

सुबह के करीब 7 बज रहे है। मैं मध्य प्रदेश के पांढुरना जिला मुख्यालय से लगभग 10 किमी दूर देवखापा में हूं। पांढुरना से संतरे के लिए मशहूर नागपुर को जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-47 के किनारे अपने बाग़ में आशीष आखरे घूमते हुए दिखाई देते है। सुबह की हल्की धूप में वो गौर से पेड़ की पत्तियों, तनों और ज़मीन को देखते है।
वे खेत में लगे संतरे के पौधों की कतारों के बीच जाकर पौधों का ध्यान रखते हैं। वे धीरे-धीरे पौधों के बीच चलते है और कुछ क्षण पौधों के पास रुककर देखते हैं। कहीं पत्तियों का रंग बदला तो नहीं? तने पर फफूंद का कोई निशान तो नहीं? सिंचाई से पर्यांप्त पानी मिल रहा है या नहीं?
पेशे से अकाउंटेंट आखरे लगभग 7 एकड़ में संतरे की खेती करते है। बीते सालों में मौसम में हो रहे परिवर्तनों के चलते उन्हें खेती के कैलेण्डर में भी बदलाव महसूस हुआ। इससे उन्हें नुकसान भी हुआ। मगर निराश होने के बजाए उन्होने खेती में हो रहे परिवर्तन के अनुसार नवाचार करने शुरू किए। वो अपने बाग़ को किसी प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करते है जहां मिलने वाली सीख बाकी किसानों के लिए कारगर होती है।
आशीष आखरे उनके खेत में।
फ़ोटो - सयाली पराते
बीते 10 सालों से संतरे की खेती कर रहे आखरे के बाग़ में फिलहाल 900 के करीब संतरे के पेड़ हैं। आखरे बताते हैं की पहले मौसम का एक क्रम होता था, बारिश समय पर आती थी, सर्दी अपने समय पर पड़ती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब कभी भी बारिश आ जाती है या फिर लंबे समय तक बारिश नहीं होती। सबसे ज्यादा नुकसान तब होता है, जब लगातार बारिश होती है। इससे पानी संतरे के पौधों में भर जाता है, पौधे की जड़ इसे सहन नहीं कर पाती।
2016 में ऐसी ही एक आपदा के दौरान लगातार बारिश के बाद उनके खेत में पानी भर गया। वो याद करते हुए कहते हैं, “उस साल बहुत बारिश हुई और पानी संतरों के पेड़ों की जड़ों में जमा हो गया। इसका नुकसान यह हुआ की पेड़ों की पत्तियां पिली पड़ने लगीं।
“खेती में लगातार हो रहे बदलाव और जानकारी के कमी के कारण किसान जोखिम झेल रहे थे। जब फसल खराब होती है तो उसका कारण समझ नहीं आता। कई बार ग़लत सलाह से नुकसान ज्यादा होता है।” आखरे कहते है।
फ़ोटो - सयाली पराते
यह अनुभव केवल आखरे का नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में संतरा किसानों के सामने बाजार की चुनौतियों के साथ मौसम की अनिश्चितता भी बड़ी समस्या बनकर उभरी है।
ICAR की एक समीक्षा के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण फसल की बढ़ती अवधि छोटा हो जाता है। इससे पौधे को बढ़ने और फल विकसित करने के लिए कम समय मिलता है। विशेष रूप से फसल की अंतिम अवस्था में पड़ने वाली अत्यधिक गर्मी पौधों की वृद्धि और विकास को नुकसान पहूंचाती है। तापमान और पानी की उपलब्धता में बदलाव के कारण किसानों के लिए सामान्य उत्पादन बनाए रखना कठिन हो जाता है।
आपदा जोखिम न्यूनीकरण की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन ने विदर्भ के संतरा किसानो पर सूखे के प्रभावों का अध्ययन किया। शोध के अनुसार क्षेत्र में लगभग हर दूसरे साल सूखे की स्थिति देखी जा रही है और इससे संतरे की फसल प्रभावित होती है। अध्ययन ने किसानों के अनुकूलन रणनीतियां को भी देखा। अध्ययन के अनुसार विदर्भ में 2019 के गंभीर सूखे के दौरान लगभग 60% संतरे के बाग प्रभावित हुए। पांढूरना क्षेत्र विदर्भ से लगा हुआ है।
2019-20 की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में संतरे की कुल भूमि 4.79 लाख हेक्टेयर है। संतरे के उत्पादन में प्रमुख रूप से मध्य प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान और हरियाणा राज्य शामिल है। पांढुरना मध्य भारत का प्रमुख संतरा उत्पादक क्षेत्र माना जाता है। यहां हजारों किसान संतरे की खेती पर निर्भर है।
आखरे बताते हैं कि पहले किसान मौसम के अनुभव के आधार पर खेती करते थे, लेकिन अब हर मौसम अनिश्चित लगने लगा है। इसलिए अब फसल आने से पहले अपने निर्णयों को भी बदलना पड़ता है। “अब खेती कैलेंडर देखकर नहीं होती। हर हफ्ते मौसम देखना पड़ता है।” आखरे ने कहा।
फ़ोटो - सयाली पराते
2016 के नुकसान के बाद आखरे ने यूट्यूब और स्थानीय विशेषज्ञों से बदलते मौसम में खेती करने के नए तरीके सीखे। वे बताते है, “अगर उस समय कारण समझ नहीं आता, तो शायद पूरा बगीचा खत्म हो जाता।”
उन्होंने सबसे पहले जल निकासी पर काम किया। वर्षा के दौरान खेत में पानी रुकने से रोकने के लिए नालियां बनवाईं ताकि अतिरिक्त पानी जल्दी बाहर निकल सके। उनका अनुभव है कि संतरे के पौधे की बारिश का पानी अगर जड़ों के आसपास लंबे समय तक खड़ा रहा तो पौधा कमजोर होना तय है।
उनका कहना है कि किसान बीमारी दिखने के बाद उपचार शुरू करता है तब तक देर हो चुकी होती है। इसलिए मौसम देखकर पहले से तैयारी करनी पड़ती है।
वो कहते हैं, “यदि पत्तियां हल्की पीली होने लगें तो यह पोषण की कमी या जड़ों में समस्या का संकेत हो सकता है।” इस तरह वे हर बदलाव का परिणाम देखने लगे।
कौन-सी खाद किस समय देनी है, किस मौसम में कौन-सी बीमारी आती है, कितनी बारिश के बाद कौन-सा उपचार जरूरी है उन्होंने हर अनुभव को नोट करना शुरू किया।
वे कहते है तने से गोंद जैसा द्रव निकलना फाइटोफ्थोरा जैसे रोग का संकेत हो सकता है। नई पत्तियों का सिकुड़ना या फल का समय से पहले गिरना भी अलग-अलग समस्याओं की ओर इशारा करता है।
फ़ोटो - सयाली पराते
वे कहते है, मैं रोज हर पौधे के पास जाता हूं। पौधा बोलता नहीं है, लेकिन उसकी पत्तियां और तना बहुत कुछ बता देते है। वे हर बारिश के बाद सबसे पहले खेत का निरीक्षण करते है।
आखरे के अनुसार यदि लगातार बारिश की संभावना हो तो पहले ही फफूंदजनित रोगों से बचाव की तैयारी करते है। अधिक नमी वाले मौसम में तनों पर बोर्डो पेस्ट लगाते है ताकि संक्रमण का खतरा कम हो। अत्यधिक वर्षा के बाद जड़ों के उपचार के लिए ड्रेंचिंग करते है।
वे बताते हैं कि एक बार फाइटोफ्थोरा फैलने के बाद उसे नियंत्रित करना कठिन होता है। इसलिए रोकथाम ही सबसे अच्छा उपाय है। इसी तरह पौधों की पोषण व्यवस्था भी मौसम के अनुसार बदलती है। फूल आने से पहले फास्फोरस आधारित उर्वरकों का उपयोग, सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित प्रयोग और सिंचाई का समय, ये सभी निर्णय मौसम को ध्यान में रखकर लिए जाते है।
2016 का साल आखरे के लिए चुनौतीपूर्ण था। मगर इसके बाद किए प्रयोगों में उनको सफलता मिली और परिणाम भी बेहतर आए। “मैने जुलाई की बारिश के बाद अगस्त माह में उसकी ड्रिंचिंग की, निराई-गुड़ाई की उसका फायदा हो गया। संतरे की फसल अच्छी आयी।”
पांढुरना के अन्य किसान भी इसी बात को दोहराते है। इस आभाव के चलते बदलते हुए मौसम में फसल बचाना मुश्किल हो गया था। मगर आखरे की सफलता के बाद और भी किसान उनसे जुड़ने लग गए। इन्हें आखरे फसल की बोवाई के तरीके से लेकर खाद की जानकारी तक सब कुछ बताते हैं।
किसान अमोल पारडसिंघे और अनिरुद्ध आखरे
फ़ोटो - सयाली पराते
ऐसे ही एक किसान अनुरुद्ध आखरे जो 2200 पेड़ों के साथ संतरे की खेती करते हैं, ने भी खेत में प्रयोग करना शुरू किया। इससे हुए लाभ को ऐसे बताते हैं,
“5 साल पहले तक हम किसान क्रेडिट कार्ड का लोन भी नहीं चुका पाते थे। अब इसे चुकाने के बाद लाभ भी बचता है।” वह कहते हैं कि सही वक्त पर सही मार्गदर्शन मिलने के कारण यह संभव हो सका है।
इसी तरह अमोल पारडसिंघे 1100 पेड़ के साथ संतरे की खेती करते हैं। “2020 तक मैं ज्यादा उत्पादन नहीं ले पता था, मैंने गांव के ही आशीष आखरे की फसल देखकर उनसे संपर्क किया, उनसे बात करके लगातार उनके मार्गदर्शन में मैंने संतरे की फसल को खाद और स्प्रे देना शुरू किया।”
किसान आशीष आखरे अपने नेटवर्क के किसानो के साथ।
फ़ोटो - सयाली पराते
जब उन्होंने संतरे की खेती शुरू की थी तब अधिकांश लोग इसे एक सामान्य प्रयोग मान रहे थे। वे बताते है कि वर्ष 2023 में पहली व्यावसायिक फसल आने के बाद स्थिति बदल गई। वे उदाहरण देते हुए कहते है की यदि 100 रु का निवेश किया जाता है, तो 30 रु (30%) लागत में खर्च होंगे और 70 रु (70%) लाभ के रूप में बचेंगे। गांव के किसानों ने पहली बार देखा कि वैज्ञानिक तरीके से की गई बागवानी बेहतर आय दे सकती है।
इसके बाद किसानों ने उनसे सवाल पूछना शुरू किया, ड्रिप कैसे लगाएं? कौन-सी खाद दें? पौधों की दूरी कितनी रखें? बारिश के बाद क्या करें? वे कहते है उनके पास देवखापा सहित आसपास के कई गांवों के लगभग 250 से 300 किसान किसी न किसी रूप में उनसे जुड़े है। कुछ सीधे उनके खेत पर आते हैं तो कुछ फोन पर सलाह लेते हैं।
किसान सिद्धार्थ आखरे और चेतन आखरे ।
फ़ोटो - सयाली पराते
सिद्धार्थ आखरे कहते है की मुझे अपने पेड़ों में कभी कोई समस्यां दिखाई देती है तो मैं सबसे पहले आशीष के पास पहुंचता हूं या फिर उनको अपने खेत में बुलाता हूं। यह साल उनके फसल का पहला साल है जब उनके खेतो में फल लगेंगे और उनको उम्मीद है की उन्हें अच्छा उत्पादन होगा।
चेतन आखरे ने भी साल 2017 में फसल लगाना शुरू किया। वे कहते है हमें इसकी ज्यादा जानकारी नहीं थी, तभी हमने आशीष आखरे के मार्गदर्शन में काम करना शुरू किया। चेतन कहते है मेरी फसल में उत्पादन नहीं था और उस समय आशीष आकरे के खेत में अच्छा उत्पादन था। फिर मैंने उनसे चर्चा करना शुरू किया।
कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के एक अधिकारी के अनुसार किसानों की समस्याओं के समाधान और खेती की गतिविधियों की पूर्व-योजना के लिए सालभर की कार्ययोजना और प्रशिक्षण तैयार किए जाते हैं, जिसके आधार पर किसानों को सिफारिशें दी जाती हैं।
अधिकारी के मुताबिक, हर विषय विशेषज्ञ का फील्ड विजिट प्लान होता है। नियमित बैठकों के अलावा फील्ड डे, अन्य गतिविधियों और किसानों के खेतों के दौरे के जरिए वैज्ञानिक निगरानी की जाती है।
आखरे कहते हैं, “मैंने आज तक किसी भी कृषि वैज्ञानिक को खेत का निरिक्षण करते हुए नहीं देखा।” यहां के कई किसान भी उनकी इस बात से इत्तेफ़ाक रखते है
फ़ोटो - सयाली पराते
हाल के 2023–24 के छिन्दवाडा और बैतूल के अध्ययन में 240 आदिवासी किसान के बीच सूचना के कमजोर संपर्क, अपर्याप्त/समय से पहले प्रदर्शन और नई प्रौद्योगिकियां से संबंधित जानकारी की कमी प्रमुख समस्याओं में मिली।
मध्य प्रदेश के सागर जिले में किसानों के बीच कृषि विज्ञान केंद्र के ज्ञान को लेकर हुए एक अध्ययन के अनुसार 510 किसानों में से सिर्फ़ 170 (33.33%) ने केवीके सेंटर के बारे में अपनी जानकारी कंफर्म की। शोध के अनुसार जिन 170 किसानों में से सिर्फ़ 12 (7.06%) ने बताया कि वे कभी-कभी केवीके जाते हैं, जबकि 58 (34.12%) ने कभी-कभार और ज़्यादातर 100 (58.82%) ने कभी किसी केवीके प्रोग्राम में हिस्सा नहीं लिया।
हालांकि कृषि विज्ञान केंद्र की किसानों तक पहुंच में कमी इसके कम स्टाफ के कारण भी है. एक राष्ट्रीय केवीके आकलन के अनुसार मध्य प्रदेश में वैज्ञानिक के पदों में 20.63% रिक्तिया और तकनीकी सहायता कर्मचारी में 5% रिक्ती दर्ज की गई थी।
यानि एक बड़ा वर्ग अब भी मौसम के अनुकूल खेती करने के तरीकों से वंचित है। जिन संस्थानों तक इसकी जानकारी पहुंचाने का भार है वो भी अंडर स्टाफ हैं। ऐसे में आखरे जैसे किसान जलवायु परिवर्तन की त्रासदी में इन किसानों के मददगार साबित हुए हैं।
सयाली पराते एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म के क्लाइमेट चेंज मीडिया हब की मेंटी है। यह कार्यक्रम जर्मनी की इंटरलिंक अकादमी द्वारा समर्थित है।
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