ढलान वाले इलाकों में बारिश के पानी को रोक कर जल संरक्षण करने में कंटूर ट्रेंचिंग की विधि काफी मददगार और असरदार साबित होती है। 

ढलान वाले इलाकों में बारिश के पानी को रोक कर जल संरक्षण करने में कंटूर ट्रेंचिंग की विधि काफी मददगार और असरदार साबित होती है। 

स्रोत : विकी कॉमंस 

यूपी के जालौन में कंटूर ट्रेंच से आई हरियाली, जल संरक्षण की जगी नई उम्मीद

तेज ढाल वाली पथरीली जमीन को जल संकट से निजात दिलाने में कारगर साबित हो रही है यह सस्‍ती तकनीक, भूजल को रिचार्ज करने में भी मिल रही मदद।
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उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका बारिश की कमी और भूजल स्‍तर में गिरावट के चलते लंबे समय से जल संकट से जूझ रहा है। यहां की तेज ढाल वाली पथरीली जमीन को इस जल संकट की एक बड़ी वजह माना जाता है। इसके चलते यहां मानसून की जो थोड़ी-बहुत बारिश होती भी है उसका पानी रुकने नहीं पाता। वर्षा का ज्‍़यादातर जल यहां ज़मीन के भीतर जाने के बजाय की तेज बहाव वाली बरसाती धाराओं के जरिये बहकर निकल जाता है। इसके चलते भूजल रीचार्ज नहीं हो पाता। फलस्‍वरूप पानी की कमी के कारण गर्मियों में खेत-खलिहान सूख जाते हैं।

इन सब प्रतिकूलताओं के बीच जालौन जिले में पहाड़ी और पठारी ढलानों पर कंटूर ट्रेंच बनाकर जल संचय करने के कुछ प्रयोग किए गए। इस पहल के काफी सकारात्‍मक परिणाम देखने को मिले हैं और इससे जल संकटग्रस्‍त इलाके की तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। छोटे-छोटे खांचे या खाइयों जैसी दिखने वाली ये संरचनाएं बारिश के पानी को रोककर जमीन में समाने का मौका दे रही हैं। इससे मिट्टी की ऊपरी परत की नमी बढ़ी है। साथ ही भूजल को रिचार्ज करने में भी मदद मिली है, जिसके चलते आसपास यहां हरियाली उभरती नज़र आ रही है।

जल संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बुंदेलखंड जैसे सूखा-प्रभावित क्षेत्रों में इस तरह के ढलान आधारित जल संचय मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू किया जाना  खेती, पेयजल और पर्यावरण तीनों ही के लिए लाभकारी साबित हो सकता है।

जालौन की पहाड़ियों पर जल संरक्षण की नई प्रयोगशाला

जालौन जिले के ग्रामीण इलाकों में जल संकट से निजात दिलाने का यह काम पथरीली ढलानों और बंजर भूमि पर कंटूर ट्रेंचिंग का काम जल संरक्षण कार्यक्रमों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी से किया गया। हालिया मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इससे पिछले कुछ वर्षों में जल उपलब्धता में भारी सुधार हुआ है। इस बड़े बदलाव की बदौलत ही जालौन को 2024 में राष्ट्रीय जल पुरस्कार देते हुए उत्तरी क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ जिला घोषित किया गया। बीते 19 नवंबर (2025) को जालौन के जिला मजिस्ट्रेट राजेश कुमार पांडे को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा सम्मानित किया गया। संरक्षण के क्षेत्र में किए गए अभिनव प्रयासों के लिए जालौन ने श्रेणी एक में दो अन्य जिलों वाराणसी और मिर्जापुर के साथ यह पुरस्कार साझा किया।इस प्रोजेक्‍ट से जिले के कई ब्लॉकों में भूजल स्तर में 2 मीटर या उससे अधिक की बढ़ोतरी देखने को मिली है। इस बदलाव का श्रेय पिछले दो वर्षों में कंटूर ट्रेंचिंग, चेक डैमों के निर्माण और तालाबों को पुनर्जीवित करने की वाली जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण को जाता है। इससे जिले की जल पुनर्भरण प्रणाली मजबूत हुई है। क्‍योंकि, इससे वर्षा जल को एकत्र  कर वापस जमीन में डालने में मदद मिली है। 

3 से 5 लाख लीटर वर्षा जल का संचय
ढलान वाली जमीन पर व्यवस्थित रूप से बनाई गई कंटूर ट्रेंचिंग संरचनाएं प्रति हेक्टेयर लगभग 3 से 5 लाख लीटर तक वर्षा जल को जमीन में समाने में मदद कर सकती हैं। इससे भूजल स्तर बढ़ता है, सूखे की स्थिति में नमी बनी रहती है और आसपास के कुओं-हैंडपंपों में पानी का स्तर भी सुधरता है।
<div class="paragraphs"><p>ढलानों पर कंटूर ट्रेंच बनाने से बारिश का पानी बह कर बर्बाद होने के बजाय उसमें जमा होकर भूजल को रिचार्ज करता है।&nbsp;</p></div>

ढलानों पर कंटूर ट्रेंच बनाने से बारिश का पानी बह कर बर्बाद होने के बजाय उसमें जमा होकर भूजल को रिचार्ज करता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

किसानों के लिए खेती की राह हुई आसान

कंटूर ट्रेंचिंग के जरिये वर्षा जल के संरक्षण बुंदेलखंड के इस सूखा प्रभावित जिले के किसानों के लिए काफी लाभदायक साबित हुआ है। इन प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि जालौन के जिन हिस्सों में किसानों को सिंचाई के लिए बोरिंग से भूजल नहीं मिल पाता था। अब वहां के किसान पंपिंग सेटों से 2-3 अतिरिक्त घंटे पानी निकाल पा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप धान और बाजरा जैसी खरीफ फसलों और रबी फसलों की खेती के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र में तीव्र वृद्धि हुई है। बुंदेलखंड पैकेज के तहत दालों और तिलहनों का उत्पादन 20-30% तक बढ़ गया है, जिससे किसानों को आय का एक स्थिर और विश्वसनीय स्रोत प्राप्त हुआ है। साथ कई इलाकों में इससे ऊसर और बंजर भूमि को सुधारने और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी मदद मिली है।

ऐसे असरदार नतीजों के के लिए कंटूर ट्रेंचों को एक खास रणनीति के तहत बनाया गया। इन ट्रेंचों को ढलान की दिशा के समानांतर नहीं बल्कि उसके विपरीत यानी समोच्च रेखाओं (contour lines) के साथ बनाया गया, ताकि ढलानों पर बारिश का पानी तेजी से नीचे न बहने पाए। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले बरसात का पानी कुछ ही घंटों में बह जाता था। लेकिन ट्रेंच बनने के बाद वही पानी जगह-जगह इन ट्रेंचों में जमा होकर धीरे-धीरे जमीन में रिसने लगा। इससे आसपास के कुओं और हैंडपंपों के जलस्तर में सुधार देखा गया और कुछ क्षेत्रों में सूखी जमीन पर भी हरियाली लौटने लगी।

प्रशासन, ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदाय की भागीदारी ने दिखाया असर

जालौन में जल संरक्षण और जल संचय के कार्य जिला प्रशासन की पहल और निगरानी में किए गए। इसमें ग्राम पंचायतें, स्थानीय किसान समूह, स्वयंसेवी संगठन और ग्रामीण समुदाय की सक्रिय भागीदारी रही। इस ढलान आधारित जल संचयन से मिट्टी का कटाव भी कम हुआ है और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया में तेजी आई है। इस सफलता को देखते हुए झांसी, ललितपुर, बांदा जैसे बुंदेलखंड के अन्‍य जिलों में भी वॉटरशेड विकास परियोजनाओं में कंटूर ट्रेंच को प्राथमिक उपाय के रूप में अपनाने पर विचार किया जा रहा है। जालौन में किए गए इस प्रयोग से यह संकेत मिला है कि बुंदेलखंड जैसे अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में भी कम लागत वाली तकनीकों के माध्यम से जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।  ऐसे कार्य आम तौर पर प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के वॉटरशेड डेवलपमेंट कंपोनेंट (WDC-PMKSY) तथा उससे पहले के Integrated Watershed Management Programme (IWMP) के तहत किए जाते हैं। इसके तहत वर्षा आधारित और बंजर भूमि में कंटूर ट्रेंच, चेक डैम, नाला बंधान जैसी संरचनाओं के जरिए मिट्टी और पानी का संरक्षण किया जाता है। लागत की बात करें, तो WDC-PMKSY के तहत वॉटरशेड परियोजनाओं की औसत लागत मैदानी क्षेत्रों में लगभग 22,000 रुपये प्रति हेक्टेयर और पहाड़ी/ पठारी या पथरीले इलाकों  में 28,000 रुपये प्रति हेक्टेयर तक मानी गई है।

कंटूर ट्रेंच क्या होता है और कैसे काम करता है

कंटूर ट्रेंच दरअसल जमीन की ढलान पर समोच्च रेखाओं के साथ खोदी गई लंबी और संकरी खाइयों का नेटवर्क होता है। इन्हें इस तरह बनाया जाता है कि बरसाती पानी इन खाइयों में रुक जाए और धीरे-धीरे मिट्टी में समा सके।

तकनीकी रूप से देखें तो ये संरचनाएं ढलान को कई हिस्सों में तोड़ देती हैं, जिससे बारिश का बहाव धीमा हो जाता है। इससे मिट्टी का कटाव कम होता है और पानी को जमीन में रिसने के लिए अधिक समय मिलता है।

केंद्रीय जल संसाधन विभाग के तकनीकी दिशानिर्देशों के अनुसार, कंटूर ट्रेंच का आकार और दूरी स्थानीय वर्षा, मिट्टी की गहराई और ढलान की तीव्रता के आधार पर तय की जाती है। आम तौर पर इनका क्रॉस-सेक्शन लगभग 1000 से 2500 वर्ग सेंटीमीटर तक रखा जाता है।

इसी वजह से इसे इन-सीटू वॉटर कंजरवेशन यानी जमीन पर ही पानी रोकने की सबसे प्रभावी तकनीकों में से एक माना जाता है।

बारिश का 40 से 60% पानी ज़मीन में
कंटूर ट्रेंचिंग ढलान वाली भूमि पर वर्षा जल के बहाव को रोकने का प्रभावी तरीका है। विभिन्न जला प्रबंधन अध्ययनों के अनुसार, सही ढंग से बनाए गए कंटूर ट्रेंच वर्षा के दौरान बहने वाले पानी का लगभग 40–60% हिस्सा जमीन में समा जाने में मदद करते हैं। इससे भूजल पुनर्भरण यानी ग्राउंड वाटर रिचार्ज की दर में तेज बढ़ोतरी होती है।
<div class="paragraphs"><p>उत्‍तर प्रदेश में बुंदेलखंड के जालौन की तरह ही ओडिशा के कोल्‍हा बरपदा में भी कंटूर ट्रेंच बनाकर जल संरक्षण का काम सफलतापूर्वक किया जा रहा है।&nbsp;</p></div>

उत्‍तर प्रदेश में बुंदेलखंड के जालौन की तरह ही ओडिशा के कोल्‍हा बरपदा में भी कंटूर ट्रेंच बनाकर जल संरक्षण का काम सफलतापूर्वक किया जा रहा है। 

स्रोत : एक्‍स

कंटूर ट्रेंच बनाने की प्रक्रिया और जरूरी सावधानियां

कंटूर ट्रेंच बनाना देखने में सरल है, लेकिन इसे बनाने में कुछ मूलभूत बातों का ध्‍यान रखना जरूरी होता है। क्‍योंकि, इसकी सफलता काफी हद तक सही डिजाइन और योजना पर निर्भर करती है। ध्‍यान देने वाली सबसे पहली बात है ढलान वाली जमीन पर समोच्च रेखाओं यानी कटूर लाइंस का निर्धारण करना है। इसके लिए सर्वे उपकरण या कंटूर मार्कर का उपयोग किया जाता है। इसके बाद उन्हीं रेखाओं के साथ खाइयां खोदी जाती हैं। कई परियोजनाओं में इन ट्रेंचों की चौड़ाई लगभग 60 सेंटीमीटर और गहराई लगभग 30 सेंटीमीटर रखी जाती है, हालांकि यह स्थान के अनुसार बदल सकती है।

ट्रेंच खोदने से निकली मिट्टी को नीचे की ओर जमा कर छोटा बांध बनाया जाता है। इससे पानी ट्रेंच के भीतर ही रुकता है और धीरे-धीरे रिसता है। इन बांधों पर उगाई गई घास और पौधों की जड़ें मिट्टी को स्थिर करती हैं और कटाव को कम करती हैं, जिससे ट्रेंच की उम्र बढ़ जाती है। ट्रेंच खोदने में यह सावधानियां बेहद जरूरी होती हैं -

  • ढलान बहुत कम या बहुत ज्यादा न हो

  • ट्रेंच के बीच उचित दूरी रखी जाए

  • बारिश के बाद सिल्ट जमने की नियमित सफाई हो

  • ट्रेंच के आसपास घास और पेड़ लगाए जाएं

ढलान वाले इलाकों में जल संरक्षण के अन्य प्रभावी तरीके

कंटूर ट्रेंचिंग के अलावा पहाड़ी और पठारी क्षेत्रों में कई अन्य जल संरक्षण तकनीकें भी उपयोगी साबित हुई हैं। वॉटरशेड विकास कार्यक्रमों में इन्हें अक्सर एक साथ लागू किया जाता है। इन तकनीकों में कंटूर बंडिंग, चेक डैम, नाला बंड, परकोलेशन टैंक और बेंच टेरेसिंग प्रमुख हैं। उदाहरण के लिए, बेंच टेरेसिंग में ढलान को सीढ़ीनुमा समतल खेतों में बदल दिया जाता है जिससे पानी अधिक समय तक रुक पाता है।

इसी तरह छोटे-छोटे चेक डैम या गली प्लग बरसाती नालों में बनाए जाते हैं ताकि बहता पानी रोका जा सके। कई जगह इन संरचनाओं के साथ वृक्षारोपण और चरागाह विकास भी किया जाता है, जिससे मिट्टी और पानी दोनों का संरक्षण होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन उपायों को एकीकृत रूप से लागू किया जाए तो सूखा-प्रभावी क्षेत्रों में भी जल संतुलन काफी हद तक सुधर सकता है। भारत में जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही योजनाओं में क्षेत्र की ज़रूरत और व्‍यावहारिकता के आधार पर इन तकनीकों का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। इनमें प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत चलने वाला वॉटरशेड विकास कार्यक्रम प्रमुख है। इस योजना के तहत पहाड़ी और बंजर जमीनों पर कंटूर ट्रेंच, चेक डैम, तालाब और अन्य जल संरचनाएं बनाई जाती हैं। इसके अलावा मनरेगा के तहत भी जल संरक्षण तालाबों के निर्माण, चेक डैम बनाने और कंटूर ट्रेंचिंग की जा रही है।

<div class="paragraphs"><p>पहाड़ी इलाकों में सीढ़ीदार खेतों के मुहाने पर कंटूर ट्रेंच बनाकर बारिश का पानी जमा कर लिया जाता है, जो बाद में खेती के काम आता है।&nbsp;</p></div>

पहाड़ी इलाकों में सीढ़ीदार खेतों के मुहाने पर कंटूर ट्रेंच बनाकर बारिश का पानी जमा कर लिया जाता है, जो बाद में खेती के काम आता है। 

स्रोत : विकी कॉमंस

दूसरे जिलों व राज्यों में भी हो रही कंटूर ट्रेंचिंग

जालौन का प्रयोग कोई अकेला उदाहरण नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी जल संरक्षण के सामुदायिक प्रयासों ने उल्लेखनीय परिणाम दिए हैं। बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी, ललितपुर और चित्रकूट जिलों में तालाब पुनर्जीवन, चेक डैम और खेत तालाब जैसी पहलों से भूजल स्तर में सुधार दर्ज किया गया है। कई गांवों में वर्षों से सूखे पड़े कुएं फिर से पानी देने लगे हैं। इसी तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, बुलंदशहर जैसे जिलों में भी वर्षा जल संचयन और छोटे जलाशयों के निर्माण से सिंचाई की स्थिति बेहतर हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन मॉडलों को स्थानीय भूगोल और समुदाय की भागीदारी के साथ लागू किया जाए तो पूरे राज्य में जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

देश के कई राज्यों में कंटूर ट्रेंचिंग और वॉटरशेड विकास के सफल उदाहरण मिलते हैं। महाराष्ट्र के जालना जिले के कडवांची गांव का उदाहरण अक्सर दिया जाता है। यहां वॉटरशेड परियोजना के तहत हजारों हेक्टेयर क्षेत्र में कंटूर ट्रेंच बनाए गए, जिससे वर्षा जल का संरक्षण हुआ और खेती की उत्पादकता में बड़ा सुधार आया। इसी तरह राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में भी ढलान आधारित जल संरक्षण मॉडल अपनाए गए हैं। इन परियोजनाओं ने यह साबित किया है कि यदि स्थानीय समुदाय की भागीदारी हो तो कम लागत वाली तकनीकें भी बड़े पैमाने पर पर्यावरणीय बदलाव ला सकती हैं।

मिट्टी के कटाव 50% तक कमी
कंटूर ट्रेंच मिट्टी के कटाव को भी कम करने में काफी प्रभावी होते हैं। पहाड़ी या ढलान वाली भूमि पर कंटूर ट्रेंच और कंटूर बंडिंग जैसी तकनीकों के इस्तेमाल से मिट्टी के कटाव में 30 से 50 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इससे खेतों की उर्वरता बचती है और वर्षा का पानी लंबे समय तक भूमि में टिकता है।

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में महत्व

जलवायु परिवर्तन के दौर में बारिश का पैटर्न तेजी से बदल रहा है। कई क्षेत्रों में बारिश कम दिनों में तेज़ी से होती है, जिससे अधिकांश पानी बहकर निकल जाता है। ऐसे में कंटूर ट्रेंच जैसी तकनीकें वर्षा जल को रोकने और जमीन में समाने का मौका देने के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती हैं। इसके अलावा यह तकनीके मिट्टी की उर्वरता, जैव विविधता और वनस्पति पुनर्जीवन को भी बढ़ावा देती है। कई जगह ट्रेंचिंग के बाद पहाड़ी ढलानों पर प्राकृतिक वनस्पति वापस लौट आई है, जिससे हरियाली बढ़ने के साथ ही स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह मॉडल जल संरक्षण के साथ-साथ क्लाइमेट रेजिलिएंट लैंड मैनेजमेंट का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है। इस तरह जल संरक्षण की कंटूर ट्रेंचिंग जैसी सस्‍ती, सरल और कारगर तकनीकें भूजल स्‍तर को बढ़ा कर पर्यावरण के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्‍याओं से निपटने में भी सहायक साबित हो सकती हैं।

आगे की राह: सामुदायिक भागीदारी ही सफलता की कुंजी

जालौन में कंटूर ट्रेंचिंग की सफलता का अनुभव यह दिखाता है कि जल संकट का समाधान केवल बड़े-बड़े बांधों या महंगी परियोजनाओं से ही नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर किए गए छोटे-छोटे प्रयासों से भी किया जा सकता है, वह भी काफी कम लागत में। कंटूर ट्रेंच जैसी संरचनाएं अपेक्षाकृत कम लागत में बन जाती हैं और उनका रख-रखाव भी स्थानीय समुदाय आसानी से कर सकता है। यदि ग्रामीण समुदाय, स्थानीय प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञ मिलकर काम करें, तो यह मॉडल बुंदेलखंड क्षेत्र के अलावा पथरीली ढलानों वाले ऐसे ही अन्‍य इलाकों में जल संकट को कम करने का कारगर उपाय साबित हो सकता है। जालौन की पहाड़ी ढलानों पर बने ये छोटे-छोटे खांचे दरअसल भविष्य की बड़ी उम्मीदों का रास्ता खोल रहे हैं, जहां बारिश की हर बूंद जमीन में समाकर धरती को फिर से हरा-भरा बना सकती है।

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