारिश की कमी पूरी हो सकती है?
यदि मानसून के शुरुआती चरण में बारिश सामान्य से कम रही हो और बाद के महीनों में अटलांटिक नीना प्रभावी रूप से विकसित हो जाए तो अगस्त और सितंबर में अच्छी वर्षा होने की संभावना बढ़ सकती है।
भारत में मानसून के अंतिम दो महीने कृषि की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इसी दौरान खरीफ फसलों में दाना भरने की प्रक्रिया (Grain-filling process) होती है। इसलिए यदि इस अवधि में सामान्य से अधिक वर्षा होती है तो फसल का फुटाव काफी बेहतर होता है।
हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल अटलांटिक नीना के आधार पर पूरे देश में समान रूप से अच्छी बारिश की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती। स्थानीय मौसम प्रणालियां, बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र, मानसूनी ट्रफ की स्थिति और हिंद महासागर की परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
क्या कहती है रिसर्च?
हाल के वर्षों में कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में वैज्ञानिकों ने पाया है कि अटलांटिक नीना बनने के वर्षों में भारत के मध्य, पश्चिमी और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में सामान्य से बेहतर वर्षा की संभावना बढ़ सकती है। इसके पीछे मुख्य कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण में होने वाले वे परिवर्तन हैं जो मानसूनी हवाओं को मजबूत करते हैं। इसलिए इन अध्ययनों का कहना है कि अटलांटिक महासागर की स्थिति को भारतीय मानसून के पूर्वानुमान में शामिल किया जाना चाहिए।
कुछ शोध यह भी बताते हैं कि यदि प्रशांत महासागर में अलनीनो मौजूद हो और उसी समय अटलांटिक नीना भी विकसित हो जाए, तो अलनीनो के नकारात्मक प्रभाव की तीव्रता कम हो सकती है। हालांकि बार यह प्रभाव एक समान नहीं होता।
किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?
यदि मानसून के दूसरे हिस्से में बारिश बढ़ती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ खरीफ फसलों को मिलता है। धान, सोयाबीन, मक्का, कपास, गन्ना और दालों जैसी फसलों की वृद्धि के लिए अगस्त और सितंबर की वर्षा बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। अच्छी बारिश होने पर किसानों को खेतों की सिंचाई की आवश्यकता कम होगी। इससे डीजल और बिजली की खपत घटने के कारण किसानों की लागत कम हो सकती है। वहीं, जलाशयों के भरने से रबी फसलों के लिए भी पर्याप्त सिंचाई जल उपलब्ध होने की संभावना बढ़ जाती है।
जल संसाधन पर पड़ेगा सकारात्मक असर
यदि मानसून मजबूत होता है तो इसका लाभ केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। देश के बड़े बांधों, जलाशयों, झीलों और नदियों में जल भंडारण बेहतर हो सकता है। इससे पेयजल आपूर्ति, जलविद्युत उत्पादन और उद्योगों के लिए पानी की उपलब्धता सुधर सकती है।
अच्छी वर्षा भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) को भी बढ़ाती है। जिन क्षेत्रों में लगातार भूजल स्तर गिर रहा है वहां मानसून के अंतिम चरण की बारिश विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है।
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ रही है चुनौती
ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण दुनिया तापमान लगातार बढ़ने से महासागरों का तापमान भी बढ़ रहा है। इससे अलनीनो, ला नीना और अटलांटिक नीना जैसी जलवायु घटनाओं की आवृत्ति, तीव्रता और अवधि में बदलाव देखने को मिल सकता है। वैज्ञानिक अभी इस बात का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में अटलांटिक नीना अधिक बार बनेगी या कम। लेकिन, इतना स्पष्ट है कि बदलती जलवायु के चलते जटिल होते मैसमी पैटर्न में आ रहे बदलावों के कारण मौसम की सटीक भविष्यवाणी कर पाना पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल और मुश्किल होता जा रहा है।
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