एक खेत में सिंचाई के लिए लगाया गया पंप।

एक खेत में सिंचाई के लिए लगाया गया पंप।

फोटो: असदवाराइच, विकिमीडिया कॉमन्स, CC BY-SA 4.0

क्या सौर पंप भूजल बचा सकते हैं? गुजरात के दो इलाकों से मिला जवाब

गुजरात के आनंद और बोटाद पर किया गया शोध बताता है कि सौर सिंचाई का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता। भूजल, खेती और आर्थिक फायदे इसकी दिशा तय करते हैं।
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खेती की सिंचाई में भूजल का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है। इसके साथ ही भारत की भूजल पर निर्भरता भी बढ़ती गई है। देश में सिंचाई के लिए करीब 2.3 करोड़ पंप इस्तेमाल होते हैं। 1950 के दशक में सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी में भूजल की हिस्सेदारी करीब 30 प्रतिशत थी। आज यह बढ़कर 64 प्रतिशत हो गई है।

सस्ती बिजली और बेहतर ड्रिलिंग तकनीक ने भूजल का इस्तेमाल बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन लगातार पानी निकालने से कई इलाकों में भूजल भंडार (aquifers) तेजी से घट रहे हैं। इसका असर खेती और देश की खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है।

सरकार सौर ऊर्जा से चलने वाली सिंचाई को पानी और बिजली की समस्या के समाधान के तौर पर बढ़ावा दे रही है। लेकिन इससे एक सवाल भी उठता है। अगर सिंचाई के लिए बिजली मुफ्त या सस्ती हो जाए, तो क्या किसान ज्यादा भूजल निकालने लगेंगे?

मोहम्मद फैज़ आलम और उनके सहयोगियों ने गुजरात में यह अध्ययन किया है। यह अध्ययन Energy Nexus में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में देखा गया है कि ग्रिड से जुड़े सौर सिंचाई पंपों का क्या असर पड़ता है।

अध्ययन के अनुसार, जहां भूजल का भंडार अच्छा है और किसानों को पानी बचाने का आर्थिक फायदा मिलता है, वहां सौर पंप लगाने से सिंचाई में कम पानी इस्तेमाल हो सकता है। लेकिन जहां बारिश कम होती है और भूजल भी कम है, वहां सौर पंप लगाने से पानी की खपत जरूरी नहीं कि कम हो।

सौर सिंचाई का असर केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करता। इसमें खेतों के नीचे मौजूद पानी, कौन-सी फसल उगाई जा रही है और किसानों को कितना आर्थिक फायदा मिल रहा है, ये बातें भी अहम हैं।

भारत में भूजल संकट और सौर सिंचाई

सरकार ने 2019 में शुरू की गई पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) योजना के जरिए सौर सिंचाई को बढ़ावा दिया है। सरकार ने योजना के तहत मार्च 2026 तक छोटे सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने और सिंचाई पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़कर 34,800 मेगावाट सौर क्षमता तैयार करने का लक्ष्य रखा है। 

सौर पंपों को गांवों और खेतों तक पहुंचाना आसान नहीं है। इसकी शुरुआती लागत ज्यादा है। इसके अलावा तकनीकी जानकारी और रखरखाव की कमी, जमीन की कमी, छोटी और बंटी हुई जोतें और नीतियों में तालमेल न होना भी बड़ी समस्याएं हैं।

सूर्यशक्ति किसान योजना (SKY) के तहत किसान जरूरत से ज्यादा बनी सौर बिजली ग्रिड को बेच भी सकते हैं। इसके लिए उन्हें 7 रुपये प्रति यूनिट (kWh) का दाम मिलता है। इसका मकसद किसानों को बिजली और पानी बचाने के लिए प्रोत्साहित करना है।

भूजल को लेकर एक दूसरी चिंता भी है। सौर पंप लगने के बाद बिजली का खर्च बहुत कम हो जाता है। इससे किसान ज्यादा पानी निकाल सकते हैं और भूजल का इस्तेमाल बढ़ सकता है।

ग्रिड से जुड़े सौर पंप इस समस्या का एक रास्ता हो सकते हैं। इसमें पहले से लगे बिजली के पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ते हैं। किसान सिंचाई के लिए बिजली के साथ-साथ सौर ऊर्जा का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। जरूरत से ज्यादा सौर बिजली बनने पर किसान उसे ग्रिड को बेच सकते हैं। इस व्यवस्था को नेट मीटरिंग (net metering) कहते हैं।

इस व्यवस्था में किसानों को कम बिजली इस्तेमाल करने और बची हुई बिजली बेचने का आर्थिक फायदा मिलता है। पीएम-कुसुम के तहत ऐसे 10 लाख ग्रिड से जुड़े कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ने का लक्ष्य है। सौर पंप लगाने के बाद सिंचाई और बिजली की खपत में कितना बदलाव आता है, इस पर अभी ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है। गुजरात के इस अध्ययन में सौर पंप इस्तेमाल करने वाले किसानों की तुलना बिजली के पंप इस्तेमाल करने वाले किसानों से की गई है। इससे यह समझने की कोशिश की गई है कि सौर पंपों का सिंचाई और बिजली के इस्तेमाल पर क्या असर पड़ता है।

इसे लेकर अभी तक कोई व्यवस्थित अध्ययन नहीं हुआ है कि सौर पंप लगाने से सिंचाई और बिजली के इस्तेमाल में क्या बदलाव आया है। गुजरात में किए गए इस अध्ययन में देखा गया है कि ग्रिड से जुड़े सौर पंप अपनाने के बाद किसानों के सिंचाई के तरीकों में क्या बदलाव आया। इसमें यह भी देखा गया है कि इसका भूजल पर क्या असर पड़ा। 

गुजरात में सूर्यशक्ति किसान योजना (SKY) के तहत ग्रिड से जुड़े सौर पंप लगाए गए हैं। साल 2018 से अब तक सरकार ने 90 से ज्यादा कृषि बिजली लाइनों को सौर ऊर्जा से जोड़ा है। इन फीडरों से जुड़े करीब 4,500 किसानों को फ़ायदा हो रहा है। इनमें 75 प्रतिशत से ज्यादा किसानों के सिंचाई पंप अब सौर ऊर्जा से चल रहे हैं।

इस योजना के तहत किसान जरूरत से ज्यादा बनी सौर बिजली ग्रिड को बेच भी सकते हैं। इसके लिए उन्हें 7 रुपये प्रति यूनिट (kWh) का दाम मिलता है। इसका मकसद किसानों को बिजली और पानी बचाने के लिए प्रोत्साहित करना है।

किसानों को ग्रिड में भेजी गई अतिरिक्त बिजली के लिए 3.50 रुपये प्रति यूनिट मिलते हैं। इसके अलावा, पहले सात साल तक 3.50 रुपये प्रति यूनिट और दिए जाते हैं। इस अतिरिक्त राशि से किसानों को अपने कर्ज चुकाने में आसानी होती है।

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने आनंद और बोटाद के चार कृषि फीडरों से किसानों के भूजल इस्तेमाल का आंकड़ा जुटाया। इनमें दो फीडर सौर ऊर्जा से और दो सामान्य बिजली से चलते थे।

दोनों जिलों को इसलिए चुना गया क्योंकि यहां भूजल की स्थिति अलग है। गुजरात के मध्य हिस्से में स्थित आनंद में भूजल का बड़ा भंडार है। नहरों का पानी भी जमीन में जाकर भूजल को फिर भरता है।

दूसरी ओर, सौराष्ट्र के बोटाद में जमीन के नीचे कठोर चट्टानें हैं। यहां भूजल का भंडार कम है। इसलिए पानी निकालने या जमीन में पानी पहुंचने पर भूजल स्तर में जल्दी बदलाव आता है।

अध्ययन से सामने आई बातें

आनंद में बोटाद की तुलना में सिंचाई के लिए ज्यादा पानी और बिजली का इस्तेमाल हुआ। आनंद में सिंचाई के लिए तीन से चार गुना ज्यादा पानी लगाया गया। वहीं, पंप चलाने में बोटाद के मुकाबले दोगुनी बिजली खर्च हुई। इसकी एक वजह दोनों जिलों में फसलों, खेती की तीव्रता और भूजल भंडार की क्षमता में अंतर है।

आनंद में किसान साल में कई फसलें उगाते हैं। मानसून में यहां धान की खेती होती है, जबकि रबी के मौसम में तंबाकू और गेहूं उगाए जाते हैं। धान में पानी की जरूरत ज्यादा होती है।

यहां जमीन के नीचे 6 से 12 मीटर की गहराई पर पर्याप्त पानी मिलता है। बारिश और नहरों के पानी से यह भूजल फिर भर जाता है। किसान करीब 70 मीटर गहरे ट्यूबवेल से भी पानी निकालते हैं। इन्हें आमतौर पर 10 से 20 हॉर्सपावर (HP) के पंप से चलाया जाता है।

इसके उलट, बोटाद में खेती कम होती है और किसान बारिश पर ज्यादा निर्भर हैं। यहां जमीन के नीचे चट्टानों के बीच थोड़ा ही भूजल जमा होता है। किसान करीब 18 से 20 मीटर गहरे कुओं से पानी निकालते हैं। खरीफ में यहां मुख्य रूप से कपास और मूंगफली की खेती होती है और रबी की प्रमुख फसल चना है। 2021-22 में मानसून अच्छा रहा। मई में मानसून से पहले भी अच्छी बारिश हुई। इससे भूजल में पर्याप्त पानी जमा हो गया। इसका फायदा रबी की खेती को मिला।

आनंद में सौर पंप वाले किसानों ने कम पानी इस्तेमाल किया

आनंद में सौर पंप लगाने वाले किसानों ने सिंचाई में कम पानी खर्च किया। जिन किसानों के यहां सौर पंप नहीं लगे थे उनके मुक़ाबले सौर पंप इस्तेमाल करने वाले किसानों ने लगातार कम पानी खर्च किया। मानसून में दोनों ही समूहों के किसानों ने अपने 90 प्रतिशत से अधिक खेतों में धान की फसल उगाई।

रबी में सौर पंप वाले किसानों ने गेहूं और तंबाकू लगभग बराबर जमीन पर उगाए। वहीं, दूसरे किसानों की निर्भरता तंबाकू की खेती पर ज्यादा थी। गर्मियों में दोनों समूहों में बाजरा मुख्य फसल था।

अध्ययन में एक और बात सामने आई। 65 से 79 प्रतिशत किसान अपना पानी दूसरे किसानों को बेच रहे थे। सौर पंप वाले किसान पानी बेचकर होने वाली आमदनी को ध्यान में रखकर ही सिंचाई से जुड़े फ़ैसले ले रहे थे। वे पानी खरीदने वाले किसानों के खेतों तक भी पानी पहुंचा रहे थे। उनकी अपनी खेती में पानी का इस्तेमाल कम था। लेकिन पानी बेचने के कारण उन्होंने ज्यादा जमीन की सिंचाई की।

दोनों तरह के किसानों को कम गहराई पर भूजल मिल जाता था। हालांकि, सौर पंप न इस्तेमाल करने वाले किसानों के कुएं ज्यादा गहरे थे।

आनंद में सौर पंप वाले किसान कम पानी में सिंचाई कर रहे थे। इसकी मुख्य वजह सौर योजना से मिलने वाले आर्थिक लाभ और किसानों के व्यवहार में आया बदलाव था:

  • बिजली बेचने का फायदा: सौर पंप वाले किसान बची हुई बिजली ग्रिड को बेच सकते थे। इसलिए कम पानी निकालकर ज्यादा बिजली बेचना उनके लिए फायदेमंद था।

  • पानी की ख़रीद-बिक्री: कई सौर पंप वाले किसान दूसरे किसानों को पानी भी बेचते थे। ऐसे किसानों को अपने खेतों में पानी का इस्तेमाल सोच-समझकर करना पड़ता था, ताकि बिजली बेचकर ज्यादा कमाई हो सके।

  • फसल उगाने के तरीक़ों में बदलाव: सौर पंप वाले किसान रबी में गेहूं और तंबाकू की खेती लगभग बराबर करते थे। इससे पानी की जरूरत कम होती थी, क्योंकि तंबाकू में ज्यादा पानी लगता है।

  • पानी की कीमत का असर: पानी ख़रीदने वाले किसानों को आमतौर पर इसका भुगतान प्रति घंटे के हिसाब से करना पड़ता था। पानी महंगा होने पर वे कम समय तक पंप चलाते थे या पानी का ज्यादा सावधानी से इस्तेमाल करते थे।

  • भूजल तक आसान पहुंच: सौर फीडरों में लगे कुएं कम गहरे थे। इसलिए वहां भूजल निकालना आसान था। फिर भी बिजली बेचने से होने वाले आर्थिक फायदे ने किसानों को पानी कम निकालने के लिए प्रोत्साहित किया।

आनंद में सौर योजना के बाद किसानों ने फसल चुनने का तरीका बदल दिया। इससे प्रति हेक्टेयर पानी का इस्तेमाल भी कम हुआ। साथ ही, पानी की खरीद-बिक्री के कारण सिंचाई का क्षेत्र बढ़ा।

बोटाद में सौर और गैर-सौर किसानों के पानी के इस्तेमाल में कोई खास अंतर नहीं मिला

बोटाद में सौर पंप से ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। यहां खेती काफी हद तक बारिश और भूजल पर निर्भर है। सूखे साल में सौर पंप वाले किसानों ने एक हेक्टेयर में ज्यादा पानी लगाया, लेकिन भूजल कम होने के कारण वे ज्यादा जमीन पर खेती नहीं कर पाए।

2021-22 में बारिश अच्छी रही। सौर और सामान्य पंप वाले किसानों ने इस दौरान लगभग बराबर पानी से सिंचाई की। दोनों के यहां खेती का रकबा भी करीब-करीब समान रहा।

2022-23 में बारिश कम हुई और भूजल का स्तर भी कम हो गया। इसका असर खेती पर पड़ा और खेती का रकबा घट गया। रबी फसल भी बहुत कम बोई गई।

सौर पंप वाले किसानों ने कपास की फसल को बचाए रखने के लिए इसकी सिंचाई में प्रति हेक्टेयर ज्यादा पानी का इस्तेमाल किया। दूसरी ओर, सामान्य पंप वाले किसानों के पानी की खपत करीब 440 मिमी तक ही बनी रही। उनके उथले कुओं का पानी जल्दी खत्म हो गया था।

सौर पंप लगने के बाद भी बोटाद में खेती का दायरा नहीं बढ़ सका। यहां के किसान अब भी बारिश और पथरीली ज़मीन के नीचे मौजूद सीमित पानी पर ही निर्भर हैं। सौर पंप वाले किसानों ने कम जमीन पर खेती की, लेकिन कपास की फसल को ज्यादा पानी दिया। कम बारिश और भूजल की कमी के कारण कुल खेती में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हो सकी।

हर इलाके के लिए अलग भूजल नीति जरूरी है

अध्ययन से यह साफ़ है कि सिंचाई की तकनीक का असर हर इलाके में एक जैसा नहीं होता। इसका असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि जमीन के नीचे कितना पानी है और जमीन की बनावट कैसी है।

शोधकर्ताओं ने भूजल की अलग-अलग स्थिति वाले दो इलाकों की तुलना की। एक जगह पानी चट्टानों के बीच जमा था, तो दूसरी जगह मिट्टी की परतों में। इसलिए दोनों जगह किसानों ने सिंचाई के लिए अलग-अलग मात्रा में पानी इस्तेमाल किया।

जहां जमीन के नीचे पानी कम जमा होता है, वहां खेती के लिए बिजली से ज्यादा पानी की उपलब्धता मायने रखती है। किसान के पास जितना पानी होता है, उसी के हिसाब से वह तय करता है कि कितनी जमीन पर खेती करनी है और कौन-सी फसल बोनी है।

अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि ग्रिड से जुड़े सौर पंप भूजल पर बढ़ते दबाव को कुछ हद तक कम कर सकते हैं। लेकिन भूजल बचाने में इनकी मदद हर इलाके में एक जैसी नहीं होगी। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वहां भूजल कितना है, खेती का तरीका क्या है और किसान सौर बिजली किस दाम पर बेच सकते हैं।

सौर पंपों से मिलने वाले आर्थिक फायदे के कारण आनंद में किसानों ने पानी निकालने का तरीका बदल दिया। उन्होंने सिंचाई में कम पानी इस्तेमाल किया। लेकिन यह तभी संभव है, जब सौर बिजली बेचने पर किसानों को अच्छा दाम मिले।

गुजरात की सूर्यशक्ति किसान योजना (SKY) के मुकाबले कई राज्यों में पीएम-कुसुम योजना के तहत किसानों को कम दाम मिलता है। ऐसे में किसानों को बिजली बचाने और कम पानी निकालने का बहुत अधिक फायदा नहीं मिलेगा। इससे भूजल बचाने में सौर पंपों की मदद भी कम हो सकती है।

बिजली की दर तय करते समय सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कौन-सी फसलें उगाई जाती हैं, बिजली की मौजूदा कीमत क्या है और भूजल पर कितना दबाव है। सही दर मिलने पर किसान कम पानी निकालने, फसल का चुनाव बदलने और पानी बचाने वाली खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं।

इलाके के हिसाब से भूजल की नीतियां और प्रोत्साहन जरूरी

इस अध्ययन से पता चलता है कि भूजल बचाने के लिए हर इलाके में एक जैसी नीति काम नहीं करेगी। नीतियां और किसानों को मिलने वाला आर्थिक फायदा तय करते समय वहां की भूजल स्थिति, जमीन और मौसम को ध्यान में रखना होगा। ग्रिड से जुड़े सौर पंपों को बढ़ाने के साथ कुछ और समस्याओं पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है। इनमें शुरुआत में लगने वाली ज्यादा लागत, सब्सिडी पर निर्भरता, सरकारी और प्रशासनिक स्तर की कमियां और जरूरी ढांचे की कमी शामिल हैं। इसके अलावा, यह भी देखना होगा कि इन योजनाओं का फायदा अलग-अलग किसानों तक एक बराबर पहुंचे।

ग्रिड की अस्थिरता और वोल्टेज में उतार-चढ़ाव से भी सौर पंपों के काम पर असर पड़ सकता है। वोल्टेज में ज्यादा बदलाव होने पर इन्वर्टर (सौर बिजली को पंप चलाने लायक बनाने वाला उपकरण) बंद हो सकता है। अलग-अलग राज्यों में बिजली वितरण कंपनियों (DISCOM) की क्षमता भी अलग है। इससे योजना का प्रदर्शन और किसानों की कमाई भी अलग-अलग हो सकती है।

राष्ट्रीय योजना में किसानों को अतिरिक्त सौर बिजली ग्रिड को बेचने पर मिलने वाली दरों में कमी आई है। इससे किसान बची हुई बिजली बेचने के बजाय ज्यादा भूजल निकालकर खेती बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।

अब तक सौर सिंचाई की यह व्यवस्था कुछ खास इलाकों और वहां की खेती और सरकारी व्यवस्था में ही कारगर साबित हुई है।

सिंचाई की तकनीक
का असर हर इलाके में एक जैसा नहीं होता। इसका असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि जमीन के नीचे कितना पानी है और जमीन की बनावट कैसी है।

इसलिए सौर सिंचाई को सफल बनाने के लिए बेहतर कर्ज व्यवस्था, मजबूत बिजली ढांचा और इलाके की जरूरत के हिसाब से बिजली की दर तय करना जरूरी होगा। तभी इससे किसानों की आजीविका भी बेहतर होगी और भूजल भी बचाया जा सकेगा।

आगे किन बातों पर शोध की जरूरत है?

आगे के शोध में चार बातों पर खास ध्यान देना चाहिए:

  • भूजल पर लंबे समय का असर: अलग-अलग मौसमों में भूजल के स्तर, पानी की खरीद-बिक्री और किसानों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को देखना ज़रूरी है। इससे पता चलेगा कि अभी पानी के इस्तेमाल में आई कमी लंबे समय तक भूजल बचाने में मददगार हो पाती है या नहीं। खासकर उन इलाकों में इस पर ध्यान देना जरूरी है, जहां भूजल तेजी से घट रहा है और पानी की खरीद-बिक्री भी होती है।

  • योजना की टिकाऊपन और निरंतरता: समय के साथ सौर पंपों के रखरखाव में आने वाली दिक़्क़तों और किसानों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को भी ध्यान में रखना ज़रूरी है। अलग-अलग इलाकों में बिजली बेचने पर मिलने वाली दरों का भी अध्ययन करना चाहिए।

  • स्थानीय भूजल स्तर के अनुकूल तकनीक का चयन: अलग-अलग इलाकों में भूजल की स्थिति अलग होती है। इसलिए यह पता लगाना जरूरी है कि किस तरह के इलाके में सौर सिंचाई की कौन-सी व्यवस्था सबसे बेहतर रहेगी।

  • किसानों की आजीविका पर असर: पीएम-कुसुम जैसी योजनाओं के तहत सौर सिंचाई से किसानों की फसलें, पैदावार और आमदनी में आने वाले बदलावों का भी अध्ययन होना चाहिए। साथ ही यह देखना जरूरी है कि इससे किसान सूखे या दूसरी मुश्किल परिस्थितियों का बेहतर सामना कर पा रहे हैं या नहीं।

हर इलाके के लिए सौर सिंचाई एक जैसा समाधान नहीं

गुजरात के अध्ययन से पता चलता है कि सौर सिंचाई से भूजल के इस्तेमाल पर हर जगह एक जैसा असर नहीं पड़ता। यह वहां की भूजल की स्थिति, खेती के तरीके और किसानों को मिलने वाले आर्थिक फायदे पर निर्भर करता है।

आनंद में जमीन के नीचे पानी का भंडार अच्छा है। यहां पानी की खरीद-बिक्री भी होती है और किसानों को सौर बिजली बेचने का फायदा मिलता है। इन सबके चलते सौर पंप वाले किसानों ने सिंचाई में कम पानी इस्तेमाल किया।

इसके उलट, बोटाद में भूजल कम जमा होता है और बारिश के पानी से भी यह जल्दी नहीं भरता। इसलिए यहां खेती मुख्य रूप से बारिश और उपलब्ध पानी पर निर्भर रही। पंप सौर हो या बिजली का, पानी की कमी के कारण किसान ज्यादा खेती नहीं कर सके।

सौर सिंचाई से किसान पानी का इस्तेमाल करने का तरीका बदल सकते हैं। लेकिन भूजल बचाने में सौर सिंचाई कितनी कारगर होगी, यह उस इलाके के भूजल भंडार और किसानों को मिलने वाले आर्थिक फायदे पर निर्भर करता है। जहां जमीन के नीचे पानी ही कम है, वहां सिर्फ तकनीक लगाकर पानी नहीं बढ़ाया जा सकता।

भारत में खेती के लिए बिजली और पानी की जरूरत पूरी करने के लिए सौर सिंचाई का इस्तेमाल बढ़ाया जा रहा है। गुजरात का अनुभव बताता है कि सरकार को किसानों को मिलने वाले आर्थिक फायदे, खेती के तरीके और भूजल से जुड़ी नीतियां इलाके की भूजल स्थिति के हिसाब से तय करनी चाहिए। तभी सौर सिंचाई से किसानों को फायदा होगा और भूजल भी बचाया जा सकेगा।

मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस लेख का हिन्दी अनुवाद डॉ कुमारी रोहिणी ने किया है।

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