मेघालय की अनोखी कृषि व्यवस्था: न बिजली, न मोटर, सिर्फ गुरुत्वाकर्षण से होती है ड्रिप सिंचाई
भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है और देश के उपलब्ध मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा खेती में इस्तेमाल होता है। बावजूद इसके जब भी यहां जल संकट और उसके समाधान की बात होती है तो ध्यान अक्सर नई तकनीकों और सिंचाई की आधुनिक तकनीकों पर ही होता है।
हालांकि देश के कई हिस्सों में सदियों पुरानी ऐसी पारंपरिक जल प्रणालियां आज भी मौजूद हैं, जो कम संसाधनों में पानी का प्रभावी उपयोग करती हैं। ऐसी ही एक पद्धति है पूर्वोत्तर भारत के मेघालय में खासी और जयंतिया समुदायों की बांस आधारित ड्रिप सिंचाई प्रणाली।
लगभग दो सौ वर्षों से चली आ रही यह पद्धति केवल गुरुत्वाकर्षण और बांस की नलिकाओं के सहारे पहाड़ी झरनों के पानी को खेतों तक पहुंचाती है। इसमें न बिजली की जरूरत होती है और न ही महंगे उपकरणों की।
आज जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा और भूजल पर बढ़ती निर्भरता ने खेती को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। ऐसे में यह पद्धति एक सवाल सामने रखती है क्या पारंपरिक जल ज्ञान केवल अतीत की विरासत है, या आज भी इसे जल प्रबंधन का प्रभावी समाधान बनाया जा सकता है?
कैसे काम करती है बांस आधारित ड्रिप सिंचाई प्रणाली?
मेघालय में सालाना औसतन 11,000-12,000 मिमी बारिश होती है और इसे दुनिया के सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। राज्य के खासी और जयंतिया पहाड़ी क्षेत्रों में सिंचाई की इस पद्धति को स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।
पहाड़ी ढलानों के कारण बारिश का ज़्यादातर पानी तेजी से बह जाता है। इसलिए शुष्क मौसम में सिंचाई के लिए कम पानी मिलता है। स्थानीय लोगों ने इस चुनौती का समाधान बांस आधारित ड्रिप सिंचाई के रूप में विकसित किया।
इस पद्धति में किसी ऊंचाई पर स्थित झरने या प्राकृतिक जल स्रोत को शुरुआती बिंदु बनाया जाता है। वहां से पानी की धार को बड़े मुंह वाले खोखले बांस के पाइपों में मोड़ा जाता है। इसके बाद यह पानी ढलान के अनुसार बिछाए गए बांस के जाल से गुजरता है।
मुख्य पाइप से कई छोटी शाखाएं निकलती हैं। इनमें अलग-अलग मोटाई के बांस का उपयोग किया जाता है। इससे हर पौधे तक जरूरत के अनुसार पानी पहुंचता है।
यह पूरी व्यवस्था गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत पर काम करती है। इसलिए इसमें बिजली, डीज़ल पंप या ऊर्जा के किसी भी दूसरे स्रोत की ज़रूरत नहीं पड़ती।
इस प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी जल दक्षता (Water Use Efficiency) है। मुख्य नाली में प्रति मिनट लगभग 18-20 लीटर पानी बहता है। रास्ते में बांस की शाखाएं धीरे-धीरे पतली होती जाती हैं। इससे पानी का प्रवाह भी कम होता जाता है। आखिर में हर पौधे की जड़ तक प्रति मिनट केवल 20-80 बूंद पानी पहुंचता है।
इससे पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचता है। पानी का बहाव कम होता है और बेवजह बर्बादी भी नहीं होती। इसी खूबी के कारण सिंचाई की इस पद्धति को सुपारी, काली मिर्च और पान जैसी बागानी फसलों के लिए उपयुक्त माना जाता है।
इस तकनीक की एक और खासियत यह है कि इसका अधिकांश ढांचा स्थानीय रूप से उपलब्ध होने वाले बांस से तैयार किया जाता है। मेघालय बांस की समृद्ध जैव विविधता वाले राज्यों में शामिल है। राज्य में बांस की लगभग 35 प्रजातियां हैं। इनका उपयोग निर्माण, कृषि उपकरण, हस्तशिल्प और पारंपरिक जल प्रबंधन में होता रहा है। स्थानीय उपलब्धता ही इस सिंचाई पद्धति को कम लागत वाला और टिकाऊ बनाती है।
बांस हल्का, सस्ता और आसानी से उपलब्ध और प्राकृतिक रूप से गलने-सड़ने वाला पदार्थ है। इसलिए पर्यावरण पर इसका असर भी कम पड़ता है। इसके खराब हिस्सों को आसानी से बदला जा सकता है। इसके रखरखाव के लिए महंगे उपकरणों या बाहरी तकनीकी सहायता की जरूरत नहीं होती। यह पूरी व्यवस्था स्थानीय समुदायों के अनुभव, श्रम और सामूहिक सहयोग पर आधारित है।
जब परंपरा और आधुनिक तकनीक साथ आए
हाल के वर्षों में इस पारंपरिक तकनीक को आधुनिक जरूरतों के अनुसार बेहतर बनाने की कोशिश हुई है। एक अध्ययन में इस पद्धति को वर्षा जल संचयन और मल्चिंग के साथ जोड़कर परखा। इससे सूखे मौसम में भी सिंचाई संभव हुई और परीक्षणों में 25-30 प्रतिशत तक पानी की बचत दर्ज की गई।
मेघालय सरकार का कृषि एवं किसान कल्याण विभाग बांस को राज्य की प्रमुख प्राकृतिक संपदा मानता है। विभाग का कहना है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित खेती और जल प्रबंधन की व्यवस्थाएं छोटे किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। इनसे खेती अधिक टिकाऊ बन सकती है और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
पारंपरिक ज्ञान से विकसित एक जल प्रबंधन मॉडल
मेघालय की बांस आधारित ड्रिप सिंचाई को केवल एक पारंपरिक तकनीक कहना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी महत्ता इससे कहीं अधिक है। यह व्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग पर आधारित है। इससे पता चलता है कि टिकाऊ जल प्रबंधन के लिए किसी क्षेत्र की जलवायु, भूगोल और जल स्रोतों को समझना जरूरी है।
शोध बताते हैं कि बांस-आधारित ड्रिप प्रणाली स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित की गई है। इसलिए इसे पर्वतीय क्षेत्रों के लिए जल प्रबंधन का एक प्रभावी मॉडल माना जाता है।
यह तरीक़ा जल स्रोतों के संरक्षण की सोच से भी जुड़ा हुआ है। इसका उद्देश्य उपलब्ध पानी का अधिक से अधिक दोहन करना नहीं, बल्कि आवश्यकता के अनुसार उसका सावधानी से उपयोग करना है।
यह आज के अधिक भूजल दोहन वाले तरीकों से अलग है। और इससे जल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की सीख मिलती है। FAO जैसी संस्थाएं भी मानती हैं कि ऐसे स्थानीय अनुभव तंत्र टिकाऊ कृषि और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
आज इसकी प्रासंगिकता क्यों बढ़ गई है?
मेघालय की बांस आधारित ड्रिप सिंचाई पद्धति आज फिर चर्चा में है। इसकी वजह केवल इसका लगभग दो सौ वर्ष पुराना इतिहास नहीं है। यह तकनीक आज की खेती से जुड़ी कई चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान भी सुझाती है।
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक मौसम शुष्क बना रहता है। ऐसे में केवल अधिक मात्रा में पानी उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उपलब्ध पानी का कुशल और संतुलित उपयोग भी उतना ही प्रमुख हो गया है।
भारत में सबसे अधिक पानी का उपयोग खेती के लिए होता है और सिंचाई का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है। ऐसे में सिंचाई में पानी की बचत करने वाली तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
कई राज्यों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। ऊर्जा की लागत बढ़ रही है और मानसून भी अनिश्चित होता जा रहा है। ऐसे में कम लागत वाली और बिना बिजली चलने वाली सिंचाई प्रणालियां किसानों के लिए व्यवहारिक विकल्प बन सकती हैं।
ये सिंचाई पद्धति आधुनिक ड्रिप इरिगेशन का विकल्प नहीं है। यह बताती है कि स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर भी जल दक्षता हासिल की जा सकती है।
इस परियोजना से जुड़ी मेघालय के मावफ्र्यू (Mawphrew) गांव की किसान रोफिना मारिंग कहती हैं, “पहले हमारे लिए अपने घर के लिए भी सब्ज़ियां खरीदना मुश्किल था। अब हम ताज़ी और पौष्टिक सब्ज़ियां खुद उगाते हैं और क्षेत्रीय बाज़ार में बेचकर अतिरिक्त आय भी कमा रहे हैं।”
रोफिना मारिंग का अनुभव इस बात की पुष्टि करता है कि पारंपरिक प्रणालियां आज भी किसानों की आजीविका में बदलाव ला सकती हैं। ICIMOD के अनुसार, संशोधित बांस ड्रिप प्रणाली अपनाने के बाद कई छोटे किसानों ने साल भर खेती करनी शुरू कर दी। पहले वे मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर थे। अब वे टमाटर, शिमला मिर्च, आलू और स्ट्रॉबेरी समेत दूसरी नकदी फसलें भी उगा रहे हैं। इससे उनकी आय बढ़ने के साथ ही सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता में भी सुधार हुआ है।
अध्ययन के अनुसार, पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक तकनीकों के साथ जोड़ने से जल दक्षता बढ़ाई जा सकती है। इससे छोटे किसानों को बदलती जलवायु की चुनौतियों से निपटने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, यह भी समझना ज़रूरी है कि बांस आधारित जल प्रबंधन हर क्षेत्र के लिए उपयुक्त समाधान नहीं है। यह तकनीक मेघालय की परिस्थितियों के अनुरूप विकसित हुई है। इसकी सफलता पहाड़ी भू-आकृति, प्राकृतिक झरनों, बांस की उपलब्धता और समुदाय के सहयोग पर टिकी है।
इसकी नकल करने के बजाय इसकी मूल सोच से सीखना अधिक महत्वपूर्ण है। इस सोच से भारत के अन्य जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए भी नई संभावनाएं पैदा हो सकती हैं।
इसलिए मेघालय का यह उदाहरण किसी एक तकनीक की सफलता की कहानी नहीं है। यह समझने का अवसर है कि वहां की परिस्थितियों में विकसित समाधान आधुनिक जल प्रबंधन की बहस का हिस्सा कैसे बन सकते हैं।
क्या भारत की अन्य पारंपरिक जल प्रणालियां भी यही संदेश देती हैं?
देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में समुदायों ने अपनी क्षेत्रीय जलवायु, भूमि और जल स्रोतों के अनुसार कई जल प्रणालियां विकसित कीं। इन प्रणालियों ने सदियों तक खेती और आजीविका को सहारा दिया।
इनका स्वरूप भले अलग-अलग हो, इनके मूल सिद्धांत एक जैसे हैं। ये इलाक़े में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग करती हैं। वर्षा जल का संरक्षण करती हैं। भूजल पर कम निर्भर रहती हैं और सामुदायिक भागीदारी को महत्व देती हैं।
उदाहरण के लिए, दक्षिण बिहार की आहर-पाइन पद्धति वर्षा और नदी के अतिरिक्त पानी को आहर (जलाशय) में जमा करती है। इसके बाद पाइन (नहरों) के माध्यम से यह पानी खेतों तक पहुंचाया जाता है।
यह पद्धति सदियों तक बाढ़ और सूखे, दोनों परिस्थितियों से निपटने का स्थानीय समाधान रही है। Indian Journal of Traditional Knowledge में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, आहर-पाइन केवल सिंचाई व्यवस्था नहीं थी। यह सामुदायिक जल शासन का भी उदाहरण थी। इसके रखरखाव और जल वितरण का निर्णय क्षेत्रीय स्तर पर होता था।
शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ते जल संकट के दौर में इस तकनीक के पुनर्जीवन पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
सिंचाई पद्धति के ऐसे ही कुछ उदाहरण राजस्थान के जोहड़ और कुंड, महाराष्ट्र की फड़, कर्नाटक की सुरंगा, तमिलनाडु की एरी और नागालैंड की ज़ाबो पद्धति भी हैं।
कर्नाटक की सुरंगा पद्धति पहाड़ी क्षेत्रों में भूमिगत जल को सुरंगों के माध्यम से खेतों तक लाती है। वहीं तमिलनाडु की एरी (टैंक) पद्धति आपस में जुड़े जलाशयों का एक नेटवर्क है। यह वर्षा जल का संग्रह करती है। भूजल पुनर्भरण और बाढ़ नियंत्रण में भी इसकी भूमिका अहम है।
नागालैंड की ज़ाबो (रूज़ा) पद्धति जल संरक्षण को वानिकी, पशुपालन, मत्स्य पालन और कृषि से जोड़ती है। इस तरह यह प्राकृतिक संसाधनों के एकीकृत प्रबंधन का मॉडल है।
इन सभी प्रणालियों का स्वरूप अलग-अलग होने के बावजूद भी इनमें कुछ समानताएं हैं। ये क्षेत्र के भूगोल के अनुरूप विकसित हुईं। इनका उद्देश्य पानी का विवेकपूर्ण उपयोग था। इनका संचालन भी समुदाय की भागीदारी से होता था।
दुनिया के कई देश जल प्रबंधन के इसी सोच को महत्व देने लगे हैं। संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के अनुसार, स्वदेशी ज्ञान प्रणालियां जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन (Climate Adaptation), टिकाऊ कृषि और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग समाधान विकसित हुए। लेकिन सभी का आधार इलाक़े के भूगोल, सामुदायिक भागीदारी और पानी का संतुलित उपयोग था। इसलिए ही आज इन प्रणालियों पर फिर से चर्चा हो रही है।
मेघालय का उदाहरण इसलिए भी अहम है क्योंकि देश के कई हिस्सों में पारंपरिक जल प्रणालियों को फिर से नए संदर्भों में अपनाया जा रहा है। इससे पता चलता है कि यदि इलाक़े के लोगों के ज्ञान को वैज्ञानिक योजना और सामुदायिक भागीदारी के साथ जोड़ा जाए, तो वह आज भी प्रभावी नतीजे दे सकता है।
जहां परंपरा आज भी समाधान दे रही है
भारत में कई ऐसे उदाहरण हैं जहां पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों को आधुनिक जरूरतों के अनुसार पुनर्जीवित किया गया है और उनके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं।
राजस्थान के अलवर जिले में 1980 के दशक में शुरू हुआ जोहड़ पुनर्जीवन अभियान इस बात का उदाहरण है। इस अभियान से जिले के कई हिस्सों में तेज़ी से गिर रहे भूजल स्तर, सूख रहे कुओं और सिंचाई की चुनौतियों से निपटने में सहायता मिली।
क्षेत्रीय समुदायों और तरुण भारत संघ ने मिलकर पारंपरिक जोहड़ों का निर्माण और पुनर्जीवन शुरू किया। बारिश के पानी को संग्रह करने वाले इन छोटे-छोटे ढांचों की मदद से भूजल स्तर में सुधार लाया गया। वहीं सूखे पड़े कुएं फिर से भरने लगे और कई मौसमी नदियों में पानी लौट आया।
इस पहल ने केवल जल संरक्षण ही नहीं, बल्कि खेती, पशुपालन और ग्रामीण आजीविका को भी नई गति दी। ऊर्जा और पर्यावरण पर काम करने वाली संस्था CEEW भी इसे समुदाय आधारित जल प्रबंधन के सफल उदाहरणों में शामिल करती है।
महाराष्ट्र के हिवरे बाज़ार में भी जल संरक्षण को सामुदायिक प्रयासों से जोड़ा गया। कंटूर ट्रेंच, चेक डैम और वर्षा जल संचयन संरचनाओं के साथ ग्रामसभा ने फसल नियोजन और जल उपयोग पर भी नियम बनाए।
इससे भूजल स्तर में सुधार हुआ और खेती का रकबा बढ़ा। यह उदाहरण बताता है कि जल संरक्षण केवल संरचनाओं से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर लिए जाने वाले फ़ैसलों से भी जुड़ा होता है।
मेघालय, अलवर, हिवरे बाज़ार और बिहार के ये उदाहरण बताते हैं कि पारंपरिक जल प्रणालियां केवल इतिहास की धरोहर नहीं हैं। वहां के भूगोल, वैज्ञानिक योजना और आज की जरूरतों को साथ मिलाकर इन्हें आज भी प्रभावी बनाया जा सकता है। ये सभी उदाहरण जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और टिकाऊ खेती में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
Economic Advisory Council to the Prime Minister की रिपोर्ट में शंकर प्रसाद शर्मा और हिमानी अग्रवाल लिखते हैं"भारत का जल संकट केवल अधिक पानी उपलब्ध कराने से हल नहीं होगा। हमें पानी को वहीं रोकना होगा जहां बारिश होती है और इलाक़े की जल प्रणालियों को फिर से जीवित करना होगा।"
क्या केवल परंपरा ही पर्याप्त है?
मेघालय की बांस आधारित ड्रिप सिंचाई पद्धति यह दिखाती है कि सामुदायिक समझ आज भी जल संरक्षण और सिंचाई के कारगर समाधान दे सकता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि हर क्षेत्र में केवल पारंपरिक प्रणालियों के सहारे जल संकट का समाधान ही निकाला जाए।
भारत की भौगोलिक, जलवायु और खेती की परिस्थितियां इतनी विविध हैं कि किसी एक मॉडल को पूरे देश पर लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए पारंपरिक जल प्रणालियों को उनके क्षेत्रीय संदर्भ में समझना और उसी आधार पर उनका उपयोग करना ज़रूरी है।
बांस आधारित ड्रिप सिंचाई मेघालय के पहाड़ी इलाकों के लिए विकसित हुई है। इन इलाक़ों में प्राकृतिक झरने, पर्याप्त ढलान और बांस आसानी से उपलब्ध हैं। इसलिए इसे हर क्षेत्र में उसी रूप में लागू नहीं किया जा सकता।
यही बात राजस्थान के जोहड़ों, बिहार की आहर-पाइन और अन्य पारंपरिक जल प्रणालियों के लिए भी सही है। उनकी सबसे बड़ी ताकत वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित होना है।
खेती का स्वरूप भी बदल रहा है। अधिक उत्पादन वाली फसलें और बाजार आधारित कृषि से पानी की मांग बढ़ी है। इसलिए कई पारंपरिक प्रणालियां अकेले इस मांग को पूरा नहीं कर सकतीं। विशेषज्ञ इन्हें आधुनिक तरीकों के साथ जोड़ने की सलाह देते हैं।
हाल में किए गए एक शोध के अनुसार, अगर पारंपरिक बांस ड्रिप पद्धति को वर्षा जल संचयन, मल्चिंग और बेहतर जल वितरण तकनीकों के साथ जोड़ने पर इसकी उपयोगिता और जल दक्षता दोनों बढ़ सकती हैं।
बांस प्राकृतिक सामग्री है, इसलिए उसकी नियमित मरम्मत जरूरी होती है। पहले इस काम को समुदाय के लोग मिलकर करते थे। अब सामाजिक ढांचे में आए बदलावों और पलायन के कारण यह परंपरा कमजोर पड़ रही है।
एक दूसरी बड़ी चुनौती जल स्रोतों के संरक्षण की है। बांस आधारित ड्रिप सिंचाई की सफलता पहाड़ी झरनों और वनों पर निर्भर करती है। अगर जंगलों का क्षरण होता है, प्राकृतिक जलधाराएं सूखती हैं या भूमि उपयोग में बड़े बदलाव आते हैं, तो इसका असर ऐसी प्रणालियां पर भी पड़ता है।
इसलिए केवल सिंचाई की व्यवस्था को बचाना पर्याप्त नहीं है। उससे जुड़े पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र के FAO ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया है कि पारंपरिक कृषि प्रणालियों की सफलता उनके आसपास के प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जुड़ी होती है।
इसी कारण विशेषज्ञ आज 'हाइब्रिड अप्रोच' यानी पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के गठजोड़ की वकालत करते हैं। उदाहरण के लिए, बांस आधारित ड्रिप प्रणाली को आधुनिक व्यवस्थाओं के साथ जोड़ा जा सकता है। इसमें जल मापन उपकरण, वर्षा जल संचयन और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन जैसी व्यवस्थाएं शामिल की जा सकती हैं।
भारत सरकार के नीति आयोग ने भी जल उपयोग से जुड़े दस्तावेज़ में क्षेत्रीय जल संरचनाओं के पुनर्जीवन और सामुदायिक भागीदारी को दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए अहम बताया है।
पारंपरिक प्रणालियों और आधुनिक तरीकों को आमने-सामने रखने की जरूरत नहीं है। इस सोच से भविष्य की जल चुनौतियों से निपटने में भी मदद मिल सकती है।
नीति और आगे की राह: परंपरा को भविष्य की जल नीति से कैसे जोड़ा जाए?
मेघालय की बांस आधारित ड्रिप सिंचाई बताती है कि पारंपरिक जल ज्ञान आज भी उपयोगी हो सकता है। लेकिन ऐसे उदाहरण अपने आप नहीं बचेंगे। इन्हें नीति, शोध और क्षेत्रीय विकास योजनाओं से जोड़ना होगा। तभी इनका व्यापक लाभ मिल सकेगा।
सबसे बड़ी जरूरत इन प्रणालियों को ठीक से समझने और दर्ज करने की है। देश के अलग-अलग हिस्सों में आज भी मौजूद जल व्यवस्थाओं की पारंपरिक पद्धतियों में से ज़्यादातर का वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हुआ है। यही कारण है कि Economic Advisory Council to the Prime Minister अपनी रिपोर्ट Traditional Water Conservation Systems of India में इनके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और अध्ययन पर ज़ोर देता है।
जलवायु परिवर्तन ने इस ज़रूरत को पहले से भी ज़्यादा बढ़ा दिया है। पर्वतीय और वर्षा आधारित क्षेत्रों में कम लागत वाली स्थानीय तरीके छोटे किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।
सरकार की कुछ योजनाएं भी इसी दिशा में काम कर रही हैं। जल शक्ति अभियान - कैच द रेन वर्षा जल को क्षेत्रीय स्तर पर संजोने और पारंपरिक जल निकायों के पुनर्जीवन पर ज़ोर देता है।
वहीं अटल भूजल योजना समुदाय आधारित भूजल प्रबंधन को बढ़ावा देती है। दोनों योजनाएं बताती हैं कि जल संरक्षण केवल सरकारी प्रयासों से नहीं, बल्कि समुदाय की भागीदारी से ही सफल हो सकता है।
ज्ञान का संरक्षण भी उतना ही ज़रूरी
पारंपरिक जल व्यवस्थाओं को बचाने का मतलब केवल पुरानी संरचनाओं को बचाना नहीं है। उनसे जुड़ा ज्ञान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मेघालय की बांस आधारित ड्रिप सिंचाई इसका अच्छा उदाहरण है। बांस का चुनाव, उसकी काट-छांट और पानी के बहाव को नियंत्रित करने का तरीक़ा उस इलाक़े के कारीगरों के अनुभव पर आधारित है। जैसे-जैसे ग्रामीण समाज और खेती का स्वरूप बदल रहा है, यह ज्ञान भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है।
ICIMOD का भी मानना है कि ऐसी व्यवस्थाओं को बचाने का अर्थ केवल संरचनाओं का संरक्षण नहीं है। उनसे जुड़े कौशल और सामुदायिक अनुभवों को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना होगा। तभी ये व्यवस्थाएं भविष्य में भी उपयोगी बनी रहेंगी।
मेघालय की बांस आधारित ड्रिप सिंचाई हमें यही सिखाती है कि जल संकट का समाधान केवल नई तकनीकों या बड़ी परियोजनाओं में नहीं है। इलाक़े के लोगों ने सदियों में जो जल ज्ञान विकसित किया है, वह आज भी प्रासंगिक है। जरूरत उसे समझने, बचाने और आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने की है। तभी पारंपरिक जल प्रणालियां भविष्य की जल सुरक्षा और टिकाऊ कृषि में अहम भूमिका निभा सकती हैं।
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